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Tuesday, 1 June 2021

संक्षिप्त रामायण

 

क्या महाराज ! लॉक डाउन है कि सुरसा के मुह की तरह बढ़ता ही जा रहा है, लोग भी निकल नहीं रहे तब भी आप पोथी-पत्रा लेकर आ गये मंदिर पर. “

 “आओ भाई ! अब तुम आये कि नहीं. अरे पूरी बाँह के कपड़े पहनों, सर्जिकल ग्लब्स पहन लो, डबल मास्क लगाओ, सेनेटाईजर का इस्तेमाल करो, और दो गज की दूरी रखो तो मंदिर आने में क्या दिक्कत. बस भीड़ न हो और बहुत देर न बैठें तो दिक्कत नहीं. और फिर वो व्हाट्स ऐप के मैसेज और फेसबुक पर घूम रही स्टोरी नहीं पढ़ी कि इन्द्र, जने शिव जी ने बारह साल तक वर्षा न करने व डमरू न बजाने का निर्णय किया फिर भी एक किसान खेत में काम करता रहा कि कहीं खेती –किसानी भूल न जाए. उधर पार्वती जी ने भी शिव जी को उकसाया कि कहीं आप डमरू बजाना भूल गये तो ! तो क्या, भोले भण्डारी आ गये पार्वती जी की बात में, डमरू बजाया और उधर झमाझम बरसात. तो मॉरल ऑफ द स्टोरी के मुताबिक मैं क्यों अपना काम छोड़ूँ !”

 “बात तो आप सही कह रहे हैं. तो आज क्या सुनाने का विचार है ?”

 “और क्या सुनायेंगे ! रामकथा ! वैसे तो भगवान के सब रूपों में हमारी आस्था है, सबके चरित पावन और मनोहर हैं किन्तु हमारा मन रामकथा में अधिक रमता है और रमे भी क्यों ना ! देवों के देव महादेव भी तो रामरस प्रेमी हैं. उन्होनें रामचरित को मन में रखा सो वह संभु रचित रामचरितमानस हुआ –

                      रामचरितमानस मुनि  भावन। विरचेउ  संभु  सुहावन  पावन॥

                      रचि महेस निज मानस राखा। पाइ  सुसमउ सिवा सन भाषा॥

                      तातें    रामचरितमानस   बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥

 “ अति उत्तम ! किन्तु रामकथा तो बहुत बड़ी है, रामजन्म के पूर्व से लेकर राम-रावण युद्ध, रावण वध और अयोध्या लौटने तक की. मानस के उत्तरकाण्ड में और भी प्रसङ्ग हैं. अब इतना तो कई दिन का कार्यक्रम है. कोई शार्टकट नहीं है कि रामकथा भी हो जाय और समय भी अधिक न लगे, बस आज भर की बैठक में पूर्ण हो जाय ?”

 “ है क्यों नहीं ! शार्टकट चाहने वालों के लिए ‘एक श्लोकी रामायण’ है. सुनो -

 आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्‍।

 वैदेहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्‍॥

 बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्‍।

 पश्चाद्‍ रावण कुम्भकर्ण हननम्‍, एतद्वि रामायणम्‍॥“

 

(श्री राम वनवास गये, वहाँ उन्होनें स्वर्ण मृग का वध किया. रावण ने सीताजी का हरण किया, जटायु रावण के हाथों मारा गया. श्री राम और सुग्रीव की मित्रता हुई श्री राम ने बाली का वध किया. समुद्र पार किया. लंका का दहन किया. इसके बाद रावण और कुंभकर्ण का वध किया, यही रामायण है.)

और शार्ट चाहो तो एक और है ‘ एक रहे राम, एक रहे रावन्ना … ‘ करके ! किन्तु वो भाषा की दृष्टि से न रसपूर्ण है, न ही कोई भक्ति भाव जाग्रत होता है सो वह कहना उचित नहीं”

 “क्या महराज ! अब शार्टकट कहा तो इतना शार्ट पर उतर आये. अरे, रामकथा क्या इतनी सी ही है ! अरे भई, कुछ ऐसी नहीं है कि क्या गायन-वादन भी हो, कथा भी लगभग पूरी हो.”

