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Saturday, 30 May 2026

सात दिन सात किताब - पहला भाग ( तीसरी किताब तक )

 सात दिन सात किताब                                               

                                       पूर्वपीठिका ( 30 मई, 2018 को )

साथियों,

इस रोचक साहित्यिक श्रंखला में मुझे सुलेखा पाण्डेय्‍ जी ने नामांकित कियाहार्दिक आभार. इस श्रंखला में अपनी पसन्द की पुस्तकों में से पहला आवरण पृष्ठ पोस्ट करूँउससे पहले पोस्ट करने में हुए अतिशय विलम्ब के लिये क्षमा मांग लेता हूँ. उत्तम भाई एवं कुछ अन्य साथी मेरी लेट-लतीफी को जानते हैं इसलिये वे सम्भवतः इसके प्रति सशंकित नही अपितु आशावान्‍ रहे होंगे. अब तो मै इस पर शर्मिन्दा भी नही होता. ग़लत बात है यह और अब यह आश्वासन दे रहा हूँ कि आगे इतना विलम्ब न होगावैसे यह पूर्वपीठिका है अर्थात मेरी पठन यात्रा ( जो अभी भी चल रही है ) का संक्षिप्त परिचय.

यह भी पहले ही निवेदन कर दूँ कि इस पोस्ट में मै एक ऐसी पुस्तक और एक ऐसे लेखक का ज़िक्र करूँगा जो मुझे बहुत बहुत प्रिय हैं किन्तु उन्हे इस श्रंखला में शामिल नही करूंगाकुछ इस कारण कि सम्भवतः उन्हे साहित्य ही न माना जाय. इसके अतिरिक्त अपनी पसन्द की कुछ और पुस्तकोंबल्कि विषयकी भी चर्चा इस श्रंखला में करना उपयुक्त न होगा क्योंकि वे साहित्य नहीविचारधारा हैं और कुछ राजनीति मे भी आती हैं.

सामान्यतः पठन यात्रा पत्रिकाओं से प्रारम्भ होकर कुछ हल्की-फुल्की किताबों / कहानियों से होती हुई गम्भीर और स्तरीय साहित्य की ओर जाती है किन्तु मेरे साथ यह क्रम कुछ अलग हुआ. पढ़ने में रुचि मेरे पिता जी ( अब दिवंगत ) और दो बड़े भाईयों ( वे भी दिवंगत ) के सानिद्ध्य में उत्पन्न हुई. पिता जी गज़ब के पढ़ाकू थे ( इतने कि शौचालय में भी किताब ले जाते थेइसी कारण उन्हे निवृत्त होने में बहुत समय लगता था. ऐसा वे शाम की शौच के समय करते थेसुबह दफ़्तर जाने की ज़ल्दी होती थी ना तो तब यह नही कर सकते थे ) और साथ ही धार्मिक भी. सत्संग / प्रवचन/ कथाश्रवण आदि में उन्हे रुचि थी और वे मुझे अपने साथ ले जाया करते थे. मुझे साथ ले जाने का क्रम जब शुरू हुआ तब मैं कक्षा चार में और 8 साल का था. मज़े की बात यह है कि मुझे भी उनमें रस आता था. हम अमीनाबाद में रहते थे और झण्डेवाला पार्क और घण्टाघर पार्क में अक्सर सत्संग / प्रवचन/ कथावाचन आदि हुआ करता था. तब मोहल्लों में भी भादों में भागवत हुआ करती थी और जाड़ों में भी कोई न कोई कथावाचक आया करते थे. तो उनके साथ मेरी पठन यात्रा धार्मिक किताबों से प्रारम्भ हुई. पण्डाल के बाहर एक – दो तखत किताबों के भी लगते थे तोवे खरीदते भी थे. युवा वर्ग को शायद अचरज हो कि कुछ किताबों के मूल्य के रूप में अंकित होता था, “नित्य एक बार पढ़ने की प्रतिज्ञा” अर्थात्‍ वे निःशुल्क मिलती थीं और धार्मिक भाव / भय के चलते लेने वाला कुछ दिन इस प्रतिज्ञा का पालन करता भी था. कल्याण” ( गीताप्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिकाअब भी आती है ) के वे ग्राहक थे. उनके कुछ मित्र भी उसी प्रकृति के थे. तो बचपन से ही धार्मिक किताबें पढ़ने में रुचि रही और प्रवचनात्मक पुस्तकों के अलावा गीतारामायणमहाभारतकुछ उपनिषदकुछ पुराण आदि ( हिन्दी अनुवाद / भावानुवाद / संक्षिप्त संस्करण ) सत्यार्थ प्रकाश बचपन से किशोरावस्था तक पढ़ डाला. रामचरित मानस का मै और पिता जी नित्य सस्वर पारायण करते थे.

