अच्छा एक स्थिति के बारे में सोचें. कोई मोटापे से ग्रस्त हो, साधारण मोटापे से नहीं, कल्पनातीत मोटापे से. यूँ समझें कि वज़न 300 किलो के आस पास. यह बीमारी वंशानुगत हो, उसकी माँ भी मोटी रही हो, वह भी और बेटी भी. उसकी तो शादी हो गयी, बेटी भी हुई मगर बेटी भी मोटी तो शादी न हो सकी और न बेटी इस बारे में सोचती है. पति रहे नहीं, घर में खासी चलती प्रतिष्ठित बेकरी तो आर्थिक मोर्चे पर दिक्कत नहीं रही. भूतल पर बेकरी, प्रथम तल पर माँ-बेटी और एक नौकरानी. माँ तो बिस्तर पर है, तीन साल से बिस्तर पर ही है. अब किसी के अत्यन्त आग्रह पर एक जन्मदिन में उसे दूसरे शहर जाना है. उन दोनों की इच्छा भी है, इसलिए और भी कि उसके मायके का शहर है. मायके में कोई नहीं, घर बन्द पड़ा है, भाई विदेश बस गए फिर भी घर और वह शहर देखने की ललक है. जाना ठान लेती हैं पर जो बिस्तर से व्हील चेयर पर नहीं बैठी वह कैसे बिस्तर से उतरेगी, कैसे व्हील चेयर पर बैठेगी और कैसे नीचे उतर कर कार में बैठेगी ?
हुआ तो यह सब ! मगर कैसे
?
सोचें ! कुछ हल बताएँ.
******************
कुछ
संवादों/दृश्यों के सहारे बढ़ाते हैं -
-
क्या मैं डॉ. डिक्रॉस्टो से कह दूँ कि वे अपने नर्सिंग होम का एम्बुलेंस सुबह यहाँ
भिजवा दें ? पागल
हो गयी हो तुम सैंड्रा ? किसी के फंक्शन में भला एम्बुलेंस में जाया जाता है ? *
-
सब कुछ तो हो गया है लेकिन वे बिस्तर से उठ कर ऊपर की मंज़िल
से नीचे कार तक कैसे पहुँचेंगी ? लड़कियाँ उन्हें मनुहार-समझा रही हैं कि कोई न कोई रास्ता तो निकल ही
आयेगा. *
-
अभी अचानक गेट के पास का दृश्य देख कर उसे लगा है कि उसकी
आँखें हैरानी से बाहर निकल आयेंगी. विटोरिनी ने कैम्पस के गेट को पूरा खोल दिया है
और पीले रंग का विशाल 'फ्रण्ट एण्ड लोडर' यानि जे.बी.सी. अपने बहुत लम्बे-चौड़े डोल यानि बकेट के साथ
हाथी की चाल से धीरे-धीरे अन्दर दाखिल हो रहा है. ड्राईवर के साथ दो सहयोगी भी
हैं. 'यह क्या तमाशा है, पागल हो गया है विटोरिनो.'
-
आंटी का व्हीलचेयर और दोनों स्टिक बेड के पास प्लीज ले
आओ. हम सबको ज़ोर लगा कर आंटी को इनके
व्हीलचेयर पर बिठा देना है.
-
'बस आंटी ! आप अपने को पूरा ढीला
छोड़ दीजिए. एकदम झूले की तरह ढीला ... विटोरिनो ने आगे बढ़ कर उनकी पीठ के नीचे
किसी तरह एक हाथ डाला है और इवान को अपनी तरफ आकर खड़े होने का इशारा करते हुए
बेकरी की लड़कियों से कहा है, "प्लीज ... तुम लोग उधर से आंटी को सपोर्ट दो. मैं और इवान
इस तरफ से.
मिनि रॉड्रिक्स बिस्तर में रेत में धंसी बड़ी सी नाव की भंगिमा में पड़ी हैं
और उनका विशाल पेट मचान की तरह स्थिर है. बहुत प्यार से हाथ सरकाते हुए उन्हें
पीछे से गलही देकर विटोरिनो ने तकिए से थोड़ा उठाया है. अर्थर और इवान भी इस तरफ से
पूरा टेक लगाए हुए हैं. दूसरी तरफ से पाँचों लड़कियों ने बहुत सँभाल कर पूरा ज़ोर
लगाया हुआ है. मिनि रॉड्रिक्स को करवट दिलाना भी आसान नहीं.
