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Monday, 6 April 2026

मोटापा

 अच्छा एक स्थिति के बारे में सोचें. कोई मोटापे से ग्रस्त हो, साधारण मोटापे से नहीं, कल्पनातीत मोटापे से. यूँ समझें कि वज़न 300 किलो के आस पास. यह बीमारी वंशानुगत हो, उसकी माँ भी मोटी रही हो, वह भी और बेटी भी. उसकी तो शादी हो गयी, बेटी भी हुई मगर बेटी भी मोटी तो शादी न हो सकी और न बेटी इस बारे में सोचती है. पति रहे नहीं, घर में खासी चलती प्रतिष्ठित बेकरी तो आर्थिक मोर्चे पर दिक्कत नहीं रही. भूतल पर बेकरी, प्रथम तल पर माँ-बेटी और एक नौकरानी. माँ तो बिस्तर पर है, तीन साल से बिस्तर पर ही है. अब किसी के अत्यन्त आग्रह पर एक जन्मदिन में उसे दूसरे शहर जाना है. उन दोनों की इच्छा भी है, इसलिए और भी कि उसके मायके का शहर है. मायके में कोई नहीं, घर बन्द पड़ा है, भाई विदेश बस गए फिर भी घर और वह शहर देखने की ललक है. जाना ठान लेती हैं पर जो बिस्तर से व्हील चेयर पर नहीं बैठी वह कैसे बिस्तर से उतरेगी, कैसे व्हील चेयर पर बैठेगी और कैसे नीचे उतर कर कार में बैठेगी ?

                  हुआ तो यह सब ! मगर कैसे ?

        सोचें ! कुछ हल बताएँ.

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कुछ संवादों/दृश्यों के सहारे बढ़ाते हैं -

- क्या मैं डॉ. डिक्रॉस्टो से कह दूँ  कि वे अपने नर्सिंग होम का एम्बुलेंस सुबह यहाँ भिजवा दें ?                          पागल हो गयी हो तुम सैंड्रा ? किसी के फंक्शन में भला एम्बुलेंस में जाया जाता है ?                     *

- सब कुछ तो हो गया है लेकिन वे बिस्तर से उठ कर ऊपर की मंज़िल से नीचे कार तक कैसे पहुँचेंगी ?       लड़कियाँ उन्हें मनुहार-समझा रही हैं कि कोई न कोई रास्ता तो निकल ही आयेगा.                          *

- अभी अचानक गेट के पास का दृश्य देख कर उसे लगा है कि उसकी आँखें हैरानी से बाहर निकल आयेंगी. विटोरिनी ने कैम्पस के गेट को पूरा खोल दिया है और पीले रंग का विशाल 'फ्रण्ट एण्ड लोडर' यानि जे.बी.सी. अपने बहुत लम्बे-चौड़े डोल यानि बकेट के साथ हाथी की चाल से धीरे-धीरे अन्दर दाखिल हो रहा है. ड्राईवर के साथ दो सहयोगी भी हैं.                                                                                                                                                 'यह क्या तमाशा है, पागल हो गया है विटोरिनो.'                          

- आंटी का व्हीलचेयर और दोनों स्टिक बेड के पास प्लीज ले आओ.  हम सबको ज़ोर लगा कर आंटी को इनके व्हीलचेयर पर बिठा देना है.  

- 'बस आंटी ! आप अपने को पूरा ढीला छोड़ दीजिए. एकदम झूले की तरह ढीला ... विटोरिनो ने आगे बढ़ कर उनकी पीठ के नीचे किसी तरह एक हाथ डाला है और इवान को अपनी तरफ आकर खड़े होने का इशारा करते हुए बेकरी की लड़कियों से कहा है, "प्लीज ... तुम लोग उधर से आंटी को सपोर्ट दो. मैं और इवान इस तरफ से.            

   मिनि रॉड्रिक्स बिस्तर में  रेत में धंसी बड़ी सी नाव की भंगिमा में पड़ी हैं और उनका विशाल पेट मचान की तरह स्थिर है. बहुत प्यार से हाथ सरकाते हुए उन्हें पीछे से गलही देकर विटोरिनो ने तकिए से थोड़ा उठाया है. अर्थर और इवान भी इस तरफ से पूरा टेक लगाए हुए हैं. दूसरी तरफ से पाँचों लड़कियों ने बहुत सँभाल कर पूरा ज़ोर लगाया हुआ है. मिनि रॉड्रिक्स को करवट दिलाना भी आसान नहीं.             

    तुम लोग हाथी को कुँए से निकालने की कोशिश कर रहे हो.                    *

- " आप सब एक मिनट किनारे हो जायें."  सैंड्रा ने बेहद ठण्डे स्वर में  कहा है और मिनि रॉड्रिक्स के स्कर्ट के भीतर नीचे से हाथ डाला है. घर की पुरानी आया इवान को पता है कि सैंड्रा अपनी मम्मी की तोंद की आख़िरी तह में हथेली घुसा रही है और अब तोंद को सहारा देकर उठा रही है. ऐसा करते ही जाने कहाँ से मिनि रॉड्रिक्स की रगों में बरबस बिजली-सी दौड़ गयी है. वे धीरे-धीरे उठ रही हैं और अब बिस्तर पर बैठ गयी हैं.                                        *

- सुपर ! आंटी बिस्तर पर बैठ गयीं और हम आधी लड़ाई जीत गये.                         *

- आंटी ! इफ नॉट नाउ, देन  वे'न.               