ऐसा नही कि उस कालखण्ड में धार्मिक किताबें ही पढ़ीं. पिता जी जासूसी उपन्यासों के भी शौक़ीन थे ( शौचालय में उन्हे ही ले जाते थेधार्मिक किताबों को नही ) मुझसे थोड़ा इस मामले में कम थे कि वे दफ़्तर में किताबें नही ले जाते थे. दिन भर किताब घर पर रहती थी तो स्कूल से आने के बाद मै पढ़ता था. मेरे एक चचेरे भाई किताब की दुकान ( शुक्ला बुक डिपोअमीनाबाद ) में काम करते थे तो किताबें ले आते थे. जयशंकर प्रसाद जी के उपन्यास ( कंकालतितली की याद है )गुरुदत्त का उपन्यास ज़माना बदल गया” के नौ खण्डदुर्गादास राठौरअमरसिंह राठौर आदि नाटकदेवकी नन्दन खत्री जी की चन्द्रकान्ता औरऔर भी बहुत सी किताबें उनके सौजन्य से पढ़ीं. उन्हे जासूसी या सामाजिक किताबों का शौक़ न था. एक पड़ोसी भाई की अमीनाबाद में ही किताबों की दुकान थी. छोटी दुकान थीबारामदा में तखत पर किताबें लगाते थेउस तरह की दुकानों को बड़ी दुकान वाले और हमपेशा तखत एण्ड कम्पनी” कहते थे. वे स्नातक और उससे ऊपर की किताबें बेचते थे और स्टॉक घर पर रहता था. तब मैने बहुत सी किताबें पढ़ीं. मुझे इससे मतलब न था कि किस विषय की किताब है और किस कक्षा की – बस अगर रुचिकर हो तो पढ़ता था. उन्हे साहित्यिक किताबों से लगाव न थाजासूसी किताबें पढ़ते थे. तो मित्रोंमेरे पास खूब मसाला था जो मै पठन व्यञ्जन में डालता गया. शनैः शनैः उत्कृष्ट और गम्भीर किताबों की ओर अग्रसर होता गया किन्तु ऐसा नही कि हल्की-फुल्की किताबें छोड़ दी हों. अब भी सब तरह की पढ़ता हूँयहाँ तक कि हाय ! भाई साहब आप भी !! और छिः छिः कोटि की किताबें भी पढ़ीं और पढ़ता हूँ.

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पठन यात्रा तो चल रही है अब एक किताब और एक लेखक की चर्चा और कल सेअधिकतम रात्रि आठ बजे तकश्रंखला की किताबें.

किताब है रामचरित मानस” मुझे बहुत पसन्द है और जाने कितनी बार पढ़ी. अब भी नित्य कुछ पृष्ठ सस्वर पाठ करता हूँ. पहले तो धार्मिक भाव से पढ़ता था ( वो भाव आज भी तिरोहित नही हुआ है ) बाद में कथा के भाव से या एक महाकाव्य के भाव से. बहुत कुछ कण्ठस्थ भी है और चौपाई सुनकर प्रसंग याद आ जाता है. काव्य में भी मुझे बहुत रुचि है ( श्रंखला में भी देखेंगे ) और यह तो है ही गाई जाने वाली गाथा. अद्भुत संयोजन है और क्या रूपक बांधा है रामकथा का सरोवर के रूप में. सांगरूपक प्रारम्भ में ही है. सात काण्ड मानों सात सोपान हैं. चार वक्ता और चार श्रोता हैं – शिव- पार्वतीयाज्ञ्वल्क्य – भरद्वाजकाकभुसण्डि – गरुड़ और तुलसी – भक्त जन. राम अवतार की विविध कथायें / हेतु हैं और साथ ही रावणादि के भी. बालकाण्ड में रामकथा मे अन्य कई कथायें गुम्फित हैं. सरल अर्थ भी है और लाक्षणिक भी. प्रारम्भ में भक्ति भाव से पढ़ाबाद में महाकाव्य का और कथा का रस लेने के आशय सेफिर आलोचनात्मक दृष्टिकोण सेतुलसी की मानसिकताउस काल की सामाजिक स्थिति और अब इन सब भावों के साथ व्यायाम के दृष्टिकोण से भी वाचन करता हूँ. यह एक ऐसा ग्रन्थ है कि जितना डूब कर और जितनी बार पढ़ेंगे – नये नये अर्थ खुलेंगे. यह मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है ( और शायद ‘ बेस्ट सेलर’ भी ) किन्तु इसे शामिल इसलिये नही कर रहा कि अवधी का महाकाव्य होते हुए भी इसे शायद साहित्य न माना जाय.

