कुंआ कैसे बनाया जाता है ? कुंए देखे तो बहुत मगर जानता न था और न ही इस पर विचार किया. इतना तो मालूम था कि ज़मीन के नीचे पानी होता है, कहीं कुछ ही नीचे तो कहीं बहुत नीचे. तो कुंआ बनाने मे लिए गोलाकार में खोदते होंगे, जहाँ तक खोदने पर पानी निकल आया, खुदाई/खोदाई रोक दी, ऊपर जगत बना दी, मुंडेर बना दी, और पानी भरने में सुविधा हो इसलिए गेड़ुरी (लोहे/लकड़ी की घिर्री ) लगा दी, हो गया कुंआ तैयार. ऊपर से कूड़ा-पत्ती आदि न गिरे इसलिए टीन छवा दी या पक्की छत डलवा दी. लखनऊ में कई कुएं पक्की छत वाले हैं जिनमें दो याद आ रहे - एक 'लालकुंआ' जो हुसैनगंज से महाराणा प्रताप मूर्ति के बाद तीन ओर जाती सड़कों में बीच वाली सड़क पर है, दूसरा चौपटिया में 'कुंआ भोलानाथ'. यह दोनों कुंए सड़क से कुछ ऊँचाई पर हैं, एक प्रकार से चबूतरे पर बने या कुंए के चहु ओर चबूतरा बना दिया गया. कुंए मन्दिरों व धर्मशालाओं में भी होते हैं जिनमें से कुछ एक कोठरी में होते हैं. हमारे मोहल्ले, अमानीगंज चौराहा के आगे एक शिवटहल मन्दिर है जिसमें कुंआ कोठरीनुमा कमरे में है.
यह
चुनाई कैसे की जाती है ?
अब कुछ कुंओ के वास्तु पर. पक्के
कुंओं की अन्दरूनी दीवार पक्की होती है जो ईंटों की चुनाई की होती है. कुछ में
ईंटों पर प्लास्टर भी होता है, ताख भी होते हैं.
फर्श अलबत्ता/अनिवार्यतः कच्चा ही होता है, ऐसा न हो तो पानी
रिसने, कुंआ में पर्याप्त पानी रहने का रास्ता ही बन्द हो
जाय.
यह चुनाई नीचे से
ऊपर नहीं होती बल्कि कुंए के गोलाकार गड्ढे को कुछ गहराई (कुछ फुट ) तक खोद कर
करते हैं. उसके बाद और खुदाई/खोदाई करते हैं तो नीचे खाली हुई जगह में वह गोलाकार
दीवार सरक जाती है और उसके ऊपर फिर चिनाई करते हैं. यह बहुत कौशल का काम होता है
अन्यथा नीचे जगह बनने पर दीवार भहरा जाए/ढह जाए. इस प्रकार यह चिनाई अन्य चिनाई की
तरह नीचे से ऊपर को नहीं बल्कि ऊपर से नीचे जाती है. वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण
है कुंए की चिनाई.
विश्वप्रसिद्ध एलोरा कैलास मन्दिर भी
नीचे से ऊपर को नहीं बना बल्कि एक पहाड़ को ऊपर से खोदते/तराशते हुए नीचे को बनाया
गया,
पहले शिखर बना, फिर मण्डप, फिर गर्भ गृह आदि बने.
चुनाई
तो बाद की बात है, अब कुंए की खोदाई की बात करते हैं बल्कि पहले
तो खोदाई ही होती है, फिर चुनाई आदि की बात आती है. चुनाई तो वैकल्पिक है, पैसे और ज़रूरत पर निर्भर है क्योंकि
कुंए तो कच्चे भी होते हैं. खोदने में ऐसा नहीं कि जहाँ चाहे
खोद दिया. कहाँ पानी है और कितना नीचे है, इसके लिए भूजल विशेषज्ञ होते हैं जिन्हें ‘जलसुंघवा’
कहा जाता है. कुँआ खुदवाने से पहले लोग इन्हें
बुलाते थे. ये एक लाठी लिए होते हैं जिसके एक सिरे पर घुंघरू
लगे होते हैं. जलसुंघवा लाठी से ज़मीन को ठोकता हुआ चलता है. इस विषय के ज्ञान व अनुभव
से कम्पन, गन्ध व ध्वनि के आधार पर उसे ज़मीन के नीचे पानी होने,
उसकी दूरी कि कितना नीचे है और गुणवत्ता का कि खारा है या मीठा का पता
चलता है. जहाँ सही पानी
होता वह निर्दिष्ट करता और वहीं लोग खोदाई करते और पानी निकलता भी. अब हैण्डपम्प, बोरिंग व तकनीक की मदद से पानी के नए साधन
व स्रोत होने के कारण पुराने कुंए निष्प्रयोज्य हो गए, नये कुंओं
को खुदवाना बंद हो गया तो जलसुंघवा भी लुप्त हो गए. अब शायद ही
किसी को यह विद्या आती हो, जीवन यापन के लिए इसमें इतना पैसा
नहीं मिलता, लगातार यह काम मिलता नहीं और धन कमाने से अधिक यह
जनकल्याण का कार्य था इसलिए जलसुंघवो की नयी पीढ़ी ने इसे सीखने में रुचि न ली,
यह आजीविका का आधार भी न था इसलिए जलसुंघवा अब किताबों और किवदन्तियों
में ही रह गए.
