लक्ष्मण शक्ति प्रसङ्ग व राम का विलाप
आज बहुत दिनों बाद पण्डित जी मन्दिर पर आए. कौन
पण्डित जी ! भई
! अब कई माह से आए नहीं तो उनको भुला
ही बैठे ! अरे वही,
जो अक्सर शाम के समय मन्दिर पर आते हैं, कुछ
गुनगुनाते हुए, साथ मे झोला जिसमें कुछ पोथी-पत्रा
होता है, श्रोतागण जुट जाते हैं तो प्रायः राम कथा से कोई प्रसङ्ग
उठाते हैं या श्रोतओं में से कोई किसी धार्मिक / पौराणिक
प्रसङ्ग पर प्रश्न उठाता है तो शङ्का समाधान करते हैं. कुछ भजन कीर्तन आदि भी होता है. वही
पण्डित जी मन्दिर पर आए.
आए तो कुछ गुनगुनाते हुए और बैठ कर, झोला-वोला
रख कर आसन सा जमाया और उच्च स्वर में गान करने लगे _
‘ हा गुन खनि
जानकी सीता । रूप
सील
ब्रत नेम पुनीता ॥
लछिमन समुझाए बहु
भाँती । पूछत चले लता तरु पाँती ॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी
। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥
खंजन सुक कपोल मृग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी । कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा । गज केहरि निज
सुनत प्रसंसा ॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक सकुच मन
माहीं ॥
सुनु जानकी तोहि बिनु
आजू । हरषे सकल पाइ जनु
राजू ॥
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥‘
एक
तो स्वर उच्च, उसपे सुमधुर
कण्ठ, स्पष्ट उच्चारण, दूजे
जाने-पहचाने हुए, सो सुनकर लोग जुटने
लगे. जुटान का मतलब यह नहीं कि भारी भीड़ हो गयी, सौ – पचास
लोग इकट्ठे हो गए. वही आठ
– दस लोग जिनमें चार- छह
और आ जुटते थे, आए.
आने पर गान में व्यवधान तो पड़ा किन्तु यह खीझजनक न होकर आनन्ददायक
था. राम-जोहार होने लगी.
‘राम-राम पण्डित जी ! पांय लागी पण्डित जी ! सब
कुशल तो हैं, बहुत दिन बाद दिखे सो चिंता हो रही थी.’
‘ख़ुश रहो भाई ! जियत रहो बचवा ! अरे
चिंता हो रही थी तो यह नहीं कि घर आकर देख जाते, खोज-ख़बर
ले जाते कि कैसे हैं कि यहाँ देखने के बाद चिंता हुई. सही
बात है, आँख से दूर तो मन से दूर !’
‘राम
– राम ! कैसी
बात कर रहे हैं. ऐसा नहीं है के समवेत स्वर उठे. एक
ने कहा,
‘हम गए थे आपके घर मगर आप थे नहीं. पण्डिताइन
ने बताया कि गाँव गए हैं.
हाल-चाल ले
, कुछ नाज – पानी
ले और कईयौ सादी बियाह भी रहें सो वही का निपटावत आवत हुइहें अगले हफ्ता मा.’
‘मान लिया भई, मान लिया कि मुहदेखी
चिंता नहीं कर रहे हो. अब गाँव में तो अब भी जेठ में लगन ज़ोरदार होती है और इस बार
तो जेठ भी दो पड़ गए तो खूब विवाह हुए.’
‘अरे काहे के दुई जेठ ! ई
सब बांभनन के चोंचला आंय.
ई बताव कि दुई जेठ हैं तो का साल मा तेरह महिना भए ? हमका तनखा औ आपका तेरह महिना की पेंशन मिली ? का
स्कूल मा फीस औ बस का चार्ज तेरह महीना का देक पड़ा ?’
