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Saturday, 10 October 2026

पुस्तक चर्चा; काफ़ी के कप में चाय

 पुस्तक चर्चा; काफ़ी के कप में चाय

अभी एक कथेतर किताब पढ़ कर पूरी की. किताब यात्रा वृत्तांत है, सामान्य यात्रा वृत्तांत नहीं बल्कि जगहों के साथ उनसे सम्बद्ध  प्रख्यात साहित्यकारों और उनकी रचनाओं पर सांकेतिक जानकारी देती है. सांकेतिक ऐसे कि बस लेखक का नाम व उसकी किताब ( नाटक व फ़िल्म भी ) की जानकारी भर देती है, बस नामोल्लेख भर समझिए, विस्तार से विवेचन नहीं करती. उन लेखकों व कुछ पेण्टिंग्स से सम्बन्धित जगहों , संग्रहालय आदि का भी उल्लेख है कि फलां लेखक यहाँ रहता था, यह वो कैफ़े  जिसमें वे अक्सर आते, बैठते और कॉफ़ी / वाइन पीते थे.

यह वह थिएटर है जिसमें फलां प्रख्यात लेखक का एक नाटक मञ्चित हुआ था, लेखक का एक लेखक मित्र भी बड़ी मिन्नतों के बाद  नाटक में मुख्य पात्र का रोल करने को राजी तो हुआ किन्तु कतिपय कारणों से वह नाटक मे नहीं आया, नाटक उसके बिना ही हुआ. क्यों राजी नहीं हुआ, नाटक फिर उसके बिना हुआ और कौन थे वे लेखक, वह कतिपय कारण क्या था जिससे उसने मुख्य रोल करने के लिए सहमति देने के बाद भी छोड़ दिया, नाटक का नाम क्या था – इन प्रश्नों के उत्तर से बेहतर होगा कि उतना अंश ही देखें –

… “मैंने सार्त्र को मुम्बई में पढ़ा था. ये कितना अजीब लगता है कि वो असल में एक जीता-जागता इंसान था जो यहाँ रहता था. यहाँ से सड़क पर करके सामने दिख रहे Café’ de Flore में जाकर अपनी पार्टनर Simone De Beauvoir के साथ बैठकर जाने क्या-क्या बहसें करता था. फिर वापस आकर इसी लैंप के पास बैठ कर लिखता होगा. तुम्हें पता है, यहाँ एक थिएटर है Theater du Vieux-Colombier, जहाँ उनका नाटक Huts Clos ( No Exit) पहली बार प्रदर्शित किया गया था. तुम वो देखना चाहोगी ?”

“चलो.”

हम दोनों उनका घर पार करके आगे की तरफ बढ़े. दाहिने हाथ पर एक गली में घुसते ही हमें वो थिएटर मिला.

“ 27 मई, 1944 को पहली बार वह नाटक खेला गया था. सार्त्र ने कामू से पूछा था इस नाटक में मुख्य किरदार करने के लिए. बहुत मिन्नतों के बाद कामू ने हाँ कहा था. पर रिहर्सल शुरू होते ही कामू का अफ़ेयर इस नाटक की अभिनेत्री से शुरू हो गया. वो अभिनेत्री सार्त्र की Muse थी उस वक़्त. मुझे लगता है इसी वजह से जब ’ No Exit’ नाटक पहली बार खेला गया था तो उसमें कामू नहीं था .” …

( बाद के प्रदर्शनों में कामू था या नहीं, इस पर लेखक ने कोई प्रकाश नहीं डाला है )

                   इस अंश में जगह का नाम है. केवल जगह का नाम नहीं कि लेखक वहाँ गया बल्कि वह जगह आम पर्यटकों में नहीं बल्कि साहित्यिक रुचि के लोगों के बीच क्यों मशहूर है, यह इस वर्णन से स्पष्ट होता है.