 ‘है क्यों नहीं ! वो भी है. बाबा तुलसी ने बहुत ध्यान रखा है. वो भविष्यदर्शी थे. जानते थे कि ऐसा भी समय आयेगा कि लोगों के पास इतना समय न होगा कि पूरी रामकथा सुनें. समय भी होगा तो ऊबने लगेंगे. आधे से अधिक मोबाईल चलाते रहेंगे या फिर समानान्तर सास-बहू-पड़ोसन पुराण चलेगा. ‘अखण्ड रामायण’ के नाम पर चौबीस घण्टे में मानस का पाठ बैठा तो देते हैं किन्तु कहाँ बैठाने वाला उसमें बैठता है. पेशेवर मण्डली बुला ली और लाऊडस्पीकर लगा कर हुआ नई-पुरानी फिल्मी धुनों पर मानस गान. सच कहो ! उसमें रामरस मिलता है क्या ?”

 “सो तो है महराज ! मगर इतना समय इस सब में वेस्ट कर दिया, संक्षिप्त रामकथा, जिसमें रामरस मिले, वो कहिए ना !”

 “और दस-बारह लोग भी दिख रहे हैं. धूप-दीप करके हारमोनियम बजाता हूँ, ले तो आओ सामने के घर से. जब लहरा बजेगा, शंख बजेगा, मौसम बनेगा तो और लोग भी जुटेंगे.

                                                            अब ये सब हुआ तो लोग आने लगे. मतलब भर के श्रद्धालु श्रोता जुट गये.

 तो भक्तों, तुलसीदास जी ने मानस के उत्तरकाण्ड में दोहा ६३/४ से दोहा६७/४ तक काकभुसण्डि – गरुण संवाद में संक्षिप्त रामायण कही है. गरुण को मोह हुआ. मानस में सती, नारद और गरुण के मोह प्रसङ्ग हैं. मोह किसी के प्रति नहीं बल्कि प्रभु की माया से ग्रस्त होकर इन्होनें राम के ब्रह्म या अवतार होने पर शङ्का की सो उनका मोह निवारण भी किया गया. गरुण को मोह हुआ तो वे कई लोगों के पास गये, अन्ततः शिवजी के पास भेजे गये, शिव जी ने उन्हें काकभुसण्डि जी (कौआ रूप में एक परम भक्त ) के पास भेजा. काकभुसण्डि जी ने उनके मोह का निवारण तो किया ही, जिज्ञासा पर अन्य प्रसङ्ग भी सुनाये. उसी में राम कथा भी संक्षेप में सुनायी, सुनो -    

            

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥

पुनि नारद कर  मोह अपारा। कहेसि  बहुरि रा वन अवतारा॥

 प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥

                              बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन मँह परम उछाह।

                              रिषि  आगवन   कहेसि   पुनि   श्रीरघुबीर  बिबाह॥

 बहुरि  राम  अभिषेक  प्रसंगा। पुनि नृप  बचन राज रस भंगा॥

पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥


 बिपिन  गवन  केवट  अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥

बालमीकि प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट  जिमि बसे भगवाना॥


 सचिवागवन  नगर नृप मरना। भरतागवन   प्रेम  बहु  बरना॥

करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥


 पुनि रघुपति  बहुबिधि  समुझाए। लै   पादुका   अवधपुर   आए॥

भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥

 

                     कहि  बिराध बध  जेहि बिधि  देह तजी  सरभंग।

                     बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग॥

 

कहि  दंडक  बन  पावनताई। गीध  मइत्री  पुनि   तेहिं  गाई॥

पुनि प्रभु पंचबटी कृत बासा। भंजी सकल मिनिह्न की त्रासा॥

 

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥

खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥

 

दसकंधर  मारीच  बतकही। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।

पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर   बिरह   कछु   बरना॥

 

पुनि प्रभु  गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥

बहुरि    बिरह   बरनत   रघुबीरा। जेहि   बिधि   गए  सरोबर  तीरा॥

 

                       प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।

                       पुनि  सुग्रीव  मिताई  बालि  प्रान  कर भंग॥

                                      कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरसन बास।

                                      बरनन  बर्षा  सरद  अरु  राम  रोष  कपि  त्रास॥

 

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए॥

बिबर  प्रबेस  कीन्ह  जेहि भाँती। कपिन्ह  बहोरि  मिला संपाती॥

 

सुनि  सब कथा  समीर कुमारा। नाघत   भयउ  पयोधि  अपारा॥

लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सितहि धीरजु जिमि दीन्हा॥

 

बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥

आए कपि सब जँह रघुराई। बैदेही   की   कुसल   सुनाई॥

 

सेन    समेति     जथा    रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा॥

मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई॥

 

                       सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।

                       गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार॥

                                           निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार।

                                           कुंभकरन  घननाद  कर बल  पौरुष  संघार॥

                           

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना॥

रावन    बध    मंदोदरि    सोका। राज  बिभीषन  देव असोका॥

 

सीता   रघुपति    मिलन   बहोरी। सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी॥

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध  चले   प्रभु  कृपा  निकेता॥

 

जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥

कहेसि बहोरि  राम अभिषेका। पुर  बरनत  नृपनीति  अनेका॥

 

कथा   समस्त  भुसुंड  बखानी। जो  मैं तुम्ह सन कही भवानी॥

सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥

 

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कहो ! बहुत कठिन तो नहीं अर्थ समझना कि अर्थ भी करके बताऊँ ?”