    प्लीज मम्मी. अपनी सारी ताकत कमर में लाओ.                        

        इवान ! मेरा दोनों हाथ पकड़ो. इस पूरी कवायद में मम्मी का पूरा शरीर थलथला रहा है. इधर इवान उनकी हथेलियों को मजबूती से थामे है. बेकरी की लड़कियाँ उनके दोनों कांख में हाथ डाल कर ज़ोर लगाए हुई हैं.                 

     डन ... ! विटोरिनो जैसे ख़ुशी से फूट पड़ा है. मम्मी अब बिस्तर से उठ कर खड़ी हैं.

- अब बाहर का स्ट्रगल. तुम लोग आंटी के व्हीलचेयर को धीरे-धीरे सरकाते हुए सीढ़ी के पास आओ. 'फ्रंट एण्ड लोडर' के ड्राइवर को उसने इशारा किया है बड़े से डोल यानि विशाल बकेट को उठाकर सीढ़ी से एकदम सटा दे.

- "मैं इसमें बैठूँगी ? हरगिज नहीं, मैं मर जाऊँगी इसमें ... मिनि  रॉड्रिक्स हिचक-हिचक कर रो रही हैं.

- जब तक सब कुछ समझें कि मिनि रॉड्रिक्स के व्हीलचेयर के पीछे का हैंडिल थाम विटोरिनो एक झटके में फ्रंट एण्ड लोडर मशीन के आदमकद डोल में दाखिल हो गया है.                                                                         आदमकद डोल अब नीचे आ गया है. विटोरिनो ने डोल में खड़े दो लोगों की मदद से व्हीलचेयर को बहुत हिफाजत से बाहर निकाला है.

- अब उन्हें कार में बिठाना है. कार का गेट खोल दिया गया. आंटी का हाथ एक लड़की ने कस कर थामा, बाक़ी की चार लड़कियों ने उनकी काँख में दोनों तरफ से हाथ डाला है. अब व्हीलचेयर एकदम गाड़ी के गेट से सटा है. इवान दूसरे दरवाज़े से किसी तरह गाड़ी के अन्दर घुसी है. विटोरिनो ने उनके दोनों हाथों में छड़ियां पकड़ा दी हैं और लड़कियों को एक बार काँख में ज़ोर लगा कर उन्हें सीट की तरफ थोड़ा झुकाने को कहा है.

- आंटी ! बस एक पाँव गाड़ी में डालिए, इवान आपको अन्दर ले लेगी.

- एक बारगी आंटी ने दांया पाँव उठाकर गाड़ी में डाला है, सबकी किलकारी फूट पड़ी.

- "इवान ! अब आंटी का हाथ पकड़ कर आहिस्ता-आहिस्ता अन्दर लेने की कोशिश करो. पीछे से इन्हें हम थामे हुए हैं. आंटी, अब आप अपना बांया पाँव उठाकर गाड़ी में डालिए प्लीज.

- ये तो कमाल हो गया, उन्होंने बायाँ पाँव भी गाड़ी में डाल दिया. अब इवान उन्हें सीट पर बिठाने के संघर्ष में जुटी है. इधर वाले गेट से बेकरी की लड़कियाँ उन्हें सीट पर अन्दर खिसकाने में भरपूर ज़ोर लगाए हुई हैं. मिनि रॉड्रिक्स अब किसी तरह सीट में समा चुकी हैं.

यह विकास कुमार झा के उपन्यास ' राजा मोमो और पीली बुलबुल' के अध्याय 'हिंडोला' पर आधारित है.

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एक सीमा से अधिक मोटापा दिक्कत तो पैदा करता हैउस मोटे के लिए भी और घरवालों के लिए भी. जब वे उमरदार होते जाते हैं, वृद्धावस्था में होते हैं तो अपने दैनिक काम करने के लिए भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है. वे दूसरे उसके परिवारीजन भी हो सकते हैं और आर्थिक रूप से सम्पन्न हों तो नौकर भी. पति / पत्नी पूरी मदद नहीं कर पाते क्योंकि वे भी लगभग उसी वय के होने के कारण अशक्त होते हैं

दो लोगों को मैंने देखा है, दिक्कतें भी देखी हैं. एक तो घर की ही थीं.

             बैंक में एक अधिकारी थे ( उनका नाम, पद और विभाग का नाम निजता की रक्षा के लिए नहीं लिख रहा हूँ ) निहायत मोटे और खाने पीने के बेहद शौक़ीन. शुगर भी थी. बदपरहेजी भी बहुत करते थे. समोसे बहुत पसंद थे और नॉनवेज भी. रोज इंसुलिन का इंजेक्शन लगाते थे. दोपहिया चला न सकते थे, कार चला न सकते थे. ड्राईवर रखा था, उसी के साथ आते जाते थे. उठना बैठना मुहाल था, कैसे न कैसे बैंक आते थे. नींद भी उनको  बहुत आती थी. बैठे बैठे कब सो जाएं, पता नहीं. मीटिंग में भी सो जाते थे.

