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Thursday, 27 March 2014

ऐरा गैरा नत्थू खैरा


 

ऐरा गैरा नत्थू खैरा

अभी चाय के दो घूंट ही लिये थे कि कुण्डी खड़की. अब तो कालबेल है, जञ्जीर-कुण्डी वाले बचे-खुचे दरवाज़े भी अब हटे - तब हटे की मुद्रा मे खड़े हैं किन्तु मै कालबेल की आवाज़ को कुण्डी खड़कना ही कहता हूँ. हाँ तो कुण्डी खड़की, झांक कर देखा, नत्थू था. “ छत पर चले आओ भई, ज़रा एक चाय और भेजना ” ये हांक लगा कर मै फिर दरी पर जा बैठा. पहली हांक नत्थू के लिये थी और दूसरी पत्नी के लिये. वह कुछ गुस्सा जैसा लग रहा था, चाल मे भी तेज़ी थी जो तैश की सी थी.

ये उतरते जाड़े के दिनों की बात है. कोहरा, बदली के दिन विदा हो चुके थे और उनके डर से छुपी रहने वाली या डर-डर के आने वाली धूप बेधड़क आने लगी थी,  कुछ गुजरात टूरिज्म के विज्ञापन मे अमिताभ की शैली मे.”… कुछ पल तो गुज़ारिये धूप मे.” मनुहार करती सी लगती थी. वो सुनहरी गुनगुनी सी धूप रोक ही लिया करती थी अगर किसी उससे ज्यादा अहमियत वाले से मिलने जाना न हो. रविवार की सुबह और कोई घरेलू काम भी नही सो छत पर धूप के साथ बैठ कर कुछ लिखत-पढ़त के इरादा से दरी, डेस्क, कागज – कलम, किताबें जमाईं, पानी का जग, गिलास और चाय का कप लेकर “अब तो सब हो गया” के भाव से बैठक पर नज़र डाली. अभी बैठा ही था और चाय के दो घूंट ही लिये थे कि कुण्डी खड़की. अरे ! यह तो बता चुका हूँ कि कुण्डी खड़की… नत्थू आया और बड़े तैश मे आया.

नत्थू इसी मोहल्ले का बाशिंदा है मगर बसा किसी घर मे नही. इसके आगे नाथ न पीछे पगहा, ज़ोरू न जाता अल्लाह मियां से नाता. कहां से आया – पता नही. पार्क का मंदिर ही उसका ठिकाना है. मंदिर की साफ-सफाई, देख-रेख करता है और बारामदे मे सो रहता है. बस काम भर का लिखना पढ़ना आता है, थोड़ा बहुत बिजली का काम भी जानता है, सभी के छोटे-मोटे काम कर देता है तो उसके बीड़ी तम्बाकू का इन्तज़ाम हो जाता है, खाना कभी बना लिया तो ज्यादातर किसी न किसी के यहां खा लिया. मै उससे काम कराने के अलावा बतिया भी लिया करता हूँ सो मेरा मुहलगा सा है, यारी सी है और पढ़ते-लिखते देख कर काबिल भी मानता है… मै भी उसका भ्रम नही तोड़ता. बैठने को कहा, बैठते हुए ही बोला, ”ये क्या फैला रखा है आप लोगों ने ? कैसी-कैसी कहावतें गढ़ रखी हैं, “ऐरा गैरा नत्थू खैरा !” छोटा आदमी हूँ तो क्या हमारी कोई इज्जत नही. ये ऐरा, गैरा कौन हैं जिन्हे मेरे साथ जोड़ दिया. अरे कोई गैर है तो मेरे साथ क्यों है और ये ऐरा और खैरा कौन हैं. मैने तो इन्हे देखा तक नही और जोड़ दिया मेरे साथ. कितना भी सबके काम करो कहेंगे बेइज्जती करते हुए – ऐरा गैरा नत्थू खैरा ! ग़ल्ती करें ऐरे, गैरे, खैरे और बदनाम हो नत्थू.”

मेरी तो बोलती बंद हो गयी, कुछ उसके तैश से और कुछ इससे भी कि बात तो उसकी जायज थी. मुझसे कुछ बोलते नही बना सिवाय इसके कि यह कहावत तो बहुत पहले की बनी है.

“ होगी पहले की मगर अब के लोग भी तो यही कर रहे हैं. कहावत मे नत्थू के साथ नत्थी किये गये ऐरा, गैरा और खैरा और फिल्म मे मूंछों और नत्थू का मज़ाक बनाया गया. फिल्म शराबी का सीन याद करें साहब. छोटे कद का एक्टर और मूंछे बड़ी-बड़ी. नाम भी रखा तो नत्थूलाल. उसकी मूंछे छूते हुए डायलाग बोला, मूंछे हों तो नत्थू लाल जैसी. हम आपके जैसे पढ़े-लिखे तो नही मगर इतना तो समझते हैं कि तारीफ नही हो रही है… मज़ाक उड़ाया जा रहा है.”

अभी नत्थू उलझ ही रहा था कि जीने पर से कदमों की आहट सुनाई दी. ये शीला और मुन्नी थीं जिन्होने कुण्डी खड़काना भी ज़रूरी नही समझा. बिना किसी भूमिका के शुरू हो गयी शीला, “ जीना हराम कर रखा है ऐसे गानों ने, जिसे देखो वही देखते ही “शीला की जवानी” और “मुन्नी बदनाम हुयी, डार्लिंग तेरे लिये” गाने लगता है.” उनकी शिकायत पूरी होते न होते लाठी टेकती हुयी बी नसीबन भी आन पहुँचीं. “ ये मुन्नी तो अब परेशान हो रही है, निगोड़े मुझे तो तबसे परेशान किये हैं जब मै नन्ही ही थी. वो क्या गाना चला था, ‘लौंडा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिये’. ये ‘मुन्नी बदनाम’ तो उसकी नकल है.”

“खाला आप भी !” मेरे मुह से निकला.

“हाँ नही तो क्या ! उस ज़माने मे यह ज़ोरों पर था, जिन छोकरों को इस बदनामी की समझ भी न थी, वो भी देखते ही शुरू हो जाते थे. निकाह हुआ तो तुम्हारे खालू एक शक्की. जब कहीं ये गाना सुनकर आते तो मुझे दिक करते, ‘ये लौंडा कौन है जो तुम्हारे लिये बदनाम हुआ है’. मै लाख कहती, ‘ये तो गाना है, मुए दहिजरों ने बना दिया है. मुझे क्या मालूम, होगी कोई नसीबन और होगा कोई लौंडा… मुझसे कोई वास्ता नही.’ ‘कुछ तो बात होगी, यूं ही कोई थोड़े गाना बनाता है’ पता नही शक़ था कि मियां खुद लौंडे के चक्कर मे थे. उनकी झायं-झायं से तो बेवा होकर छुटकारा मिला मगर ये मरदूद अब बेचारी मुन्नी और शीला का जीना हराम किये हैं.