मेरी पसन्द के लेखक हैंसुरेन्द्र मोहन पाठक. जासूसी किताबों की दुनिया में वे स्टार हैं. उनका लेखन बांधे रखता है और विमल सीरीज ( और अब जीत सिंह ) को छोड़ कर अतिरेकी नही लगता. जब जासूसी उपन्यासों में नायक खुफिया एजेण्टसीक्रेट सर्विस केपुलिस आदि के हुआ करते थेउनका दोहरा रोल होता था तब पाठ्क जी ने एक खोजी पत्रकारसुनील चक्रवर्तीको नायक बनाया. मर्डर मिस्ट्री के वे विशेषज्ञ हैं. अपनी किताबों के अलावा उन्होने जेम्स हेडली चेईस का अनुवाद किया. वस्तुतः पाठक जी और जेम्स हेडली चेईस से परिचय ऐसे ही हुआ. उपन्यास के साथ ही उनका सम्पादकीय भी बेजोड़ होता है. पाठक जी का मै पंखा ( फैन ) नही बल्कि कूलर / AC हूँ और उत्तम भाई तो कहते हैं कि वे पाठक जी का लिखा धोबी का हिसाब और घर खर्च का विवरण भी उसी रुचि से पढ़ सकते हैं जैसे उपन्यास. उन्हे साहित्यकार और उनके रचे को साहित्य न माना जायेगा अतः पसन्दीदा होते हुए भी वे श्रंखला में नही हैं.

तो कल आठ बजे रात्रि को लीजिये.

मेरी पसन्द की पहली ( वस्तुतः कोई पहलीदूसरी नही बल्कि सात में से एक ) पुस्तक.                 

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एक दिन – एक पुस्तक ( सात दिनों तक )

पहला दिन – 31 मई, 2018

पुस्तक – “अंधा युग

लेखक – धर्मवीर भारती

विधा – नाटक

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साथियों,

एक दिन एक पुस्तक – सात दिनों तक चलने वाली श्रंखला में Sulekha Pande जी ने मुझे सात दिनों तक लगातार अपनी पढ़ी हुई और पसन्द की पुस्तक का आवरण पृष्ठ पोस्ट करने हेतु आमन्त्रित किया हैइस क्रम में आज मैं धर्मवीर भारती के कालजयी नाटक, “ अंधा युग” का आवरण पृष्ठ प्रस्तुत कर रहा हूँ. 

मै इस नाटक को कालजयी” कह रहा हूँकालजयी क्य है साहित्य के सन्दर्भ में ! मेरी मति अनुसार साहित्य कालजयी दो अर्थों में होता है – एकजब वह पीढ़ियों तक पढ़ा जायलोकप्रिय हो और सुधी पाठकों के बीच उसकी लोकप्रियता वर्त्मान में भी वैसी ही हो जैसी पूर्व में थीऔर दूसरा,  जब उसकि विषय वस्तु आज भी उतनी ही प्रासंगिक हो जितनी कि रचना के समय और जिस समय का वर्णन किया गया है – तब रही हो.

यह नाटक महाभारत युद्ध के उत्तरकाल का वर्णन करता हैयुद्ध सदैव ही विनाशकारीवीभत्स और विभीषिकामय होता है – विजेता के लिये भी और पराजित के लिये भीयुद्ध का उद्देश्य चाहे जितना ही पावन रहा होचाहे वह आत्मरक्षा के लिये लड़ा गया हो या सत्यन्याय की रक्षा के लियेआमन्त्रित हो या थोपा हुआ – युद्ध का कैसा ही प्रकार हो – वह होते समय और बाद में विनाश के चिन्ह छोड़ जाता है और उसका अभिशाप / दुष्परिणाम पीढ़ियों को भोगना होता है – ग़रीबीबीमारी और जली हुई धरती के रूप मेंयुद्ध की इसी विभीषिका को बड़े प्रभावीनिष्ठुरता और निर्ममता के साथ बता है, “ अन्धा युग

यह नाटक यद्ध के औचित्य का बखान नही करता, “ यतो धर्मस्ततो जय ” का घोष नही करताकृष्ण का गान नही करता – केवल और केवल युद्ध की विभीषिका बता कर यह बताता है कि युद्ध सदैव घातक हैयह मूल स्वर नाटक को कालजयी बनाता है – महाभारत से अब तक युद्ध का यही सत्य है.