तुम लोग हाथी को कुँए से निकालने
की कोशिश कर रहे हो. *
-
" आप सब एक मिनट किनारे
हो जायें." सैंड्रा ने बेहद ठण्डे
स्वर में कहा है और मिनि रॉड्रिक्स के
स्कर्ट के भीतर नीचे से हाथ डाला है. घर की पुरानी आया इवान को पता है कि सैंड्रा
अपनी मम्मी की तोंद की आख़िरी तह में हथेली घुसा रही है और अब तोंद को सहारा देकर
उठा रही है. ऐसा करते ही जाने कहाँ से मिनि रॉड्रिक्स की रगों में बरबस बिजली-सी
दौड़ गयी है. वे धीरे-धीरे उठ रही हैं और अब बिस्तर पर बैठ गयी हैं. *
-
सुपर ! आंटी बिस्तर पर बैठ गयीं और हम आधी लड़ाई जीत
गये. *
-
आंटी ! इफ नॉट नाउ,
देन वे'न.
प्लीज मम्मी. अपनी सारी ताकत कमर
में लाओ.
इवान ! मेरा दोनों हाथ पकड़ो.
इस पूरी कवायद में मम्मी का पूरा शरीर थलथला रहा है. इधर इवान उनकी हथेलियों को
मजबूती से थामे है. बेकरी की लड़कियाँ उनके दोनों कांख में हाथ डाल कर ज़ोर लगाए हुई
हैं.
डन ... ! विटोरिनो जैसे ख़ुशी से
फूट पड़ा है. मम्मी अब बिस्तर से उठ कर खड़ी हैं.
-
अब बाहर का स्ट्रगल. तुम लोग आंटी के व्हीलचेयर को
धीरे-धीरे सरकाते हुए सीढ़ी के पास आओ. 'फ्रंट एण्ड लोडर' के ड्राइवर को उसने इशारा किया है बड़े से डोल यानि विशाल
बकेट को उठाकर सीढ़ी से एकदम सटा दे.
-
"मैं इसमें बैठूँगी ?
हरगिज नहीं, मैं मर जाऊँगी इसमें ... मिनि रॉड्रिक्स हिचक-हिचक कर रो रही हैं.
-
जब तक सब कुछ समझें कि मिनि रॉड्रिक्स के व्हीलचेयर के पीछे
का हैंडिल थाम विटोरिनो एक झटके में फ्रंट एण्ड लोडर मशीन के आदमकद डोल में दाखिल
हो गया है. आदमकद डोल अब नीचे
आ गया है. विटोरिनो ने डोल में खड़े दो लोगों की मदद से व्हीलचेयर को बहुत हिफाजत
से बाहर निकाला है.
-
अब उन्हें कार में बिठाना है. कार का गेट खोल दिया गया.
आंटी का हाथ एक लड़की ने कस कर थामा, बाक़ी की चार लड़कियों ने उनकी काँख में दोनों तरफ से हाथ
डाला है. अब व्हीलचेयर एकदम गाड़ी के गेट से सटा है. इवान दूसरे दरवाज़े से किसी तरह
गाड़ी के अन्दर घुसी है. विटोरिनो ने उनके दोनों हाथों में छड़ियां पकड़ा दी हैं और
लड़कियों को एक बार काँख में ज़ोर लगा कर उन्हें सीट की तरफ थोड़ा झुकाने को कहा है.
-
आंटी ! बस एक पाँव गाड़ी में डालिए,
इवान आपको अन्दर ले लेगी.
-
एक बारगी आंटी ने दांया पाँव उठाकर गाड़ी में डाला है,
सबकी किलकारी फूट पड़ी.
-
"इवान ! अब आंटी का हाथ पकड़ कर
आहिस्ता-आहिस्ता अन्दर लेने की कोशिश करो. पीछे से इन्हें हम थामे हुए हैं. आंटी,
अब आप अपना बांया पाँव उठाकर गाड़ी में डालिए प्लीज.