                        जानकीपुरम विस्तार में घर था और रहते द्वितीय तल पर थे. हम लोग परिहास भी करते थे कि मर जाएंगे तो कैसे ऊपर से उतारे जाएंगे. रिटायरमेंट के बाद छह माह भी जीवित न रहे. निधन घर पर ही हुआ, जाने कैसे उतारे गए होंगे. हांलाकि बस पर ले जाया जाता है मगर कुछ दूर तो कांधों पर और घाट पर बस से उतारने के बाद तो उठा कर ही ले जाया जाता है.

                               दूसरा मैंने अपनी बहू ( छोटे चचेरे भाई की पत्नी) को  देखा. वे खासी मोटी थीं और खाने की शौक़ीन भी. घर के खाने के अलावा रोज ही बाहर का भी कुछ न कुछ खाती थीं. उनके पिताजी हलवाई थे, भाई भी कारीगर थे तो यह आदत बचपन से थी. अमीनाबाद वाले घर में रहती थीं. वहाँ से खाली हम दो भाई और एक चचेरा भाई अमीनाबाद छोड़ कर गए.                                                                   

                                                जब उनका निधन हुआ तो उठाना समस्या थी. यह तो गनीमत कि वे भूतल पर रहते हैं तो ऊपर से उतारना नहीं पड़ा. हमारा घर गलियों को पार करके अन्दर है तो शववाहन अन्दर तक नहीं आता. बहुत हुआ तो गढ़ईया , करीब आधा किलोमीटर के अंदर  या झण्डेवाला पार्क के पास खड़ा होता, वह लगभग एक किलोमीटर है.  इन्होंने पता नहीं कैसी बस की कि वह गणेशगंज पर खड़ी हुई. यह घर से करीब दो किलोमीटर है. अब वहाँ तक ले जाना मुहाल. मैं तो जेठ था इसलिए कंधा दे नहीं सकता था मगर गणेशगंज तक तो साथ में पैदल गया  ही. अब जिन्होंने उठाया वे ही जानते होंगे. थोड़ी-थोड़ी दूर पर रखते थे, फिर सहता कर उठाते थे. भारी देख कर लोग उठाने से बच भी रहे थे.

                               भैसाकुण्ड (श्मशान घाट) पर भी बस सड़क पर उतार देती है, नीचे तक और फिर चिता तक उठा कर ले जाना होता है. एक और प्रमुख घाट है गुल्लाला. वहाँ अंदर तक बस जाती है, कम दूरी तक ही उठाना होता है, फिर समतल भी है किन्तु हमारे घर के लोग भैसाकुण्ड ही ले जाए जाते हैं तो वहीं ले जाया गया.

                    तो मोटापा अगर एक सीमा से अधिक हो तो उमर बढ़ने से अंत समय तक दिक्कत देता है.

यहाँ किसी के मोटापे का उपहास नहीं कर रहा और न ही बॉडी शेमिंग है, अगर किसी को ऐसा लगता है तो क्षमाप्रार्थी हूँ. उद्देश्य इस ओर ध्यान दिलाना है कि जहाँ तक हो सके, स्वयं को अथवा परिजन को मोटा न होने दें.  कुछ लोगों का मोटापा तो वंशानुगत होता है या थायराइड के कारण हो जाता है, उनके लिए कुछ नहीं किया जा सकता किन्तु कुछ लोगों में यह अर्जित किया हुआ होता है. खूब और अस्वास्थ्यकर ( फास्ट फूड, तला-भुना, अधिक कैलोरी वाला ) खा खा कर बढ़ाया जाता है, खाने के साथ चाहे काम ऐसा हो जिसमें देर तक बैठना हो या आलस्यवश बैठे / अधलेटे ही रहें, व्यायाम न करें, पैदल न चलें, ऐसे काम न करें जिनमें कैलोरी बर्न हो, अधिक प्यार-दुलार जो खूब गरिष्ठ भोजन करा कर व्यक्त किया जाए , अल्कोहल भी लिया जाय … तमाम कारक हैं जो मोटापा बढ़ाते हैं. एक सीमा तक तो अच्छा लगता है, कम भी किया जा सकता है किंतु सीमा से बाहर हो जाने पर व्यायाम, दवा, डाइटिंग आदि भी कुछ कारगर नहीं होते. मोटापा … दिनों में कम करने का दावा करने वाले ये लुभावने विज्ञापन छलावा ही होते हैं. आप किसी मॉडल की पहले की फोटो और इनके उपचार की फोटो देखते हैं तो विश्वास सा होने लगता है कि जब ये वज़न कम कर सकती है तो मैं क्यों नहीं ! मगर यह कुछ दिन के उपचार से नहीं होता, बल्कि दवाओं या डाइटिंग से कमज़ोरी आ जाती है. उपचार की किसी भी पैथी के दावे थोथे ही होते हैं. मोटापा कोई पन्द्रह दिन / एक माह / छह माह में कम नहीं होता, यह तब ही कारगर होता है जब मोटापा शुरू होने का संकेत / लक्षण पर ही रोकथाम के उपाय किए जाएँ, यह निरन्तर निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है. ऐसा नहीं कि संयम बरत कर इच्छित आकार / वज़न पा लिया तो फिर वही सब शुरू कर दिया जिनसे आपकी कमर कमरा हुई थी. अब वह कमरा से हॉल हो सकती है. तो बेहतर है कि क्षीण कटि जब पेट होने की सीमा पार करके तोंद बनने की प्रक्रिया में हो, तभी इसे रोकें.