यह नाटक का रचनाकाल सितम्बर 1954 है और प्रथम संस्करण 1965 में प्रकाशित हुआयह मञ्चन के लिये लिखा गया था अतः नाटक में इसी के निर्देश / टीप भी हैंइसका रेडियो रूपान्तरण भी हुआ और रेडियो पर भी यह नाटक उतना ही प्रभावी हुआ जितना कि मञ्च परमैने रेडियो पर भी इसे सुना है और इसके कई मञ्चन भी देखे हैंनामचीन निर्देशकों और कलाकारों से लेकर कार्यशाला तक में रंगकर्म से नितान्त अनभिज्ञ लोगों के साथ इसका मञ्चन किया गया और तब भी यह उतना ही प्रभावी रहाअन्तिम बार 1999 में अल्मोड़ा के एडम्स कॉलेज” में एक माह की कार्यशाला के बाद मञ्चन देखा थामेरी दो बेटियांअपेक्षिता और अपराजिताभी इसमें थीं.

नाटक महाभारत के 18रर्वें दिन की संध्या से प्रभास तीर्थ में कृष्ण की मृत्यु के क्षण तक का हैनाटक में आद्योपांत रुदनशापचीत्कारप्रतिहिंसा आदि ही है – जो युद्ध का सत्य और प्राप्य हैनाटक मुक्त छन्द में है और गेय हैदेहाभिनय के ही बराबर स्वराभिनय मुख्य है और न्यूनतम मञ्चसज्जा और प्राप्स के साथ है.

नाटक के कुछ दृश्य / संवाद देखें 

“… उस भविष्य में

   धर्म-अर्थ ह्रासोन्मुख होंगे

   क्षय होगा धीरे-धीरे सारी धरती का   

   सत्ता होगी उनकी

   जिनकी पूँजी होगी

   जिनके नकली चेहरे होंगे

   केवल उन्हे महत्व मिलेगा.

   स्थापना खण्ड से – क्या आज भी यह नही हो रहा )

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“ … यह अन्धा युग अवतरित हुआ

   जिसमें स्थितियांमनोवृत्तियांआत्माएँ सब विकृत हैं

   है एक बहुत पतली डोरी मर्यादा की

   पर वह भी उलझी है दोनों पक्षों में … “

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“… मैने कहा था दुर्योधन से

   धर्म जिधर होगा  मूर्ख

   उधर जय होगी.

   धर्म किसी ओर नही था लेकिन

   सब ही तो थे अपनी प्रवृत्तियों से परिचालित

   जिसको तुम कहते हो प्रभु

   उसने जब चाहा

   मर्यादा को अपने ही हित में बदल लिया

   वञ्चक है … “

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“ चुप क्यों हो

  थका हुआ होगा यह

  विदुर इसे फूलों की शय्या दो

  कोई पराजित दुर्योधन नही है यह

  सोये जो जाकर

  सरोवर की

  कीचड़ मे … “

  युयुत्सुएक कौरव जो धर्म / सत्य / न्याय के पक्षपाण्डव पक्षमें चला गया थायुद्ध के बाद जब कौरव नगरी में गान्धारी के पास गया तो उसका व्यंग्य वाणों से तिरस्कार किया गयापाण्डव पक्ष में जाने पर भी अपमानित हुआअन्ततः उसने आत्महत्या की. )

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सबसे महत्वपूर्ण खण्ड, “ गान्धारी का शाप” इसके अनेक स्वतन्त्र मञ्चन भी हुए 

“ … कृष्ण सुनो !

    तुम यदि चाहते तो रुक सकता था युद्ध यह

    मैनें प्रसव नही किया था कंकाल का

    इंगित पर तुम्हारे ही भीम ने अधर्म किया

    क्यों नही तब तुमने वह शाप दिया भीम को

    जो तुमने दिया निरपराध अश्वत्थामा को

    तुमने किया है प्रभुता का दुरुपयोग …. “

“ … तो सुनो कृष्ण !

    प्रभु हो या परात्पर हो

    कुछ भी हो

    सारा तुम्हारा वंश

    इसी तरह पागल कुत्तों की तरह

    एक दूसरे को परस्पर फाड़ खायेगा

    तुम खुद उनका विनाश करके

    किसी घने जंगल में

    साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे.

    प्रभु हो

    पर मारे जाओगे पशुओं की तरह … “

     ***************

“ … प्रभु हूँ या परात्पर

    पर पुत्र हूँ तुम्हारातुम माता हो

    मैने अर्जुन से कहा 

    सारे तुम्हारे कर्मों का पाप-पुण्ययोगक्षेम

    मैं वहन करूँगा अपने कंधों पर

    अठ्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में

    कोई नही केवल मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार

    जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ

    कोई नही था

    वह मै ही था … “

ऐसे अनेक दृश्य हैं जो लययुक्त उच्च स्वर में बोले गये संवादों में सजीव हो उठते हैंचाहे किताब पढ़ेंरेडियो लाईब्रेरी से लेकर सुनें या मञ्चन देखें – मेरा सुझाव हैअंधा युग से साक्षात अवश्य करें.

