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Wednesday, 21 January 2026

कुंआ चर्चा









कुंआ कैसे बनाया जाता है ? कुंए देखे तो बहुत मगर जानता न था और न ही इस पर विचार किया. इतना तो मालूम था कि ज़मीन के नीचे पानी होता है, कहीं कुछ ही नीचे तो कहीं बहुत नीचे. तो कुंआ बनाने मे लिए गोलाकार में खोदते होंगे, जहाँ तक खोदने पर पानी निकल आया, खुदाई/खोदाई रोक दी, ऊपर जगत बना दी, मुंडेर बना दी, और पानी भरने में सुविधा हो इसलिए गेड़ुरी (लोहे/लकड़ी की घिर्री ) लगा दी, हो गया कुंआ तैयार. ऊपर से कूड़ा-पत्ती आदि न गिरे इसलिए टीन छवा दी या पक्की छत डलवा दी. लखनऊ में कई कुएं पक्की छत वाले हैं जिनमें दो याद आ रहे - एक 'लालकुंआ' जो हुसैनगंज से महाराणा प्रताप मूर्ति के बाद तीन ओर जाती सड़कों में बीच वाली सड़क पर है, दूसरा चौपटिया में 'कुंआ भोलानाथ'. यह दोनों कुंए सड़क से कुछ ऊँचाई पर हैं, एक प्रकार से चबूतरे पर बने या कुंए के चहु ओर चबूतरा बना दिया गया. कुंए मन्दिरों व धर्मशालाओं में भी होते हैं जिनमें से कुछ एक कोठरी में होते हैं. हमारे मोहल्ले, अमानीगंज चौराहा के आगे एक शिवटहल मन्दिर है जिसमें कुंआ कोठरीनुमा कमरे में है.

यह चुनाई कैसे की जाती है ?        

               अब कुछ कुंओ के वास्तु पर. पक्के कुंओं की अन्दरूनी दीवार पक्की होती है जो ईंटों की चुनाई की होती है. कुछ में ईंटों पर प्लास्टर भी होता है, ताख भी होते हैं. फर्श अलबत्ता/अनिवार्यतः कच्चा ही होता है, ऐसा न हो तो पानी रिसने, कुंआ में पर्याप्त पानी रहने का रास्ता ही बन्द हो जाय.

यह चुनाई नीचे से ऊपर नहीं होती बल्कि कुंए के गोलाकार गड्ढे को कुछ गहराई (कुछ फुट ) तक खोद कर करते हैं. उसके बाद और खुदाई/खोदाई करते हैं तो नीचे खाली हुई जगह में वह गोलाकार दीवार सरक जाती है और उसके ऊपर फिर चिनाई करते हैं. यह बहुत कौशल का काम होता है अन्यथा नीचे जगह बनने पर दीवार भहरा जाए/ढह जाए. इस प्रकार यह चिनाई अन्य चिनाई की तरह नीचे से ऊपर को नहीं बल्कि ऊपर से नीचे जाती है. वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है कुंए की चिनाई.

         विश्वप्रसिद्ध एलोरा कैलास मन्दिर भी नीचे से ऊपर को नहीं बना बल्कि एक पहाड़ को ऊपर से खोदते/तराशते हुए नीचे को बनाया गया, पहले शिखर बना, फिर मण्डप, फिर गर्भ गृह आदि बने.