-
ये तो कमाल हो गया,
उन्होंने बायाँ पाँव भी गाड़ी में डाल दिया. अब इवान उन्हें
सीट पर बिठाने के संघर्ष में जुटी है. इधर वाले गेट से बेकरी की लड़कियाँ उन्हें
सीट पर अन्दर खिसकाने में भरपूर ज़ोर लगाए हुई हैं. मिनि रॉड्रिक्स अब किसी तरह सीट
में समा चुकी हैं.
यह विकास कुमार झा के उपन्यास '
राजा मोमो और पीली बुलबुल'
के अध्याय 'हिंडोला'
पर आधारित है.
*********************************
एक सीमा से अधिक मोटापा दिक्कत तो पैदा करता है – उस मोटे
के लिए भी और घरवालों के लिए भी. जब वे उमरदार होते जाते हैं, वृद्धावस्था
में होते हैं तो अपने दैनिक काम करने के लिए भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है. वे दूसरे
उसके परिवारीजन भी हो सकते हैं और आर्थिक रूप से सम्पन्न हों तो नौकर भी. पति / पत्नी
पूरी मदद नहीं कर पाते क्योंकि वे भी लगभग उसी वय के होने के कारण अशक्त होते हैं.
दो लोगों को मैंने देखा है, दिक्कतें भी देखी हैं. एक तो
घर की ही थीं.
बैंक में एक अधिकारी थे ( उनका
नाम, पद और विभाग का नाम निजता की रक्षा के लिए नहीं लिख रहा हूँ ) निहायत मोटे और खाने पीने के बेहद शौक़ीन. शुगर
भी थी. बदपरहेजी भी बहुत करते थे. समोसे
बहुत पसंद थे और नॉनवेज भी. रोज इंसुलिन का इंजेक्शन लगाते थे. दोपहिया
चला न सकते थे, कार चला न सकते थे. ड्राईवर
रखा था, उसी के साथ आते जाते थे. उठना
बैठना मुहाल था, कैसे न कैसे बैंक आते थे. नींद
भी उनको बहुत
आती थी. बैठे बैठे कब सो जाएं, पता
नहीं. मीटिंग में भी सो जाते थे.
जानकीपुरम विस्तार में
घर था और रहते द्वितीय तल पर थे. हम लोग परिहास भी करते थे कि मर जाएंगे तो कैसे ऊपर से उतारे
जाएंगे. रिटायरमेंट के बाद छह माह भी जीवित न रहे. निधन
घर पर ही हुआ, जाने कैसे उतारे गए होंगे. हांलाकि
बस पर ले जाया जाता है मगर कुछ दूर तो कांधों पर और घाट पर बस से उतारने के बाद तो
उठा कर ही ले जाया जाता है.
दूसरा मैंने अपनी बहू ( छोटे
चचेरे भाई की पत्नी) को देखा. वे खासी
मोटी थीं और खाने की शौक़ीन भी. घर के खाने के अलावा रोज ही बाहर का भी कुछ न कुछ खाती थीं. उनके
पिताजी हलवाई थे, भाई भी कारीगर थे तो यह आदत बचपन से थी. अमीनाबाद
वाले घर में रहती थीं. वहाँ से खाली हम दो भाई और एक चचेरा भाई अमीनाबाद छोड़ कर गए.
जब उनका निधन हुआ तो उठाना
समस्या थी. यह तो गनीमत कि वे भूतल पर रहते हैं तो ऊपर से उतारना नहीं पड़ा. हमारा
घर गलियों को पार करके अन्दर है तो शववाहन अन्दर तक नहीं आता. बहुत
हुआ तो गढ़ईया , करीब आधा किलोमीटर के अंदर या झण्डेवाला पार्क के पास खड़ा होता, वह लगभग
एक किलोमीटर है. इन्होंने
पता नहीं कैसी बस की कि वह गणेशगंज पर खड़ी हुई. यह घर
से करीब दो किलोमीटर है. अब वहाँ तक ले जाना मुहाल. मैं
तो जेठ था इसलिए कंधा दे नहीं सकता था मगर गणेशगंज तक तो साथ में पैदल गया ही. अब जिन्होंने उठाया वे ही जानते होंगे. थोड़ी-थोड़ी दूर पर रखते
थे, फिर सहता कर उठाते थे. भारी
देख कर लोग उठाने से बच भी रहे थे.