साधो ! कैसा रहा प्रथम पुष्प !                         

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एक दिन – एक पुस्तक ( सात दिनों तक )

दूसरा दिन – 01जून, 2018

पुस्तक – “मेघनाद वध

लेखक – माईकेल मधुसूदन दत्त

विधा – काव्य

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साथियों,

एक दिन एक पुस्तक – सात दिनों तक चलने वाली श्रंखला में Sulekha Pande जी ने मुझे सात दिनों तक लगातार अपनी पढ़ी हुई और पसन्द की पुस्तक का आवरण पृष्ठ पोस्ट करने हेतु आमन्त्रित किया हैइस क्रम में आज मैं माईकल मधुसूदन दत्त के काव्य, “ मेघनाद वध” के दो आवरण पृष्ठ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

पहले इस काव्य का संक्षेप में परिचय दे दूँतत्पश्चात इसमें अपनी रुचि के बारे में बताता हूँरामायण और महाभारत ऐसे दो महाकाव्य हैं जिन्होने भारतीय जनमानस में बहुत गहरे पैठे हैंइन ग्रन्थों को पूज्य का दर्जा मिला है और इनके बारे में या इनके नायकों के बारे में कोई भी विपरीत बात कोई सुनना पसन्द नही करताधार्मिकजन तो पाप मानते ही हैंसाहित्यानुरागी भी पसन्द नही करतेइसके बावजूद साहित्य में इन पात्रों की घोर आलोचना भी की गयी है और उन्हे प्रतिनायकों से हीन और छुद्र मनोवृत्ति का दिखाया है और मनोवृत्ति के अनुरूप कर्म भीरामकथा के तो सैकड़ों प्रकार हैं और विदेशों में भी रामकथा प्रचलित हैइण्डोनेशिया बालीमॉरीशस आदि में तो रामकथा उत्तर भरत से भिन्न है – हरि अनन्तहरि कथा अनन्ता.

रामकथा के ही एक प्रसंगमेघनाथ द्वारा यज्ञ और उसी यज्ञभूमि में लक्ष्मण द्वारा मेघनाद के वध ( नायकों द्वारा प्रतिनायकों की हत्या को वध कहने की ही परम्परा हैवे युद्ध में वीरगति को प्राप्त नही होतेनायक के हाथों उनका वध होता है ) की कथा सर्गों में है.

काव्य मूल बांग्ला में अति क्लिष्ट भाषा और छन्द विधान में है ( ऐसा मेरे बंगाली मित्रों ने बताया जब मैं इस ग्रन्थ को पढ़ने को आतुर होकर इसे ढूंढ रहा था ) जो घोर साहित्यप्रेमी / काव्यानुरागी  होवह बंगभाषी भी इसे पढ़ने में असुविधा / अरुचि का अनुभव करेगाइसका रचना काल 1861 है.

इसका हिन्दी अनुवाद मैथिलीशरण गुप्त ने किया और यह साहित्य सदनझांसी” से 2003 में प्रकाशित हुआअनुवाद भी क्लिष्ट है और काव्यानुरागी ही इसका पूर्ण आनन्द ले सकने में समर्थ होंगेअंग्रेजी अनुवाद William Radice ने किया और यह Penguin Classics से 2010 में हुआ.

इस काव्य का तत्कालीन बंग समाज में बहुत विरोध हुआविरोध का कारण यह था कि इसमें रामलक्ष्मणहनुमान  अन्य नायकों की अपेक्षा राक्षसों को वीरधर्मयुद्ध करने वालेउदात्त … दिखाया गया हैयहां तक कि मेघनाद की पत्नी प्रमिला के समक्ष राम भी बिना युद्ध के ही हार मान लेते हैंराम का ऐसा चित्रण भला कैसे स्वीकार्य होता.

विरोध का हाल यह था कि तत्कालीन बंग समाज के कुछ विद्वानों ने इसका उपहास करने के लिये छछूँदर वध” नामक काव्य लिखा और उसे प्रचारित कियाछछूँदर वध” की कुछ पंकियों का अनुवाद देखें 

“ …  एकदा चतुष्पदी छछूँदर थी घूमती पत्ते खड़काती हुई.

     पीछे पुष्प-गुच्छ-सी पुच्छ हिलती थी अहा !