इस अंश में पात्र वहाँ मौजूद है तो बता रहा है, जहाँ वो मौजूद नहीं भी है या नहीं गया है,  वहाँ  के भी लेखकों के बारे में बताता है कि अगर वह वहाँ जाता तो किन लेखकों की वजह से जाता या वह जगह किन साहित्यकारों की वजह से जाने योग्य है, क्यों साहित्यिकों के बीच मशहूर है.  ऐसा ही एक अंश देखें -

        ... काफ़्का  की वजह  से  मेरी यात्राएँ शुरू हुई थीं. मैं पहली बार प्राग काफ़्का और निर्मल वर्मा के लिए ही आया था. उसके बाद से मेरी हर यात्रा किसी-न-किसी लेखन या लेखक की वजह से होती रही.

                   अमिताव घोष की  'द  ग्लास  पैलेस'  पढ़ने के बाद मैं रत्नागिरि गया था. फिर उनकी 'द हंगरी टाइड'  पढ़ते ही सुन्दरबन में जाकर रहा था. निर्मल वर्मा की वजह से शिमला और उन्हीं की वजह से जब भी दिल्ली जाता था, एक बार हुमायूँ की दरगाह ज़रूर जाता था. रस्किन बॉण्ड की वजह से लैंडोर और जिम कार्बेट की वजह से मैं उत्तराखण्ड के जंगलों की ख़ाक छानता रहा था. फिर मैंने लिस्ट बनाई थी कि फ़र्नाडो पेसोआ और सारामागो के लिए एक दिन पुर्तगाल जाऊँगा, कार्ल ओवे क्नाउसगार्ड के लिए नॉर्वे घूमना है और एलेना फ़ेरांटे को पढ़ने के बाद इतनी तेज़ इच्छा हुई कि कैसे भी नेपल्स चला जाऊँ. नूरी के हाथों में एलेना फ़ेरांटे की किताब देखकर अचानक मेरी नेपल्स जाने की इच्छा और बढ़ गई थी ...

 ऐसे ही पेण्टिंग्स का उल्लेख किताबों व उनके अंश की अपेक्षा अधिक विस्तार से किया गया है. पेण्टिंग का विश्लेषण, पेण्टिंग के साथ पेण्टर की मनोदशा का विश्लेषण अच्छा किया है. यह उन पेण्टिंग्स को देखने की नयी/ सही दृष्टि देती है. कुछ पेण्टिंग्स की, जैसे ‘मेडुसा’ की विशद व्याख्या है. एक संग्रहालय में संगमरमर की एक नग्न पुरुष की मूर्ति का वर्णन है.

संग्रहालयों में भी अगर पेरिस है तो वहाँ के लूव म्यूजियम आदि, जहाँ पेरिस जाने वाल हर पर्यटक ज़रूर जाता है, का उल्लेख नहीं है, शायद इसलिए भी कि वहाँ कोई मशहूर लेखक नहीं रहता है. पेरिस की पहचान जैसे  एफ़िल टॉवर का उल्लेख है तो बस इस तरह के वाक्यों में निपटा दिया गया है –

‘ दूर एफ़िल टॉवर की लाइट  दिख  रही थी / तभी मेरी निगाह चमकते हुए एफ़िल टॉवर पर पड़ी / दूर एफ़िल टॉवर  दिख रहा था …

