एक दिन – एक पुस्तक ( सात दिनों तक )
चौथा
दिन
– 03 जून,
2018
पुस्तक
– “क”
– भारतीय मानस
और
देवताओं
की
कहानियां
( इतालवी
से
अंग्रेजी
में
फिर
हिन्दी
में
अनूदित
)
लेखक
– रॉबर्तो
कलासो
( इतालवी साहित्यकार
)
अनुवादक
– देवेन्द्र
कुमार
( अंग्रेजी से
हिन्दी
में
अनुवाद)
विधा
– मिथक
कथायें
और
विवेचन
*********************************************************************
साथियों,
एक
दिन
एक
पुस्तक
– सात
दिनों
तक
चलने
वाली
श्रंखला
में
Sulekha Pande जी ने
मुझे
सात
दिनों
तक
लगातार
अपनी
पढ़ी
हुई
और
पसन्द
की
पुस्तक
का
आवरण
पृष्ठ
पोस्ट
करने
हेतु
आमन्त्रित
किया
है,
इस
क्रम
में
आज
मैं
रॉबर्तो
कलासो
की
किताब,
“क” का
आवरण
पृष्ठ
प्रस्तुत
कर
रहा
हूँ.
मिथक
और्
पुराण
कथायें
सदा
से
ही
अखिल
विश्व
को
आकर्षित
करती
आयी
हैं.
इन
मिथकों
में
धर्म
होता
है,
दर्शन
होता
है
, प्रतीकों
के
माध्यम
से
कथा
में
पिरो
कर
ब्रह्माण्ड
की
गुत्थियां
सुलझायी
जाती
हैं.
उन
पात्रों
को
किसी
ने
देखा
नही
होता
है
किन्तु
देखने
का
दावा
किया
जाता
है.
वे
पात्र
किसी
न
किसी
रूप
में
प्रत्यक्ष
–अप्रत्यक्ष मानव
के
समक्ष
आते
रहते
है
या
मानव
उनको
सदैव
अपने
बीच
महसूस
करता
है.
वे
अतीन्द्रिय
और
अजर-अमर
माने
जाते
हैं.
वे
भगवान
हो
सकते
हैं,
देवता
और
असुर
–राक्षस दानव
भी.
इन्ही
की
जानी-पहचानी
कथाओं
को
लेखक
ने
दार्शनिक
विवेचन
और
अपनी
टिप्पणी
के
साथ
प्रस्तुत
किया
है.
इस
पुस्तक
में
15 अध्याय
हैं
और
सृष्टि
के
प्रारम्भ
से
लेकर
बुद्ध
तक
की
कथा
कही
गयी
है.
फिर
ध्यान
दें,
यह
सिर्फ
भक्ति
भाव
में
डूबी
सरस
कथायें
नही
हैं
जिन
पर
कोई
प्रश्न
नही
उठाये
जाते
और
जो
कथाकार
ने
कह
दिया,
उस
पर
कोई
विवेचन
नही
होता
और
वो
प्रसंग
/ विवरण जिनसे
धर्मभीरू
लोगों
की
आस्था
को
चोट
पहुँच
सकती
है
और
ग्रन्थकार
उनका
और
ही
अर्थ
बताते
हैं
बल्कि
सब
को
पूर्ण
निर्ममता
से
तटस्थ
होकर
कहा
गया
है.
प्रथम
अध्याय
कद्रु
और
विनता
का
आख्यान
है
कि
कैसे
कद्रु
छल
से
गरुड़
की
माता,
विनता,
को
एक
शर्त
में
हरा
कर
दासी
बना
लेती
हैं
और
उन्हे
दासत्व
से
मुक्त
करने
को
वैनतेय,
गरुड़,
अमृत
लाते
हैं.
आगे
के
तीन
अध्याय
एकाकी
ब्रह्मा
द्वारा
सृष्टि
उत्पन्न
करने
और
उनकी
सन्तानों
के
गृहस्थ्य
अपनाने
और
सन्तति
बढ़ाने
के
काम
को
नकार
देते
हैं.
वस्तुतः
उन्होने
नारी
को
पृथक
जाना
ही
नही
और
यौन
तथा
यौनाकर्षण
तथा
यौनकर्म
द्वारा
सन्तान
उत्पन्न
करने
से
ही
अनभिज्ञ
थे.
यहां
लेखक
ने
जैसा
भारतीय
( हिन्दू ) ग्रन्थों
में
है
– वैसा
ही
वर्णन
किया
है,
अपनी
ओर
से
कोई
तर्क/
खण्डन-मण्डन
नही
किया.
यह
विचित्र
है
कि
ब्रह्मा
द्वारा
सृजित
लोग
यौन
से
अपरिचित
थे
किन्तु
ब्रह्मा
में
यौन
बोध
बहुत
था
और
वे
यौन
लोलुप
भी
थे.
पुत्री
सरस्वती
से
विवाह
की
बात
तो
सभी
जानते
होंगे,
कई
साथी
इससे
भी
परिचित
होंगे
कि
ब्रह्मा
ने
ऊषा
से
भी
संसर्ग
किया.
वह
उनसे
बचने
हरिणी
के
रूप
में
भागी
तो
वे
हरिण
के
रूप
में
उसके
पीछे
लगे
और
अपना
मनोरथ
सिद्ध
किया.