 “नहीं, नहीं ! अब इतना कठिन भी नही फिर भी जिन्हें कठिन लग रहा होगा तो कल की सभा ( यहाँ पर टिप्पणियों में ) पूछेंगे, तब सरलार्थ भी कर दीजिएगा.”

 “ यही मेरा भी विचार है. अब संक्षेप वाली बात है तो अर्थ करने में बहुत विस्तार हो जाएगा / पोस्ट बड़ी हो जाएगी सो अर्थ पूछने पर.”

 “ जय हो ! अब एक बात और बताईये. ये हाथ में क्या लिए हैं मानस के अलावा ? ये तो कुछ चित्र से लगते हैं. चित्र भी नहीं, पाण्डुलिपि के पृष्ठ लगते हैं. क्या हैं ये, ज़रा दिखाईये और बताईये इनके बारे में. “

 




“अनुमान सही भी है और ग़लत भी. फेसबुक पर एक पेज है, FOUNTAIN PEN CLUB INDIA. उसमें फाउण्टेन पेन के प्रेमी जन पेन, इंक आदि की चर्चा करते हैं, फोटो पोस्ट करते हैं और लिखावट भी. इन्ही में से एक, अनुपम गोस्वामी,  ने पाण्डुलिपि शैली में उत्तरकाण्ड की संक्षिप्त राम कथा लिखी. बहुत ही सुन्दर लिखावट है. वो पृष्ठ इस पोस्ट की प्रेरणा भी बने. आप सब भी देखें इतनी अच्छी लिखावट. अन्य वितरण इस प्रकार हैं –

 

                        My first attempt at a traditional looking manuscript.  

                        Paper: handmade paper by Ayush Surana

                        Pen: RC Devanagari by Rajeev Chauhan

                        Inks: krishna IG black and MB Corn Poppy red

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Friday, 30 April 2021

“छापक पेड़ छिवलिया … “ करुणा का महा आख्यान !

 

“छापक पेड़ छिवलिया … “ करुणा का महा आख्यान !

 


ये सोहर जब भी सुनता हूँ, मन द्रवित हो जाता है. दुःख से भी बढ़ कर चीत्कार, विवशता और क्रोध के भाव उमड़ते हैं. गायक का मन भारी होने लगता है तो स्वर भी भारी होकर टूटने लगते हैं और सुनने वाला भी करुण हो जाता है. प्रेम, निष्ठुरता, सामन्तशाही, विवशता और विवशताजन्य शाप का आख्यान है यह सोहर.

 

धरोहर अभिषेक  की एक पोस्ट पर कभी इस सोहर की चर्चा हुई थी, तब इसे प्रस्तुत करने को कहा था किन्तु पोस्ट ओझल हुई तो यह बात भी आयी-गयी हो गयी. कल फिर किसी की प्रतिक्रिया/टिप्पणी से यह पोस्ट दिखी तो फिर बात छिड़ी तो फिर तकादा हुआ और हुई यह पोस्ट.

 

संक्षेप इस सोहर पर कुछ बात. राम जन्म का उत्सव मनाया जा रहा है. दावत के लिए शिकार लाया गया है, उन्हीं में एक हिरन भी है. हिरन का शिकार होने से पहले ही हिरनी को आभास हो जाता है कि राजकुँअर जी की छट्ठी है तो शिकार होगा और मेरा हिरन भी मारा जायेगा. इसी आशङ्का में हिरनी ढाक के पेड़ के नीचे उदास खड़ी है. हिरन उदासी का कारण पूछता है तो वह मन का डर बताती है. ऐसा ही होता है. हिरन को शिकारी ले गये तो व्याकुल होकर हिरनी भी पीछे-पीछे दौड़ी. हिरन का माँस रसोई में रांधा जा रहा है और हिरनी विवश खड़ी देख रही है. मचिया पर कौशल्या राम को लिए बैठी हैं तो हिरनी विनती करती है कि मांस तो रसोई में पक रहा है हमें उसकी खाल ही दे दो, पेड़ से टांग लेंगे, देख कर हिरन की मौजूदगी लगेगी, उसी को देख कर जी लेंगे. कौशल्या खाल देने से भी मना कर देती हैं कि हिरनी, घर जाओ ! खाल तो हम न देंगे, उससे खँजड़ी मढ़ायेंगे, मेरे राम उसे बजा कर खेलेंगे. हिरनी बेचारी क्या कर सकती थी. मन मार कर लौटती है. जब-जब खँजड़ी बजती है तब-तब उस खँजड़ी पर मढ़ी खाल की उस ध्वनि को सुनकर हिरनी को हिरन की याद आती है. ऐसी दशा में वो उसी ढाक के पेड़ के नीचे चली जाती है. वहीं खड़े-खड़े अपने हिरन को बिसूरती है. कातर दीठ से राह निहारती है.