किताब में यह सब स्थान अधिकतर यूरोप के हैं, पर्याप्त बर्फीले, ठण्डे .                                                                   यह शहर बहुधा वे हैं जो किसी नदी के दोनों किनारों पर बसे हैं, उन्हें एक पुल से पार करके दूसरे हिस्से में जाना होता है. वहाँ लेखक ( किताब का पात्र ) बहुत ठण्ड महसूस करता है. वह ठण्ड से बचाव के लिए पर्याप्त गरम कपड़े लेकर नहीं जाता या ले भी जाता है तो उन्हें होटल में छोड़ कर, वहाँ की ठण्ड को जानते हुए भी स्वेटर या जैकेट पहने बिना ही निकल पड़ता है, देर करता है ताकि भयंकर ठण्ड में ठिठुरने का अहसास कर सके. भारत में बंबई ( किताब में मुंबई नहीं लिखा है) है, कलकत्ता है किन्तु ज़िक्र भर है. थोड़ा वर्णन कश्मीर का है पर उसमें भी वह थोड़ा लंबा प्रवास गुरेज़ में करता है जो अत्यधिक ठण्डा, पाकिस्तान की सीमा पर है. वहाँ भी वह गरम कपड़े नहीं ले जाता है . ठण्ड से कांपने पर होटल मालिक से मांग कर स्वेटर पहनता है. उस होटल में उसके अलावा कोई और नहीं ठहरा होता है. अगर वह होटल से जैकेट, स्वेटर आदि पहन कर निकला भी तो ठण्ड को खूब अच्छी तरह आत्मसात करने के लिए जैकेट खोल देता है, स्वेटर उतार देता है और सिर्फ़ टी शर्ट में कांपता, ठिठुरता, ठण्ड को अपने अन्दर घुसाता, ठण्ड से शरीर सुन्न पड़ जाने की अवस्था तक टहलता रहता है. ठण्ड के प्रति इतने आत्मघाती प्रेम की अनुभूति पाठक को भी उस ठण्ड में खींच ले जाता है.  इस तरह पाठक भी भयंकर ठण्ड और उसके ठण्ड प्रेम का अहसास करता है.  ठण्ड के अहसास के लिए भी यह किताब पढ़ें.

शहर के कई कैफ़े / रेस्तरां का , पी गयी कॉफ़ी / बियर/ वाइन/ डिनर की  भी बात है, उनके मूल नाम और वर्तनी में.

कुल मिला कर ‘कॉफ़ी के कप में चाय’ बहुत अच्छा यात्रा वृत्तांत है. जगहों के साथ मौसम, कैफ़े, लेखकों, उनकी  किताबों, संग्रहालयों, पेण्टिंग्स आदि के बारे में बहुत जानकारी मिलती है, आप अगर विदेशी क्लासिक साहित्य के रसिया हैं, उन्हें पढ़ा है या जानते भर ( मतलब नाम व सन्दर्भ से परिचित भर ) हैं पर उनसे मिले नहीं हैं तो आपको इसमें बहुत रस मिलेगा. नहीं जानते या पढ़ा तो आप प्रभावित तो हो ही जाएंगे, हो सकता है कि लेखक के ज्ञान, रुचि और जानकारी से आतंकित भी हों कि लेखक ( किताब का लेखक, किताब में पात्र नहीं जो लेखक है ) ने कितना अधिक पढ़/ गुन रखा है, वह भी उत्कृष्ट / क्लासिक/ विश्व साहित्य ! न केवल पढ़ा बल्कि उन जगहों पर खूब घूमा भी है.  आप चमत्कृत हो सकते हैं कि लेखक कितना विकट पढ़ाकू है और कितना विकट यायावर ! उसकी यायावरी वैसा पर्यटन नहीं है कि टूर ऑपरेटर से बुकिंग करा ली, लक्ज़री शिप/ प्लेन/ कार/ बस से घूमते हैं, लक्ज़री होटलों में ठह्रराए जाते हैं, बेहतरीन खाना खाते, चर्चित टूरिस्ट प्लेस पर जाते और खरीदारी करते हैं. उन्हें तो सब करा-कराया मिलता है बस पैसा खर्च करना होता है. वह यायावरी नहीं, यायावरी तो वह है जो विकट यायावर, राहुल सांकृत्यायन ने की या लेखक ने. इसे ध्यान में रख कर ही सम्भवतः इस किताब का मुख्य पात्र भी एक लेखक है और एक अन्य पात्र फ़िल्मकार.