ऐसी
अनेक
कथायें
चार
अध्याय
तक
हैं.
पाँचवे
अध्याय
से
शिव
की
कथा
प्रारम्भ
होती
है.
शिव
ही
ऐसे
देवता
थे
जो
ब्रह्मा
तक
को
दण्ड
दे
सकने
में
समर्थ
थे.
जब
ब्रह्मा
ने
सरस्वती
पर
वासनामयी
दृष्टि
डाली
तो
शिव
क्रोधित
हुए
और
अपने
नाखून
से
ब्रह्मा
का
पाँचवा
सर,
जो
सरस्वती
पर
कुदृष्टि
डाल
रहा
था,
काट
डाला.
सर
तो
काटा
किन्तु
कपाल
शिव
की
हथेली
से
चिपक
गया
– छूटा
ही
नही.
यह
ब्रह्महत्या
थी
जो
उनके
साथ
लगी
थी.
अनेक
तीर्थों
में
शिव
हथेली
पर
चिपका
कपाल
लिये
घूमते
रहे.
इसी
से
शिव
का
एक
नाम
कपाली
भी
हुआ.
गंगा
तट
पर
उन्हे
कपाल
से
मुक्ति
मिली.
शिव
के
वन
क्षेत्र
( दारुकवन, अल्मोड़ा,
बूढ़ा
जागेश्वर
) में नग्न
घूमते
रहे
और
ऋषिपत्मियां
उन
पर
आसक्त
होकर
उनके
पीछे
घूमती
रहीं.
ऋषियों
की
भर्त्सना
से
शिव
को
क्षोभ
हुआ
और
उन्होनें
अपना
अण्डकोष
मुठ्ठी
से
जकड
कर उखाड़
कर
फेंक
दिया.
यह
प्रसंग
रोचक
ढंग
से
कहा
गया
है.
ऐसे
ही
अश्वमेघ
यज्ञ
का
बहुत
विस्तार
से
वर्णन
है.
सम्पूर्ण
अनुष्ठान
का
वर्णन
है
जो
अश्लील
भी
लग
सकता
है.
आगे
के
अध्यायों
में
सागर
मन्थन,
उर्वशी-पुरुरवा,
च्यवन,
सुकन्या
और
अश्विनीकुमारों
का
आख्यान
है
तथा
राम
और
कृष्ण
का
भी.
कृष्ण
आख्यान
के
कुछ
अंश
काशीनाथ
सिंह
ने
अपने
उपन्यास
“ उपसंहार”
में
आभार
सहित
शामिल
किये
हैं.
आठवां
अध्याय
मुझे
विशेष
और
कई
बार
पढ़ने
योग्य
लगा.
इसमें
सप्तऋषियों
तथा
अन्य
ऋषियों
की
सभा
का
वर्णन
है
जिसमें
गहन
दार्शनिक
विवेचन
होता
है
और
कई
मान्यताओं
की
स्थापना
/ खण्डन होता
है.
पूर्ण
मनोयोग
और
विषय
में
रुचि
के
साथ
पढ़ने
पर
भी
यह
अध्याय
दुबारा
पढ़े
जाने
की
मांग
करता
है.
लेखक
ने
1980 के दशक
में
मिथकों
पर
काम
शुरू
किया
और
उनकी
चार
किताबें
प्रकाशित
भी
हो
चुकी
हैं
जिनमें
से
दो
का
हिन्दी
अनुवाद
भी
हुआ
है.
एक
तो
प्रस्तुत
पुस्तक
“क” है
और
दूसरी
LA ROVINA DI KASCH जिसका
भी
अंग्रेजी
में
अनुवाद
हुआ
और
उससे
हिन्दी
में
“कश का
विनाश”
– पश्चिमी संस्कृतु,
साहित्य,
कृति
और
प्रबोधन
की
गाथा
– नाम
से
हुआ.
दोनों
राजकमल
से
प्रकाशित
हैं.
“ कश का
विनाश”
भी
मैनें
पढ़ी
है
किन्तु
मेरी
सलाह
है
कि
यदि
पढ़ें
तो
पहले
“क” पढ़ें
और
पसन्द
आने
पर
ही
“ कश का
विनाश”
पढ़ें
अन्यथा
उसे
तो
प्रणाम
करके
छोड़
दें.
( फिर न
कहना
कि
चेताया
नही
)
विस्तार
और
दार्शनिक
विवेचन
के
कारण
पुस्तक
बोझिल
लग
सकती
है
और
इनमें
रुचि
न
रखने
वाला
ऊब
कर
किताब
धर
भी
सकता
है.
यहां
मैं
यह
विनम्र
निवेदन
कर
रहा
हूँ
( और उत्तम
भाई
के
प्रोत्साहन
से
) कि श्रंखला
के
ये
सात
दिन
मेरी
पसन्द
की
पुस्तकों
के
हैं
और
साथियों
की
रुचि
/ अरुचि के
कारण
मुझे
अपनी
पसन्द
से
बहुत
विचलन
नही
करना
चाहिये.
