अभी पिछले महीने, मगर सिर्फ चार दिन पहले, 29 जुलाई को अंर्तराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ में पारम्परिक शैली में ‘अमर सिंह राठौर’ नौटंकी की प्रस्तुति की तो बरबस ही लखनऊ/ कानपुर की नौटंकियां याद आयीं और याद आयीं नौटंकी की मलिका, पद्मश्री गुलाब बाई. यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है तो नीलाक्षी लोक कला कल्याण समिति द्वारा प्रस्तुत यह नौटंकी उन्हें श्रद्धांजलि भी रही.
गुलाब बाई ने नौटंकी की दिशा और दशा बदल दी. पहले, पहले
क्या, नौटंकी की दुनिया में उनके प्रवेश के बहुत बाद तक थिएटर और
नौटंकी में लड़कियों का प्रवेश वर्जित था. यह उनके लिए सुरक्षित
क्षेत्र न था और सुरक्षा के अलावा सामाजिक रूप से इन खेल-तमाशों
को लड़कियों के लिए अपमानजनक माना जाता था. भले
घर की औरतें यह सब नहीं करतीं,
फ़िल्मों में भी उनके काम को हेय, तिरस्कृत
माना जाता था.
नौटंकी आदि में महिलाओं की भूमिका पुरुष ही निभाते थे. सारे
देश की यही सोच और चलन था.
कमसिन लड़के व युवक तो नाच वाली व स्त्री पात्रों की भूमिका
करते ही थे, बड़ी उमर होने तक भी पुरुष ही स्त्रियों की भूमिका निभाते
रहे, खासे लोकप्रिय भी रहे. महाराष्ट्र
मे बाल गंधर्व ने थियेटर की दुनिया में अपने गायन और स्त्री पात्र की भूमिका में लंम्बे
समय तक राज किया. महाराष्ट्र के लोक नाट्य ‘तमाशा’ व
लावणी में भी अनेक
जगह पुरुष ही थे. ऐसे में मात्र 12
वर्ष की वय में गुलाब बाई का प्रवेश एक युगांतरकारी घटना
थी. महज तेल-साबुन के खर्चे पर उस्ताद तिरमोहन की कम्पनी से शुरुआत करके
वे इतना छा गयीं कि उन्होंने
‘द ग्रेट गुलाब थिएटर कम्पनी’ की
स्थापना की. उनका जन्म 1926 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ.
नौटंकी में उनके आने के बाद,
अनेक संघर्षों के बाद उन्होंने अपना प्रतिष्ठित स्थान बनाया, नौटंकी
को फूहड़ / भदेस मनोरंजन से निकाल कर कला के रूप में मान्यता दिलाई. उतर
प्रदेश सरकार ने 1988 में उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी
पुरस्कार’ से सम्मानित किया और भारत सरकार ने 1990
में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. 13 मई, 1996 को उनका निधन हुआ.
यह सब गाथा आप दीप्ति प्रिया महरोत्रा की किताब ‘ नौटंकी
की मलिका गुलाब बाई’ में पढ़ सकते हैं. जब
उनकी याद आयी तो कथाकार शिवमूर्ति का गाँव और लोक पर वृहद आख्यान, उपन्यास ‘अगम
बहै दरियाव’ भी याद आया जिसके एक अध्याय में उनके निधन का समाचार सुनकर
एक पात्र की मनोदशा के ज़रिए उन्हें याद किया है. देखें
वह अंश.
‘ मोरी बारी उमर मोहे लागेद शरम
मोहे मारो न तिरछी नजरिया बलम
सबेरे
– सबेरे बाबा दूध लेने गुरु टी स्टाल
पर गए थे. दूध लेने के साथ टहलना भी हो जाता है और एक नज़र अख़बार पर
भी डाल लेते हैं.
अख़बार उठाते ही नज़र पड़ी – नौटंकी
की मलिका गुलाब बाई का निधन.
माठा बाबा के कलेजे से हाय निकल गई. लिखा
है कि की महीनों से बीमार चल रही थीं. उन्हें पछतावा होने
लगा. कानपुर है ही कितनी दूर ! कभी
भी जाकर भेंट कर आते. गुलाब बाई अपने समय में पूरे हिन्दीभाषी समाज के दिल पर राज
करने वाली कलाकार थीं. यही होता है. जब तक आदमी जीवित रहता
है, हम सोचते हैं कि कभी भी चल कर मिल आएँगे. लेकिन
वह ‘कभी भी’
आता नहीं और जाने वाला चला जाता है तो पछतावे के सिवा कुछ
हाथ नहीं आता.