“ सच कह रही हैं खाला “ ये पटवारी जी थे जो जाने कब आकर बैठ गये थे. “ खालू एक बार मुझसे भी उलझ गये थे, ‘ कहीं ये तुम्हारा वाला लौंडा तो नही जिसके पीछे मेरी नसीबन बदनाम है’. उस ज़माने मे एक और गाना चला था, ‘लौंडा पटवारी का बड़ा नमकीन’ अब आपको खालू परेशान किये थे और मुझे आपकी बहू. ज़रा घर आने मे देर होती तो ताना मारतीं, ‘होगे उसी लौंडे के साथ.’ अब मै कभी सफाई देता तो कभी झल्ला पड़ता. हद तो ये कि एक बार तहसीलदार साहब ने भी मौका देखकर फुसफुसाते हुए कहा, ‘भई, वो तुम्हारा लौंडा कहां है, हमसे भी तो मिलवाओ’ पता नही संजीदा थे कि चुहुल कर रहे थे.”   

खैर, किसी तरह लल्लो-चप्पो करके इन सबको चाय-पानी कराके विदा किया. अब पढ़ने-लिखने का क्या मन होता, चिन्तन ही चालू हो गया. कितने ही मुहावरें और कहावते हैं जो किसी नाम पर या जात पर बने हैं. कल को वो भी ऐतराज करने लगें, याचिका-वाचिका दायर दें तो क्या हो ! कहावतें और कुछ नाम तो बदले जा सकते नही भले ही सरकारें उन्हे बदल दें. अब ‘बाम्बे डाईंग’, फिल्म ‘बम्बई का बाबू’ और भी तमाम ‘मुम्बई डाईंग’ और ‘मुम्बई का बाबू’ होने से रहे.

अगर कोई गंगू नामधारी लड़ने लगें कि ‘कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली’ मे मुझे क्यों घसीटा गया, होंगे राजा भोज बड़े, करो उनकी तारीफें , मेरी बेइज़्ज़्ती क्यों पीढ़ी दर पीढ़ी करते चले आ रहे हो. इतना ही नही तेली समाज भी आपत्ति उठा सकता है कि ये गंगू की ही नही पूरी तेली जाति का अपमान है और पता नही किस गंगू को हमारी जात से जोड़ रहे हो. कल को कोई अब्दुल्ला आकर बखेड़ा करे, ’क्यों मियां, मै किस बेगानी शादी मे दीवाना हुआ था, हुआ होगा कोई अब्दुल्ला दीवाना किसी बेगाने की शादी मे, अब तक क्यों सारे अब्दुल्लाओं के पीछे पड़े हो ? गोया अब्दुल्ला नाम न हुआ जात हो गयी !’ है कोई जवाब ! जात की बात पर ध्यान आया कि “मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक” भी तो ऐतराज के लायक है. कल को कोई मुल्ला कह दे कि हमे क्या निरा मुल्ला ही समझ रखा है कि मस्जिद से आगे का न पता हो, न समाई. अरे हम वो मुल्ला नही, दीन के साथ दुनिया की खबर रखते हैं और ऊपरवाले के अलावा नीचे के ऊपरवालों तक भी पहुँच रखते हैं. मुल्ला ऐतराज करें तो पण्डित जी क्यों पीछे रहेंगे. उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की गायी ठुमरी, “… कंकरि मार जगा गयो रे बम्भना का छोरा… “ मे एक तो ब्राह्मण को बदनाम किया सो किया मगर ब्राहमण देवता कहना तो दूर बम्भना कहा है और आपको बड़ा रस मिलता है इसे सुनने मे. गया राम, गंगा दास, जमुना दास, नयनसुख आदि भी तो आपत्ति उठा सकते हैं. इनके नामों पर भी तो कहावते हैं और कहावत मे इन नामों को इज्जत तो दी नही गयी है.

नत्थू, शीला, मुन्नी, पटवारी और बी नसीबन के अलावा और कोई शिकायत करने तो नही आया मगर आशंका बराबर बनी हुई है कि कहावतों, मुहावरों और गानो मे शामिल नामों और जातियों के लोग भी आकर खड़े हो गये तो क्या जवाब होगा. अदालती कार्यवाही झेलो और इनका प्रयोग बन्द करो. फिर तो लाक्षणिक अभिव्यक्ति सीमित ही समझो.

दरअसल मुहावरों व कहावतें मे, लोकगीतों से लेकर फिल्मी गानों मे, विभिन्न शीर्षकों मे, कथानकों मे, और और भी कई प्रसंगों मे नाम और जाति का प्रयोग हुआ है. इनके पीछे मंशा क्या रही होगी ! निश्चित ही यह मंशा तो नही ही होगी कि इनका मज़ाक उड़ाया जाय या इन्हे अपमानित किया जाय. अब तो जाति का आधार व्यवसाय नही और यह भी आवश्यक नही कि किसी जाति विशेष के लोगों मे जातिगत गुण-अवगुण या विशेषताएं हों. बहुत अकादमिक विश्लेषण मे न जायें तो किसी घटना या प्रवृत्ति के बारे मे जो कुछ सूत्र रूप मे कहा जाय वह कहावत और जो मुह दर मुह चलन मे रहे, वह मुहावरा. दोनो का ही एक फार्मूला और एक ही मानक है. कोई नाम, कोई जाति या घटना इसलिये जोड़ी जाती है कि पूरी बात न बतानी पड़े, सुनते लोग जान जायें कि, अच्छा उस घटना / उस आदमी ( औरत भी हो सकती है ) की बात हो रही है या ये बात भी ‘ऐसी’ ही है जैसी ‘वो’ थी. यही कहावतों का उद्गम, आशय और उपयोगिता है.