एक
प्रयोजन
और
है
– कालजयी
और
जन-जन
में
सुपरिचित
किताबें
और
लेखक
हर
साहित्यप्रेमी
की
उंगलियों
पर
हैं
किन्तु
उनके
प्रभामण्डल
से
अलग
भी
बहुत
कुछ
है
जो
कालजयी
तो
नही
किन्तु
पठनीय
है.
हो
सकता
है
उनमे
मनोरंजन
तत्व
न
हो
किन्तु
एक
अलग
विषय
और
उसके
सम्यक
निर्वाह
से
परिचय
होता
है.
यदि
साथी
इन
किताबों
के
प्रति
आकर्षित
हुए
और
पढ़ा
तो
मुझे
अपनी
पसन्द
और
प्रस्तुति
सार्थक
भी
लगेगी.
**********************************
एक
दिन
– एक पुस्तक
( सात दिनों
तक
)
पाँचवा
दिन
– 04 जून,
2018
पुस्तक
– “दोज़ख़नामा”
( बांग्ला
से
हिन्दी
में
अनूदित
)
लेखक
– रबिशंकर
बल
अनुवादक
– अमृता
बेरा
विधा
– उपन्यास
प्रकाशक
– हार्पर
हिन्दी
********************************************************************
साथियों,
एक
दिन
एक
पुस्तक
– सात
दिनों
तक
चलने
वाली
श्रंखला
में
Sulekha Pande जी ने
मुझे
सात
दिनों
तक
लगातार
अपनी
पढ़ी
हुई
और
पसन्द
की
पुस्तक
का
आवरण
पृष्ठ
पोस्ट
करने
हेतु
आमन्त्रित
किया
है,
इस
क्रम
में
आज
मैं
रबिशंकर
बल
के
उपन्यास,
“दोज़ख़नामा” का
आवरण
पृष्ठ
प्रस्तुत
कर
रहा
हूँ.
ग़ालिब
और
मंटो
– दोनों
ही
मुझे
पसन्द
हैं,
मुझे
ही
क्यों
अनेक
साहित्यप्रेमियों
को
पसन्द
हैं
( ग़ालिब तो
आजकल
असाहित्यिक
लोगों
की
भी
पसन्द
हैं,
जाने
कौन-कौन
सी
फूहड़
तुकबन्दियां
ग़ालिब
के
नाम
से
फेसबुक
और
व्हाट्स
ऐप
पर
परोसी
जा
रही
हैं
) और जब
दोनों
एक
ही
जगह
मिल
जायें
तो
कहना
ही
क्या
! इस किताब
में
दोनों
हैं
और
है
किस्सागोई
शैली
में
इनकी
जीवनगाथा.
ये
दोनों
समकालीन
नही
थे
मगर
एक
चीज़
जो
दोनों
में
समान
है
वह
है
फ़ाकामस्ती,
रचनाधर्मिता
और
शराब.
शराब
ने
दोनों
को
बहुत
सताया,
उन्हे
बहुत
समझौते
भी
करने
पड़े
इसी
मुई
शराब
की
खातिर.
ग़ालिब
भी
कहां
से
कहां
दौड़े,
बेईज्जत
भी
बहुत
हुए
और
मंटो
भी
एक
एक
बोतल
के
बदले
लिखने
लगे
मगर
रचनाधर्मिता
बरकरार
रही.
ग़ालिब
और
मंटो
के
बारे
में
कुछ
कहना
मेरी
बिसात
में
नही
सो
बेहतर
है,
जो
किताब
पेश
कर
रहा
हूँ
उसी
के
बारे
में
कहूँ.
इन
दोनों
के
अलावा
जो
चीज़
इस
किताब
की
तरफ
खींचती
है,
वह
है
इसकी
शैली.
लखनऊ
में
लेखक
के
हाथों
एक
पाण्डुलिपि
लग
जाती
है
मंटो
का
अप्रकाशित
उपन्यास
है.
जिनसे
पाण्डुलिपि
मिलती
है
वो
लखनऊ
के
वज़ीरगंज
के
फरीद
मियाँ
थे
जो
नीम
पागल
हैं.
लेखक
उसे
पढ़
कर
छपवाना
चाहता
है
किन्तु
दिक्कत
यह
कि
पाण्डुलिपि
उर्दू
में
है
और
उर्दू
लेखक
जानता
नही
तो
उर्दू सीखने
की
सूझी
और
एक
अध्यापिका,
तबस्सुम
मिर्ज़ा,
से
भेंट
हुई.
कुछ
ही
दिन
में
लेखक
ने
पाया
कि
उर्दू
सीखना
और
इतनी
ज़ल्दी
( ज़ल्दी इसलिये
कि
कुछ
ही
दिन
में
तबस्सुम
का
निकाह
होने
वाला
था
) मंटो का
लिखा
पढ़ने
लायक
सीखना
उनके
बस
का
नही
तो
तय
पाया
गया
कि
वे
बोल
कर
तर्जुमा
करती
जायेंगी
और
वे
लिख
लेंगे.
इस
तरह
उपन्यास
पाठकों
के
सामने
आया.
उपन्यास
मिर्ज़ा
ग़ालिब
के
बारे
में
है,
एक
तरह
से
उनकी
जीवनी
है
लेकिन
खाली
ग़ालिब
के
बारे
में
ही
नही
मंटो
के
बारे
में
भी
है
और
उनकी
भी
जीवनी
है.