     सुश्यामांग बंग में विश्वपशुविश्वम्भरादशभुजा देवी पे

     ऋत्विकों की मण्डली ज्यों चामर डुलाती है … “

छछूँदर वध” की और इसके हेतु की रामकृष्ण परमहंस ने निन्दा की किन्तु माईकेल मधुसूदन दत्त ने इसके काव्य सौष्ठव को सराहा.

अब वो पंक्तियां देखें जिनके कारण इसका विरोध हुआमेघनाद की पत्नी पति के पांव पूजने लंका से रणभूमि में जाना चाहती है किन्तु रास्तों पर राम की सेना की घेराबन्दी हैवह कुछ अंगरक्षिकाओं को लेकर वीरवेश में प्रस्थान करती हैहनुमान तो उसकी दूती से ही प्रभावित / पराजित से होकर उसे राम के समक्ष ले जाते हैंउस समय का प्रसंग 

“ … बोले रघुनाथ – सुनो हे सुभाषितेकरता अकारण विवाद नही मैं कभी.

    मेरा शत्रु रावण हैतुम कुल बालाएँ,कुलवधुएँ हो;

   फिर किस अपराध से वैरभाव रखूँगा तुम्हारे साथ मैकहो ?

   लंका में प्रविष्ट हो सहर्ष बिना शंका के.

   वीरेश्वर रूप रघुराज कुल में शुभे,

   जन्म राम का है दुतिहैं तुम्हारी स्वामिनी वीर पत्नी,

   सखियां हैं वीरांगना उनकी.

   सौ मुख से बड़ाई उनकी कर कहना 

   देख पति-भक्तिशक्तिशूरता मैं उनकी,

   युद्ध के बिना ही हार मानता हूँ उनसे … “

ऐसे अनेक प्रसंग हैं और सब लम्बे अतुकान्त छन्दों मेंएक प्रसंग में लक्ष्मण शक्तियों को प्राप्त करने मायादेवी से मिलने अन्य लोकों को जाते हैंउस मार्ग में स्वर्गनरक का वर्णन और विचित्र लोक – होमर के महाकाव्य ओडिसी” ( मैने यह भी पढ़ा है – निश्चित ही अनुवाद ) के समकक्ष हैं.

मै जानता हूँसशंकित भी था / हूँ कि यह पुस्तक मित्रों की कसौटी पर सम्भवतः खरी  उतरेबल्कि बोर टाईप की प्रतीत हो – जैसे मेघनाद वध” की उपेक्षा / विरोध किया गया था किन्तु एक तो यक श्रंखला प्रस्तुत करने वाले की पसन्द की पुस्तकों की है दूसरे एक-दो साथी भी इसे पढ़ने को उत्सुक हुए तो मेरी पसन्द सार्थक होगीमै इस श्रंखला में सुविख्यातबहुश्रुतलगभग सभी साहित्यानुरागी जन द्वारा पसन्द किये जाने और पढ़े जा चुके साहित्यकार / कृतियां प्रस्तुत करने नही जा रहाऐसा नही कि वे मुझे पसन्द नहीबहुत-बहुत पसन्द हैं और  केवल भारत अपितु विश्व का गौरव हैं --- मै कुछ अलग विधा / विषय वस्तु को प्रस्तुत करने के आशय से ऐसा कर रहा हूँ और प्रस्तुत्य पुस्तकें मेरी पसन्द” और कई बार पढ़ी तो हैं ही.

अभी एक काम से निकलना हैलौटते में ग्यारह बजने की सम्भावना हैउसके बाद पोस्ट करने में तीसरा दिन हो जाता अतः इसके प्रति मेरी रुचिउत्कण्ठा कैसे हुई – यह टिप्पणियों में ( यदि साथी सुनना चाहें तो ) बताऊँगा.

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एक दिन – एक पुस्तक ( सात दिनों तक )

तीसरा दिन – 02 जून, 2018

पुस्तक – “चित्रलेखा

लेखक – भगवतीचरण वर्मा

विधा – उपन्यास

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साथियों,

एक दिन एक पुस्तक – सात दिनों तक चलने वाली श्रंखला में Sulekha Pande जी ने मुझे सात दिनों तक लगातार अपनी पढ़ी हुई और पसन्द की पुस्तक का आवरण पृष्ठ पोस्ट करने हेतु आमन्त्रित किया हैइस क्रम में आज मैं भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास, “चित्रलेखा” का आवरण पृष्ठ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