                                चुनाई तो बाद की बात है, अब कुंए की खोदाई की बात करते हैं बल्कि पहले तो खोदाई ही होती है, फिर चुनाई आदि की बात आती है. चुनाई तो वैकल्पिक है, पैसे और ज़रूरत पर निर्भर है क्योंकि कुंए तो कच्चे भी होते हैं. खोदने में ऐसा नहीं कि जहाँ चाहे खोद दिया. कहाँ पानी है और कितना नीचे है, इसके लिए भूजल विशेषज्ञ होते हैं जिन्हेंजलसुंघवाकहा जाता है. कुँआ खुदवाने से पहले लोग इन्हें बुलाते थे. ये एक लाठी लिए होते हैं जिसके एक सिरे पर घुंघरू लगे होते हैं. जलसुंघवा लाठी से ज़मीन को ठोकता हुआ चलता  है. इस विषय के ज्ञान व अनुभव से कम्पन, गन्ध व ध्वनि के आधार पर उसे ज़मीन के नीचे पानी होने, उसकी दूरी कि कितना नीचे है और गुणवत्ता का कि खारा है या मीठा का पता चलता है.  जहाँ सही पानी होता वह निर्दिष्ट करता और वहीं लोग खोदाई करते और पानी निकलता भी. अब हैण्डपम्प, बोरिंग व तकनीक की मदद से पानी के नए साधन व स्रोत होने के कारण पुराने कुंए निष्प्रयोज्य हो गए, नये कुंओं को खुदवाना बंद हो गया तो जलसुंघवा भी लुप्त हो गए. अब शायद ही किसी को यह विद्या आती हो, जीवन यापन के लिए इसमें इतना पैसा नहीं मिलता, लगातार यह काम मिलता नहीं और धन कमाने से अधिक यह जनकल्याण का कार्य था इसलिए जलसुंघवो की नयी पीढ़ी ने इसे सीखने में रुचि न ली, यह आजीविका का आधार भी न था इसलिए जलसुंघवा अब किताबों और किवदन्तियों में ही रह गए.

पुराने समय में सार्वजनिक प्रयोजन हेतु कुआं खुदवाना एक पुण्य कार्य माना जाता था. गांवों में अलग-अलग जातियों के कुएं भी निश्चित थे. सवर्ण हिन्दू, अनुसुचित जाति के लोगों को अपने कुएं में पानी भी भरने नहीं देते थे. कानून की किताबों में भले ही अब सब बराबर हैं, जाति के आधार पर कोई छुआछूत नहीं होती, यह दण्डनीय है, किसी भी जाति को किसी कुंए पर रोक नहीं है किंतु वास्तविक धरातल में आज भी बहुत जगह यह भेदभाव और रोक है. प्रेमचंद काठाकुर का कुंआआज भी है.

कुंओं का उल्लेख हो और राजस्थान व गुजरात के सीढ़ीदार कुओं, बावलियों/ बावड़ियों / बाव का उल्लेख न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. सीढ़ीदार कुंए गोल / नीचे को जाती मीनार की तरह न होकर चौकोर और बड़े होने के साथ बहुत गहराई में भी होते हैं. सम्भवतः भू जलस्तर बहुत नीचे होने के कारण ऐसा हो. इनमें हमारे देखेसे कुंआ / W for Well की तरह रस्सी और गिड़री / घिर्री से पानी नहीं निकलते बल्कि नीचे उतर कर पानी तक जाना होता है. जानेआने के लिए चारो तरफ की दीवार से लगी  सीढ़ियां होती हैं, ऊपर से सीधे तल तक अनवरत जाती सीढ़ियां नहीं बल्कि कुछ दूरी के बाद प्लेटफार्म, उसके बाद फिर सीढ़ियां. इस प्रकार कई चरणों में सीढ़ियां होती हैं जो देखने में भी बहुत सुन्दर लगती हैं. वास्तुकला का अनुपम उदाहरण हैं यह सीढ़ीदार कुंए जो सुन्दरता और उपयोगिता का संगम हैं.

                                            ग्यारहवीं सदी में निर्मित गुजरात के पाटन शहर में स्थित 'रानी की बाव' को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित है किया गया है. लेवेंडर रंग के सौ रुपए की करेंसी के पीछे रानी की बाव का चित्र छपा है.

पातालतोड़ कुओं की भी बात होती है जिन्हें इन्दारा कुंआ भी कहते हैं. लखनऊ के बड़े इमामबाड़े में ऐसी बावली है जिसका सम्बन्ध गोमती से बताया जाता है. इसी में ख़जाने की चाभी फेंक दिए जाने की चर्चा सुनते आए हैं. इंदारा या पातालतोड़ कुंआ तो अब चर्चा में भी नहीं आता.

