भोजन पानी से निवृत्त होकर, कुछ देर फेसबुकियाने के बाद लेटा ही था कि किसी के गाने की निहायत बेसुरी आवाज़ कानों मे पड़ी. कोई गाता हुआ जा रहा था, “कंकरिया मार के जगाया, कल तू मेरे सपने मे आया, बालमा ! तू बड़ा वो है…” वह रुक कर तो गा नही रहा था बल्कि गाता हुआ जा रहा था इसलिये पूरा गाना सुनने से तो बच गया मगर एक दूसरी उलझन ने घेर लिया. “… बालमा, तू बड़ा ‘वो’ है…” ये ‘वो’ क्या है ? ‘वो’ माने कैसा ? कौन से गुण / दुर्गुण या लक्षण बालमा को “वो” की पदवी देते हैं ? ये “वो” आख़िर है क्या ?
चिन्तन किया (
मेरा चिन्तन अक्सर ऐसा ही होता है ) तो पता चला कि इक मै ही नही तन्हा,
“वो” के मारे हुए कई हैं, कुछ की तो समझ मे ही नही आया कि “वो” क्या है और कुछ की समझ मे आया भी तो उनका “वो”
अलग-अलग निकला. किसी के लिये ‘वो’ जो कुछ था, वो किसी के लिये कुछ
और. एक शायर ने फरमाया, “ वो बात सारे फसाने मे जिसका ज़िक्र
न था, वो बात उन्हे बहुत नागवार गुज़री है…” अब आप पता करते रहिये कि क्या थी ‘वो’ बात. एक और ने फरमाया और बेग़म अख़्तर ने क्या खूब अदा किया है, “ वो जो हममे तुममे करार था, तुम्हे याद हो के न याद
हो…” अब यहां भी वही पर्दादारी… ‘वो’
करार – कौन सा ? लगता है
‘वो’ के मारे शायर ही सबसे ज़्यादा
हैं. वैसे ग़ालिब के यहाँ वो की पहचान इतनी जटिल नहीं. 'पूछते
हैं वो कि ग़ालिब कौन है ... ' में ज़्यादा झञ्झट नहीं,
वो या तो माशूक़ है या कोई रकीब़ और 'उनके देखे
से जो आ जाती है मुह पे रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल
अच्छा है' में वो तीमारदार भी हो सकता है, हकीम भी. इनमें तो दो ही विकल्प हैं तो 'वो कौन है'
का अनुमान लगाना सरल है मगर हर जगह ग़ालिब कयास को इतना सहल नहीं
छोड़ते, एक दफा ग़ालिब फरमा रहे थे, “ वो
फिराक़ और वो विसाल कहां, वो शब – ओ-
रोज़- ओ – माह-ओ – साल कहां…” पूरी ग़ज़ल मे उन्होने लिस्ट थमा दी है कि कौन कौन सी “वो” अब नही हैं मगर खुलासा अब भी न हुआ. इतना ‘वो-वो’ किया कि एक साहब झल्ला के कह उठे, “ अब बस भी करो नही तो “वो” हाल
करूँगा कि याद करोगे “ सहम कर ये भी न
पूछ सका कि ‘वो’ हाल माने कौन सा हाल ?
हमारे फिल्मकार भी
इस ‘वो’ से पीड़ित रहे. एक ने तो तमाम आलम से पूछ ही
लिया – ‘वो कौन थी’ शुद्धतावादी इसे 'वह कौन थी' पढ़ें पर असल में ये वो है. वैसे ‘वो;
और ‘वह’ में बहुत अन्तर नहीं है. एक बन्धु प्रतिवाद करते हुए बता रहे थे कि ‘वो; अशुद्ध
है, सही शब्द ‘वह’ है. हमारी राय में ‘वो’ और ‘वह’ दोनों ही शुद्ध हैं, वह ही मुख सुख
से वो हो जाता है. आम बोलचाल में वो ही कहते हैं. व्याकरण पर अधिकजायें तो सर्वमाम
दोनों ही हैं – वो को संकेतवाचक सर्वनाम कह सकते हैं तो वह को व्यक्ति/वस्तु वाचक सर्वनाम,
व्याकरणसम्मत दोनों ही हैं, बल्कि ऐसा है कि वह की जगह वो तो धड़ल्ले से प्रयोग किया
जा सकता है मगर हर वो की जगह वह नहीं कह सकते. ‘वो देखो जला घर किसी का … ‘ गाने में
वो स्पष्ट रूप से संकेतवाचक ही है, इसकी जगह वह कह ही नहीं सकते. फ़्ल्मकार तो ‘वो कौन थी ?’ फिल्म बना कर मौन हो गए पर यह ‘वो’ कौन है इसका शीर्षक से खुलासा न
हुआ, फ़िल्म ही देखनी पड़ी. इस फ़िल्म के शीर्षक में तो नहीं, एक अर्से बाद एक दूसरी फ़िल्म स्पष्ट जवाब
मिला, फ़िल्म थी “पति, पत्नी और वो”. बिना
फ़िल्म देखे, केवल शीर्षक से ही साफ है कि ‘वो’ वो है जो पति-पत्नी के बीच तीसरी / तीसरा है.
फ़िल्मी गानों में भी कुछ इशारा
मिलता है. एक इशारा यह भी मिला था कि “वो”
माने ‘बलम’ होता है. याद
कीजिये ‘वो’ गाना, “जा रे कारे बदरा बलम के द्वार, ‘वो’ हैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार…” और सलाह दी बादलों
को, “… वहीं जा के रो्ऽऽओ..” अब कोई
कालिदास का एकाधिकार थोड़े ही है बादलों को कहीं भेजने का.
