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Friday, 24 July 2026

पुस्तक चर्चाः “ग्वालियर से खजुराहोः एक साईकिल यात्रा" – लेखक और यात्री – जयदीप शेखर

 


पुस्तक चर्चाः ग्वालियर से खजुराहो

ग्वालियर से खजुराहोः एक साईकिल यात्रा

( आठ दिनों की साईकिल यात्रा का सचित्र वृत्तान्त ) लेखक और यात्री जयदीप शेखर

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आज डेस्क टॉप पर ई पुस्तक फोल्डर में गया तो मित्र जयदीप शेखर की किताब, ‘ग्वालियर से खजुराहोः एक साईकिल यात्रा’ फिर से पढ़ डाली. यह यात्रा वृत्तान्त इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि ग्वालियर से खजुराहो आना-जाना मिला कर लगभग 564 किमी है तो इतनी दूरी तय करना, वह भी साईकिल पर, एक साहसिक यात्रा है. यात्रा का जुनून हो तो ही इतनी दूरी साईकिल से तय की जा सकती है. भले ही रुकते-रुकाते, विश्राम करते गए. 1995 में उन्होंने यह यात्रा की थी.

इस तरह की यात्रायें एक जुनून के तहत ही की जा सकती हैं जो जयदीप मे है. इस किताब के प्रति मेरी उत्सुकता इसलिये और भी बढ़ी कि विगत तीन साल मै लौड़ी ( जिला छतरपुर, मध्य प्रदेश ) मे तैनात रहा जहां से खजुराहो मात्र 42 किलोमीटर दूर था और माह मे दो-तीन बार तो मेरा जाना होता ही था. खजुराहो तो जैसे घर का आंगन बन गया था कि छुट्टी के दिन बैंक से निकले और खजुराहो मे डेरा डाला. कला के विविध रूपों मे रुचि है और वहां तो कला के दो आयाम थे एक खजुराहो मन्दिर समूह का स्थापत्य और दूसरा मेरे चित्रकार मित्र, राजकुमार जाटोलिया., तो अक्सर ही खजुराहो जाना होता था.

बात जयदीप की किताब के बारे मे हो रही थी. ये हज़रत निकल पड़े साईकिल पर और न इनके पास हवा भरने वाला पम्प , न मरम्मत के लिये कुछ और न ही पंचर जोड़ने की सामग्री. जैसा किताब मे बताया है कि रास्ते मे कई जगह चेन कसवानी पड़ी, साईकिल भारी भी चली तो उसे दिखाना पड़ा और कई जगह हवा कम होने पर भी चलाई, आगे जब कोई दुकान मिली तो हवा भरवाई. खजुराहो से अधिक रोचक यह यात्रा वृत्तान्त है. उस समय ( 1995 मे ) लोग साईकिल पर खूब चलते थे इसलिये मरम्मत की दुकाने भी मिल गयीं , आज के समय बाईक मरम्मत की दुकानें तो बहुतायत से हैं, साईकिल की कम. साईकिल मरम्मत की सुविधा तो अलग बात है मगर इस तरह अकेले निकल पड़ना, कुछ रकम , कुछ कपड़े , मालिश के लिये तेल और चटाई जैसा कुछ लेकर , आना-जाना मिलाकर 564 किलोमीटर की साईकिल यात्रा पर अलग और जीवट की बात है.

खजुराहो का वर्णन जयदीप ने बहुत नही किया है  क्योंकि यह डायरी / यात्रा वृत्तान्त वस्तुतः साईकिल यात्रा के बारे मे है. एक दो बातें मुझे इस यात्रा मे रोचक लगीं. एक जगह वे थक कर एक पेड़ के नीचे लेटे और सो गये. इसका साम्य जयदीप ने पुराने समय के यात्रियों से किया है जब वे घोड़ा बांध कर पेड़ की छांव मे सुस्ता लेते थे या सो लेते थे. अभी इकत्तीस साल ही हुए हैं इस यात्रा को मगर अब ऐसा विश्राम निरापद नही, ऐसी छांव भी न मिलेगी और ट्रेफिक का शोर तो ऐसा कि अब घने जंगलों मे ही शायद शांति हो. एक और घटना रोचक है जब एक पेड़ के नीचे से गुज़रते हुए उन पर मधुमक्खियों का आक्रमण हुआ और वे साईकिल तेज़ भगा कर बच सके.