जब कोई कहावत बनी तो उस समय के लोग तो समझ लेते थे कि किस सन्दर्भ की बात है किन्तु इनका कोई लिखित अभिलेख तो रखा जाता नही अतः एक पीढ़ी बाद के लोग या उससे भी बाद के लोग उस घटना या व्यक्ति विशेष के बारे मे नही जानते तो कुछ खुराफाती लोग भड़कने और भड़कने से अधिक भड़काने मे लग जाते हैं. ऐसे लोग कभी कोर्स की किताबों के पाठ बदलवाने के लिये तो कभी फिल्मों के नाम को लेकर तो कभी किसी गाने से एक आध शब्द बदलवाने के लिये हाय तोबा मचाते हैं. बहाना यही होता है कि हमारी भावना को ठेस पहुँची / भावना आहत हुई, हमारी जाति का अपमान हो रहा है… आदि, इत्यादि. जहां तक हम समझते हैं, इन कारणों मे से कोई भी वास्तविक नही होता बल्कि ये चर्चा मे आने या सस्ती लोकप्रियता पाने का ओछा हथकण्डा है. सरकार उनकी बात कभी कभी मान भी लेती है. उन्हे तो उतना प्रचार नही मिलता और न ही जातीय गौरव बढ़ता है और न ही वे जाति के प्रतिनिधि बन जाते हैं, बस उनका अहं तुष्ट हो जाता है या फिर फिल्म-विल्म का मामला हुआ तो कुछ माल-मत्ता हाथ लग जाता है.

इस वितण्डा से सबसे अधिक फायदा उसे होता है जिस पर आपत्ति की गयी होती है. फिल्म या किताब या लेख के मामले मे तो मुफ्त मे प्रचार हो जाता है. कुछ समय पहले ‘नया ज्ञानोदय’ मे एक साक्षात्कार मे विभूति नारायण सिंह ने नाम लिये बगैर कुछ लेखिकाओं के लिये एक बहुश्रुत/ प्रचलित शब्द ( फ्लर्ट से ऊंचे दर्जे का) प्रयोग किया तो कुछ ने इसे लपक लिया. नतीजा क्या हुआ – साहित्य मे ज़रा भी रुचि / जानकारी रखने वालों ने ढूंढ-ढूंढ कर वह साक्षात्कार पढ़ा. पत्रिका की बिक्री बढ़ी बस. ऐसे ही फिल्म ’आजा नच ले’ के एक गाने मे ‘सुनार’ शब्द पर हाय-तोबा मची तो शब्द तो हटा मगर बहुतेरे सुनार सहित गाना सुन चुके थे. जिन्होने पहले वाला नही सुना था उन्होने भी सुना. दो कार्टूनों पर चाय के प्याले मे तूफान उठाया गया तो लोगों ने ढूंढ-ढूंढ कर वो कार्टून देखे. विवाद पर लोग प्रयास करके देखते/ पढ़ते/ सुनते हैं कि देखें इसमे है क्या ! इस चक्कर मे औसत माल भी खप जाता है. इससे तो लगता है कि ऐसी आपत्तियां प्रायोजित और इन पर लड़ाई नूरा कुश्ती होती है.   

पहले नत्थू, शीला, मुन्नी, बी नसीबन और पटवारी की बमचक से मार खुपड़ी झांझर हो गयी और रही-सही कसर इस चिन्तन ने पूरी कर दी. अब पढ़ता तो क्या और लिखता भी क्या… सरो सामां समेट कर खाने की गुहार लगाता नीचे उतरा.

राज नारायण

 

 

 

 

  

 

Saturday, 11 January 2014

एक महफ़िल, दाग़ देहलवी और साहित्यिक चोरी

एक बार शहर की एक महफ़िल मे दाग़ ने ग़ज़ल पढ़ीः

                                 ख़ातिर से या लिहाज़ से मै मान तो गया

                                  झूठी क़सम से आपका ईमान तो गया

ज़बान का लुत़्फ, बंदिश की चुस्ती, मज़मून की शोख़ी, उस पर बेतकल्लुफ़ गुफ़्तगू के अंदाज़ मे मामलाबंदी, देहली वालों ने ये अदाएं सौदा और कायम के बाद देखी थीं. तारीफ़ और तहसीन का शोर हर तरफ़ से गर्म हुआ. बाद मे जो शेर दाग़ ने पढ़े वो भी अपनी मिसाल आप थे -

                                             अफ़्शा--राज़--इश्क़ मे गो ज़िल्लतें हुई

                                              लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया



                                                    दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नही

                                                     उल्टी शिकायतें हुईं अहसान तो गया

दाद के डोंगरों के बीच दाग़ ने मक़्ता पढ़ा -

                                                   होसो- हवासो- ताबो-तवां दाग़ जा चुके

                                                    अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

जब दाद का शोर कुछ थमा तो एक बुज़ुर्ग ने फ़रमाया, " सुभानल्लाह, यह उम्र और यह शेर !

एक और साहब ने हँस कर कहा, "साहबज़ादे, अभी तो नामे-ख़ुदा उठती जवानी है, अभी से यह मज़मून कहां से सूझ गया."

"
जी मै कुछ अर्ज़ करूं " ढलती उम्र के एक शख़्स ने. जो सूरत से किसी मदरसे के मौलवी मालूम होते थे. ज़रा बुलंद आवाज़ मे कहा.

"
ज़रूर, मौलवी साहब, ज़रूर फ़रमाएं" मजमे से आवाज़ें आईं.

मौलवी साहब ने खंखार कर कहा, " अजी हज़रत, यह मज़मून ख़ुदा--सुख़न मीर तक़ी मीर साहब का है." फिर उन्होने नीचे के शेर पढ़े -

                                          क्या फ़हम क्या फ़िरासत ज़ौक़े - बसर समाअत

                                          ताबो-तवानो-ताक़त ये कर गए सफ़र अब



                                                     मंज़िल को मर्ग की था आख़िर मुझे पहुँचना

                                                    भेजा है मैने अपना असबाब पेशतर सब

एक पल के लिए ख़ामोशी छा गई. फिर नवाब मुस्त़फा ख़ां शेफ़्ता ने फ़रमाया," भई, यह तो दुरुस्त है कि मीर साहब इस मज़मून को पहले बांध गए हैं लेकिन मियां दाग़ के मक़्ते मे एक बरजस्तगी है जो बहुत भली मालूम होती है..."

"
सरकार, बात काटना माफ़ हो," दाग़ ने खड़े होकर हाथ जोड़ते हुए कहा, "बंदे को बिल्कुल नही याद कि ख़ुदा--सुख़न के ये शेर कब मेरी नज़र से गुज़रे, और गुज़रे भी कि नही..."

"
सही चोरी," मौलवी साहब ने ज़रा तेज़ी से कहा. " मज़मून लड़ तो गया"

"
बेशक लड़ गया," दाग़ ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा,. बंदा तो चोरी का इल्ज़ाम भी अपने सर लेने को तैयार है. लेकिन मै दो शेर पढ़ता हूँ, एक ख़ुदा--सुख़न मीर तक़ी मीर साहब का और एक उनसे पहले एक शायर गुज़रे हैं, अमीर मुइज़ी, उनका है. मौलवी साहब इन्हे सुनकर हुक्म फ़रमावें कि चोरी या मज़मून का लड़ना किससे हुआ."