क्या आपके आस पास ऐसे लोग हैं, आप स्वयं हैं तो सजग हों, सजग करें. आपके कोई ऐसे सकारात्मक, प्रेरक या नकारात्मक अनुभव हों तो लिखें. क्या पता, कोई संदेश ग्रहण करे और तोंद को पुनः पेट / कटि में परिवर्तित कर दे !                                      


Monday, 9 February 2026

‘वो’ क्या है ?


भोजन पानी से निवृत्त होकर, कुछ देर फेसबुकियाने के बाद लेटा ही था कि किसी के गाने की निहायत बेसुरी आवाज़ कानों मे पड़ी. कोई गाता हुआ जा रहा था, “कंकरिया मार के जगाया, कल तू मेरे सपने मे आया, बालमा ! तू बड़ा वो है…” वह रुक कर तो गा नही रहा था बल्कि गाता हुआ जा रहा था इसलिये पूरा गाना सुनने से तो बच गया मगर एक दूसरी उलझन ने घेर लिया. “… बालमा, तू बड़ा वोहै…” ये वोक्या है ? ‘वोमाने कैसा ? कौन से गुण / दुर्गुण या लक्षण बालमा को वोकी पदवी देते हैं ? ये वोआख़िर है क्या ?

चिन्तन किया ( मेरा चिन्तन अक्सर ऐसा ही होता है ) तो पता चला कि इक मै ही नही तन्हा, “वोके मारे हुए कई हैं, कुछ की तो समझ मे ही नही आया कि वोक्या है और कुछ की समझ मे आया भी तो उनका वोअलग-अलग निकला. किसी के लिये वो’ जो कुछ था, वो किसी के लिये कुछ और. एक शायर ने फरमाया, “ वो बात सारे फसाने मे जिसका ज़िक्र न था, वो बात उन्हे बहुत नागवार गुज़री है…” अब आप पता करते रहिये कि क्या थी वोबात. एक और ने फरमाया और बेग़म अख़्तर ने क्या खूब अदा किया है, “ वो जो हममे तुममे करार था, तुम्हे याद हो के न याद हो…” अब यहां भी वही पर्दादारी… ‘वोकरार कौन सा ? लगता है वोके मारे शायर ही सबसे ज़्यादा हैं. वैसे ग़ालिब के यहाँ वो की पहचान इतनी जटिल नहीं. 'पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है ... ' में ज़्यादा झञ्झट नहीं, वो या तो माशूक़ है या कोई रकीब़ और 'उनके देखे से जो आ जाती है मुह पे रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है' में वो तीमारदार भी हो सकता है, हकीम भी. इनमें तो दो ही विकल्प हैं तो 'वो कौन है' का अनुमान लगाना सरल है मगर हर जगह ग़ालिब कयास को इतना सहल नहीं छोड़ते, एक दफा ग़ालिब फरमा रहे थे, “ वो फिराक़ और वो विसाल कहां, वो शब ओ- रोज़- ओ माह-ओ साल कहां…” पूरी ग़ज़ल मे उन्होने लिस्ट थमा दी है कि कौन कौन सी वोअब नही हैं मगर खुलासा अब भी न हुआ. इतना वो-वोकिया कि एक साहब झल्ला के कह उठे, “ अब बस भी करो नही तो वोहाल करूँगा कि याद करोगे सहम कर ये भी न पूछ सका कि वोहाल माने कौन सा हाल ?