पुराने समय में
सार्वजनिक प्रयोजन हेतु कुआं खुदवाना एक पुण्य कार्य माना जाता था. गांवों में अलग-अलग जातियों के कुएं भी निश्चित थे.
सवर्ण हिन्दू, अनुसुचित जाति के लोगों को अपने कुएं में पानी
भी भरने नहीं देते थे. कानून की किताबों में भले ही अब सब बराबर
हैं, जाति के आधार पर कोई छुआछूत नहीं होती, यह दण्डनीय है, किसी भी जाति को किसी कुंए पर रोक नहीं
है किंतु वास्तविक धरातल में आज भी बहुत जगह यह भेदभाव और रोक है. प्रेमचंद का ‘ठाकुर का कुंआ’ आज
भी है.
कुंओं का उल्लेख हो
और राजस्थान व गुजरात के सीढ़ीदार कुओं, बावलियों/
बावड़ियों / बाव का उल्लेख न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. सीढ़ीदार कुंए गोल / नीचे को जाती मीनार की तरह न होकर चौकोर और बड़े होने के साथ बहुत गहराई में
भी होते हैं. सम्भवतः भू जलस्तर बहुत नीचे होने के कारण ऐसा हो.
इनमें हमारे देखे ‘क’से कुंआ
/ W for Well की तरह रस्सी और गिड़री / घिर्री से
पानी नहीं निकलते बल्कि नीचे उतर कर पानी तक जाना होता है. जाने
– आने के लिए चारो तरफ की दीवार से लगी सीढ़ियां होती हैं, ऊपर से सीधे
तल तक अनवरत जाती सीढ़ियां नहीं बल्कि कुछ दूरी के बाद प्लेटफार्म, उसके बाद फिर सीढ़ियां. इस प्रकार कई चरणों में सीढ़ियां
होती हैं जो देखने में भी बहुत सुन्दर लगती हैं. वास्तुकला का
अनुपम उदाहरण हैं यह सीढ़ीदार कुंए जो सुन्दरता और उपयोगिता का संगम हैं.
ग्यारहवीं सदी में निर्मित
गुजरात के पाटन शहर में स्थित 'रानी की बाव' को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित है किया गया है. लेवेंडर रंग के सौ रुपए की करेंसी के पीछे रानी की बाव का चित्र छपा है.
पातालतोड़ कुओं की
भी बात होती है जिन्हें इन्दारा कुंआ भी कहते हैं. लखनऊ के बड़े इमामबाड़े में ऐसी
बावली है जिसका सम्बन्ध गोमती से बताया जाता है. इसी में ख़जाने की चाभी फेंक दिए
जाने की चर्चा सुनते आए हैं. इंदारा या पातालतोड़ कुंआ तो अब चर्चा में भी नहीं
आता.
कुंए के महत्व के
कारण ही शादी में बारात निकासी के समय कुंआ पूजने की/ कुंआ ब्याहने की रीत है. पहले जब
पैदल या घोड़ों या बैलगाड़ी पर यात्रा की जाती थी तो प्यास बुझाने, स्नान व कपड़े धोने के लिए यह कुंए ही काम आते थे. यात्रा
कई दिनों में पूरी होती थी. नाऊ ठाकुर व विवाह तय कराने वाले
वरखोजवा निमन्त्रण देने, वरसंधान व अन्य संदेशा देन-लेने के लिए पैदल, रुकते हुए यात्रा करते थे. कुंओं पर लोटा-डोर या रस्सी-बाल्टी
रखी होती. बटोही ऐसा कुंआ देख कर रुकते. पानी खींच कर प्यास बुझाते, नहाते, कपड़े फींचते. कुंए के निकट ही बाग भी होता जहाँ भोजन
बनाते या लाया हुआ भोजन करते, विश्राम करते, उसके बाद आगे की यात्रा करते. यह कुंए एक पड़ाव हुआ करते
थे. विख्यात लोक कलाकार, भोजपुरी के सेक्सपियर
कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर नाऊगिरी भी करते और नाऊ ठाकुर का काम भी करते थे.