भगवतीचरण वर्मा जी लखनऊ की साहित्यकार त्रयी – श्री अमृतलाल नागरयशपाल जी और भगवतीचरण वर्मा – में से हैं और साहित्य के महत्वपूर्ण स्तम्भ हैंउन्होने ‘ रेखा’, भूले-बिसरे चित्र’ , ‘टेढ़े मेढ़े रास्ते’, ‘सीधी-सच्ची बातें’, ‘सामर्थ्य और सीमा, ‘ सबहिं नचावत राम गोसांई’ जैसे कई उपन्यास और दो बांके’ , ‘वसीयत’ और रंगीलेलाल तीर्थयात्री’ जैसी चुटीली और व्यंग्यप्रधान कहानियां लिखीं किन्तु उन्हे ( सम्भवतः ) सर्वाधिक प्रसिद्धि चित्रलेखा” उपन्यास से मिलीइस उपन्यास पर दो बार फिल्में भी बनी हैंपाठ्यक्रम में भी यह उपन्यास लगा और लखनऊ के महानगर में स्थित उनकी कोठी का नाम भी चित्रलेखा” है.

उपन्यास का प्रथम संस्करण राजकमल प्रकाशन’ से 1934 में हुआनिश्चित ही उससे कुछ पहले इसकी रचना हुई होगीयह उपन्यास अपनी विषय-वस्तु और उसके अति सशक्त निर्वाह की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैयह इस बात की विवेचना करता है कि पाप क्या हैउपन्यास के तीन केन्द्रीय चरित्रों – चित्रलेखाबीजगुप्त और कुमारगिरि – के माध्यम से इसकी विशद व्याख्या हुई हैअन्य चरित्रों में महाप्रभु रत्नाम्बरउनके दो शिष्य – श्वेतांक और विशालदेवचाणक्यवयोवृद्ध सामन्त मृत्युञ्जय और उनकी पुत्री यशोधरा हैं जिनके साथ यह कथा विस्तार पाती है.

महाप्रभु रत्नाम्बर के दो शिष्य यह जानना चाहते हैं कि पाप क्या है रत्नाम्बर कहते हैं कि वन में और संन्यासियोंब्रह्मचारियों के बीच रह कर और सैद्धान्तिक रूप से यह नही जाना जा सकता कि पाप क्या हैइसके लिये संसार में सांसारिक जनों के बीच जाना होगावे श्वेतांक को पाटलिपुत्र के भोगी सामन्तबीजगुप्तके पास सेवक रूप में और विशालदेव को योगीकुमारगिरिके शिष्य के रूप में एक वर्ष तक रहने को कहते हैंएक वर्ष बाद यह तय होना है कि पाप क्या हैरत्नाम्बर स्वयं उन्हे बीजगुप्त और कुमारगिरि को सौंप कर आते हैं.

बीजगुप्त सामन्त है और उसकी जीवनशैली भोग-विलास से पूर्ण है तथा योगी कुमारगिरि संयमीब्रह्मचारी और अतिन्द्रीय शक्तियों के स्वामी हैंइन्द्रिय और सांसारिक इच्छाओं / वासना का दमन ही उनका ध्येय और सिद्धि हैचित्रलेखा अतीव सुन्दरी नर्तकी है किन्तु वेश्या नहींतत्कालीन पाटलिपुत्र में रूपवती और वैभववान नर्तकी का वेश्यावृत्ति  करना आश्चर्य और उसके प्रति सम्मान का कारण हैचित्रलेखा और बीजगुप्त एक दूसरे के प्रति अनुरक्त हैं और वह बीजगुप्त की पत्नी की तरह है किन्तु रहती अपने पृथक भवन में है.

पाठक सहज ही यह सोच सकता है कि श्वेतांक को बीजगुप्त के साथ पाप का अनुभव होगा किन्तु विशालदेव को संयमी योगीकुमारगिरिके साथ भला पाप का क्या अनुभव होगावह यह अवश्य जान जायेगा कि पाप क्या नही हैसाहित्यकार इतनी सहज लीकमान्यताओं पर नही चलता और घटनाक्रम ऐसा होता है कि बीजगुप्त का चरित्र उदात्त और पुण्यात्मा का तथा कुमारगिरि का दम्भीवञ्चक और भ्रष्ट का सिद्ध होता है और सबसे सशक्त चरित्र है चित्रलेखा कावह रूपमतीकुशल नर्तकी होने के साथ तार्किकसुदृढ़ इच्छाशक्ति की स्वामिनी भी है.

सामन्त बीजगुप्त के यहां श्वेतांक प्रथम दिन से ही मदिरा ढाल कर बीजगुप्त और चित्रलेखा को देता है और बीजगुप्त के आदेश पर उसे घर पहुँचाने जाता हैवहां वह चित्रलेखा के सम्मोहन में मदिरापान भी करता है और उसके प्रति अनुरक्त भी होता है किन्तु चित्रलेखा उसे उसकी स्थिति का भान करा देती हैउसे ग्लानि होती है और वह बीजगुप्त को सब बता कर दण्ड की याचना करता हैबीजगुप्त उसे दण्ड के रूप में नित्य चित्रलेखा को घर पहुँचाने की आज्ञा देता हैकालान्तर में वह मदिरापान का अभ्यस्त हो जाता है.