मौलवी साहब थोड़ा गर्म होकर बोले, "अपनी बहस अपने ही शेर तक रखिए..."

मज्मे मे से कुछ आवाज़े आईं, " नही साहब, ज़रा वो शेर भी सुन लें."

दाग़ ने कहा, "बहुत ख़ूब , हाज़िर करता हूँ." यह कह कर उसने पहले मुइज़ी का शेर पढ़ा, फिर हज़रत मीर तक़ी साहब काः

                                                       हमीं गोई कि बा तू इत्तहादेस्त

                                                       बिगो ज़ालिम कि मारा एतमादेस्त

(
          (तू कहता हैः तेरे साथ मेरा मेल-मिलाप है. ज़ालिम, यह बात तू कहे जा, कि हमे तुझ पर पूरा भरोसा है)

शेर पर वाह-वाह ख़त्म हुई तो दाग़ ने पढ़ा-

                                          कहते हो इत्तहाद है हमको

                                          हां कहो एतमाद है हमको

लोग एक पल चुप रहे,

फिर किसी ने कहा, "अगर मुइज़ी पहले हैं तो यह सरासर चोरी है मीर साहब मरहूम की"

(...
(...इसके बाद मुइज़ी और मीर साहब की पैदाईश की तारीख का ज़िक्र है जिससे मालूम हुआ कि मुइज़ी मीर साहब से सात सौ बरस पहले के हैं ... )

"
तो गोया मीर साहब ने चोरी की" एक साहब बोले.

"
नही, चोरी और मज़मून के क़ायदे बहुत पेचीदा हैं." इमाम अब्दुल क़ाहिर ज़ुरजानी तो चोरी के वजूद से तक़रीबन इंकार ही करते हैं" मौलाना सहबाई ने कहा,

"
फ़िदवी की अर्ज़ यह है कि जनाब चोरी हो या टकराव, सभी से सरज़द हो सकता है. यह वह गुनाह है जो आपके शहर के लोग भी करते हैं," दाग़ ने कहा जो अब तक पहले की ही तरह महफ़िल के बीच मे खड़ा था.

"
मुमकिन है मीर साहब ने अमीर मुइज़ी का अनुवाद किया हो. यह भी एक फ़न है." मौलाना सहबाई ने फ़रमाया.

"
बेशक, लेकिन बड़ाई तो पहले आने वाले की है ही," नवाब मुस्त़फा ख़ां ने जवाब दिया.

"
जी हां, इसी ऐतबार से बंदा भी ख़ुदा--सुख़न की बड़ाई को दिलो-जान से तस्लीम करता है," दाग़ ने झुककर दोनो बुज़ुर्गों को सलाम करते हुए अर्ज़ किया.

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मित्रों, शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी के उपन्यास "कई चांद थे सरे-आसमां" का यह टुकड़ा ( पृष्ठ 716 से 718 )
प्रस्तुत करने के अनेक उद्देश्य हैं, जिनमे से कुछ हैं - इस उपन्यास के प्रति रुचि जाग्रत करना, देहली की महफ़िलों के तौर-तरीकों की एक झलक देना और इस बहाने एक ऐसे आरोप पर चर्चा जिस पर दो बड़ी मुश्किल से ही एकमत होते हैं - एक तो वह जिस पर यह लगाया जाता है और दूसरे, जो इसे लगाते हैं. इस प्रसंग मे यह बखूबी देखा जा सकता है.

देहली कि इस महफ़िल मे दाग़ देहलवी पर साहित्यिक चोरी तो नही किन्तु ज़मीन उड़ाने का आरोप तो लगा ही
. दाग़ भी बदस्तूर तिलमिलाये और अपने को बेदाग़ साबित करने के लिये बासबूत यह कहा कि फिर तो मीर साहब भी चोर हैं क्योंकि उनका एक शेर उनसे सात सौ बरस पहले के शायर मुइज़ी की जमीन से मेल खाता है.

इस प्रसंग से यह तो साफ है कि विचार साम्य चाहे संयोग से हो या फिर उड़ाया हुआ
-- इसे अच्छा नही माना जाता, यह भी कि साहित्यिक जगत्मे मौलिक जैसा कुछ होता ही नही या दुर्लभतम से दुर्लभ होता है. तुलसी के काव्य मे भी अनेक पद वाल्मीकि से इस सीमा तक साम्य रखते हैं कि उन्हे अनुवाद कहा जा सकता है, तो संस्कृत कवि भी भाव साम्य से अछूते नही हैं. समकालीन साहित्य मे भी अनेक उदाहरण हैं, एक देखें -उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी "पीली छतरी वाली लड़की" का 'तितली प्रसंग' एक और प्रसिद्ध ( जापानी, या शायद चीनी ) कहानी के प्रसंग की हूबहू नकल कहा गया है.

   आज जब साहित्य , फिल्म व कला के हर क्षेत्र मे पूरे के पूरे फ्रेम, दृश्य, प्रसंग आदि हूबहू टीपे जा रहे हैं और उन्हे इंगित किये जाने पर लोग पूरी बेशर्मी व ढिठाई से कुतर्क करते हैं तो ऐसे मे इस प्रसंग की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है.

राज नारायण

Sunday, 29 December 2013

हँस कैसे लेते हैं !


स्टेट बैंक ब्लॉग पर सक्रियता के दिनों की बात है एक साथी थे सुदीप्त मजूमदार. थे तो वे पुरुष किन्तु लोगों की अंग्रेजी समझ की बलिहारी, उन्हे कुछ साथी बहुत समय तक महिला समझते रहे – कारण कि, अपना नाम वे अंग्रेजी मे Sudipta लिखते थे जिसे वे लोग सुदीप्ता समझ कर उन्हे महिला मानते थे. अब स्टेट बैंक ब्लॉग पर अन्य फोटो तो पोस्ट की जाती थीं किन्तु अपनी फोटो पेस्ट करने का चलन नही था जो अब भी नही है. उनके महिला होने का भ्रम बहुत दिनों तक बना रहा. एक बार उन्होने बिना किसी विवरण / शीर्षक / सन्दर्भ के एक सुन्दर युवती की हँसती हुयी आकर्षक फोटो पेस्ट की जिस पर बहुत टिप्पणियां आयीं. लोगों ने उनकी ही तस्वीर समझा. उनमे से बस एक टिप्पणी. जो अब तक याद है. प्रस्तुत कर रहा हूँ –

“ अच्छा. तो  ये आप  हैं मैडम. लेकिन ये बताईये कि बैंक मे काम करते हुए भी आप इतनी खुश  कैसे रह लेती हैं ? “