यह यात्रा वर्णन मुझे और भी रोचक इसलिये भी लगा कि लगभग तीन साल मैं उसी क्षेत्र में रहा. छतरपुर जिले की तहसील लौड़ी स्थित स्टेट बैंक की लौड़ी शाखा में मेरी तैनाती थी. खजुराहो वहाँ से लगभग 42 किलोमीटर है और खजुराहो मेरा अक्सर जाना होता था. साईकिल से जाने की तो मेरी हिम्मत नहीं, मोटरसाईकिल से गया, ऑफिसियल काम से  कार ( बैंक में लगी बोलेरो ) से जाता था, निजी तौर से जाने पर मोटरसाईकिल से. अक्सर ही शनिवार को जाता था, शनिवार और रविवार वहीं रुक कर सोमवार को सुबह नौ बजे तक लौड़ी लौट आता था, ड्यूटी भी तो बजानी होती थी.  इस क्षेत्र मे रहते हुए अक्सर छतरपुर भी जाना होता था तो मै छतरपुर शहर के बाहर की जगहों को भी  चित्र से पहचान गया. पुस्तक सचित्र है, कुछ चित्र खींचे हुए हैं और कुछ नेट से लिये गये हैं.

जयदीप शेखर मेरे मित्र और सहकर्मी हैं. वायु सेना से रिटायर होकर भारतीय स्टेट बैंक मे नौकरी की, अब बैंक से भी रिटायर हैं. उनके व्यक्तित्व के कई पहलू हैं जिनमे से एक उनका साहित्यानुराग है. वे लेखक व कवि भी हैं, चित्रकार भी और यायावर भी, और अब तो प्रकाशक और अनुवादक भी हैं. बनफूल, बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय व अन्य कई बांग्ला साहित्यकारों की किताबों के हिन्दी अनुवाद उन्होंने किए हैं. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर उनकी शोधपरक पुस्तक, नाज़ ए हिन्द सुभाष’ अध्येताओं के लिये बड़ी महत्वपूर्ण है.

उन्होने इस किताब, ‘ग्वालियर से खजुराहोः एक साईकिल यात्रा के बारे मे एक पोस्ट फेसबुक पर डाली तो मुझे स्मरण हो आया कि उन्होने एक बार पहले भी इस यात्रा का ज़िक्र किया था. हम कुछ मित्र मेल मञ्चनामक एक ई- प्लेटफार्म पर हैं जहां अपनी और दूसरों की रचनायें और बातें साझा करते हैं, उसी मञ्च पर उन्होने एक पोस्ट मे इस साईकिल यात्रा के बारे मे भी बताया था. सोच कर ही कुछ अचम्भा / सनक सा लगा कि कोई अकेले ग्वालियर से खजुराहो तक और ओरछा ( आना-जाना मिला कर 564 किमी ) तक साईकिल से यात्रा करे. खैर, हम लोगों ने कोई उत्सुकता व्यक्त नही की तो उन्होने भी कुछ नही बताया. अब इस डायरी को सचित्र पुस्तक का रूप दिया , इसकी ई- प्रति मुझे भेंट की तो याद ताज़ा हो उठी और इसे पढ़ा.

बहरहाल, मेरे कहने पर न जाईये, रुचि जगी हो तो पुस्तक पढ़िये. छोटी सी पुस्तक है. यह पहले ई पुस्तक के रूप मे थी किन्तु अब जगप्रभा प्रकाशन, बरहरवा, साहब गंज, झारखण्ड (web: jagprabha.in | email: contacts@jagprabha.in ) से मुद्रित भी हो रही है, और पोथी.कॉमपर भी है.