पति-पत्नी के रिश्ते में भी
‘वो’ होता है. घर-बाहर के तमाम फैसले करने वाली पत्नी का जब किसी को किसी काम से इन्कार
करना होता है मगर इन्कार अपने सर नहीं लेना चाहती तो कहती है, ‘मैं तो राजी हूँ, कर
दूँ मगर हमारे ‘वो’ नहीं मानेंगे, बहुत नाराज़ होंगे. उनसे पूछ कर ही कुछ कह सकती हूँ.’
ऐसा वो पत्नियां भी कहती हैं जो अपने पति को ‘… के पापा’, ‘अजी सुनते हो’ के बजाय नाम
से पुकारती हैं. बाज पति भी अपनी पत्नी को ‘वो’ कहते हैं. तो दांपत्य में ‘वो’ का मतलब
पति/ पत्नी भी होता है.
अगर अब आप ये
सोचने लगे हों कि ‘वो’ सिर्फ इश्क़-विश्क़ से ताल्लुक रखता कुछ
है तो झाड़ू फेरिये अपनी सोच पर. ‘वो’ के
हज़ारों मायने हैं. डरिये नही, बस दो ही पेश कर रहा हूँ.
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“सर जी !
मेरे कागज आपके पास आये होंगे, देखा आपने !”
“ हाँ देखा
! क्या भेजते हो, कागज ही पूरे नही हैं.”
“जी कागज
तो सब देख कर लगाये थे, जो जो मांगा गया था, सब लगा दिया, कुछ रह गया क्या ?”
“ क्या ख़ाक
लगाया है ! जिनकी ज़रूरत नही वो सब लगा दिये और जो सबसे ज़रूरी हैं ‘वो’ तो लगाये ही नही, न हि अलग से सबमिट किया
! ”
“ जी कौन
सा रह गया, बता दें अभी लगा देता हूँ.”
“ अब सब
हमी बताएं क्या ? किसी पुराने आदमी से पूछो और कागज पूरे
करके लाओ.”
उसने किसी से पूछा और ‘वो’ कागज लगा दिये जिन पर रिजर्व बैंक के गवर्नर के
हस्ताक्षर होते हैं… उसका काम बन गया. जैसे उसके दिन फिरे,
वैसे सबके फिरें ! समझ ही चुके होंगे कि ये
वैसे ऑफिस का सीन था जहां पब्लिक डीलिंग होती है. अब अगर आप ये समझ रहे होंगे कि ‘वो’ माने यही होता है तो किसी
मुगालते मे न रहें. दूसरा सीन देखें, सीन ऑफिस का ही है मगर ‘वो’ का मतलब दूसरा है –
“ सर ! मै
फलाना बोल रहा हूँ ढिमाकी ब्रांच से. “
“ हाँ,
बोलिये ! आपको वो भेजने को कहा गया था, आपने
अभी तक भिजवाया नही. सबका आ चुका है, बस आपका बाक़ी है !
साहब बहुत नाराज़ हो रहे हैं, हमे भी आगे
भेजना होता है, आपकी वजह से ही रुका है. दस मिनट मे फैक्स कीजिये और कल
सुबह तक हार्ड कॉपी भेजिये.”
“ जी सर,
जी सर ! अभी फैक्स करता हूँ. सर, सर !
काटियेगा नही ! एक निवेदन है.”
“कहिये !”
“ सर मेरी
वो अप्लीकेशन / बिल आपके पास पहुँचा होगा. सर आपने बताया था कि मिल नही रही है तो
पिछले हफ्ते ही ऑफिस कापी मैसेन्जर से भिजवा दी थी , सेंक्सन
हो गयी क्या ! “
“ अच्छा वो
! होल्ड कीजिये, अभी दिखवाता हूँ.”
“ क्या
भेजते हैं आप लोग ! भेजने से पहले देखते नही हैं ? अल्लम-गल्लम
सब लगा दिया मगर जो ज़रूरी था ‘वो’ नही
लगाया ”
“ जी देख
तो लिया था. क्या रह गया बता दीजिये, अभी फैक्स कर देता हूँ.”
“ फारवर्डिंग
तो लगाया ही नही, पेज 3 पर गोल मोहर है
मगर किसी के इनीशियल नही हैं और पेज 4 पर सिग्नेचर हैं मगर
गोल मोहर नही लगी है और डेट नही पड़ी है. जब अपने काम मे यह हाल है तो बाक़ी का
क्या हाल होगा ! और हाँ, फैक्स न करियेगा. वापस भिजवा रहा
हूं !, इसे कवरिंग लेटर के साथ हार्ड
कॉपी भिजवाईयेगा और हाँ ! थोड़ा सबर किया कीजिए. ऐसे मॉनिटरिंग न किया कीजिए.
यहाँ कुछ रुकता नहीं है, समय से सबका निस्तारण हो जाता है.”
ये सीन तो नौकरीपेशा लोगों का खूब
जाना –
पहचान ही गए होंगे कि कोई अपने नियन्त्रक
कार्यालय से बात कर रहा है. ‘वो’ यहीं
तक नही है, एक कवि के शब्द देखें, गायक पुकार-पुकार कर कह रहा है, “… हमका हउ चाही… “ यह हौ वही ‘वो’ है मगर यहाँ ‘वो’ यानि ‘हउ’ का मतलब
दूसरा है. अब आप इस “हउ” मे कोई भद्दा/ अश्लील इशारा ढूंढने लग जायं तो इसका
क्या किया जाय कि आपके दिमाग मे वही सब भरा है.
‘वो’ के मतलब बहुत सारे हैं,
आपको ‘वो’ के कुछ और
अर्थ सूझ रहे हों तो हमे भी बताइये.