उनको जो भ्रम था, उसे व्यक्त होता देखने और टूटने की अपेक्षा उनकी टिप्पणी के दूसरे अंश पर तरस आया, कुढ़न हुई और अन्ततः हँसी आयी. ऐसा ही एक वाकया अभी पिछले दिनों ( 11 अप्रैल, 2013 ) को पेश आया. स्टेट बैंक अकादमी. गुड़गांव मे ट्रेनिंग थी. उद्घाटन व परिचय सत्र मे महाप्रबन्धक महोदय ( श्री धर्मवीर प्रसाद ) सम्बोधित कर रहे थे. अब महाप्रबन्धक थे तो पकी आयु के थे ही किन्तु इतने उच्च पद पर होते हुए भी बड़े खुशमिज़ाज. ज़िन्दादिल औए सबसे सहज होकर हँसी – मज़ाक करते हुए बात कर रहे थे. लग ही नही रहा था कि गरिमामय अकादमी का गरिमामय प्रमुख उदघाटन भाषण दे रहा है बल्कि कोई अनुभवी और खुशमिज़ाज दोस्त बातें कर रहा हो, ऐसा लग रहा था. उन्होने फिल्मों की, त्योहारों की, किताबों की – कितनी ही औपचार्रिक बातें की – डायस से हट कर, टहलते हुए.

अधिकांश लोगों को उनका अंदाज अटपटा लग रहा था, कुढ़ भी रहे थे और इस अंदाज को हल्कापन मान रहे थे. आखिर रहा नही गया, एक प्रतिभागी ने ( वही यक्ष प्रश्‍न ) पूछ ही लिया, “ सर, आप बैंक मे इतने उच्च पद पर और इतने तनाव के बावजूद इतना खुश कैसे रह लेते हैं ? “ उन्होने एक ठहाका लगाया और बोले, “ क्यों ! क्या मेरा पद और काम मुझे ठीक से बोलने की मनाही करता है ?  काम का बोझ व तनाव होने के बाद भी जब मै खाता हूँ, नहाता - धोता हूँ, बीमार पड़ने या ज़रूरी कामों पर छुट्टी लेता हूँ, LFC पर या वैसे ही घूमने जाता हूँ तो क्या शाम को फिल्म देखने, बाज़ार घूमने, गाना सुनने, किताब पढ़ने और उस पर बात करने से क्या बैंक मना करता है ? ये तो हम ही हैं जो सोच लेते हैं कि नही, अब ये सब नही करना और करना भी तो गिल्टी फील करना और किसी से कहना तो कतई नही. और भी बहुत कुछ कहा.

वे बहुत कह चुके, आप वहां थे नही इसलिये मने यह वाकया बयान किया. मै अपनी तरफ से कुछ नही कहूँगा – आपको कुछ समझना हो तो समझें, नही तो मुह बिचका कर ‘हुंह’ कर दें.

राज नारायण

मुझे तो तेरी लत लग गयी, लग गयी… !


मुझे तो तेरी लत लग गयी, लग गयी… ! 

कुछ दिनों पहले मेरे एक साथी सेवानिवृत हुए. इस उपलक्ष्य मे एक पार्टी रखी गयी. हमारे प्रशासनिक कार्यालय , लखनऊ मे सेवानिवृत्ति पर एक पार्टी रखी जाती है जिसमे सेवा से विदा हो रहे साथी को बैंक की ओर से भेंट, यूनियन की ओर से भेंट, अन्य उपहार, माल्यार्पण, जलपान आदि होता है, अध्यक्षता उप महाप्रबन्धक महोदय करते हैं. प्रशासनिक कार्यालय मे लोग अधिक हैं अतः हर महीने के अन्तिम ऐसी पार्टी होती ही है, कभी – कभी तो एक साथ कई लोगों की विदाई पार्टी होती है.

इन पार्टियों मे कुछ साथी, लगभग सभी उच्चाधिकारी और समापन पर सेवानिवृत अधिकारी भी अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करते हैं. इन भाषणों मे एक बात ज़रूर होती है कि ये अधिकारी हमेशा देर तक कार्य करते थे / आठ - नौ बजे से पहले तो कभी गये ही नही / एक वक्ता ने बताया कि एक बार सवा आठ बजे वे घर जाने को हुए तो इनसे भी घर चलने को कहा तो वे बोले कि आप चलें, मै तो अभी एक घण्टा और बैठूंगा. उनके सुबह जल्दी आने का भी ज़िक्र होता है कि लोग मज़ाक मे कहते थे, “ अरे ! कल घर नही गये क्या ? “ ऐसा इसलिये कि घर जाते समय वे बैठे मिलते थे और सुबह भी. यह भी कहा जाता है कि जब भी मै (वक्ता) इनके डिपार्टमेण्ट गया, इन्हे काम मे लगा ही पाया. ये सब बातें बड़े गर्व से कही जाती थीं और समापन भाषण मे सेवानिवृत साथी भी बड़े गर्व से इसकी पुष्टि करते हैं.

मुझे एक बात हमेशा सालती है कि यह प्रवृत्ति गर्व की है या शर्म की. मै तो इसे गर्व की नही शर्म की बात मानता हूँ कि आप घर – परिवार, यार- दोस्त, अपने शौक़, स्वास्थ्य, मनोरंजन, पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्ध आदि सबकी बलि देकर यह कर रहे हैं. बैंक से बाहर कैसा मौसम है, कैसी रंगीनी है या बाहर क्या हो गया – इनसे कोई मतलब नही. ऑफिस से ठीक बाहर की घटना की जानकारी भी इन्हे अख़बार से व साथियों की बातचीत से मिलती है. अखबार मे भी ये मुखपृष्ठ की सुर्खियां ही देख पाते हैं क्योंकि टाईम ही नही मिलता. शाम या धुंधलका ( गोधूलि बेला तो शहरों मे होती नही ) तो इन्होने अर्से से देखा ही नही. कृश्न चन्दर की मशहूर “ गधा त्रयी “ ( ‘एक गधे की आत्मकथा’, ‘एक गधे की वापसी’ और ‘एक गधा नेफा मे’ ) के प्रथम उपन्यास, “एक गधे की आत्मकथा”, मे ज़िक्र है जब रामू धोबी यमुना मे घुटनों तक पानी मे खड़ा होकर कपड़े धो रहा होता है तब सूरज डूबने को हो रहा होता है. गधा यमुना मे डूबते सूरज के अप्रतिम सौन्दर्य को देख कर मुग्ध होता है किन्तु रामू बेचारा उस उस सौन्दर्य से विमुख कपड़े ही कूट रहा होता है. उसे मालूम ही नही होता कि उसके आस-पास सौन्दर्य का कितना भण्डार बिखरा है जो मुफ्त मे ही उपलब्ध है. हमारे ये ‘कर्मवीर’ बेचारे उसी रामू की तरह हैं जो गधे से बदतर है.