दोनों
मर
चुके
हैं.
मिर्ज़ा
ग़ालिब
दिल्ली
में,
निज़ामुद्दीन
औलिया
दरगाह
के
पास
कब्र
में
हैं
और
मंटो
लाहौर
में
मियाँ
साहेता
की
कब्र
में.
रात
में
एक
मुर्दे
के
साथ
मुर्दे
की
बातचीत
होती
है
और
पाठक
सुनता
है.
एक
रात
मंटो
मिर्ज़ा
ग़ालिब
से
बतियाते
हैं
और
अगली
रात
ग़ालिब
मंटो
से.
एक
लेखक
और
मुर्दों
के
लिये
वक़्त
और
जगह
की
दूरी
भी
क्या
दूरी.
वे
बात
भी
मरे
हुओं
की
तरह
करते
हैं,
“...
सन
1857 के बाद
, मैं
बारह
साल
तक
और
ज़िन्दा
रहा,
पर
मेरा
किसी
के
भी
साथ
बात
करने
का
दिल
नही
करता
था.
फिर
भी
बात
करनी
पड़ती
थी,
बातें
ही
तो
बेच
कर
मुझे
आमदनी
करनी
पड़ती
थी
... “
मंटो
अपनी
कहानी
ग़ालिब
को
सुनाते
हुए,
“
... पहले मैं
आग
की
कहानी
बता
लेता
हूँ
मिर्ज़ा
साहब
! भाईजान लोग,
जान
लीजिये
यही
वह
मंटो
है,
सआदत
हसन
तो
कबका
मर
चुका,
लेकिन
मंटो
आग
के
ऊपर
चल
कर
आया
था.
यह
बात
बिल्कुल
सच
है,
ज़रा
भी
झूठ
नही.
मंटो
को
झूठ
का
पता
नही
था,
वह
झूठ
नही
जानता
था,
तभी
वे
लोग
उसे
बार-बार
कोर्ट
में
घसीट
कर
ले
जाते
थे,
बड़े-बड़े
साहित्यकारों
ने
कहा,
मंटो
को
कब
लिखना
आया,
और
कम्युनिस्टों
ने
कब
उसे
छोड़ा
था,
साला
मंटो,
सुअर
का
बच्चा,
साहित्य
के
नाम
पर
कीचड़
उछालता
है
... “
ऐसे
ही
रोज
बारी-बारी
से
मिर्ज़ा
ग़ालिब
और
मंटो
अपनी
कहानी
सुनाते
हैं.
ग़ौरतलब
यह
भी
है
कि
दोनों
उस
वक़्त
को
याद
करते
हैं
जब
वे
बरबाद
हो
चुके
थे,
पैसे-पैसे
को
मोहताज़
थे,
दारू
और
दीगर
खर्चों
के
लिये
बेइज्जत
होते
और
कुछ
न
कुछ
करते
थे.
कहानी
किस्सागोई
के
अंदाज़
में
है,
बीच-बीच
में
ग़ालिब
और
दूसरे
कई
शोरा
के
शेर
पिरोये
गये
हैं
और
लेखक
और
तबस्सुम
भी
आते
रहते
हैं
गोया
तीन
दास्तानें
एक
साथ
चल
रही
हैं.
यह
किताब
ग़ालिब
और
मंटो
का
अफसाना
होने
के
साथ
इसकी
विलक्षण
शैली
के
लिये
भी
पढ़ी
जानी
चाहिये.
ज़रूर
पढ़िये
–
“ ये
लाश-ए-बेकफ़न
असद–ए-ख़स्ता
जाँ
की
है
;
हक़
मगफ़िरत
करे,
अजब
आज़ाद
मर्द
था
. “
******************************
एक
दिन
– एक पुस्तक
( सात दिनों
तक
)
छठवाँ
दिन
– 05 जून,
2018
पुस्तक
– “मरंग
गोड़ा
नीलकंठ
हुआ”
लेखक
– महुआ
माजी
विधा
– उपन्यास
प्रकाशक
– राजकमल
******************************************************
साथियों,
उपन्यास
मुझे
बहुत
पसन्द
है
और
पसन्द
का
एक
कारण
मेरा
अपना
रुझान
भी
है.
यह,
जैसा
कि
शीर्षक
के
साथ
भी
लिखा
है,
“विकिरण, प्रदूषण
व
विस्थापन
से
जूझते
आदिवासियों
की
गाथा” सामाजिक
सरोकारों
व
पर्यावरण
में
रुचि
रखने
वाले
जानते
हैं
कि
जंगल
बहुमूल्य
खनिज
सम्पदा
से
समृद्ध
हैं
और
आदिवासी
जंगल
पर
ही
निर्भर
हैं.
उन्हे
खनिज
से
कोई
मतलब
नही,
वन
और
वनोपज
उनका
आधार
है,
उनकी
संस्कृति
और
घर
है,
वन
से
अलग
किये
जाने
पर
या
उसके
असन्तुलित
व
पर्यावरण
को
प्रदूषित
करने
वाले
दोहन
पर
उनका,
उनकी
संस्कृति
और
वन
का
अस्तित्व
ही
खतरे
में
पड़
जाता
है.