 

अब देखें सोहर

 

छापक पेड़ छिउलिया पतवन धनवन हो

तेहि तर ठाढ़ हिरिनिया मन अति अनमन हो।।

 

चरतहिं चरत हरिनवा हरिनी से पूछेले हो

हरिनी ! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझेलु हो।।

 

नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो

हरिना ! आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो।।

 

मचियहिं बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो

रानी ! मसुआ सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू नू हो।।

 

पेड़वा से टाँगबो खलरिया मनवा समुझाइबि हो

रानी ! हिरी-फिरी देखबि खलरिया जनुक हरिना जियतहिं हो

 

जाहु हरिनी घर अपना, खलरिया ना देइब हो

हरिनी ! खलरी के खँजड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहेनू हो।।

 

जब-जब बाजेला खँजड़िया सबद सुनि अहँकेली हो

हरिनी ठाढि ढेकुलिया के नीचे हरिन के बिजूरेली हो।।

 

अब एक-एक बन्द का अर्थ देखें –

 

ढाक का ( छापक को ढाक/छूल कहते हैं और छिवलिया का अर्थ है छाँव ) एक छोटा सा घने पत्ते वाला पेड़ है. ये खूब लहलहा रहा है. इसी पेड़ के नीचे हिरनी खड़ी है, लेकिन वो मन से बहुत बेचैन है.

 

चरते-चरते हिरन ने हिरनी की इस दशा को देखा. उसने पूछा, ‘हे हिरनी, तुम उदास क्यों हो? क्या चारागाह सूख गया है या तुम्हारा मन पानी के अभाव से व्याकुल है.’

 

हिरनी ने कहा, ‘हे प्रिय, न तो चारागाह ही सूखा है और न ही मैं पानी बिना मुरझा रही हूं. बात कुछ और है. आज राजाजी के यहां उसके पुत्र की छट्ठी है. वे आज तुम्हें मार डालेंगे.

 

जैसा कि हिरनी को आशङ्का थी, आगे वैसा ही हुआ. और जानवरों के साथ उसके हिरन का भी शिकार हुआ. उसके मांस का भोज हुआ. राम-जन्म पर राज्योत्सव हुआ. इधर मृत्यु, उधर सत्ता का उत्सव. हिरन के मारे जाने पर हिरनी राजा दशरथ की रानी कौशल्या के पास जाती है. वो रानी से अपना अनुरोध कहती है:

                                                                                                   रानी कौशल्या मचिया पर बैठी हुई हैं. हिरनी विनती कर रही है, ‘हे रानी, हिरन का मांस तो आपकी रसोई में सीझ ही रहा है. आपसे एक विनती है, हिरन की खाल ही हमें दिलवा दीजिए. मैं इसे पेड़ पर टांगूंगी. हेर-फेरकर देखा करूँगी. अपने मन को समझाऊंगी कि हिरन तो जीवित है, जी रहा है.

 

कौशल्या साफ मना कर देती हैं

                            हे हिरनी, तुम अपने घर जाओ. ये भी मुझसे नहीं होगा. मैं हिरन की खाल तुम्हें नहीं दूंगी. इस खाल से खँजड़ी मढ़ी जाएगी. इसे मेरे बेटे राम बजाएंगे. इससे खेलेंगे.

 

असहाय हिरनी लौट आती है, लेकिन

                                       उस खँजड़ी पर मढ़ी खाल जब-जब बजती है, तब-तब हिरनी उस ध्वनि को सुनकर अनकती है. (अनकना का मतलब अनुभव करना और याद आना दोनों है) ऐसी दशा में वो उसी ढाक के पेड़ के नीचे चली जाती है. वहीं खड़े-खड़े अपने हिरन को बिसूरती है. कातर दीठ से राह निहारती है.