मै या मेरी तरह सोचने वाला कोई भी कामचोरी को प्रोत्साहित नही कर रहा. यदि आप दिन मे योजनाबद्ध ढंग से, प्राथमिकताएं तय करके कार्य करें तो देर तक बैठने की कोई ज़रूरत नही. देर तक बैठने का यह कतई अर्थ नही कि आप बहुत अधिक कार्य कर रहे हैं बल्कि यह भी है कि आप कार्य को नियत कार्यकाल मे निपटाने के योग्य नही हैं. ऑडिट, लेखाबन्दी या कोई निर्धारित लक्ष्य जिसमे समय सीमा दी हो तो देर तक बैठना आपकी प्रतिबद्धता दर्शाता है किन्तु काम काज के सामान्य दिनों मे अक्षमता. यदि देर तक बैठने पर उस दिन या अगले दिन का सारा काम खत्म हो जाये तब तक ठीक है किन्तु इनका भी उतना ही बचा होता है जितना समय से जाने वाले का.

दरअसल ऐसे लोग अपनी संस्था या कार्य के लिये कार्य नही करते बल्कि अपनी आदत, जो कुछ दिन बाद लत बन चुकी होती है, से मजबूर होकर करते हैं. घर व घर के कामों, पत्नी और बच्चों से जी चुराते, ऑफिस और घर के बीच रेखा खींच कर सन्तुलन बैठाने वालों से ईर्ष्या (क्योंकि वे उनकी तरह सामंजस्य मे समर्थ नही होते ) करते हुए उन्हे हीन समझते हुए कब वे लत के शिकार हो जाते हैं, पता ही नही चलता. तमाम ट्रेनिंग और कार्यशालाओं मे यह सब बताया जाता है किन्तु ये स्वयं ही अपना इतना अनुकूलन ( Conditioning / Brainwash ) कर लेते हैं कि उन्हे और कुछ दिखाई ही नही देता.

विदाई पार्टी मे अन्तिम बार अपने कसीदे सुनने के बाद जब वे घर जाते हैं तो उन्हे समझ नही आता कि करें क्या ? पत्नी बच्चे इन्हे घास नही डालते. जब उन्हे इनकी ज़रूरत थी तब उन्होने उनकी उपेक्षा की. अब वे उनके बगैर काम चलाना सीख चुके होते हैं. दोस्त व रिश्तेदार भी अपने व्यवहार से प्रकट कर ही देते हैं कि पहले तो कभी हमे समय दिया नही, अब अपना समय काटने आये हो. उसी ऑफिस मे जायें तो कुछ ही देर बाद वे “गुजरा गवाह व लौटे बराती” से भी गया बीता हो जाते हैं.तब वे ज़माने को दोष देते हैं. मित्रों, इस दयनीय स्थिति के लिये आपकी संस्था या ज़माना नही आप स्वयं दोषी हैं. कोई भी यह नही कहता कि आप कार्य के पीछे इन सबको छोड़ दें किन्तु आपको तो सबसे जी चुराने व कार्य की लत लग चुकी होती है और लत चाहे अच्छी हो या बुरी – इसके दूरगामी परिणाम हमेशा ही बुरे होते हैं.  

राज नारायण‌

Saturday, 8 June 2013

बिरयानी वाले बाबा


बिरयानी वाले बाबा

आज सुबह -सुबह ऐसा लगा कि कोई हौले से हिला कर जगा रहा है. कच्ची नींद से जगाये जाने पर घबराहट और हड़बड़ाहट हुई कि इतनी सुबह कौन और क्यों जगा रहा है मगर उनींदा सा जगा भी. सोवानीधीं मे देखा तो पलंग की दाहिनी साईड पर कोई सफेद चोगा सा पहने खड़ा था, अब तो झुंझलाहट डर मे बदल गई, गला खुश्क हो गया, चिल्लाना चाहा तो आवाज़ ही नही निकली. बुरी तरह डर गया क्योंकि बगल मे श्रीमती जी भी नही थीं . डर मुझ पर पूरी तरह हॉवी हो चुका था क्योंकि दरवाजा तो बन्द था, यह आया कैसे और है कौन ? और श्रीमती जी कहां गयीं ? बत्ती बन्द करके सोया था किन्तु अब कमरे मे हल्का-हल्का उजाला और भीनी - भीनी खुशबू भी थी . अब तो डर और भी बढ़ गया . घबराहट बढ़ी तो पसीना भी निकलने लगा और जो पहले सोचा था कि कोई चोर होगा तो अब ख्याल चोर से हटकर भूत-प्रेत पर बल्कि जिन्न पर गया क्योंकि बचपन मे सुनी - पढ़ी कहानियों और चैनलों के तमाम भूतिया कार्यक्रमों के अनुसार रोशनी और खुश्बू जिन्नात के आने पर ही फैलती है. डर के मारे घिग्घी बंध गयी. मेरी हालत को उसने भांप लिया और गम्भीर, मन्द - मधुर किन्तु व्यंग्य मिश्रित वाणी मे बोला, " बनते तो बड़े सूरमा हो और भूत-प्रेत, जिन्नात वगैरह को मानते ही नही हो तो अब क्यों डर रहे हो ! डरो मत, मै कोई जिन्न नही, फरिश्ता हूँ. यह देखो मेरे सर के ऊपर घूमता आभामण्डल ( Aura ) और पंख " कहने के साथ ही उसने पंख फैला कर दिखाये.

जब उसने यह कहा तो मेरी जान मे जान आयी और पता नही उसके दैवीय प्रभाव मे या फरिश्ता से साक्षात होने के रोमांच मे श्रीमती जी के साथ मे होने की ओर भी ध्यान नही रहा. अब फरिश्ता आया है तो महज हाल - चाल पूछने तो आया नही होगा और वैसे भी मै कौन सा उसका खास हूँ. ज़रूर कोई इनायात करनी होगी सो पूछा, " किबला, कैसे आये ?" वह शायद चुहुल के मूड मे था, बोला, " नीचे तक तो रेगुलर शटल सर्विस से आया. जन्नत से हर आधे घण्टे पर तुम लोगों को दिखाई पड़ने वाली UFO चलती हैं. जहां लैण्ड किया वहां से तुम्हारे घर तक उड़ कर और फिर सीढ़ी चढ़ कर. तुम तो जानते ही होगे कि कैसी भी दीवार हम लोगों को रोक नही सकती है. " अब डर खत्म हो चुका था सो झुंझलाहट से दांत पीसता हुआ बोला, " मियां, साधन नही पूछ रहा हूँ, सबब बताईये."