हमारे फिल्मकार भी इस वोसे पीड़ित रहे. एक ने तो तमाम आलम से पूछ ही लिया – ‘वो कौन थी शुद्धतावादी इसे 'वह कौन थी' पढ़ें पर असल में ये वो है. वैसे ‘वो; और ‘वह’ में बहुत अन्तर नहीं है. एक बन्धु प्रतिवाद करते हुए बता रहे थे कि ‘वो; अशुद्ध है, सही शब्द ‘वह’ है. हमारी राय में ‘वो’ और ‘वह’ दोनों ही शुद्ध हैं, वह ही मुख सुख से वो हो जाता है. आम बोलचाल में वो ही कहते हैं. व्याकरण पर अधिकजायें तो सर्वमाम दोनों ही हैं – वो को संकेतवाचक सर्वनाम कह सकते हैं तो वह को व्यक्ति/वस्तु वाचक सर्वनाम, व्याकरणसम्मत दोनों ही हैं, बल्कि ऐसा है कि वह की जगह वो तो धड़ल्ले से प्रयोग किया जा सकता है मगर हर वो की जगह वह नहीं कह सकते. ‘वो देखो जला घर किसी का … ‘ गाने में वो स्पष्ट रूप से संकेतवाचक ही है, इसकी जगह वह कह ही नहीं सकते.   फ़्ल्मकार तो ‘वो कौन थी ?’ फिल्म बना कर मौन हो गए पर यह ‘वो’ कौन है इसका शीर्षक से खुलासा न हुआ, फ़िल्म ही देखनी पड़ी. इस फ़िल्म के शीर्षक में तो नहीं,  एक अर्से बाद एक दूसरी फ़िल्म स्पष्ट जवाब मिला, फ़िल्म थी  पति, पत्नी और वो. बिना फ़िल्म देखे, केवल शीर्षक से ही साफ है कि  वोवो है जो पति-पत्नी के बीच तीसरी / तीसरा है.

फ़िल्मी गानों में भी कुछ इशारा मिलता है. एक इशारा यह भी मिला था कि वोमाने बलमहोता है. याद कीजिये वोगाना, “जा रे कारे बदरा बलम के द्वार, ‘वोहैं ऐसे बुद्धू न समझे रे प्यार…” और सलाह दी बादलों को, “… वहीं जा के रो्ऽऽओ..अब कोई कालिदास का एकाधिकार थोड़े ही है बादलों को कहीं भेजने का.

पति-पत्नी के रिश्ते में भी ‘वो’ होता है. घर-बाहर के तमाम फैसले करने वाली पत्नी का जब किसी को किसी काम से इन्कार करना होता है मगर इन्कार अपने सर नहीं लेना चाहती तो कहती है, ‘मैं तो राजी हूँ, कर दूँ मगर हमारे ‘वो’ नहीं मानेंगे, बहुत नाराज़ होंगे. उनसे पूछ कर ही कुछ कह सकती हूँ.’ ऐसा वो पत्नियां भी कहती हैं जो अपने पति को ‘… के पापा’, ‘अजी सुनते हो’ के बजाय नाम से पुकारती हैं. बाज पति भी अपनी पत्नी को ‘वो’ कहते हैं. तो दांपत्य में ‘वो’ का मतलब पति/ पत्नी भी होता है.

अगर अब आप ये सोचने लगे हों कि वो’ सिर्फ  इश्क़-विश्क़ से ताल्लुक रखता कुछ है तो झाड़ू फेरिये अपनी सोच पर. वोके हज़ारों मायने हैं. डरिये नही, बस दो ही पेश कर रहा हूँ.

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सर जी ! मेरे कागज आपके पास आये होंगे, देखा आपने !

हाँ देखा ! क्या भेजते हो, कागज ही पूरे नही हैं.

जी कागज तो सब देख कर लगाये थे, जो जो मांगा गया था, सब लगा दिया, कुछ रह गया क्या ?”

क्या ख़ाक लगाया है ! जिनकी ज़रूरत नही वो सब लगा दिये और जो सबसे ज़रूरी हैं वो तो लगाये ही नही, न हि अलग से सबमिट किया ! ”

जी कौन सा रह गया, बता दें अभी लगा देता हूँ.

अब सब हमी बताएं क्या ? किसी पुराने आदमी से पूछो और कागज पूरे करके लाओ.

            उसने किसी से पूछा और वोकागज लगा दिये जिन पर रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैंउसका काम बन गया. जैसे उसके दिन फिरे, वैसे सबके फिरें ! समझ ही चुके होंगे कि ये वैसे ऑफिस का सीन था जहां पब्लिक डीलिंग होती है. अब अगर आप ये समझ रहे होंगे कि वोमाने यही होता है तो किसी मुगालते मे न रहें. दूसरा सीन देखें, सीन ऑफिस का ही है मगर वोका मतलब दूसरा है

सर ! मै फलाना बोल रहा हूँ ढिमाकी ब्रांच से.

हाँ, बोलिये ! आपको वो भेजने को कहा गया था, आपने अभी तक भिजवाया नही. सबका आ चुका है, बस आपका बाक़ी है ! साहब बहुत नाराज़ हो रहे हैं, हमे भी आगे भेजना होता है, आपकी वजह से ही रुका है.  दस मिनट मे फैक्स कीजिये और कल सुबह तक हार्ड कॉपी भेजिये.

जी सर, जी सर ! अभी फैक्स करता हूँ. सर, सर ! काटियेगा नही ! एक निवेदन है.

कहिये !

सर मेरी वो अप्लीकेशन / बिल आपके पास पहुँचा होगा. सर आपने बताया था कि मिल नही रही है तो पिछले हफ्ते ही ऑफिस कापी मैसेन्जर से भिजवा दी थी , सेंक्सन हो गयी क्या !