 

इस सोहर का एक बन्द और है जो बहुधा गाया नहीं जाता ( या मैनें नहीं सुना ) उसमें विवश होकर जाने से पहले हिरनी कौशल्या को शाप देती है कि

 

जैसे सुन्न हमरो निकुंज बन अउर बृंदावन हो 

रानी! वइसे सुन्न होइहैं अजोध्या रमइया बिनु हो॥

                                                     जैसे हमारा कुञ्ज और वृन्दावन सूना हो गया है, हे रानी ! वैसे ही अयोध्या भी राम के बिना सूनी हो जायेगी.

                                                 ***************************

कुछ बातें सोहर और इस सोहर परः

 

सोहर मुख्यतः जन्मोत्सव का गीत है, लोक गीतों में यह संस्कार गीतों की श्रेणी में है किन्तु कुछ ब्याह गीतों को भी सोहर कहते हैं. सोहर उल्लास का, बधाई देने का, मङ्गलकामना का गीत है किन्तु यह सोहर करुण है, निष्ठुरता का गीत है और शाप का भी. लोक गीतों में कब उल्लास का स्वर करुण हो जाय, पता नहीं चलता – एक रपटीली ज़मीन पर गीत चलते हैं जो अनजाने और अनचाहे ही रपट कर करुणा की ओर चले जाते हैं. ब्याह गीतों में सिखावन और विदाई करुण आख्यान ही हैं जो बेटी के पराये घर जाने की टीस में कि उससे साथ कैसा व्यवहार हो, आँख नम कर देते हैं. ब्याह गीतों में ही नकटा यूँ तो हँसी-मज़ाक है किन्तु यह नारी जीवन की करुण कथा / विद्रूप भी है कि जो उसके साथ होता है / जो वह नहीं कर सकती/ सामान्य अवस्था में नहीं कह सकती – नकटा में सब खुल कर कह देती है सो सोहर के इस आख्यान के करुण होने में अचरज न करें.

 

यह सोहर भोजपुरी का है और लोग इसे अवधी का भी बताते हैं. हम इस पचड़े में नहीं पड़ते कि यह भोजपुरी है कि अवधी – यह जानकार और विद्वत जन बतायें.

 

साथ ही एक बात और कि कोई यह वितंडा न खड़ा करे कि भला ऐसा भी कहीं हुआ होगा ! दशरथ की रसोई और रामजन्म का उत्सव – भला मांस पका होगा या मांस तो वे लोग खाते नही थे ! या फिर कौशल्या जी इतनी क्रूर और निष्ठुर नहीं हो सकती ! यह आक्षेप है… आदि, इत्यादि ! तो भईया ! यह लोक है. लोक का संसार शास्त्रीयता की सीमाओं से परे है. वह जो कुछ देखता और सोचता है – उसे गीतों, कथाओं और खेल में ढाल लेता है. वह भगवान से हँसी का नाता भी रखता है, गरियाता भी है, रूठता भी है. मिथिला में राम से परिहास का नाता है और दशरथ से भी. ब्याह की गारियों में चारों भाई, दशरथ, शांता … सब ‘न्योते’ जाते हैं वैसे ही जैसे सामान्य ब्याह की गारियों में सम्बन्धी. लोक जो भोगता है, उसे मज़बूती, स्वर और विश्वसनीयता देने के लिए पहले हुए या वर्तमान राजाओं / चरित्रों में आरोपित करता है सो कथ्य को इसी लोक दृष्टि से देखें.

Thursday, 11 March 2021

शिवरात्रि पर शिव विवाह का प्रसङ्ग


 “जय राम जी की ! जय हनूमान जी की ! जय होय भोले नाथ की औ साथ मा जय होय पंडी जी की !” पंडी जी , आज कौन प्रसंग सुनइहो ?