‘अरे भाई
! यह सब तो पञ्चाङ्ग और काल गणना
के विचार से है, उसी में इसका महत्व है, लौकिक
व्यवहार जैसे वेतन, पेंशन आदि के लिए नहीं. वह
सब व्यवहार तो ग्रिग्रेयिएन कलेण्डर के अनुसार ही होता है,
जनवरी से दिसम्बर या वित्तीय वर्ष अप्रैल से मार्च तक का होता है. उसमें
भी धरती के घूमने की गति के अनुसार व अन्य कारणों से समय समायोजन के लिए हर चौथे साल
फरवरी 29 दिन की हो जाती है, कभी
सुना होगा कि घड़ियां कुछ सेकेण्ड आगे या पीछे की गयीं, वैसा
ही इस काल गणना में भी है.
देखा भी होगा कि बहुत से पर्व दो दिन के पड़ जाते हैं. कुछ
लोग उदया तिथि लेते हैं तो कुछ नहीं लेते. तो
सबकी सन्तुष्टि के लिए शुद्धतावादी उदया तिथि, इस
राशि से उस राशि में ग्रह के प्रवेश आदि के हिसाब से मनाए, जो
इतना हिसाबी नहीं है वह दफ़्तर में छुट्टी के हिसाब से मनाए. कभी
तिथि की हानि
भी होती है अर्थात एक ही दिन दो तिथियां होती हैं. यह
सब पञ्चाङ्ग़, शुभ साईत,
गणना की शुद्धता के लिए हैं काहे से कि पर्वादि, विवाह
मुहूर्त आदि इसी कैलेण्डर के हिसाब से होते हैं. मूहूर्त
वगैरह की गणना हिन्दी माह की तिथि के हिसाब से होती है किन्तु सबके लिए प्रचलित ग्रेग्रेयियन
कलेण्डर के हिसाब से बताया जाता है. निमन्त्रण
पत्र आदि में अंग्रेजी माह के अनुसार डेट लिखी जाती है ताकि सबको सुविधा हो. ‘
‘हाँ पण्डित जी ! अब कौनो संका सेस ना
रही. संका
करब तो फिर मार आधा घंटा निवारन करिहो.’
हे पक्षियों, हे हिरन,
हे भौंरों की पांत
क्या तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है ? हे खञ्जन, तोतों,
कबूतरों, हिरनों,
मछलियों, भौंरों,
गान में प्रवीण कोयल, कुंद कलियों,
अनार, बिजली,
कमल, शरद के चाँद,
नागिन, वरुण के पाश,कामदेव के धनुष, हंस,
हाथियों, सिंह
… ‘ख़ुश तो बहुत होगे आज
तुम लोग
!’ अब तो तुम सब अपनी
खूब प्रशंसा सुन रहे होगे !
बेल, स्वर्ण,
केला ! अब तो तुम लोगों के मन में तनिक भी शङ्का व संकोच न होगा ! हर्षित तो ऐसे हो मानो सारे संसार का राज-पाट मिल गया हो ! हे
जानकी ! तुम्हारे बिना ये सब अभिमान में फूल उठे हैं. प्रिया
! तुमसे यह स्पर्धा कैसे
सहन की जा रही है
! तुम शीघ्र प्रकट क्यों
नहीं होतीं
!
इस
प्रकार विरह में ऐसे आकुल होकर प्रलाप करते फिर रहे थे जैसे अति कामातुर हों. ‘
अब सुनो इन सबके ख़ुश होने और अभिमान करने का कारण ! यह
साहित्यिक कारण है, काव्य रस और अलंकार से सम्बन्धित है. काव्य में सुन्दर स्त्रियों/ नायिकाओं
की उपमा इन सबसे दी जाती है,
इनसे तुलना की जाती है और इन्हें हीन ठहराया जाता है. नायिकाओं के अङ्ग
– प्रत्यङ्ग की तुलना करते हुए कहते
हैं ना कि नासिका तोते की चोंच के समान या उससे अच्छी है, आँखें
हिरनी की आँखों से भी सुन्दर अर्थात बड़ी-बड़ी हैं. बिहारी
ने भी कहा है, ‘हरिनी के नैनान ते हरि नीके ए नैन.‘ इसके
गुनुगनाने के आगे भँवरे का गुनगुनाना भी फेल है या काली अलकें ऐसी हैं जैसे भ्रमर पंक्ति. मुख
चन्द्र से भी अच्छा है.