कुंए के महत्व के कारण ही शादी में बारात निकासी के समय कुंआ पूजने की/ कुंआ ब्याहने की रीत है.                             पहले जब पैदल या घोड़ों या बैलगाड़ी पर यात्रा की जाती थी तो प्यास बुझाने, स्नान व कपड़े धोने के लिए यह कुंए ही काम आते थे. यात्रा कई दिनों में पूरी होती थी. नाऊ ठाकुर व विवाह तय कराने वाले वरखोजवा निमन्त्रण देने, वरसंधान व अन्य संदेशा देन-लेने के लिए  पैदल, रुकते हुए यात्रा करते थे. कुंओं पर लोटा-डोर या रस्सी-बाल्टी रखी होती. बटोही ऐसा कुंआ देख कर रुकते. पानी खींच कर प्यास बुझाते, नहाते, कपड़े फींचते. कुंए के निकट ही बाग भी होता जहाँ भोजन बनाते या लाया हुआ भोजन करते, विश्राम करते, उसके बाद आगे की यात्रा करते. यह कुंए एक पड़ाव हुआ करते थे. विख्यात लोक कलाकार, भोजपुरी के सेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर नाऊगिरी भी करते और नाऊ ठाकुर का काम भी करते थे. उनके जीवन पर आधारित संजीव के उपन्याससूत्रधारमें इसका विशद वर्णन है.     

                    पानी भरती पनिहारिने राहगीरों को पानी पिलातीं, वे चुल्लू लगा कर पीते. कुछ प्रेम कहानियां इसी पानी पीनेपिलाने में जन्मीं और सुखद परिणिति को प्राप्त हुईं. शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के वृहद उपन्यासकई चाँद थे सरे-आसमाँके शुरुआती पन्नों में पनघट पर जन्मी और परिणिति को प्राप्त हुई प्रेम कथा का वर्णन है. उपन्यास इतिहास और गल्प का रोचक मेल है.

                  कुंए सिंचाई के भी स्रोत थे. सिंचाई के लिए पानी निकालने के लिए कुछ पर्याप्त पानी वाले कुंओं में रहट होते थे. रहट एक बेल्ट सी होती थी जिसमें कई डब्बे लगे होते थे. बैल या आदमी इसे चक्कर लगाता / परिक्रमा जैसा चलाता तो डब्बे नीचे जाते और भर कर ऊपर आते. एक पक्की नाली में पानी जाता, वह नाली खेत तक जाती जिससे सिंचाई होती. सिंचाई के अन्य साधन होने से रहट भी गायब हो गये. हमारी वय के लोगों ने रहट के बारे में पाठ्य पुस्तकों मेंसिंचाई में साधनपाठ में पढ़ा, चित्र देखा और बहुतों ने प्रत्यक्ष भी देखा है, आप संलग्न चित्र में देखें.

        प्यास बुझाने व पानी की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के अलावा कुंए के अन्य उपायोग/दुरुपयोग भी थे. हत्या/आत्महत्या के लिए कुंए का उपयोग किया जाता था. लोग कुंए में धकेल कर मार देते थे, लड़ते-लड़ते असावधानी से एक या दोनों कुंए में गिर जाते थे, कुंए में कूद कर आत्महत्या भी की जाती थी. बस्ती में ही कुंआ होने से इन सब कामों के लिए नदी तक जाना नहीं पड़ता था. नदी की तुलना में कुंए का पानी चुल्लू भर ठहरा तो जो उलाहने आदि में चुल्लू भर पानी में डूब मरने को प्रेरित किया जाता था, उसका आशय कुंए में डूब मरने से ही था. माताओं/अध्यापकों का बच्चों के प्रति प्रिय वाक्य था, 'वह कुंए में कूदेगा तो तुम भी कूद जाओगे ?' कुंआ न होता तो यह वाक्य न होता. घर के आंगन में कुंआ होने का पानी के अलावा भी उपयोग था. अयोग्य/अवांछित वर का प्रस्ताव/दबाव आने पर कहा जाता था, 'कुंए में धकेल देंगे मगर ऐसे लड़के से अपनी बिटिया नहीं ब्याहेंगे !' नायिका नायक को झूठी धमकी देती थी, 'आंगना में कुंइया राजा डूब के मरूँगी ... '

           अब नए कुंए न बनने व पुराने निष्प्रयोज्य होने से यह मुहावरे मृतप्राय हैं व नए बन नहीं रहे. नयी पीढ़ी में बहुतेरे बच्चों ने कुंआ साक्षात देखा न होगा जैसे भ से भड़भूजा, भिश्ती और ठ से ठठेरा नहीं देखा. अब किसी को नन्दलाल पनघट पे छेड़ नहीं जाते. कुंए के विलोपन से साहित्य, संगीत, रसिकता को भी क्षति हुई है.