भैसाकुण्ड (श्मशान घाट) पर भी बस सड़क पर उतार देती है, नीचे
तक और फिर चिता तक उठा कर ले जाना होता है. एक और
प्रमुख घाट है गुल्लाला. वहाँ अंदर तक बस जाती है, कम दूरी
तक ही उठाना होता है, फिर समतल भी है किन्तु हमारे घर के लोग भैसाकुण्ड ही ले जाए
जाते हैं तो वहीं ले जाया गया.
तो मोटापा अगर एक सीमा
से अधिक हो तो उमर बढ़ने से अंत समय तक दिक्कत देता है.
यहाँ किसी के मोटापे का उपहास नहीं कर रहा और न ही बॉडी शेमिंग
है, अगर किसी को ऐसा लगता है तो क्षमाप्रार्थी हूँ. उद्देश्य इस ओर ध्यान दिलाना है
कि जहाँ तक हो सके, स्वयं को अथवा परिजन को मोटा न होने दें. कुछ लोगों का मोटापा तो वंशानुगत होता है या थायराइड
के कारण हो जाता है, उनके लिए कुछ नहीं किया जा सकता किन्तु कुछ लोगों में यह अर्जित
किया हुआ होता है. खूब और अस्वास्थ्यकर ( फास्ट फूड, तला-भुना, अधिक कैलोरी वाला )
खा खा कर बढ़ाया जाता है, खाने के साथ चाहे काम ऐसा हो जिसमें देर तक बैठना हो या आलस्यवश
बैठे / अधलेटे ही रहें, व्यायाम न करें, पैदल न चलें, ऐसे काम न करें जिनमें कैलोरी
बर्न हो, अधिक प्यार-दुलार जो खूब गरिष्ठ भोजन करा कर व्यक्त किया जाए , अल्कोहल भी
लिया जाय … तमाम कारक हैं जो मोटापा बढ़ाते हैं. एक सीमा तक तो अच्छा लगता है, कम भी
किया जा सकता है किंतु सीमा से बाहर हो जाने पर व्यायाम, दवा, डाइटिंग आदि भी कुछ कारगर
नहीं होते. मोटापा … दिनों में कम करने का दावा करने वाले ये लुभावने विज्ञापन छलावा
ही होते हैं. आप किसी मॉडल की पहले की फोटो और इनके उपचार की फोटो देखते हैं तो विश्वास
सा होने लगता है कि जब ये वज़न कम कर सकती है तो मैं क्यों नहीं ! मगर यह कुछ दिन के
उपचार से नहीं होता, बल्कि दवाओं या डाइटिंग से कमज़ोरी आ जाती है. उपचार की किसी भी
पैथी के दावे थोथे ही होते हैं. मोटापा कोई पन्द्रह दिन / एक माह / छह माह में कम नहीं
होता, यह तब ही कारगर होता है जब मोटापा शुरू होने का संकेत / लक्षण पर ही रोकथाम के
उपाय किए जाएँ, यह निरन्तर निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है. ऐसा नहीं कि संयम बरत कर
इच्छित आकार / वज़न पा लिया तो फिर वही सब शुरू कर दिया जिनसे आपकी कमर कमरा हुई थी.
अब वह कमरा से हॉल हो सकती है. तो बेहतर है कि क्षीण कटि जब पेट होने की सीमा पार करके
तोंद बनने की प्रक्रिया में हो, तभी इसे रोकें.
क्या आपके आस पास ऐसे लोग हैं, आप स्वयं हैं तो सजग हों, सजग
करें. आपके कोई ऐसे सकारात्मक, प्रेरक या नकारात्मक अनुभव हों तो लिखें. क्या पता,
कोई संदेश ग्रहण करे और तोंद को पुनः पेट / कटि में परिवर्तित कर दे !


No comments:
Post a Comment