" तो ऐसा कहो ! वह भी बताऊंगा, पहले कहो हाल-चाल कैसे हैं, सब ठीक है ? " अब मेरी बारी थी, बोला, " कहां ठीक हैं. दो दिन से पेट खराब है, खांसी- जुकाम तो है ही ऊपर से स्पाण्डलाईटिस की वजह से कमर मे भी दर्द हो रहा है, दांत अलग दर्द कर रहा है. कुछ खाते बनता है पीते. बस किसी तरह पतली खिचड़ी खा रहा हूँ."

" हद है मियां. हाल-चाल पूछने का यह मतलब थोड़े होता है कि जवाब मे कोई 'हेल्थ बुलेटिन' जारी करने लगे. अरे यह तो रस्मी होता है. पूछने और बताने वाला- दोनो ही जानते हैं कि जवाब यही होगा कि आपकी दुआ है, अल्लाह का करम है, सब ठीक है... वगैरह, वगैरह ! कहलाते अदीब हो मगर इतना अदब नही."

"क्यों, अब लगी ! कैसे आये के जवाब मे आपने जो कहा वो ठीक और मै जो बताऊं वो बेअदबी !"

"अच्छा, छोड़ो यह सब. ऊपर से हुक्म हुआ है कि तुम्हे एक नायाब चीज दी जाये जो सबके भला करने मे इस्तेमाल हो."

उसकी बात पूरी होने से पहले ही मै बोल पड़ा, " मुझ पर ही यह करम क्यों ? "

" तुम्हारी यह आदत ठीक नही. सवाल बहुत करते हो. कौन सा मुझे या ऊपर वालों को वोट लेने हैं जो कम्बल, लैपटाप, मुआवजा, ओहदा बाटूं छुट्टी घोषित करता फिरूं. अब शांत रहते हो कि ऊपर यह रिपोर्ट दूं कि वह लेना ही नही चाहता. "

" नही, नही. वो तो यूं ही आपके रंग मे रंग कर बोल गया. अब कहें. "  अब दोनो ही गम्भीर होकर गरीब और गरीबनवाज़ की भूमिका मे चुके थे. उसने मालूम कहां से चांदी की एक छोटी डिबिया बरामद की, उसे खोला. अन्दर हरे रंग का सनील का अस्तर लगा था उसमे गुलाबी रंग के पतंगी कागज मे कोई छोटी सी चीज थी, उसे भी खोला तो उम्दा किस्म के चावल का एक दाना निकला, बोला, " यह गैबी चावल है. इसकी खासियत यह है कि नहा धोकर, मन पाक-साफ रखकर किसी खाली देग मे यह डिबिया खोल कर धूनी दिखाने जैसा फिराकर डिबिया बन्द करके वापस अपने पास हिफाजत से रख लेना और देग का मुह उस पर तश्तरी ढक कर गीले मैदा से बन्द कर देना. खबरदार, यह सब बिल्कुल अकेले मे हो, किसी के भी , यहां तक कि तुम्हारी बीवी के भी , देखना तो दूर कान मे भनक तक पड़े कि क्या हो रहा है नही तो सब गैबियत जाती रहेगी. देग मे ही यह करना है, कुकर, भगौना या किसी और बरतन मे नही. आधा घण्टा बाद जब देग खोलोगे तो उम्दा बिरयानी से भरी होगी. ईंधन, मसाला, गोश्त या सब्जियां वगैरह की फिक़्र मत करना , सब उसी गैबी करम से होगा जैसा चावल मे प्रोग्राम फीड है. उसी हिसाब से चिकन, मटन या वेज, जिसे कुछ लोग पुलाव मानते हैं - बिरयानी नही, तैयार मुहय्या होती रहेगी. देग मे चावल की धूनी देने के दौरान चावल उसमे या बाहर ज़मीन पर गिरने पाये और डिबिया कभी नापाक जगह पर रखना और कभी बिना गुसल किये छूना, ऐसा होने पर भी इसकी खूबी जाती रहेगी. और हाँ ! एक बात की तरफ खास तौर से आगाह किये देता हूँ, इस बिरयानी को कभी बेचा या किसी और तरीके से पैसा कमाने की कोशिश की तो इस चावल के साथ जो कुछ तुम्हारे पास भी है, वह भी जाता रहेगा. ये अमीर-गरीब, अपने या दूसरे महजब का, शाकाहारी या मांसाहारी - गरज ये कि सबके लिये है. शाकाहारी भी ले सकें इसी गरज से इसमे हफ़्ता मे तीन दिन शाकाहारी का प्रोग्राम फीड है. जो इसे तबर्रुक ( प्रसाद ) मान कर खायेगा, उसे स्वाद के साथ-साथ और भी फायदे होंगे और जो महज बिरयानी समझ कर खायेगा, उसे बस स्वाद मिलेगा और पेट भरेगा.