“ जय जय होय जजमान ! आज तो महाशिवरात्रि का पावन पर्व आय, आदिशक्ति औ शिव के बियाह का. भोलेनाथ का बियाह तो और कौन प्रसंग सुनाइब ! आज तो शिव-पार्वती का बियाह प्रसंग चली औ आज शिवरात्रि है औ बियाहौ रातै मा होत है सो कथा देर रात तक चली. अब भक्तगनौ आय गये हैं तो सिरीगनेश कीन जाय भोलेनाथ के कौतुक भरे बियाह का. “
“ बिल्कुल ! अब इहौ मा कौनों साईत घड़ी बिचारेक है का. मुदा एक निहोरा आय. बाबा तुलसी भी रामचरित मानस अवधी मा कहिन हैं, शिव-पार्वती का बियाह “पार्वती मङ्गल” भी अवधी मा आय, हम-आप औ हियां के जादातर लोग अवधी समुझ लेत हैं, बोलतौ हैं औ रसौ लेत हैं भाखा मा, मुदा बहुत से लोग ई सिकायत कीन्ह कि रस तो है भाखा मा मुदा अवधी समुझ मा नाइ आवत है. जो सुनावत हो ऊका समुझ तो लेइत है मुदा जोरि-गांठ के कौनिउ तनी ! अवधी समझे मा दिक्कत होत है तो पंडी जी ! भले अइसे लोग दसै-पांच होयं मुदा सबका मान राखेक चाही. ई तो हरि कथा आय सबका रस मिलेक चाही. भाखा औ भाषा के चक्कर मा काहे कुछ लोग कथा से विमुख होयं औ दोख हमका-आपका लगे तो पंडी जी अबते कथा खड़ी बोली मा कहौ.
“ ठीक है यजमान. वैसे इस आग्रह में अवधी समझ में न आने की अपेक्षा यह भाव अधिक है कि अवधी को गवाँरु भाषा मान लिया गया है, वो भी अवध में ! लोगों का बोलने का अभ्यास भले न हो किन्तु समझ तो सभी लेते ही हैं किन्तु वही भाव कि समझना भी स्वीकार किया तो अभिजात्य समाज उन्हे भी गवाँर – देहाती मानेगा. विडम्बना यह कि ऐसे लोग भी अन्य लोकभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं / बोलियों में रुचि लेते हैं और समझ भी लेते हैं. भोजपुरी गाने तो खूब छाये हुए हैं, हरियाणवी और पंजाबी गाने भी खूब सुनते और पसन्द करते हैं, डी.जे. पर धमाल तो बिना भोजपुरी और हरियाणवी गानों के फीका रहता है मगर अवधी में शर्म आती है. खैर, हम तो कथावाचक ठहरे सो कथा उस भाषा में कहेंगे जिसे सब लोग समझ लें आनन्द लें. तो बोलिये आदियोगी शिव और आदि शक्ति भवानी की जय. कथा का आनन्द लें और हाँ ! कथा में कुछ हास-परिहास भी रहेगा, उसमें तो आपत्ति नही है ना ! किसी की भावना न आहत हो जाय.
“ अरे नही पण्डित जी. हास- परिहास से तो कथा में रस आ जाता है और भगवान भोलेनाथ तो ठहरे परम कौतुकी. सभी देवगण कौतुकी हैं. शिव जी ने भी कौतुक किया और बाबा तुलसी ने भी तो इस कौतुक का बखान किया है. आप कुछ अपनी तरफ से गढ़ कर थोड़े न कहेंगे. आप निर्द्वन्द्व होकर कथा सुनायें.”
“ तो सज्जनों ! चित्त लगा कर शिव जी के विवाह की कथा सुनें. शिव जी हैं तो आदि देव किन्तु दोनों देवों से अलग. कर्पूरगौरं अर्थात कपूर की तरह गौर वर्ण के हैं किन्तु शरीर पर भस्म लपेटे रहते हैं, चिता भस्म. शिव अर्थात कल्याणकारी हैं किन्तु भयङ्कर और अमङ्गल वेष बनाये रहते हैं. शरीर पर भस्म और व्याघ्रचर्म, बस ! श्रंगार में सर्प लपेटे, शीश पर गङ्गा जो जटा-जूट में अटक कर रह गयीं, मस्तक पर चन्द्र सो चन्द्रमौलि व चन्द्रशेखर भी कहाये. कभी कपाल भी उनकी हथेली पर बहुत काल तक चिपका रहा सो कपाली कहाये. रहने का कोई घर नहीं, शम्शान में या कैलाश पर. गण भी भूत-प्रेत और वाहन भी बैल. अब भले ही त्रिदेवों में एक हों, जगदीश्वर हों . अब ऐसे नङ्ग-धड़ङ्ग , घर-बार से हीन, संगी-साथी ऐसे को लड़की कौन देता. सो इनके विवाह में अड़चनें शुरू से रहीं. वैसे तो कोई जामाता बना नही रहा था किन्तु दक्ष प्रजापति की पुत्री, सती, ने शिव को पसन्द किया और क्यों न करतीं. वे तो आदि शक्ति, सदा ही शिव में समाहित थीं तो दक्ष की पुत्री रूप में उन्हें वरण तो शिव का ही करना था सो शिव को वरा. अब विवाह तो हो गया किन्तु दक्ष ने इससे स्वयं को इतना अपमानित अनुभव किया कि शिव क्या, अपनी पुत्री सती से भी नाता तोड़ लिया. यज्ञ किया तो सब देवों को न्योता पर सती को नही बुलाया. इतना ही नहीं, यज्ञ में शिव का भाग भी नही रखा. अब पिता पर स्नेह और मायके में यज्ञ के कारण सती वहाँ गयीं तो किन्तु शिव का निरादर और पिता की उपेक्षा से क्षुब्ध होकर यज्ञ कुण्ड में स्वयं की आहुति दे दी. बाद में शिवगणों ने यज्ञ विध्वंस किया और दक्ष को समुचित दण्ड मिला. ये सब कथा आप सती मोह प्रसङ्ग में सुन चुके हैं, सो अति संक्षेप में नीरस ढङ्ग से बखाना, अब सुनें शिव के दूसरे विवाह, पार्वती से विवाह, की कथा.
वही सती हिमवान के घर पार्वती रूप में उत्पन्न हुईं. अब शिव जी सती के वियोग में थे, उनकी विवाह करने की कोई मंशा न थी इधर पार्वती शिव जी को वर रूप में पाने हेतु घोर तप कर रही थीं. किन्तु शिव जी सब जानते हुए भी विवाह के इच्छुक ही न थे. अब शिव योगी तो थे ही, कौतुकी भी कम न थे. जानते थे कि वही सती हैं जो पार्वती के रूप में उत्पन्न हुई हैं, विवाह तो करना ही होगा किन्तु मनौना करवा रहे थे. वो काहे को उतावलापन दिखाते और हिमवान भी ऐसे वर से अपनी सुघढ़ पुत्री का विवाह करते, अब तो वे दुहाजू भी थे. जब नारद ने हिमवान को पार्वती का हाथ देखकर भावी वर के लक्षण बताये तो वे बहुत दुखी हुए.
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥

अब बताईये भला, जिस कन्या के बारे में उसके माता-पिता से बताया जाय कि गुणहीन, अनाथ ( माता-पिता विहीन ), उदासीन, संशयहीन ( लापरवाह ) योगी, जटाधारी, निष्काम नङ्गा और अमङ्गल वेष वाला पति मिलेगा – तो उन्हे कैसा लगेगा ! इससे तो बिटिया कुँवारी ही भली. तब नारद जी ने शिव के लक्षण बखाने कि ठीक यही लक्षण शिव जी के हैं और वे प्रतिष्ठित देव हैं , बड़े हैं, समर्थ हैं और समर्थ को कोई दोष नही लगता.

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कौ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोष गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥

संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥

खूब समझाया कि गङ्गा जी में तो शुभ-अशुभ सब जल बहता है उन्हे कोई अपावन नही कहता. सूर्य, अग्नि और गङ्गा जी की भाँति समर्थ को दोष नही लगता - तरह-तरह से समझाया. हिमवान कुछ कुछ मान भी गये किन्तु मैना, हिमवान की पत्नी और पार्वती जी की माता, ने तो साफ मना कर दिया कि घर-वर और कुल हमारे अनुरूप हों तब ही विवाह कीजिए अन्यथा नही. भले बेटी कुमारी ही रहे, घर ही रहे किन्तु ऐसे अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नही करूँगी –

जौं घरु बरु कुलु होई अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥
न त कन्या बरु रहे कुआरी। कंत उमा मम प्रानपियारी॥
इधर हिमवान विचलित, मैना तो मान ही रहीं ऊपर से पार्वती जिद करें कि विवाह तो शिव जी से ही करेंगे और तप करने का दृढ़ विचार प्रकट किया. इधर ये असमंजस तो उधर शिवजी भी कम नही, वो तो विवाह को ही राजी नही. अब देवताओं को चिंता हुई कि शिव जी विवाह ही न करेंगे तो उनका पुत्र कहाँ से होगा जो तारकासुर का वध करके देवताओं को त्रासमुक्त करेगा. ब्रह्मा जी की सलाह से सबने अनुनय-विनय की पर वे माने ही नही. उनके आराध्य राम – सो वे रामभजन मे ही रत रहने लगे –

जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयौ विरागा॥
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥

जब सबके प्रयास निष्फल हो गये तो राम प्रकट हुए और उन्होनें शिवजी को समझाया, विवाह का अनुरोध किया और शिवजी ने उसे आज्ञा मान कर शिरोधार्य किया –