अच्छा वो ! होल्ड कीजिये, अभी दिखवाता हूँ.

क्या भेजते हैं आप लोग ! भेजने से पहले देखते नही हैं ? अल्लम-गल्लम सब लगा दिया मगर जो ज़रूरी था वोनही लगाया

जी देख तो लिया था. क्या रह गया बता दीजिये, अभी फैक्स कर देता हूँ.

फारवर्डिंग तो लगाया ही नही, पेज 3 पर गोल मोहर है मगर किसी के इनीशियल नही हैं और पेज 4 पर सिग्नेचर हैं मगर गोल मोहर नही लगी है और डेट नही पड़ी है. जब अपने काम मे यह हाल है तो बाक़ी का क्या हाल होगा ! और हाँ, फैक्स न करियेगा. वापस भिजवा रहा हूं !, इसे कवरिंग लेटर के साथ हार्ड कॉपी भिजवाईयेगा और हाँ !  थोड़ा सबर किया कीजिए. ऐसे मॉनिटरिंग न किया कीजिए. यहाँ कुछ रुकता नहीं है, समय से सबका निस्तारण हो जाता है.”

             ये सीन तो नौकरीपेशा लोगों का खूब जाना पहचान ही गए होंगे कि कोई अपने नियन्त्रक कार्यालय से बात कर रहा है. वोयहीं तक नही है, एक कवि के शब्द देखें,  गायक पुकार-पुकार कर कह रहा है, “… हमका हउ चाही… “ यह हौ वही ‘वो’ है मगर यहाँ ‘वो’ यानि ‘हउ’ का मतलब दूसरा है. अब आप इस हउमे कोई भद्दा/ अश्लील इशारा ढूंढने लग जायं तो इसका क्या किया जाय कि आपके दिमाग मे वही सब भरा है.

‘वो’ के मतलब बहुत सारे हैं, आपको वोके कुछ और अर्थ सूझ रहे हों तो हमे भी बताइये.

Wednesday, 21 January 2026

कुंआ चर्चा









कुंआ कैसे बनाया जाता है ? कुंए देखे तो बहुत मगर जानता न था और न ही इस पर विचार किया. इतना तो मालूम था कि ज़मीन के नीचे पानी होता है, कहीं कुछ ही नीचे तो कहीं बहुत नीचे. तो कुंआ बनाने मे लिए गोलाकार में खोदते होंगे, जहाँ तक खोदने पर पानी निकल आया, खुदाई/खोदाई रोक दी, ऊपर जगत बना दी, मुंडेर बना दी, और पानी भरने में सुविधा हो इसलिए गेड़ुरी (लोहे/लकड़ी की घिर्री ) लगा दी, हो गया कुंआ तैयार. ऊपर से कूड़ा-पत्ती आदि न गिरे इसलिए टीन छवा दी या पक्की छत डलवा दी. लखनऊ में कई कुएं पक्की छत वाले हैं जिनमें दो याद आ रहे - एक 'लालकुंआ' जो हुसैनगंज से महाराणा प्रताप मूर्ति के बाद तीन ओर जाती सड़कों में बीच वाली सड़क पर है, दूसरा चौपटिया में 'कुंआ भोलानाथ'. यह दोनों कुंए सड़क से कुछ ऊँचाई पर हैं, एक प्रकार से चबूतरे पर बने या कुंए के चहु ओर चबूतरा बना दिया गया. कुंए मन्दिरों व धर्मशालाओं में भी होते हैं जिनमें से कुछ एक कोठरी में होते हैं. हमारे मोहल्ले, अमानीगंज चौराहा के आगे एक शिवटहल मन्दिर है जिसमें कुंआ कोठरीनुमा कमरे में है.

यह चुनाई कैसे की जाती है ?        

               अब कुछ कुंओ के वास्तु पर. पक्के कुंओं की अन्दरूनी दीवार पक्की होती है जो ईंटों की चुनाई की होती है. कुछ में ईंटों पर प्लास्टर भी होता है, ताख भी होते हैं. फर्श अलबत्ता/अनिवार्यतः कच्चा ही होता है, ऐसा न हो तो पानी रिसने, कुंआ में पर्याप्त पानी रहने का रास्ता ही बन्द हो जाय.

यह चुनाई नीचे से ऊपर नहीं होती बल्कि कुंए के गोलाकार गड्ढे को कुछ गहराई (कुछ फुट ) तक खोद कर करते हैं. उसके बाद और खुदाई/खोदाई करते हैं तो नीचे खाली हुई जगह में वह गोलाकार दीवार सरक जाती है और उसके ऊपर फिर चिनाई करते हैं. यह बहुत कौशल का काम होता है अन्यथा नीचे जगह बनने पर दीवार भहरा जाए/ढह जाए. इस प्रकार यह चिनाई अन्य चिनाई की तरह नीचे से ऊपर को नहीं बल्कि ऊपर से नीचे जाती है. वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है कुंए की चिनाई.