इस आलेख का प्रेरक 19 जनवरी, 2026 के NBT में 'NBT कैफ़े पेज पर छपे जे.पी.शुक्ला के आलेख 'तब एक पवित्र काम था कुंआ बनाना' है. आप चाहें तो वह पूरा आलेख निर्दिष्ट तिथि के NBT में पढ़ सकते हैं.

Tuesday, 6 January 2026

पेरुमाल मुरुगन के उपन्यास 'नर नारीश्वर' के बारे में और कौआ के बारे मे !

कहने को कर्कश बोली वाला कौआ बहुत चतुर, बल्कि धूर्त पक्षी होता है मगर होता मीठा गाने वाला कोयल है . जब मादा कोयल के अण्डे देने का समय होता है तो नर, कौआ के घोसले के पास जाकर खूब चिलगुहाड़ मचाता है, उसे उकसाता है, गुस्सा दिलाता है. तंग आकर कौआ उसे भगाने का उपक्रम करता है, वह लड़ते हुए उसे दूर ले जाता है. घोसला असुरक्षित हो जाता है  तो मादा कोयल उसमें अण्डे दे आती है. अण्डे एक जैसे होने से कौआ उसे अपने अण्डे समझती है और सेती रहती है. समय पर जब अण्डे फूटते हैं, बच्चे निकलते हैं, बोलते हैं तभी कौए को पता चलता है. इस तरह कोयल दम्पति बिना मेहनत के उससे अपने बच्चे जनवा लेते हैं.

         यह मैंने बचपन से पढ़ा-सुना ! बेचारे कौए ! क्या वास्तव में कौए इतने बेवकूफ होते हैं ? कोयल में यह धूर्तता और कौए में यह बेवकूफी क्या जीन्स में होती है जो अब तक चली आ रही है. क्या अब भी कौआ और कोयल का यही सम्बन्ध है, कोयल के बच्चे अब तक ऐसे ही पैदा होते हैं ?

              मुझे तो यह एक बोध/नीति कथा लगती है जो और कुछ सिखाने के लिए गढ़ी गयी और आज तक चल रही है.

       ऐसे तमाम लोक विश्वास और कथाएँ हैं जो रोचक ढंग से बातें सिखाने के लिए बनीं और फैलीं, जैसे पञ्चतन्त्र की कथाएँ.

               उनको तो हम जानते हैं कि लोक में प्रचलित विश्वास हैं, कथाएँ हैं, सच नहीं किन्तु बहुत से लोग, शिक्षित भी, जज भी ऐसी बातों को सच मानते हैं. मोर के आंसुओं से मोरनी के गर्भवती होने की बात एक जज साहब ने गम्भीरता और विश्वास से कही थी. 'भै गति सांप-छछून्दर केरी' मुहावरा आज भी बहुतेरे मानते हैं. सांप चूहे के धोखे छछून्दर को पकड़ ले, पूरा न निगला हो तो जाने कैसे, शायद गंध व स्वाद से, सांप को पता चला कि यह तो धोखा हो गया. अब न निगल सकता है, न उगल. निगले तो मर जाए, उगले तो अंधा हो.

  सांप के अंधे होने का एक और लोक विश्वास है, स्त्री की परछाई पड़ने से भी अंधा हो जाता है. एक दोहा भी है -

'नारी की झांई पड़त अंधा होत भुजंग।

 कबिरा तिन की कौन गति, जो नित नारी संग॥'

       नारी और दाम्पत्य द्रोही है यह बात. हैरत तो यह कि तमाम लोग मानते हैं कि नारी की झांई पड़ने से सांप अंधा हो जाता है. न इसका कोई प्रमाण है, न हमने देखा. इसमें यह संशोधन भी हो गया कि हर नारी की झांई पड़ने से नहीं, गर्भिणी स्त्री की झांई पड़ने से अंधा होता है.