कुल मिलाकर यह किताब बहुत बढ़िया है, पठनीय है, मानव कौल के प्रशंसकों को, उनकी लेखन शैली को पसम्द करने वालों को बहुत पसन्द आएगी. मुझे भी अच्छी लगी, अपना आप समझ लें !  

                            बस एक बात मुझे अटपटी लगी कि इतने अच्छे यात्रा वृत्तांत को उपन्यास क्यों कहा ! इसकी श्रेणी कथेतर / यात्रा वृत्तांत न होकर उपन्यास क्यों है ! किताब के उस पेज पर, जिस पर प्रकाशन, आवरण ऑर्टिस्ट आदि की सूचना दी जाती है, उस पर भी A Novel by Manav kaul लिखा है और पृष्ठआवरण पर भी इसे उपन्यास ही लिखा है.  सम्भवतः इसलिए कि दाल में नमक और घी की तरह, हींग आदि से छौंक की तरह इसमें कहानी भी है. प्रथम पुरुष में लिखे नायक ‘मैं’ के साथ अन्य भी पात्र हैं जिनकी भी कहानी है. इस आधार पर इसे कथेतर/यात्रा वृत्तांत की नहीं, उपन्यास श्रेणी में रखा गया. कुल मिला कर एक किताब में दो का मज़ा है – कथेतर/ यात्रा वृत्तांत का भी और उपन्यास का भी.

      इसमें नायक के अपने पिता से गहरे लगाव का वर्णन है. मूलतः वे कश्मीर के हैं. नायक के पिता ने दूसरी शादी भी की जिससे उन्हें एक बेटी,रूमिका है. इस दूसरे परिवार को पिता कलकत्ता में रखते हैं. स्वाभाविक ही नायक के मन में अपनी सौतेली बहन के प्रति चिढ़ है. दोनों ने एक दूसरे को प्रत्यक्ष नहीं देखा है किंतु इधर कुछ समय से वे मेल के ज़रिए सम्पर्क में भी हैं. नायक एक उपन्यासकार है और बहन उसकी कल्पना उसके एक उपन्यास मे नायक, राजिल के रूप में करती है. नायक की छवि उसके मन में राजिल की है. नायक ने इंस्टाग्राम पर अपनी सौतेली बहन को देखा है और व्हाट्स ऐप से कुछ बात भी होती है.  पिता और उनकी दोनों पत्नियों की मृत्यु हो जाती है. अब नायक पिता की स्मृतियों को सहेजने / जीने कश्मीर जाता है और अपनी बहन से मिलने कई देशों की यात्रा करते हुए पेरिस जाता है. अब उसकी भेंट बहन से हुई कि नहीं, हुई तो उनमें कैसे सम्बन्ध विकसित हुए – यह सब आप उपन्यास में पढ़ें.

              फिलहाल एक वाक्य पढ़ें जो नायक अपनी बहन से मिलने पर महसूस करता है. वे दोनों पहली बार प्रत्यक्ष मिल रहे होते हैं, इससे पहले दोनों ने एक दूसरे को सोशल मीडिया के जरिए ही जाना था, कुछ इन्स्टाग्राम की तस्वीरों के जरिए और उसकी बहन ने उसके लेखन के जरिए. बहन के मन में उसकी छवि उसके एक उपन्यास के नायक राजिल की थी. नायक पाता है कि वह प्रत्यक्ष में वैसी नहीं थी जैसी सोशल मीडिया पर. वह सोचता है , ‘क्या रूमिका भी सोच रही होगी कि वह वैसा नहीं है जैसा उसने सोचा/जाना था.

… क्या ऐसा ही होता है कि हम असल में वो होते ही नहीं है जैसे सोशल मीडिया पर दिख रहे होते हैं, या हम लिख रहे होते हैं …

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किताब – ‘कॉफ़ी के कप में चाय’

लेखक – मानव कौल

विधा – उपन्यास

प्रकाशक – हिंद युग्म

पृष्ठ 254, दाम 299/- एडिशन- पेपरबैक

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Wednesday, 23 September 2026

क्या पंचलाइट का आधार सतीनाथ भादुड़ी के उपन्यास का एक प्रसङ्ग है !