         विश्वप्रसिद्ध एलोरा कैलास मन्दिर भी नीचे से ऊपर को नहीं बना बल्कि एक पहाड़ को ऊपर से खोदते/तराशते हुए नीचे को बनाया गया, पहले शिखर बना, फिर मण्डप, फिर गर्भ गृह आदि बने.

                                चुनाई तो बाद की बात है, अब कुंए की खोदाई की बात करते हैं बल्कि पहले तो खोदाई ही होती है, फिर चुनाई आदि की बात आती है. चुनाई तो वैकल्पिक है, पैसे और ज़रूरत पर निर्भर है क्योंकि कुंए तो कच्चे भी होते हैं. खोदने में ऐसा नहीं कि जहाँ चाहे खोद दिया. कहाँ पानी है और कितना नीचे है, इसके लिए भूजल विशेषज्ञ होते हैं जिन्हेंजलसुंघवाकहा जाता है. कुँआ खुदवाने से पहले लोग इन्हें बुलाते थे. ये एक लाठी लिए होते हैं जिसके एक सिरे पर घुंघरू लगे होते हैं. जलसुंघवा लाठी से ज़मीन को ठोकता हुआ चलता  है. इस विषय के ज्ञान व अनुभव से कम्पन, गन्ध व ध्वनि के आधार पर उसे ज़मीन के नीचे पानी होने, उसकी दूरी कि कितना नीचे है और गुणवत्ता का कि खारा है या मीठा का पता चलता है.  जहाँ सही पानी होता वह निर्दिष्ट करता और वहीं लोग खोदाई करते और पानी निकलता भी. अब हैण्डपम्प, बोरिंग व तकनीक की मदद से पानी के नए साधन व स्रोत होने के कारण पुराने कुंए निष्प्रयोज्य हो गए, नये कुंओं को खुदवाना बंद हो गया तो जलसुंघवा भी लुप्त हो गए. अब शायद ही किसी को यह विद्या आती हो, जीवन यापन के लिए इसमें इतना पैसा नहीं मिलता, लगातार यह काम मिलता नहीं और धन कमाने से अधिक यह जनकल्याण का कार्य था इसलिए जलसुंघवो की नयी पीढ़ी ने इसे सीखने में रुचि न ली, यह आजीविका का आधार भी न था इसलिए जलसुंघवा अब किताबों और किवदन्तियों में ही रह गए.

पुराने समय में सार्वजनिक प्रयोजन हेतु कुआं खुदवाना एक पुण्य कार्य माना जाता था. गांवों में अलग-अलग जातियों के कुएं भी निश्चित थे. सवर्ण हिन्दू, अनुसुचित जाति के लोगों को अपने कुएं में पानी भी भरने नहीं देते थे. कानून की किताबों में भले ही अब सब बराबर हैं, जाति के आधार पर कोई छुआछूत नहीं होती, यह दण्डनीय है, किसी भी जाति को किसी कुंए पर रोक नहीं है किंतु वास्तविक धरातल में आज भी बहुत जगह यह भेदभाव और रोक है. प्रेमचंद काठाकुर का कुंआआज भी है.

कुंओं का उल्लेख हो और राजस्थान व गुजरात के सीढ़ीदार कुओं, बावलियों/ बावड़ियों / बाव का उल्लेख न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. सीढ़ीदार कुंए गोल / नीचे को जाती मीनार की तरह न होकर चौकोर और बड़े होने के साथ बहुत गहराई में भी होते हैं. सम्भवतः भू जलस्तर बहुत नीचे होने के कारण ऐसा हो. इनमें हमारे देखेसे कुंआ / W for Well की तरह रस्सी और गिड़री / घिर्री से पानी नहीं निकलते बल्कि नीचे उतर कर पानी तक जाना होता है. जानेआने के लिए चारो तरफ की दीवार से लगी  सीढ़ियां होती हैं, ऊपर से सीधे तल तक अनवरत जाती सीढ़ियां नहीं बल्कि कुछ दूरी के बाद प्लेटफार्म, उसके बाद फिर सीढ़ियां. इस प्रकार कई चरणों में सीढ़ियां होती हैं जो देखने में भी बहुत सुन्दर लगती हैं. वास्तुकला का अनुपम उदाहरण हैं यह सीढ़ीदार कुंए जो सुन्दरता और उपयोगिता का संगम हैं.

                                            ग्यारहवीं सदी में निर्मित गुजरात के पाटन शहर में स्थित 'रानी की बाव' को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित है किया गया है. लेवेंडर रंग के सौ रुपए की करेंसी के पीछे रानी की बाव का चित्र छपा है.

पातालतोड़ कुओं की भी बात होती है जिन्हें इन्दारा कुंआ भी कहते हैं. लखनऊ के बड़े इमामबाड़े में ऐसी बावली है जिसका सम्बन्ध गोमती से बताया जाता है. इसी में ख़जाने की चाभी फेंक दिए जाने की चर्चा सुनते आए हैं. इंदारा या पातालतोड़ कुंआ तो अब चर्चा में भी नहीं आता.