उनके जीवन पर आधारित संजीव के उपन्यास ‘सूत्रधार’
में इसका विशद वर्णन है.
पानी भरती पनिहारिने
राहगीरों को पानी पिलातीं, वे चुल्लू लगा कर पीते. कुछ प्रेम कहानियां इसी पानी पीने – पिलाने में जन्मीं
और सुखद परिणिति को प्राप्त हुईं. शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के वृहद
उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे-आसमाँ’
के शुरुआती पन्नों में पनघट पर जन्मी और परिणिति को प्राप्त हुई प्रेम
कथा का वर्णन है. उपन्यास इतिहास और गल्प का रोचक मेल है.
कुंए सिंचाई के भी
स्रोत थे. सिंचाई के लिए पानी निकालने के लिए कुछ पर्याप्त पानी
वाले कुंओं में रहट होते थे. रहट एक बेल्ट सी होती थी जिसमें
कई डब्बे लगे होते थे. बैल या आदमी इसे चक्कर लगाता /
परिक्रमा जैसा चलाता तो डब्बे नीचे जाते और भर कर ऊपर आते. एक पक्की नाली में पानी जाता, वह नाली खेत तक जाती जिससे
सिंचाई होती. सिंचाई के अन्य साधन होने से रहट भी गायब हो गये.
हमारी वय के लोगों ने रहट के बारे में पाठ्य पुस्तकों में ‘सिंचाई में साधन’ पाठ में पढ़ा, चित्र देखा और बहुतों ने प्रत्यक्ष भी देखा है, आप संलग्न
चित्र में देखें.
प्यास बुझाने व पानी की अन्य आवश्यकताओं
को पूरा करने के अलावा कुंए के अन्य उपायोग/दुरुपयोग भी थे. हत्या/आत्महत्या के
लिए कुंए का उपयोग किया जाता था. लोग कुंए में धकेल कर मार देते थे,
लड़ते-लड़ते असावधानी से एक या दोनों कुंए में गिर जाते थे, कुंए में कूद कर आत्महत्या भी की जाती थी. बस्ती में ही कुंआ होने से इन
सब कामों के लिए नदी तक जाना नहीं पड़ता था. नदी की तुलना में कुंए का पानी चुल्लू
भर ठहरा तो जो उलाहने आदि में चुल्लू भर पानी में डूब मरने को प्रेरित किया जाता
था, उसका आशय कुंए में डूब मरने से ही था. माताओं/अध्यापकों
का बच्चों के प्रति प्रिय वाक्य था, 'वह कुंए में कूदेगा तो
तुम भी कूद जाओगे ?' कुंआ न होता तो यह वाक्य न होता. घर के
आंगन में कुंआ होने का पानी के अलावा भी उपयोग था. अयोग्य/अवांछित वर का
प्रस्ताव/दबाव आने पर कहा जाता था, 'कुंए में धकेल देंगे मगर
ऐसे लड़के से अपनी बिटिया नहीं ब्याहेंगे !' नायिका नायक को
झूठी धमकी देती थी, 'आंगना में कुंइया राजा डूब के मरूँगी
... '
अब नए कुंए न बनने व पुराने
निष्प्रयोज्य होने से यह मुहावरे मृतप्राय हैं व नए बन नहीं रहे. नयी पीढ़ी में
बहुतेरे बच्चों ने कुंआ साक्षात देखा न होगा जैसे भ से भड़भूजा,
भिश्ती और ठ से ठठेरा नहीं देखा. अब किसी को नन्दलाल पनघट पे छेड़
नहीं जाते. कुंए के विलोपन से साहित्य, संगीत, रसिकता को भी क्षति हुई है.
इस
आलेख का प्रेरक 19 जनवरी, 2026 के NBT में 'NBT कैफ़े पेज पर
छपे जे.पी.शुक्ला के आलेख 'तब एक पवित्र काम था कुंआ बनाना'
है. आप चाहें तो वह पूरा आलेख निर्दिष्ट तिथि के
NBT में पढ़ सकते हैं.