वन
नष्ट
करना
आसान
है
किन्तु
वन
उगाना
और
उसका
प्रदूषण
/ विकिरण रहित
मूल
स्वरूप
लौटाना
असम्भव
सा
है.
यह
उपन्यास
इसी
विकिरण
और
विस्थापन
की
दारुण
गाथा
है
जो
काल्पनिक
होते
हुए
भी
सत्य
है.
यद्यपि
लेखिका
का
पहला
उपन्यास,
‘मै बोरिशाइल्ला”
अंग्रेजी
में
भी
अनूदित
हुआ
और
इटली
स्थित
रोम
के
सबसे
बड़े
विश्वविद्यालय,
‘सापिएन्जा युनिवर्सिटी
ऑफ
रोम’
में
मॉडर्न
लिटरेचर
में
बी.
ए.
के
पाठ्यक्रम
में
लगा
और
60 वर्षों
में
प्रकाशित
हिन्दी
के
30 शिखर
उपन्यासों
में
भी
शामिल
रहा
और
इण्टरनेट
पर
राजकमल
के
बेस्ट
सेलर्स
में
रहा.
वह
भी
मैने
पढ़ा
है
और
पसन्द
भी
है
किन्तु
विषय
वस्तु
के
कारण
यह
उपन्यास
मुझे
अधिक
पसन्द
है.
लेखिका
झारखण्ड
महिला
आयोग
की
अध्यक्ष
भी
हैं.
यह
झारखण्ड
के
जंगलो
में
बसे
एक
आदिवासी
गाँव,
मरंग
गोड़ा,
की
गाथा
है.
मरंग
गोड़ा
घना
जंगल
है,
आदिवासियों
का
घर
और
आजीविका
है
और
प्रकृति
ने
इसे
बहुमूल्य
खनिज,
यूरेनियम,
से
भी
समृद्ध
किया
है.
यद्यपि
वहां
से
कुछ
दूर
तांबे
की
खदानें
थीं
जिनमें
आदिवासी
काम
करने
जाते
थे.
खदानों
के
कारण
गैर
आदिवासी
लोग
थे
और
उनकी
ज़रूरतों
को
पूरा
करने
को
बाज़ार
भी
था
जिसका
असर
आदिवासियों
के
खान-पान
और
पहनावे
पर
पड़
रहा
था
किन्तु
उनकी
संस्कृति
और
जंगल
सलामत
थे.
जंगल
और
उनके
स्वास्थ्य
पर
बहुत
बुरा
असर
तब
पड़ना
शुरू
हुआ
जब
वैज्ञानिकों
ने
भूगर्भ
में
यूरेनियम
होने
की
पुष्टि
की.
वहां
की
ज़मीन
में
यूरेनियम
प्रचुर
मात्रा
में
था
और
यह
अति
बहुमूल्य
खनिज
है
तो
सरकार
और
उद्योगपति
इसे
यूँ
ही
ज़मीन
के
नीचे
पड़ा
नही
रहने
दे
सकते
थे.
तो
शुरू
हुई
यूरेनियम
की
खदानें
बनना
और
उसका
खनन.
सरकारी
विभाग
हो
या
गैर
सरकारी
उद्योगपति
– सब जंगल
से
खनिज
तो
लेते
हैं
- पैसा, मशीनें
और
तकनीकी
स्टाफ
तो
शहर
से
आता
है
किन्तु
उसकी
खुदाई
के
लिये
मज़दूर
वर्ग
आदिवासी
/ स्थानीय निवासी
ही
होते
हैं.
इसके
अतिरिक्त
जो
अपशिष्ट
( बेकार मलबा
) निकलता है
वह
उस
ज़मीन
में
और
वहां
की
नदियों
में
ही
डाला
जाता
है
जो
शनैः
शनैः
अपना
असर
दिखाता
है.
वह
हवा,
पानी,
उर्वरता
( धरती, पशु-पक्षी
और
इन्सान
– सब की
) पर असर
डालता
है.
तरह
– तरह
की
बीमारियां
फैलती
हैं
जिनका
मौत
या
स्थायी
और
आनुवांशिक
अपंगता
के
अलावा
कोई
निस्तार
नही.
धरती
उपज
दे
नही
पाती,
पानी
पीने
योग्य
नही
रह
जाता,
पशु-पक्षी
नष्ट
होते
जाते
हैं
और
जो
बचे
उनके
व्यवहार
में
परिवर्तन
/ आक्रामकता या
ढीलापन
आ
जाता
है,
विकिरण
से
वे
खाने
योग्य
भी
नही
रहते,
दूध
भी
संक्रमित
होता
है.
निष्कर्ष
यह
कि
सरकार
या
युद्योगपतियों
को
मुनाफा
तो
बहुत
होता
है
किन्तु
जन
और
जंगल
तबाह
हो
जाता
है.
यूरेनियम
है
ही
ऐसे
भयंकर
विकिरण
वाला
खनिज.
यूँ
तो
पर्यावरण
के
नियम
हैं,
बीमारी
के
ईलाज
की
व्यवस्था
भी
कम्पनी
को
करनी
होती
है,
अपशिष्ट
को
परिशोधित
करके
ऐसे
डम्प
करना
होता
है
कि
नुकसान
कम
से
कम
हो,
अपंगता
पर
मुआवजे
की
व्यवस्था
है
किन्तु
उपन्यास
से
बाहर
भी
सभी
जानते
हैं
कि
यह
बस
दिखावटी
/ नितान्त अपर्याप्त
होती
है.