                  ऐसे तमाम नीति और उपदेश वाले दोहे, कहावत, लोकोक्तियां हैं जिनका सार न ग्रहण करके लोग थोथी बातों से चिपटे हैं.

            उन सबका उल्लेख नहीं कर रहा, आप सब कौए-कोयल वाली बात बताएं. क्या पहले कभी कोयल के बच्चे ऐसे ही होते थे या अब भी होते हैं ? और कोई ऐसे विश्वास याद आ रहे हों तो बताएं, बतकुच्चन हो जाए, थोड़ा मेला लगे पोस्ट पर.

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यह प्रश्न ज़रूर उठ रहा होगा कि बिना सन्दर्भ के यह कौआरार क्यों मचाई ! रिटायर होने का यह मतलब तो नहीं कि इन सब में उलझाते रहें.

             तो भईया, सन्दर्भहीन नहीं यह. तमिल साहित्यकार पेरुमाल मुरुगन का उपन्यास 'नर -नारीश्वर' (हिन्दी अनुवाद Badri Varma / मोहन वर्मा द्वारा)पढ़ते हुए कौआ प्रसङ्ग आया. अब उन्होंने क्या लिखा, आप इच्छुक हों

तो आगे पढ़ें 

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ठीक है, कर लो पैदा बच्चे. पर क्या तुम्हे यह भी पता है,  ज़िन्दगी कैसे जी जाती है. कभी तुमने कौवे की तरफ देखा है ? उसे जब अण्डे देने होते हैं, तब ताड़ के पेड़ पर जाकर घोसला बना लेता है, अण्डों को सेता है और फिर उन्हें फोड़ता है. ढूँढ-ढाँढ  कर उनके लिए दाना लाता है और उनकी तब तक देखभाल करता है, जब तक उनके पंख नहीं निकल आते. एक बार यह हो जाए तो तुम्ही बताओ, क्या रिश्ता रह जाता है माँ और उनके बच्चों के बीच ? वे अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं. अब तुम्हारे पर निकल आये, जाओ जाकर खोजो अपने को. ज़िन्दगी को इसी तरह जीना चाहिए. इसके बजाय हम लोग, बच्चे पैदा करते हैं, पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, उनकी शादियां करते हैं और उनके लिए धन-दौलत जोड़ने के चक्कर में संघर्ष संघर्ष करते रहते हैं. क्या यह भी कोई तरीका है ज़िन्दगी जीने का ?अगर मैं कौआ या कोयल होता, तो मैं भी सोचता बच्चे पैदा करने के बारे में … ‘

                   - पेरुमाल मुरुगन के उपन्यासनरनारीश्वरसे .

पेरुमाल मुरुगन के उपन्यास का यह वह अंश है जिसे पढ़ते हुए मुझे कौवेकोयल और कोयल का अण्डे सेने, उनकी देखभाल करने के झञ्झट से बचने के लिए चतुराई / धूर्तता से कौए से यह सब करा लेने के बारे में ख़याल आया.

              इस अंश में यद्यपि यह बात नहीं आयी कि कौआ बेचारा धोखे में यह सब करता है किंन्तु इस अण्श की अन्तिम पंक्ति में कोयल का उल्लेख करके यह संकेत दे ही दिया कि कौओं से कोयल का सम्बन्ध है, वह सम्बन्ध और क्या होता इनके अण्डे देने / सेने के बारे में प्रचलित लोकश्रुति के अलावा. उड़ने लायक बड़ेद हो जाने पर कोयल के बच्चों के मन में देवकीयशोदा वाला असमंजस आता होगा क्या – ‘ओ रे कन्हैया ! किसको कहेगा तू मैया … ‘ जैविक माँ कोयल और पास पोल कर जन्म देने वाला कौआ !