ग्रीवा शंख के समान है.
कविगण सौन्दर्य और अङ्ग-प्रत्यङ्ग
वर्णन में चेहरे और गरदन तक ही सीमित नहीं रहते, और
नीचे उतरते जाते हैं. उन्नत और पुष्ट वक्ष बेल के समान, शरीर
की कांति तप्त स्वर्ण से भी अधिक दीप्तिमान है, सुडौल
जंघाएं केले के तने के समान या उससे भी सुडौल हैं … हिन्दी
के रीतिकालीन कवि ही नहीं यह वर्णन और तुलना करते हैं, संस्कृत
के कवि
तो उनसे भी चार बांस ऊपर हैं.
अब जब सीता जी वन में थीं तो ये अपमानित होते रहते थे, चिढ़े
रहते थे कि सीता जी का ये-ये अङ्ग तुमसे बेहतर है, तुम
तो उनके सामने
कुछ भी नहीं हो … वगैरह,
वगैरह
! तो जब सीता जी का हरण हो गया, वे
वन में नहीं रहीं तो अब किससे उनकी तुलंना होती, वे
किसकी तुलना में निम्न कहे जाते
! अब वे अपना उपमान स्वयं थे, तो
ख़ुश हो गए, अपमान में फूल उठे कि देखो, अब
तो हम ही हम हैं, कोई नहीं है हमारे मुकाबले ! यही
इन सबके हर्षित और गर्वित होने का कारण है.
अब इसमें तुलसी की चतुराई देखो. प्रत्यक्ष
सीता सौन्दर्य का वर्णन नहीं किया,
उनकें अङ्ग-उपाङ्ग की बात नहीं
की और इन सबके हर्षित और अभिमान से फूल उठने की बात कहते हुए जता भी दिया कि सीता जी
कितनी सुन्दर और सुडौल देहयष्टि की थीं. ऐसे किया उन्होंने
मर्यादा का पालन,कुछ कहा भी नहीं और सब कुछ कह भी दिया.’
‘अब तुम लोग न पूछते तो मैं काहे बताता ! सचमुच
बड़ा करुण प्रसङ्ग है. अब आगे की कथा सुनो. ‘
संबुक भेक सिवार
समाना । इहाँ न विषय कथा
रस नाना ॥
तेहि कारन आवत हिय हारे । कामी काक बलाक बिचारे ॥
आवत एहिं सर अति कठिनाई । राम
कृपा बिनु आइ न जाई ॥‘
तो क्यों वे प्रश्न उठा कर इन अधम लोगों में नाम लिखाएं. जो किसी लोभ, जैसे प्रसाद या समय काटने के
लिए आ भी गए तो आ कर भी व्यर्थ ही बैठते हैं. इस सरोवर में स्नानादि का आन्द
नहीं ले पाते औरे घर जाते हुए मार्ग में भी लोगों से निन्दा ही करते हैं –
जड़ता जाड़ विषम उर लागा । गएहुँ
न मज्जन पाव अभागा ॥
करि न जाइ सर मज्जन पाना ।फिरि आवै समेत अभिमाना
॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर
निंदा करि ताहि बुझावा ॥‘
तो क्यों प्रश्न उठा कर ऐसे लोगों
में नाम लिखावें जो इस कथा के अधिकारी ही नहीं. अगर किसी तरह आ भी गए तो आनन्द नहीं ले पाते और दूसरों से निंदा
ही करते हैं. अब ऐसा कोई क्यों होना चाहेगा, इसी से वे अपनी शङ्का गले से अन्दर घोंट लेते हैं, वह शङ्का कफ की तरह उनके अन्दर
ही रह जाती और कष्ट देती है.