 रेणु की पंचलाइट और सतीनाथ भादुड़ी की विलायती 'लालटेन' !

क्या पंचलाइट का आधार सतीनाथ भादुड़ी के उपन्यास का एक प्रसङ्ग है !

रेणु की 'पंचलाइट' अद्भुत कहानी है, बहुत रसदार प्रसङ्गों से भरी, ऊपर से ग्राम्य जीवन का रस तो है ही जो छोटी-छोटी बातों में जीवन रस पा लेते हैं. मान-अपमान, बहिष्कार-अपनाना, ईर्ष्या, लोक संस्कृति, हँसी-उदासी ... सब पा लेते हैं.

महतो टोली के लोग ज़ुर्माना के पैसे से रामनवमी के मेले से पेट्रोमैक्स खरीदते हैं. पेट्रोमैक्स नाम तो शहराती लोगों लोगों के लिए है, शहर में भी बहुतेरे इसे गैस/गैसबत्ती कहते हैं तो महतो टोली के पंचलाइट या पंचलैट. पंचलैट इसलिए कि यह पंचायत की सम्पत्ति है. खरीदने में भी गाँव वालों की भोली चतुराई के रोचक प्रसङ्ग हैं कि कैसे दुकानदार पर रोब डाला, उसे ठगने नहीं दिया.

                  अब ले तो आए पर उसे जलाए कौन, कोई तो उसे जलाना (गाँव की बोली में बालना )नहीं जानता. पंचलैट बालने की उठापटक में बामन टोली का हँसी उड़ाने का खूब खांचा खींचा है रेणु ने , "... पंचलैट के सामने कान पकड़ कर उठा बैठी लगाओ तो जलेगी ... "

               उनकी नाक कटने को है कि ध्यान आता है गोधन जानता है पंचलैट बालना पर उसे तो जात बाहर किया गया है काहे से कि वह छिछोरा है. मुनरी को सलम-सलम (सनम) करके सलीमा का गाना गाकर छेड़ता है. ख़ैर, टोले की इज़्ज़त का सवाल है तो उसका हुक्का-पानी खोल दिया जाता है. तमाम दिक्कत और किरासिन तेल न होने के बावजूद वह गरी के तेल से ही पंचलैट बाल देता है.

           इस सफलता और ख़ुशी में उसे समाज में शामिल किए जाने की मुहर तब लगती है जब गुलरी काकी (मुनरी की अम्मा) कहती हैं,

'आज रात मेरे घर में खाना गोधन.'

    यह तो संक्षेप है, कहानी में रेणु ने इन प्रसङ्गों को सजीव कर दिया है खास शैली और वर्णन से.

आज पंचलाइट की याद क्यों ? इसलिए कि सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास 'ढोड़ाय चरितमानस' (मूल बांग्ला नाम 'धोराई चरितमानस') पढ़ते हुए एक प्रसङ्ग पर पहुँचा तो लगा, अरे ! यह तो 'पंचलाइट' जैसा है. रेणु ने सतीनाथ भादुड़ी को अपना साहित्यिक गुरु कहा है. रेणु का जन्म 1921 में हुआ था और सतीनाथ भादुड़ी का 1906 में. 'ढोड़ाय चरितमानस 1949 से 1951 के बीच लिखा गया और रेणु ने कहानी पंचलाइट 1957-1958 के बीच लिखी. पंचलाइट का रचनाकाल ढोड़ाय चरितमानस के बाद का है और रेणु सतीनाथ भादुड़ी को अपना साहित्यिक गुरु मानते थे तो सहज ही माना जा सकता है कि पंचलाइट का आधार ढोड़ाय चरितमानस का 'विलायती लालटेन' प्रसङ्ग है. उसमें जो वर्णन है, वह पंचलाइट में विस्तार से और बहुत अच्छे ढंग से है.