कुंए के महत्व के कारण ही शादी में बारात निकासी के समय कुंआ पूजने की/ कुंआ ब्याहने की रीत है.                             पहले जब पैदल या घोड़ों या बैलगाड़ी पर यात्रा की जाती थी तो प्यास बुझाने, स्नान व कपड़े धोने के लिए यह कुंए ही काम आते थे. यात्रा कई दिनों में पूरी होती थी. नाऊ ठाकुर व विवाह तय कराने वाले वरखोजवा निमन्त्रण देने, वरसंधान व अन्य संदेशा देन-लेने के लिए  पैदल, रुकते हुए यात्रा करते थे. कुंओं पर लोटा-डोर या रस्सी-बाल्टी रखी होती. बटोही ऐसा कुंआ देख कर रुकते. पानी खींच कर प्यास बुझाते, नहाते, कपड़े फींचते. कुंए के निकट ही बाग भी होता जहाँ भोजन बनाते या लाया हुआ भोजन करते, विश्राम करते, उसके बाद आगे की यात्रा करते. यह कुंए एक पड़ाव हुआ करते थे. विख्यात लोक कलाकार, भोजपुरी के सेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर नाऊगिरी भी करते और नाऊ ठाकुर का काम भी करते थे. उनके जीवन पर आधारित संजीव के उपन्याससूत्रधारमें इसका विशद वर्णन है.     

                    पानी भरती पनिहारिने राहगीरों को पानी पिलातीं, वे चुल्लू लगा कर पीते. कुछ प्रेम कहानियां इसी पानी पीनेपिलाने में जन्मीं और सुखद परिणिति को प्राप्त हुईं. शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के वृहद उपन्यासकई चाँद थे सरे-आसमाँके शुरुआती पन्नों में पनघट पर जन्मी और परिणिति को प्राप्त हुई प्रेम कथा का वर्णन है. उपन्यास इतिहास और गल्प का रोचक मेल है.

                  कुंए सिंचाई के भी स्रोत थे. सिंचाई के लिए पानी निकालने के लिए कुछ पर्याप्त पानी वाले कुंओं में रहट होते थे. रहट एक बेल्ट सी होती थी जिसमें कई डब्बे लगे होते थे. बैल या आदमी इसे चक्कर लगाता / परिक्रमा जैसा चलाता तो डब्बे नीचे जाते और भर कर ऊपर आते. एक पक्की नाली में पानी जाता, वह नाली खेत तक जाती जिससे सिंचाई होती. सिंचाई के अन्य साधन होने से रहट भी गायब हो गये. हमारी वय के लोगों ने रहट के बारे में पाठ्य पुस्तकों मेंसिंचाई में साधनपाठ में पढ़ा, चित्र देखा और बहुतों ने प्रत्यक्ष भी देखा है, आप संलग्न चित्र में देखें.

        प्यास बुझाने व पानी की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के अलावा कुंए के अन्य उपायोग/दुरुपयोग भी थे. हत्या/आत्महत्या के लिए कुंए का उपयोग किया जाता था. लोग कुंए में धकेल कर मार देते थे, लड़ते-लड़ते असावधानी से एक या दोनों कुंए में गिर जाते थे, कुंए में कूद कर आत्महत्या भी की जाती थी. बस्ती में ही कुंआ होने से इन सब कामों के लिए नदी तक जाना नहीं पड़ता था. नदी की तुलना में कुंए का पानी चुल्लू भर ठहरा तो जो उलाहने आदि में चुल्लू भर पानी में डूब मरने को प्रेरित किया जाता था, उसका आशय कुंए में डूब मरने से ही था. माताओं/अध्यापकों का बच्चों के प्रति प्रिय वाक्य था, 'वह कुंए में कूदेगा तो तुम भी कूद जाओगे ?' कुंआ न होता तो यह वाक्य न होता. घर के आंगन में कुंआ होने का पानी के अलावा भी उपयोग था. अयोग्य/अवांछित वर का प्रस्ताव/दबाव आने पर कहा जाता था, 'कुंए में धकेल देंगे मगर ऐसे लड़के से अपनी बिटिया नहीं ब्याहेंगे !' नायिका नायक को झूठी धमकी देती थी, 'आंगना में कुंइया राजा डूब के मरूँगी ... '

           अब नए कुंए न बनने व पुराने निष्प्रयोज्य होने से यह मुहावरे मृतप्राय हैं व नए बन नहीं रहे. नयी पीढ़ी में बहुतेरे बच्चों ने कुंआ साक्षात देखा न होगा जैसे भ से भड़भूजा, भिश्ती और ठ से ठठेरा नहीं देखा. अब किसी को नन्दलाल पनघट पे छेड़ नहीं जाते. कुंए के विलोपन से साहित्य, संगीत, रसिकता को भी क्षति हुई है.

इस आलेख का प्रेरक 19 जनवरी, 2026 के NBT में 'NBT कैफ़े पेज पर छपे जे.पी.शुक्ला के आलेख 'तब एक पवित्र काम था कुंआ बनाना' है. आप चाहें तो वह पूरा आलेख निर्दिष्ट तिथि के NBT में पढ़ सकते हैं.