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मांगे देहु॥

तब भी शिवजी तैयार नही थे किन्तु राम की मर्यादा रखने को राजी हुए –

कह सिव जदपि उचित यह नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥

अब जब सब तय हो गया कि विवाह करना है और पार्वती जी से ही करना है तब भी विवाह की अड़चनें कम न हुईं और शिवजी ने ही अड़चनें डालीं. उन्होने सप्त्रऋषियों को भेजा अपने विरुद्ध भड़काने को कि परीक्षा लें. सप्तॠषियों के भड़काने पर भी वे अडिग रहीं और उनसे यह सुनकर भी शिवजी स्वयं वेश बदल कर भड़काने गये

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मांगि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥

अब बहुत क्या विस्तार करना, शिवजी ने खूब हिला-हिला कर पक्का कर लिया. धन्य है पार्वती का प्रेम कि वे तब भी शिवजी से विवाह को दृढ़ रहीं. लो भई सब मान गये, हिमवान को संदेशा भी भेज दिया गया, विवाह की तिथि निकल आयी, सब तैयारियाँ हो गयीं, बारात सजी तो फिर शिवजी ने कौतुक किया. जो धजा थी, उससे भी विकट वेश बनाया. अब ब्याह को जा रहे हैं बारात लेकर किन्तु धजा कैसी वही साँप के ही कुण्डल और कङ्गन , जटाओं का मुकुट और उस पर भी साँप लपेटे , भभूत रमायी और बाघम्बर लपेट लिया कि चलो भाई –
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥

जैसे वो, वैसे ही उनके बाराती. जस दुलहा तस बनी बराता –

कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कौ बहु पद बाहू॥
बिपुल नयन कौ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥

तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बने॥

ऐसी बारात देख कर विष्णु और अन्य देवगण तो अलग होकर चले. वे सब सुन्दर, सुदर्शन, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित, वैभवशाली रथ और पर सवार, सुमधुर वाणी वाले – कहाँ इनके साथ शोभते सो वे अलग चले. ऐसी बारात देख कर बच्चे तो डर कर भाग गये और मैना, पार्वती की माता, परछन के समय ऐसा विकट वेश देख कर अपने भवन में भाग आयीं और शिवजी जनवासे को गये –

कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
बिकट वेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेखा॥
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥

गौरा को गोद में बैठा लिया, कहने लगीं कि भाड़ में जाय विवाह. मैं तुम्हे लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी या आग में जल जाऊँगी या समुद्र में डूब मरूँगी. चाहे घर उजड़े या बदनामी हो – यह विवाह तो अब न होगा –

कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागईं॥
तुम्ह् सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घरु जाउ अपजसु हौउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥

अब ये तो ढिठाई थी शिवजी की कि विवाह में भी ये कौतुक किया. खैर, सबने खूब समझाया-बुझाया तब विवाह हुआ और बड़े उछाह से , विधि-विधान से हुआ. खूब दावत उड़ी और महिलाओं ने गारी भी गाईं. दावतों का वर्णन बाबा तुलसी ने खूब किया है, शिव विवाह में भी और राम विवाह में भी और गारी भी दोनों विवाह में गायी गयी.

भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥

सो जेवनार कि कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परसन निपुन सुआरा॥
नारिरूंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी।

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहिं।
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥
जेवँत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।
अचवाँइ दीन्हें पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥

सो सारी अड़चनों, विघ्न बाधाओं – जो कि कौतुक ही थे – के बाद उमा-शंभु का विवाह हुआ, हिमवान ने भरपूर दहेज दिया, मैना ने गौरी को सिखावन दी, मैना को ममता विलगित देख कर शिवजी ने सास को बहुत समझाया, उनकी शङ्का दूर की, देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की, दुन्दुभि बजायीं, शिव विवाह सम्पन्न हुआ.

शिव-पार्वती विवाह का वर्णन गोस्वामी तुलसिदास जी ने एक छोटे काव्य, “पार्वती मङ्गल” में भी किया है. श्रोतागण ऊबने लगे हैं सो उसका बस एक छन्द सुनें और आमोद-प्रमोद का भाव ग्रहण करते हुए निज निज गृह पधारें –

मगनयनि बिधुबदनी रचेउ मनि मंजु मंगलहार सेा।
उर धरहुँ जुबती जन बिलोकि तिलोक सोभा सार सो॥
कल्यान काज उछाह व्याह सनेह सहित जो गाइहैं ।
तुलसी उमा संकर प्रसाद प्रमोद मन प्रिय पाइहै॥