तो जो शङ्का हो, उसके निवारणार्थँ निःसंकोच पूछ लेना चाहिए. प्रश्न उठने पर भी इन सब कारणों
से न पूछने वालों ने सरोवर के रूपक वाली यह चौपाईयां तो याद रखीं किन्तु इसी काण्ड
में आगे प्रयागराज में याज्ञवल्क्य के आश्रम में भरद्वाज जी द्वारा कही चौपाईयां याद
न रखीं –
कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौं
न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥‘
‘आओ शङ्कानाथ ! बहुत उद्विग्न दिख रहे हो ! कहो, क्या बात है जिससे इतने उद्विग्न
हो
?’
‘अब क्या बताएं पण्डित जी ! आज प्रातः स्नानादि के बाद मानस
का पाठ करने बैठा , लङ्काकाण्ड चल रहा था. उसमें लक्ष्मण शक्ति प्रसङ्ग पर जब पहुँचा तो लक्ष्मण
को मूर्छित पड़े देख कर राम विलाप का प्रसङ्ग आया. उसी से मन विचलित हो गया , क्षुब्ध हुआ कि राम राम ! हे राम ! यह रामजी क्या कह रहे हैं. माना शोक का अवसर है, शक्तिशाली शत्रु सम्मुख है, रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण को वीरघातिनी
शक्ति मार कर अचेत कर दिया है. कूछ सूझ नहीं रहा. इधर उनके प्राण संकट में हैं, उधर सुबह फिर युद्ध होगा. लक्ष्मण का उपचार करेंगे कि युद्ध
करेंगे ! इसी शोक में राम विलाप कर रहे हैं और ऐसी बातें कहते हैं कि सामान्य मनुष्य
भी न कहे मगर राम जैसे धीर और मर्यादा पुरुषोत्तम कह रहे हैं ! विश्वास नहीं होता. राम पर श्रद्धा ही जाती रही.
आपने भी पढ़ा होगा. वे कहते हैं, ‘अगर मैं यह जानता कि वन में भाई
का बिछोह होगा तो पिता जी का वचन मानता ही नहीं, वन न आता. न वन आता, न यह सब होता, न बन्धु बिछोह होता.’ राम राम ! राम तो रघुवंश के हैं जिसमें वचन का पालन करना प्रण
देकर भी किया जाता है. ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्राण जाएं पर बचन न जाई ॥‘ और राम जी कह रहे हैं ‘जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू ।
पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥‘ वचनबद्ध होने के अलावा वे पितृभक्त
भी थे, फिर ऐसा कहना ! राम-राम !
आगे तो और भी क्षुब्ध कर देने
वाली बात कही. विश्वास नहीं होता कि राम जी कह रहे हैं कि पुत्र, धन दौलत, नारी मतलब पत्नी, भवन, परिवार आदि तो फिर हो सकते हैं, मतलब दूसरा विवाह किया जा सकता
है किन्तु भाई फिर नहीं मिल सकता. अब मैं अयोध्या क्या मुह लेकर जाऊँगा. लोग कहेंगे कि नारी के लिए प्रिय
भाई को गँवा दिया ! चलो यह तो शोक की अवस्था में प्रलाप हुआ किन्तु हद तो यह कि वे कहते हैं कि
और कोई अपयश सहा जा सकता है, नारी अर्थात पत्नी अर्थात सीता जी को छोड़ कर लौट जाता क्योंकि नारी की हानि कोई विशेष हानि
नहीं है.
यह राम जी कह रहे हैं ! शिव शिव ! सीता जी को रावण के यहाँ ही छोड़
कर लौट जाते क्योंकि उनकी नज़र में नारी की हानि विशेष क्षति नहीं, मामूली बात है. यह केवल अपनी पत्नी ही नहीं, समस्त नारियों का अपमान है. नारी के लिए उनके मन में यह भाव ! क्या नारी भवन, धन सम्पदा की तरह एक वस्तु है, जड़ सम्पत्ति है ? विश्वास नहीं होता कि राम जी
के यह उद्गार हैं. क्या यही मर्यादा है ? लोग क्या यह सीखेंगे कि राम जी नारी हानि को विशेष क्षति
नहीं मानते थे ?