ऐसा बताने के बाद उसने मुझे वो डिबिया दी.मैने भी दामन मे लेकर दोनों आँखों से लगाया, आँख खोली तो फरिश्ता गायब था. अब कोई आश्‍चर्य करते हुए डिबिया को पूजा वाली जगह पर रख दिया. ये बाद मे ख़्याल आया कि अमूमन मै जांघिया - बनियान पहन कर सोता हूँ तो दामन कहां से गया जिसमे डिबिया ली, बनियान मे तो वैसा दामन होता नही. खैर , सोचना शुरू कर दिया क्योंकि यही एक काम ऐसा है जिसमे कुछ लगता नही - आपका पैसा, टैक्स. टाईम भी वैसा नही लगता. आप और काम करते हुए भी सोच सकते हैं और सोचने का समय भी दस से पाँच या आठ से आठ नही तय है. आप इस समय सीमा मे या इसके पहले / बाद भी सोच सकते हैं. सबसे पहले तो इस दिक्कत की तरफ ध्यान गया कि देग तो घर मे है ही नही. अब देग खरीदूँ तो दो - ढाई हजार से क्या कम की आयेगी, और फिर फरिश्ते ने पत्‍नी को भी बताने से मना किया है. अब घर मे देग लाऊं तो ताना सुनूं कि तमाम चीजें कहती रहती हूँ वो तो लाते नही, ये देग क्यों उठा लाये, इसका होगा क्या ? मान लो रात - बिरात या उनके मायके वगैरह जाने पर लाऊं भी तो पड़ोसिने बता देंगी कि आंटी / भाभी जी, आज अंकल / भाई साहब देग लाये थे, उसका क्या करेंगी. इसके अलावा वह एकांत कहां नसीब होगा जिसमे बिरयानी प्रक्रिया सम्पन्न होगी. यह किस झंझट मे डाल दिया इस फरिश्ते के बच्चे ने ! और किसकी प्रेरणा से इसने मुझे इस इनायत के लिये चुना ?... आदि, इत्यादि तमाम सवालात और दिक्कतों के बावजूद मै उस गैबी चावल से नाता रखना चाह रहा था क्योंकि उसकी कमाई करने की चेतावनी के बाद भी इसमे कमाई और शोहरत के बहुत रास्ते नज़र रहे थे. सोचा कि घर पर कुछ दिन बहाना करूं कि ऑफिस मे बहुत काम है अतः कुछ दिन देर से आना होगा और ऑफिस मे कि कुछ घरेलू काम हैं तो कुछ दिन ज़ल्दी जाऊंगा. ऑफिस और घर के बीच एक बड़ी सी खाली जगह पड़ती है जिस पर करील का जंगल सा है, वह सेना की ज़मीन है सो उस पर कोई अतिक्रमण भी नही है. वही झाड़ियों के बीच एक मज़ार और कोठरी सी भी है, वहीं यह सब करने का सोचा. चूंकि मामला गैबी था तो धज भी वैसी ही धारने की सोची. पहली ज़रूरत दाढ़ी की थी और दाढ़ी सफेद हो तो और भी अच्छा. मेरी दाढ़ी सफेद है भी तो ख़िजाब की जगह व्हाइटनर लगाने का भी झंझट नही. पहले सोचा "बकर दाढ़ी" ( इसे अधिकांश लोग 'फ्रेंच कट' कहते हैं ) रख लूं मगर तुरन्त ही इसे खारिज कर दिया. सफेद बकर दाढ़ी मे आदमी खामख़्वाह अपने को अमिताभ बच्चन, विजय माल्या, मुजफ्फर अली, अज्ञेय जैसे लुक का समझने लगता है और इस तरह की दाढ़ी मे पीर-फकीर- औलिया जैसा लुक नही आता तो पूरी दाढ़ी रखने का तय हुआ. दाढ़ी के बाद कपड़ों का सोचा. इस स्वांग मे तो चोगा ही फबता है. चोगा का रंग कौन सा हो -- सोचा कि बिरयानी सभी जाति- धर्म वालों के लिये है तो चोगा भी बहुरंगी हो. अब अनेक रंगों का तो क्या बनवाता, हिन्दुओं को प्रिय भगवा, मुसलमानों का हरा और सूफी भी इधर पॉपुलर हो रहा है तो सफेद - इन तीन रंगों का सोचा मगर फिर याद आया कि यह तो अपने राष्‍ट्रीय ध्वज के रंग हैं. इन्हे पहनने पर कोई कोई राष्‍ट्र ध्वज के अपमान की याचिका दायर कर देगा तो फसन्त होगी तो रंग सलेटी ठहरा - किसी धर्म का नही और मैला भी ज़ल्दी होगा.

बिरयानी तो जब बनती तब बनती मगर सब तय हो जाने के बाद ख़्याली पुलाव पकने लगे. आँखें बन्द करके बैठा तो तन्द्रा सी आने लगी. जागता हुआ सा, कुछ ख़्वाब सा देखा. उस मज़ार से सटे एक तख़्त पर मै तयशुदा धज मे आँखे बन्द किये ( मगर कनखियों से सब देखता हुआ ) ध्यानमग्न सा बैठा हूँ. नौकरी से कब का एक्जिट ले लिया है, अब तो जनकल्याण ही मेरा और पूरे कुनबे का ध्येय है. अब मै "बिरयानी वाले बाबा " के नाम से मशहूर हूँ. "बिरयानी वाले बाबा " की वेबसाईट भी है. आस- पास के जिलों से भी लोग आते हैं. अभी कल ही मुलायम सिंह, अखिलेश यादव और आजम खां भी आये थे. जायरीनों की भीड़ जमा है जिन्हे खिदमतगार बिरयानी दे रहे हैं. जगह गुलजार हो गयी है. झाड़ियां साफ करके कार / मोटरसाईकिल स्टैंड बना दिया है जिस पर रात के आठ बजे भी सौ के आस पास गाड़ियां होंगी. लोग अपनी श्रद्धा से ही चढ़ावा चढ़ा रहे हैं जिन्हे मै छूता भी नही हूँ. खिदमतगार उसे गिन कर एक रजिस्टर मे चढ़ाते हैं और हर दिन सुबह साढ़े दस बजे उसे बैंक मे "बिरयानी वाले बाबा ट्रस्ट" के नाम से खुले खाता मे जमा कर देते हैं जिसका संरक्षक मै, अध्यक्ष मेरी पत्‍नी, सचिव मेरा साला और कोषाध्यक्ष भतीजा है.

खिदमतगारों मे से कुछ लोग चढ़ावा की रकम मे हेरा- फेरी करने लगे हैं कुछ तो जायरीनों को पटा कर लाते हैं कि बाबा के हाथ से बिरयानी दिलवा देंगे, इसके लिये वे अच्छी खासी रकम लेते हैं जिसका रजिस्टर मे कोई इन्दराज नही होता. बिरयानी वही है मगर लोग समझते हैं कि मेरे हाथ से मिलेगी तो फायदा अधिक और शर्तिया होगा. मै भी उनका दिल नही तोड़ता. आज तो हद ही हो गयी. ये खिदमतगार पैसे से मजबूत किसी बेवा और उसकी जवान लड़की को पटा कर लाये जो बेचारी बीमार थी और इसी से उसकी शादी नही हो रही थी. इन लोगों ने उसे बहकाया जब सब चले जायेंगे तो रात के एक बजे बाबा एकांत मे खास उपाय करेंगे. उनका इरादा ग़लत ही था मगर अंधश्रद्धा मे डूबी वे दोनो उनके कुत्सित इरादे भांप नही पा रही थीं. मै पैसा - कौड़ी से भले ही भ्रष्ट हो चुका था मगर इस हद तक नही गिरा था और ही यह सब अपनी आँखों के सामने और अपने तकिया पर नही होने दे सकता था. मैने तख़्त पर रखी अपनी छड़ी ( जिसे मुकद्दस का दर्जा मिल चुका था ) उठायी और उस कमीने को पीटने के साथ चिल्लाया, " मरदूद, यह सब यहां नही चलेगा. "

मेरी आवाज़ से मेरी पत्‍नी की नींद खुली, उसने पहले तो मोबाईल मे टाईम देखा तो और झुंझलाहट हुई कि अभी तो 3:56 ही हुआ था, बोली , "क्या हुआ, क्या नही चलेगा ?" अब मै क्या बताता !

राज नारायण