यह
उपन्यास
विकिरण
के
धीरे-धीरे
पड़ने
वाले
कुप्रभाव
को
अत्यन्त
विस्तार
और
प्रभावी
ढंग
से
प्रस्तुत
करता
है.
विकिरण
से
प्रभावित
लोगों
के
सिर
असामान्य
रूप
से
बड़े
या
छोटे
होते
जाते
हैं
- होने वाली
सन्तानों
के
भी,
देह
घावों
और
दुर्गन्ध
से
बजबजाती
है,
स्वांस
में
तकलीफ
और
नाना
प्रकार
के
चर्म
रोग
हो
जाते
हैं
और
इनसे
छुटकारा
बस
मौत
ही
दिलाती
है.
उपन्यास
में
मनोरंजन
नही
है,
विकिरण
के
बाद
न
तो
प्रकृति
मनोरम
वर्णित
है
न
ही
आदिवासी
समाज
की
निश्छल
और
उन्मुक्त
परम्पराएं
हैं
और
न
ही
रोमांचक
व
हास्य
प्रसंग
और
रोमांस.
वस्तुतः
उपन्यास
की
विषय
वस्तु
यह
है
भी
नही
– यह प्रकृति
के
असन्तुलित
दोहन
के
खतरों
को
नग्न
रूप
में
दिखाता
और
सचेत
करता
है
किन्तु
विकास
और
धनलिप्सा
ऐसा
राक्षस
है
जो
बलि
लेता
ही
लेता
है
– चाहे
वह
पर्यावरण
की
बलि
हो
या
जन
बलि.
अभी
तूतीकोरन
में
प्रत्यक्ष
यह
देखा
गया.
उपन्यास
है
तो
एक
शोध
/ जाँच दल
है,
एक
जुझारू
पत्रकार
है
और
आदिवासियों
में
से
कुछ
जो
जन
और
जंगल
की
लड़ाई
लड़ते
हैं,
उसे
दुनिया
के
सामने
लाते
हैं
और
बहुत
कुछ
करवाने
में
सफल
भी
होते
हैं.
यह
एक
तरीक़ा
भी
सुझाता
है
जो
मौत
के
रास्ते
होकर
ही
जाता
है.
इसी
के
साथ
विश्व
के
अन्य
भागों
में
इसी
तरह
के
संघर्ष
का
ब्योरा
देता
है
और
जापान
के
नागासाकी-हिरोशिमा
का
भी.
साथियों
से
निवेदन
है
कि
व्यथा,
विनाश,
लोलुपता
आदि
से
साक्षात
करना
हो
तो
यह
उपन्यास
ज़रूर
पढ़ें.
यह
समस्या
को
अपने
वास्तविक
नग्न
रूप
में
दर्शाता
है
– न इसमें
किसी
का
समर्थन
है,
न
विरोध
– है तो
बस
प्रकृति
से
खिलवाड़
के
भयावह
परिणाम
की
चेतावनी.
फिर
वही
बात
कि
यदि
कुछ
साथियों
ने
भी
इस
उपन्यास
में
रुचि
दिखाई,
पढ़ा
और
उन्हे
झकझोरा
तो
मैं
अपनी
पसन्द
और
श्रम
सार्थक
समझूँगा.
***************************
एक
दिन
– एक पुस्तक
( सात दिनों
तक
)
सातवाँ
दिन
– 06 जून,
2018
पुस्तक
– “Raja Ravi Varma” ( मूल
मराठी
में,
अंग्रेजी
में
अनूदित
)
लेखक
– रणजीत
देसाई
अनुवादक
– विक्रान्त
पाण्डेय्
विधा
–उपन्यास (कलाकार
के
जीवन
पर
आधारित
)
प्रकाशक
– Harper Perennial
*********************************************
साथियों,
एक
दिन
एक
पुस्तक
– सात
दिनों
तक
चलने
वाली
श्रंखला
में
Sulekha Pande जी ने
मुझे
सात
दिनों
तक
लगातार
अपनी
पढ़ी
हुई
और
पसन्द
की
पुस्तक
का
आवरण
पृष्ठ
पोस्ट
करने
हेतु
आमन्त्रित
किया
है,
इस
क्रम
में
आज
मैं
रणजीत
देसाई
के
उपन्यास,
“Raja Ravi Varma” का आवरण
पृष्ठ
प्रस्तुत
कर
रहा
हूँ.
मेरी बारी में अंग्रेजी की किताब देख कर चौंकियेगा नही. मेरे लिए इस किताब का अंग्रेजी में होना गौण है, प्रमुख है राजा रवि वर्मा पर लिखी किताब और वह भी रणजीत देसाई द्वारा. रणजीत देसाई जीवनीपरक उपन्यास में सिद्धहस्त हैं, इस तरह के उनके उपन्यासों में नायक का इसलिये महिमामण्डन नही होता कि वह उस पर लिखा हुआ है और न ही उसके जीवन के काले पक्ष छुपाये जाते हैं या उन पर सफाई दी जाती है. लेखन में घटनाओं को रोचकता से विस्तार दिया जाता है और लेखक अपना मत या झुकाव नही दिखाता. रणजीत देसाई का शिवाजी के जीवन पर आधारित उपन्यास. श्रीमान योगी, हिन्दी में भी अनूदित है. प्रस्तुत उपन्यास का अनुवाद हिन्दी में नही हुआ अतः मुझे अंग्रेजी में पढ़ना पड़ा – इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह उपन्यास मुझे कितना पसन्द है.