यहाँ यह कहने की किञ्चित भी धृष्टता नहीं कर रहा कि रेणु की कहानी उस प्रसङ्ग की नकल है. बस रेणु ने उससे प्रेरणा ग्रहण की होगी.

                  रेणु अद्भुत कथाशिल्पी थे. उन्होंने वह प्रसङ्ग पढ़ा होगा, उसमें उन्हें एक पूरी कहानी की सम्भावना लगी होगी और फिर उसे स्वतन्त्र कहानी के रूप में बहुत कुशलता से मोहक रूप में ढाला. वह एक नामालूम सी साधारण घटना थी उपन्यास नायक ढोड़ाय के जीवन की जिसे रेणु ने अद्वितीय कहानी में ढाल दिया. रेणु की कहानी में वह ग्राम्य प्रवृत्ति का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है. उस कहानी में रेणु ने रोमांस और उसकी सुखान्त परिणिति दिखाई जो उपन्यास के प्रसङ्ग के बिल्कुल नहीं है. यहाँ रेणु के अद्भुत शिल्प का पता चलता है.

      बहरहाल, कोई तुलनात्मक टिप्पणी नहीं है, न ही आक्षेप जैसा कुछ. बिना वह प्रसङ्ग पढ़े उपरोक्त सारा कुछ वाग्विलास ही है. इसलिए वह प्रसङ्ग दे रहा हूँ ताकि मेरा यह सब कहना, दोनों का साम्य आपकी अदालत में आए.

वैसे जिन सुधी पाठकों ने 'ढोड़ाय चरितमानस' पढ़ा होगा, निश्चित ही उन्होंने भी यह साम्य नोट किया होगा. ऐसे जो सुधी पाठक फेसबुक पर, उनमें भी जो यह पोस्ट देख रहे हैं, उन्होंने ऐसा कुछ लक्ष्य किया क्या ?



                       
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रेणु की पंचलाइट और सतीनाथ भादुड़ी की विलायती 'लालटेन' !

देखें  'ढोड़ाय चरितमानस' का वह अंश जिसका बहुत सरसता से विस्तार रेणु ने ‘पंचलाइट’ में किया है –

… विलायती ‘लालटेन’ के लिए बाबा ने अयोध्या जी से तीन रुपए भेजे हैं. कागज में कुछ नहीं लिखा हुआ है. बाबा के हाथ का छुआ पत्र – ढोड़ाय कितनी तरह से उसे उलट-पलट कर देखता है. कितने छुटपन की याद उसे आती है. रमिया के अलक्ष्य में वह चिट्ठी सूँघकर देखता है – बाबा की जटा की गन्ध उसमें मिलती है या नहीं. फिर यत्न के साथ उसे रमिया के बनाए हुए मूँज की ‘पोहती’ में रख देता है.

     महतो कहते हैं, “बड़े खर्च का रास्ता है, - अर्थात ‘लालटेन’ जलाने में बड़ा खर्च है. बाबा ने तेरा भला किया या बुरा, कहना कठिन है.

       छड़ीदार सहमति प्रकट करता है, “ जिसे दिवालिया बनाना हो, उसे जमींदार लोग हाथी खरीद देते हैं. फिर सँभालो उसका खर्च.”

       हरिया का लड़का कहता है – यह सब है पंचायत की तरफ से खरीद कर रखने की चीज़ ! दस-पाँच लोगों के काम-काज से पंचायत का जरा उपकार होता है. नौजवानों का दल कहता है – अरे रखो भी ! पंचायत की ‘सतरंजी’ खरीदने की बात हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, सो आज तक नहीं खरीदी गई. फिर ‘विलायती लालटेन’ जलाकर जोगीरा और बलबाही का नाच नचाएँगे पंच लोग ! इतने रुपए जुर्माने में आते हैं, सो सब क्या होते हैं ?

     महतो यह प्रसंग दबा देना चाहते हैं.