                              पेरुमान मुरुगन ने इसी उपन्यास में एक जगह और कौए को याद किया है, उसकी कर्कश बोली से तुलना करते हुए,

                      ‘ …  काली पोन्ना से कभी भी  ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता था. यहाँ तक कि अगर वह उसे खेत में काम करने के लिए आवाज़ देता, तो भी वह उसे चिल्ला कर नहीं बुलाता था. वह निकट आकर ऐसी आवाज़ में पुकारता जैसे कोई कौवा उसके गले में अटका हुआ हो. पोन्ना को बुरा लगता था, वह काली के ऊपर चीखती चिल्लाती थी और उससे झगड़ा करती थी … ‘

कुछ उपन्यास के बारे में

पेरुमाल मुरुगन का यह उपन्यासनर-नारीश्वरतमिल केमादोरुबागनका हिंदी अनुवाद है जिसे बद्री वर्मा / मोहन वर्मा ( मोहन वर्मा उनका लेखन नाम है ) उपन्यास कालीपोन्ना की व्यथा कथा है. काली से विवाह के बाद पोन्ना माँ नहीं बन पाती. उन दोनों में बहुत प्रेम है किन्तु सन्तान की कमी महसूस करते हुए भी वे विभिन्न अवसरों पर सन्तान होने की कमी शिद्दत से महसूस करते हैं. अनेक अवसरों पर समाज में और्फ माङ्गलिक कार्यों में उनका अपमान / बहिष्कार  सा होता है. अपने घनिष्ठ रिश्तेदार भी बांझ होने के कारण पोन्ना और काली को कुछ रस्मों में भाग नहीं लेने देते. फसल के एक उत्सव, बीज बुवाई में पोन्ना को भाग लेने के कारण फसल खराब होनेद की आशंका से लांछित किया जाता है. काली को भी बाज़ार में कई अवसरों पर उसके मित्र ही ताना मारते, नामर्द भी कहते हैं. दोनों समधिने मिल कर काली के दूसरे विवाह की बात करते हैं किन्तु काली मना कर देता है. तत्कालीन समाज में नियोग जैसी प्रथा भी है जिसमें रथयात्रा उत्सव में स्त्री पुजारियों से समागम द्वारा गर्भवती होती है. समाज इसे स्वीकार करता है. काली की माँ, पोन्ना की माँ, काली का सालासभी लोग रथयात्रा में देवताओं से सन्तान प्राप्ति को सहमत हैं उस पर दबाव भी डालते हैं किन्तु काली मना करता है. क्या हुआ, यह आगे इसी व्यथा का चित्रण है. उपन्यास में पढ़ें

                                यह उपन्यास एक त्रयी के रूप में है जिसके अगले खण्डपोन्ना की अग्निपरीक्षाऔरपोन्ना का अभिशापहैं. मोहन वर्मा के उपहार से तीनो मेरे पास हैं कुछ अन्य किताबें भी.

                               अनुवाद अच्छा है और सरल शब्दावली में है. तत्कालीन परिवेश और काली का अंर्तद्वन्द्व बहुत अच्छी तरह व्यक्त हुआ है.

                               यह उपन्यास हार्पर हिन्दी ( हार्पर कॉलिंन्स पब्लिशर्स, इण्डिया) द्वारा प्रकाशित हैं.

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अब कौओं पर कुछ और बनाम साहित्य में कौए                     

                                           कौआ पालतू पक्षी नहीं है किन्तु इसका इन्सानों से  सदैव ही निकट सम्बन्ध रहा है. वह मुंडेर पर बोल बोल कर अतिथि के आने का संकेत देता है तो सुनने वाली उसे दूधभात खिलाने और सोने से चोंच मढ़ा देने का आश्वासन देती है, ‘… दूध-भात की दोनी दैहों, सोने चोंच मढ़ैहों …’ यह आश्वासन कभी पूरा किया या नहीं या कोयल से ठगे जाने के बाद वह बेचाराधूर्तपक्षी प्रतीक्षारत / प्रोषितपतिका नायिकाकों द्वारा भी ठगा गया ! सालिम अली सहित अन्य पक्षी विशेषज्ञों द्वारा भी इस बारे में कहीं कुछ नहीं बताया गया, आपको पता हो / इस बारे में अध्ययन किया हो तो आप ही बताएँ.