शायद
ही
ऐसा
कोई
हो
जो
महान
चित्रकार
राजा
रवि
वर्मा
के
बारे
में
न
जानता
हो.
उन्होनें
पौराणिक
और
मिथकीय
पात्रों
को
प्रमुखता
से
चित्रित
किया
बल्कि
यूँ
कहा
जाय
कि
हिन्दू
देवी
देवताओं
और
भगवानों
को
चित्र
के
माध्यम
से
जन-जन
तक
पहुँचाने
का
काम
किया.
यह
उन्ही
का
काम
है
जो
घर-घर
में
और
कैलेण्डर
पर
आप
इन
विभूतियों
को
देखते
हैं.
उन्होने
देवी-देवता,
भगवान
और
अन्य
पौराणिक
/ मिथकीय चरित्रों
को
स्थूल
स्वरूप
दिया
और
अनेक
प्रसंगों
से
आम
जनता
को
परिचित
कराया.
उनका
महत्व
इतना
ही
नही
बल्कि
और
भी
है.
पेण्टिंग्स
की
कीमत
बहुत
अधिक
होती
है,
इतनी
कि
सामान्य
जन
क्या,
पैसे
से
खासे
मज़बूत
लोगों
की
भी
पहुँच
में
नही
होती.
दूसरी
बात
यह
कि
मूल
पेण्टिंग
एक
ही
होती
है
तो
एक
ही
व्यक्ति
उसे
खरीदेगा.
तब
व्यक्तिगत
संग्रह
में
बहुत
कम
होती
थीं,
राजा-महाराजा
या
संग्रहालयों
में
ही
पेण्टिंग्स
होती
थीं.
( अब भी
बहुत
कुछ
ऐसा
ही
है
) बहुत हुआ
तो
पेण्टिंग
की
नकल
तैयार
की
जाती
थी
किन्तु
वह
भी
मूल
चित्रकार
या
उसके
पटु
शिष्य
तैयार
करते
थे.
उसमें
भी
बहुत
दक्षता
और
समय
लगता
था
और
सीमित
प्रतियां
ही
तैयार
होती
थीं.
ऐसे
में
उन्होनें
‘राजा रवि
वर्मा
प्रेस’
नाम
से
प्रेस
स्थापित
की
जिसमें
मुख्यतः
लीथोग्राफ
विधि
से
प्रिण्ट
तैयार
किये
जाते
थे.
इस
तरह
एक
पेण्टिंग
के
कितने
ही
प्रिण्ट
हो
सकते
थे
और
वह
अपेक्षाकृत
बहुत
सस्ते
भी
होते
थे.
इस
तरह
जन-जन
तक
उनकी
पेण्टिंग्स
पहुँचीं
और
घरों
व
दुकानों
तक
में
लगीं.
इसको
लेकर
उन
पर
मुकदमा
भी
हुआ.
राजा
रवि
वर्मा
के
बारे
में
और
चित्रकला
के
बारे
में
उनके
विशद
योगदान
के
बारे
में
कुछ
कहने
को
कई
अध्याय
चाहियें
अतः
अब
इस
पुस्तक
की
ही
बात
कर
रहा
हूँ.
जीवनीपरक
उपन्यास
है
तो
इसमें
राजा
रवि
वर्मा
के
बाल्यकाल
से,
जबसे
उनको
पेण्टिंग्स
के
लिये
हर
तरह
का
प्रोत्साहन
मिला,
लेकर
मृत्यु
तक
की
यात्रा
को
चित्रित
किया
है.
कुछ
प्रसंग
इस
पुस्तक
में
विशेष
हैं.
वे
किलमन्नूर
में
अपने
मामा,
राजा
वर्मा,
के
यहां
रहते
थे.
उस
समय
तत्कालीन
समाज,
विशेषतः
राज
परिवार
मे
परम्परा
थी
कि
विवाह
के
बाद
पुरुष
ससुराल
में
रहता
था.
उनके
मामा
ने
उन्हे
मन्दिर
की
दीवारों
पर
कोयले
से
चित्र
बनाते
देख
कर
उनकी
प्रतिभा
को
पहचाना
और
त्रावणकोर
में
महाराज
के
आश्रय
में
दिया.
जैसा
कि
राजाओं
के
यहां
होता
था,
वे
कलाप्रेमी,
कलासंरक्षक
और
कलाकार
को
आश्रय
देने
वाले
होते
थे,
ये
महाराज
भी
थे.
राजचित्रकार,
नाईक्कर,
के
साथ
उन्होनें
प्रारम्भिक
गुर
हासिल
किये
और
विदेशी
चित्रकारों
का
काम
तल्लीनता
से
देख
कर
रंगों
के
सही
अनुपात
में
मिश्रण
की
बारीकियां
सीखीं.