     “ ढोड़ाय अच्छी तरह देखभाल कर लालटेन खरीदना. काँच बजा लेना – ठनन ! ठनन !!”

    “ मैं क्या उतना पहचानता हूँ ? महतो, नायब, तुम ही लोग क्यों नहीं चलते  कल सुबह विलायती लालटेन का सौदा कर देने ?”

    रतिया छड़ीदार आँख मारकर महतो को न मालूम क्या तो इशारा करता है.

    “नहीं, नहीं, कल हम लोगों को सुविधा नहीं होगी, एक काम है.”

    “अरे. फट फट करते हो, तुम लोग तो मेरे ठेहुने की उम्र के हो. मेरे माथे का केश धूप में नहीं पका है. हम लोगों को हटाना चाह रहे हो कल सुबह हरखू के बाप का तेरहाँ करने के मतलब से ! इतना भी क्या मैं नहीं समझता ?”

     ढोड़ाय ! तुम ही जाना सामुअर की ग़ाड़ी में – कल भोर को जब वह काम पर जाएगा. उसने साहबों के यहाँ अनेकों विलायती लालटेन जलाए हैं. और, गाड़ी पर जाने से चीज भी देगा मजबूत. “

महतो के कहने के अनुसार ढोड़ाय सामुअर के साथ लालटेन खरीदने तो जाता है, पर सुबह नहीं, अपरान्ह में. सुबह क्या ढोड़ाय जा सकता है ? बूढ़े अपने को चाहे जितना ही चालाक समझें,उनके अँगुली उठाते ही ढोड़ाय का दल उनके सारे मतलबों को समझ जाता है.

      खबरदार ढोड़ाय, सुबह कहीं नहीं जाना. नहीं, नहीं तो पाँच-पाँच बनैले भैंसो का ताल सँभालना – पाँच क्यों, छड़ीदार को भी गिनो – छह – वह हम लोगों से नहीं होगा.

        दूसरे दिन सुबह, झगड़ा और गालियों के बीच माथा मुड़वा का पर्व शेष होता है. ततमा लोगों के किरिया-करम में पूरन नाऊ को महतो और नायब लोगों ने मना कर दिया था – हरखू के बाप के तेरहाँ में किसी का भी सर न मूड़ना. ढोड़ाय पकड़ कर ले आता है मरगामा से उस नाऊ के लड़के को.

भाग्य था कि सामुअर के साथ ढोड़ाय लालटेन खरीदने गया था. नहीं तो वह ठगा ही गया था. सामुअर था इसलिए बतला दिया कि बत्ती में दुकानदार लोग बड़ा ठगते हैं, - नीले कोर वाली बत्ती लेना. उसी रात सामुअर ढोड़ाय के के घर पर विलायती लालटेन जला देता है. भीड़ अधिक नहीं हुई थी. महतो-नायबों के दल बिगड़े हुए हैं ! वे ढोड़ाय के यहाँ आ ही नहीं सकते हैं. और ढोड़ाय का दल था कि हरखू के घर पर तेरहाँ के भोज के आयोजन में व्यस्त.

      रमिया कहती है, “ एकदम दिन की तरह प्रकाश हुआ है न ? सामुअर ढोड़ाय को कहता है – ऐसी बत्ती खरीदी तूने, एकदम दुकान की बत्ती है यह ! अब खोल दे एक दुकान. तेरी बहू होगी मोदियाइन, सौदा तौलेगी – “रामे राम, राम, रामे राम दो, दुये दू – तीन.”

       रमिया हँसकर लोट पड़ती है…

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है तो यह पंचलाइट की अपेक्षा बहुत छोटा प्रसङ्ग पर शायद रेणु ने पंचलाइट के सूत्र इसी प्रसङ्ग से लिए होंगे, उसे अपने कथा बुनने के कौशल से पंचलाइट में गूंथ कर विस्तार दिया हो सकता है.

                             आपको लगा कुछ ऐसा ?