अभी तक लगता है कि भोगी बीजगुप्त के यहां  उसे  केवल पाप के दर्शन हो रहे हैं अपितु वह भी विलासी होता जा रहा है किन्तु घटनाक्रम में ऐसा मोड़ आता है कि पाप की दिशा ही बदल जाती हैसम्राट चन्द्रगुप्त के यहां सभा में अन्य विद्वतजनों के योगी कुमारगिरि भी होते हैं और चित्रलेखा भी नृत्य हेतुमंत्री चाणक्य ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करते और ईश्वर को व्यक्तियों द्वारा गढ़ा हुआ बता कर प्रश्न करते हैं कि क्या किसी ने ईश्वर को देखा है कुमारगिरि सम्मोहन द्वारा एक तेजपुञ्ज ज्वाला को प्रत्यक्ष करके उसे ईश्वर बताते हैंसभी उस तेजपुञ्ज कॉ ईश्वर मानते हैं किन्तु चाणक्य कहते हैं कि उन्हे ऐसा कुछ नही दिखासब उनका अविश्वास करते हैं क्योंकि सम्राट तक ने उसका अनुभव कियातभी चित्रलेखा भी कहती है कि उसे भी कुछ ऐसा नही दिखावह यह भी प्रतिपादित करती है कि जिनकी आत्मशक्ति कुमारगिरि से दुर्बल हैवे ही प्रभावित हुएप्रबल आत्मशक्ति वालों पर उनके सम्मोहन का प्रभाव नही हुआविजय मुकुट चित्रलेखा को दिया जाता है और कुमारगिरि अपमानित और क्रोधित अपनी कुटिया पर जाते हैं.

अब चित्रलेखा कुमारगिरि पर अनुरक्त है और वह उनसे दीक्षा पाना चाहती हैवह बीजगुप्त को छोड़ देती है और कुमारगिरि की कुटिया में रहने लगती हैउसे दीक्षा देना तो दूरकुमारगिरि उसके दुर्निवार सौन्दर्य के आकर्षण से बच नही पाते और वासना तथा संयम के द्वन्द्व में उनका संयम बालू की भीत की भांति ढह जाता हैअब वे वासना के वशीभूत पतित सामान्य व्यक्ति हैं जो चित्रलेखा के समक्ष तर्क में भी बुरी तरह पराजित हुआ.

बीजगुप्त चित्रलेखा का सच्चा प्रेमी है और उसमें उदात्तता और विरक्ति आती हैवयोवृद्ध सामन्त मृत्युञ्जय अपनी पुत्री यशोधरा के पाणिग्रहण का प्रस्ता करते हैं जिसे वह ठुकरा देता हैघटनाक्रम कुछ ऐसा चला कि श्वेतांक ( उसे बीजगुप्त के सेवक का नहीगुरु भाई का दर्ज़ा प्राप्त है और वह उच्चकुल का किन्तु निर्धन है ) यशोधरा के प्रति अनुरक्त होता हैइसका पता चलने पर बीजगुप्त स्वयं श्वेतांक के विवाह का प्रस्ताव करता और बाधक निर्धनता के प्रतिकार हेतु अपनी सारी सम्पत्ति और सामन्त पदवी श्वेतांक को दान करता हैअब चित्रलेखा भी कुमारगिरि को छोड़ कर  जाती है और वह भी सारी सम्पत्ति दान करके बीजगुप्त के साथ रहने का निर्णय करती है.

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एक वर्ष बीत चुका और पाप को जानने के इच्छुक दोनों महाप्रभु के समक्ष आते हैंश्वेतांक बीजगुप्त को देवता के समकक्ष और पुण्यात्मा बता हैउसे बीजगुप्त या चित्रलेखा के आचरण मे कही पाप नही दिखा जबकि विशालदेव कुमारगिरि को उत्कट योगी और संयमी बताता हैनिष्कर्ष स्वरूप रत्नाम्बर कहते हैं 

“ ... संसार में पाप की परिभाषा नही हो सकी और  हो सकती हैहम  पाप करते और  पुण्य करते हैं

हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है ... 

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उपन्यास इतना कथासार भर नही हैचित्रलेखा का सशक्त चरित्र और उसके तर्क घटनाओं के चित्रण और उसके तर्कों से पता चलता हैबीजगुप्त की भी तार्किक क्षमता सम्वादों और स्थितियों के निरूपण में हैयह कालजयी उपन्यास अवश्य पढ़ें.

                        

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