यह मै नहीं कह रहा हूँ मानस के
लङ्का काण्ड में तुलसी ने राम के मुख से कहलाया है –
सुत बित
नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई
। नारि हेतु प्रिय
भाई गँवाई ॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माही । नारि हानि बिसेष छति नाहीं
॥‘
छि छी ! पढ़ने के बाद मन बहुत खराब हो रहा है. ‘
अब उपस्थित जनसमूह को भी इसमें
रस आने लगा था अन्यथा कथा में बाधा पड़ने पर वे उद्धिग्न हो उठते थे, या तो तितर-बितर होने लगते थे या प्रश्नकर्ता
को डपटने लगते थे किन्तु इस बार न केवल चुप थे बल्कि इस पर बात सुनना भी चाहते थे, ऐसा उनकी प्रतिक्रिया से लगा.
‘बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥
उमा एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥
‘पर पण्डित जी ! लोग तो इसे भगवान का कहा ही मानेंगे ! तुलसी बाबा ने इसे भगवान राम के मुख से कहलवाया है तो उनके ही वचन और उनकी ही सोच तो हुई. अब हम कैसे अन्तर करें कि यह राम जी कह रहे हैं कि तुलसी की सोच है कि प्रभु की लीला है ?’
जैसे तुम्हारे मन में शंका और
अविश्वास हुआ, वैसे ही तमाम लोगों के मन में उत्पन्न होता है किन्तु वे कहते नहीं, अगर कहते हैं तो जिससे कहते हैं
तो अगर वह उनका भ्रम निवारण नहीं कर पाता, मोह नहीं हर पाता, औचित्य नहीं बता पाता कि भगवान
ने ऐसा क्यों कहा या तुलसी ने भगवान के मुह से ऐसा क्यों कहलाया तो शंका, आक्रोश व अविश्वास बना का बना
रहता है. लोग ग़लत समझते हैं तो उन्हें ग़लत मानने लगते हैं.
क्यों, है न ऐसी बात ! अब भक्त हो, राम व तुलसी में आस्था रखते हो
तो जैसे तुलसी की कही या राम जी के मुख से कहलाई इस बात को मानते तो तो उन बातों को
भी मानों जो कई जगह कही हैं कि यह सब लीला है, भगवान मनुष्य रूप में हैं तो
मनुष्यों का आचरण कर रहे हैं. कहो, कुछ सन्तुष्ट हुए कि नहीं !’
वहीं दूसरी ओर यदि कठिन धर्म, उदारता या सदाचरण करने को कहो
कि कि भगवान ने यह मार्ग बताया तो कहेंगे कि अरे ! वे भगवान हैं, हम छुद्र मानव. हमारी उनकी कहाँ बराबरी. इसलिए यदि कुछ ऐसा निन्दनीय सा
विचार आए तो दिल पर हाथ रख कर पूछो, क्या ऐसा कहना और करना ठीक है, शोभनीय है ? निश्चित ही जवाब नहीं में मिलेगा ! तो फिर ऐसी बातों को क्या मन
से लगाए रखना, क्षुब्ध होना.’
‘यह तुलसी के कवि रूप का असर है. कवि में यह विशेषता होती है, बल्कि कुटेव होता है कि अवसर मिलने पर या अवसर उत्पन्न करके ऐसे प्रसङ्ग निकाल लेता है कि नीति वचन, लोगों का चरित्र, दुर्बलता या अच्छी बात पात्रों के मिस कह देता है. कहो कि विद्वता या कविताई झाड़ने का बहाना या मौक़ा निकाल लेता है. तुलसी इन सबसे अछूते थोड़े न हैं, न सूर रहे. उन्होंने भी कूट पद कहे, तुलसी ने भी कि अर्थ करने में दांतों पसीना आ जाए.