उन्होने
अनेक
देशी-
विदेशी
प्रतिस्पर्धाओं
मंन
पुरुस्कार
भी
प्राप्त
किये.
फिर
जीवन
परिचय
की
ओर
चला
गया.
क्या
करूं
– एक तो
कला
में
कुछ
रुचि
और
उसके
ही
बराबर
कलाकार
के
जीवन
में,
लेकिन
यह
सब
भी
तो
इस
किताब
में
ही
विस्तार
और
रोचक
ढंग
से
प्रस्तुत
किया
गया
है.
खैर,
एक
तो
भगवान
/ देवी-देवताओं
का
चित्रण,
दूसरे
उनकी
सार्वजनिक
प्रदर्शनी
– धर्मधुरन्धरों
को
यह
बहुत
आपत्तिजनक
लगा
और
केशव
शास्त्री
ने
उन
पर
मुकदमा
कर
दिया.
मुख्य
आरोप
थे
–
- उन्होने
पूज्य
और
मन्दिरों
में
स्थापित
भगवान
/ देवी-देवताओं
को
चित्रित
और
उनके
सस्ते
( केवल दाम
में
) प्रिण्ट
निकाल
कर
जन-जन
और
दुकानों
तक
पहुँचा
दिया,
इस
प्रकार
उनका
अपमान
व
अवमानना
की,
और
- उन्होने
मिथिकीय
चरित्रों
का
अश्लील
( नग्न/ अर्धनग्न
/ प्रणयावस्था में
) चित्रण किया
है.
वे
अश्लीलता
फैलाने
के
आरोपी
माने
गये.
उनके
मेनका-विश्वामित्र
और
उर्वशी-पुरुरवा
चित्र
पर
विशेष
आपत्ति
की
गयी.
राजा
रवि
वर्मा
ने
अनेक
ख्यातिप्राप्त
वकीलों
के
मित्र
होने
और
उनके
प्रस्ताव
के
बावजूद
अपना
मुकदमा
खुद
लड़ा
और
विजयी
हुए.
उनकी
दलीलों
को
विस्तार
से
दिया
गया
है
और
उन
चित्रों
पर
उनका
( और सही
) मत जानने
के
लिये
यह
पुस्तक
पढ़ी
जानी
चाहिये.
त्रासद
यह
रहा
कि
इस
विजय
से
उनको
व्यक्तिगत
रूप
से
बहुत
बड़ी
क्षति
हुई.
हर
कोई
यह
मान
रहा
था
कि
वे
हार
जायेंगे
और
उन्हे
सजा
/ज़ुर्माना होगा.
फैसले
के
दिन
उनकी
प्रेमिका,सुगन्धा,
ने
उनकी
हार
की
आशंका
से
ज़हर
खाकर
आत्महत्या
कर
ली.
सुगन्धा
का
उनके
जीवन
में
प्रवेश,
दोनों
का
प्रेम
और
कई
पेण्टिंग्स
में
सुगन्धा
का
मॉडल
बनना
विस्तार
से
चित्रित
है.
विशेष
रूप
से
उर्वशी-पुरुरवा
वाली
पेण्टिंग
में
वह
नग्नप्रायः
( प्रसंग ही
ऐसा
है
) है और
उसे
उस
अवस्था
के
भाव
तक
लाने
की
प्रक्रिया
का
वर्णन
पठनीय
है.
यहां
यह
स्पष्ट
कर
दूँ
कि
उस
प्रक्रिया
में
कहीं
अश्लीलता
/ कामलिप्सा शायद
ही
किसी
पाठक
को
लगे.
यह
लेखक
की
खूबी
है
कि
उसने
उन
क्षणों
को
सम्पूर्णता
से
आत्मसात्
और
प्रस्तुत
किया.
ऐसे
अनेक
प्रसंग
हैं
जो
पढ़ने
पर
ही
पूरा
आनन्द
देंगे.
राजा
रवि
वर्मा
के
जीवन
पर
केतन
मेहता
ने
‘रंग रसिया’
नाम
से
फिल्म
भी
बनाई
जो
उतनी
ही
शानदार
है
जितनी
कि
यह
किताब.
राजा
रवि
वर्मा
का
जादू
आज
भी
बरकरार
है,
वे
कालजयी
हैं.
अभी
कुछ
दिनों
पूर्व
उनकी
एक
पेण्टिंग,
“तिलोत्तमा” 5.17 करोड़
में
बिकी.
पेण्टिंग
का
चित्र
तो
नही
दे
रहा
हूँ,
इस
संकोच
से
कि
वह
अर्धनग्न
है
किन्तु
राजा
रवि
वर्मा
( जन्म 1848
देहावसान 1906 ) का
चित्र
पोस्ट
कर
रहा
हूँ.
आज
मेरी
बारी
का
समापन
है.
आप
सबको
बहुत
धन्यवाद
कि
आपने
मेरी
पसन्द
का
आनन्द
उठाया,
सराहा
और
कुछ
ने
सहन
भी
किया.
अब
क्रम
को
आगे
बढ़ाते
हुए
मै
Lakhi Baranwal को
इस
श्रंखला
के
लिये
नामित
/ आमन्त्रित कर
रहा
हूँ.
*************************
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