                                         कौआ बच्चों के साथ खेलने का भी काम करता है, वह उनके हाथ से रोटी छीन कर ले जाता है, ‘… काग को भाग कहा कहिए जो हाथ सो लै गयो माखनरोटी …’ कौए ने यह बाल लीला कृष्ण के साथ ही नहीं, राम के साथ भी की है, बस वहाँ माखन-रोटी के बजाय पुआ है. राम आँगन में घुटुरवन चल रहे हैं पुआ भी खाते जा रहे हैं कि कौआ को देख कर उसे बुलाने के लिए पुआ दिखाते है. वह आता है तो ख़ुश होते हैं, उड़ जाता है तो पकड़ने के लिए भुजा पसारते हैं और इस बहाने उसे विराट  स्वरूप दिखाते हैं. 

                     लरिकाईं जहँ जँह फिरहिं तहँ न्तहँ संग उड़ाउँ ।

                      जूठनि  परइ  अजिर महँ  सो उठाइ करि खाउँ ॥

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                        जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

                        तब   मैं  भागि  चलेउँ   उरगारी ।  राम  गहन कहँ  भुजा पसारी ॥

                        जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखौँ निज पासा ॥

                                    तुलसी का यह कौआ साधारण कौआ नहीं, बड़ा ज्ञानी ध्यानी है. काकभुशुण्डि नाम है. सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में उसका आश्रम भी है जहाँ  स्नान ध्यान आदि के बाद पक्षियों को प्रवचन करता है, राम कथा सुनाता है. पक्षिराज गरुण भी उसके पास अपनी एक शंका / मोह का निवारण करने व राम कथा सुनने आये थे. और तो और, इस विलक्षण कौए की वाणी कर्कश नहीं, मधुर  है.

                         करि पूजा समेत अनुरागा । मधुर बचन तब बोलेउ कागा ॥

                               यह सब तुलसी बाबा ने मानस के उत्तरकाण्ड में बखाना है. मानस में, अरण्यकाण्ड में एक जगह और कौए का वर्णन है. चित्रकूट मे फटिक शिला पर राम सीता के साथ बैठे हैं कि उनके बद्धि बल की परीक्षा लेने के लिए इन्द्र पुत्र जयन्त कौए का रूप धर कर सीता जी के चरण में चोंच मार कर भाग जाता है.

                          सुरपति सुत धरि बायस बेषा । सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥

                          सीता चरन  चोंच हति  भागा । मूढ़  मंदमति  कारन  कागा ॥

पितृ पक्ष में कौओं का विशेष आदर होता है, उन्हें खीर-पूड़ी आदि अर्पित की जाती है. कओआ यह खा ले तो माना जाता है कि पितरों तक बलि भाग पहुँचा.  निर्मल वर्मा की एक कहानी है, ‘कव्वे और काला पानीउसमें भी अन्त में कौओं का बोलना है जो कहानी को निष्कर्ष बिन्दु पर ले जाता है. वैसे कौए कर्णकटु स्वर और काले रंग के कारण ही नकारात्मक रूप में याद किए जाते हैं. किसी गोरी लड़की का विवाह काले लड़के से हो तो विदाई पर एक लोकगीत का भाव यह रहत्ता है कि मेरी मैदे की लोई ले भागा कागा.’

 

कौओं पर साहित्य में इतना ही नहीं, और भी होगा. मैंने इतना ही पढ़ा / इतना ही याद आया. आपको इनके अलावा याद आ रहा हो तो बताएँ. इस पोस्ट का समापन अंगिका भाषा में मधुसूदन साहा की कविता से

 

कौआ रोजे जावे छै

सखरी-मखरी खावै छै।

कहियो बेठै छप्पर पर

कहियो नैका टप्पर पर

कहियो उतरी अंगना में

सुख-सन्देश सुनावै छै।

 

ठोचकों  मारै ढेरी में

भरलों सूप-चँगेरी में

मौका मिलथैं मुनिया के

बिस्कुट तुरत उड़ावै छै।

 

कौआ बड़ा सयानो छै

एक आँख के कानो छै

साँझ-सबेरे आवी के

काकी कॅ फुसलावै छै।

 

जखनी कौआ काँवकरै

काकी बाहर पाँव धरै

बौआ के दुलरावै ले

शायद काका आवै छै।"

 

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