शुरू से ही लो. दशरथ के प्राण त्यागने पर जब
भरत जी आए तो उनके मन में बहुत ग्लानि थी, क्षोभ था कि मेरे कारण, मुझे राजगद्दी दिलाने के लिए
माता ने एक वर मांगा और मैं निष्कण्टक राज करूँ तो राम को चौदह वर्ष का वनवास मांगा. जब भरत कौशल्या जी के पास जाते हैं तो इस सब से
अपनी अनभिज्ञता बताने के लिए खूब उदाहरण देते हैं कि यदि इस सबमें मेरी सम्मति हो तो
मुझे फलां – फलां गति मिले, पातक लगे. कथा लम्बी हो रही है तो बस एक – दो उदाहरण सुनो –
तेहि कै गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मति मोर ॥
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं ।
पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी ।
बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी ॥
लोभी लंपट लोलुपचारा । जे ताकहिं परधनु
परदारा ॥
पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा । जौं जननी यहु
संमत मोरा ॥‘
अर्थात, जो हरि और विष्णु के चरणों को छोड़ कर भूत प्रेतों को भजते
हैं तो उनकी जो दुर्गति होती है वही गति मेरी हो अगर इस सबमें मेरी मति हो. जो वेद बेचते हैं, अपने लाभ के लिए धर्म को साधन
बनाते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों के पाप ही देखते हैं, कपटी, कुटिल, कलहप्रिय, क्रोधी हैं, वेद निन्दक और विश्व विरोधी हैं, लोभी, लम्पट हैं, दूसरों की स्त्री व धन पर बुरी
नियत रखते हैं – मैं उनकी गति पाऊँ अगर इस सबमें मेरा मत हो.
अब यह बताओ कि यह सब कहा होगा ! अरे थोड़ा कहा होगा पर इतनी चौपाईयों भर का नहीं. यह तो तुलसी ने इस बहाने निन्दित और पापकर्म को, उन्हें करने वालों की गति बताई है. प्रकारान्तर से यह सीख है कि अतिगर्हित कुकर्म क्या-क्या हैं, इन्हें नहीं करना चाहिए. इतना ही नहीं, कवित्व झाड़ने से भी ऐसे शोकपूर्ण, करुण प्रसङ्ग में नहीं चूके. देखो, ‘कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी’ में अनुप्रास अलंकार है, सब शब्द क से हैं. अब बताओ, कोई अति शोक व ग्लानि में है तो वह बुरे लक्षण बताने में अलंकार ढूँढेगा ? चलो एक शब्द क से हो गया तो सोच कर बाक़ी तीन भी क से ही कहेगा ? ऐसी अवस्था में रस, छन्द, अलंकार पर ध्यान ही न जाएगा. यह तो तुलसी की कविताई है जो ऐसे प्रसङ्ग में भी झाड़ी गयी और इसके बहाने उपदेश भी दिया कि कोई ऐसा मत करना.
ऐसे अवसर रस, अलंकार और उपमाओं की झड़ी लगाना वैसा ही है जैसे फ़िल्मों में हीरो- हीरोईन घोर शोक में भी पूरे लय-सुर-ताल में गाना गाते हैं. अरे ऐसे मौक़े पर रोना तो ठीक
से होगा नहीं, क्रन्दन ही निकलेगा मगर नायक या नायिका पूरे लय-सुर-ताल में गाना गाते हैं. यह कविताई ही है. ऐसे ही तुलसी ने उपदेश, नीति, कवित्व, सांसारिक मानवों की सोच दिखाने
के लिए राम जी के मुह से ऐसा कहला दिया. यही ऐसे कथनों व वर्णन का हेतु है.’
‘ठीक है, जैसा आप चाहें.’
इसके बाद आरती हुई, प्रसाद ग्रहण किया और सब अपने घर चले. देखो, कल पण्डित जी किस प्रसङ्ग का
बखान करते हैं.
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