बाबा दुखी मन से लौट आए और पत्नी को बता दिया कि आज वे उपवास
करेंगे.
अख़्तरी बाई और गुलाब बाई को सुनने के लिए ही धन्नू बाबा ने
सन 1950 में
रेकॉर्ड प्लेयर खरीदा था.
सन 1970 में
जब पाँडे ने नौटंकी कम्पनी खोली तो उसका उद्घाटन गुलाब बाई से कराना चाहते थे. तब
अनारा की अम्मा की सिफारिशी चिट्ठी लेकर माठा बाबा ही पाँडे बाबा को गुलाब बाई से मिलवाने
कानपुर गए थे.
बेटा हमेशा के लिए जाकर ससुराल में बस गया तो उनका मन वीतरागी
हो गया. तब उन्होंने रेकॉर्ड और रेकॉर्ड प्लेयर गट्ठर में बाँध कर
टाँड़ पर चढ़ा दिया था.
दूध लेकर लौटे तो आज कई साल बाद धोती घुटने तक चढ़ा कर, सीढ़ी
लगा कर टाँड़ पर रखे रेकॉर्ड प्लेयर का गट्ठर
नीचे उतारा. उस पर पड़ी धूल और जाले साफ किए. जाँचने
पर चार-पाँच गाने इस हालत में मिले जिन्हें रेकॉर्ड प्लेयर पर सुना
जा सकता था –
नदी नारे न जाओ … मोहे
मारो न तिरछी नज़रिया
… नज़रिया तोसे लागी …
अकेली डर लागे …और
बनारस राजा जइहो.
सब ग़म की दुनिया में डूब गए.
पाँडे बाबा बता रहे थे कि सबसे पहले, जब
वे दर्जा तीन में पढ़ते थे माठा बाबा के साथ ही सुल्तानपुर के चौक बाज़ार में गुलाब बाई
की नौटंकी ‘शाही लकड़हारा’ देखने गए थे और लौट
कर पिता जी की मार खाए थे.
”यह सन 1954-55 की बात होगी. नौटंकी
के प्रति आकर्षण मेरे मन में उसी समय पैदा हुआ था. जिसने
भारी विरोध के बावजूद मुझसे नौटंकी कम्पनी खुलवाई.”
*****
गुलाब बाई व उनके जैसे अन्य कलाकारों
के बावजूद नौटंकी ‘सभ्य’
समाज में तिरस्कार का पात्र होती गयी. भले
ही नौटंकी शहरों में भी होती थी,
वे
‘सभ्य’ लोग
भी देखते थे, रस लेते थे. भले ही वे नौटंकी मञ्च
के सामने कुर्सी या दरी पर बैठ कर न देखते हों, अपने
छज्जे से देखते हों, मगर चाहे-अनचाहे देखते थे. नौटंकी
कलाकारों की आवाज़, नगड़िया की आवाज़ बिना माईक के ही इतनी तेज़ होती थी कि पचास
घरों के बाद भी सुनाई पड़ती थी,
उस पर माईक और लाऊडस्पीकर लग जाते थे तो दरवाज़े बन्द कर लेने, कमरे
के अन्दर बैठे या बिस्तर पर लेटने के बावजूद नौटंकी बरबस अपने को सुनवा लेती थी.
फिर
नौटंकी हेय दृष्टि से क्यों देखी जाने लगी, क्यों
इसे भले घर के बच्चों, युवकों और लड़कियों को देखना वर्जित किया गया, क्यों
चोरी-छुपे नौटंकी देखकर लौटने पर मार पड़ती थी ? कारण
था इसमें बढ़ती अश्लीलता,
फूहड़ कॉमेडी, दुअर्थी संवाद और उत्तेजक
नाच ! नौटंकी लोक नाट्य है और मनोरंजन वाला लोक साहित्य प्रायः भदेस होता है. सामान्य
बोलचाल में भी कुछ भदेस व अश्लील शब्द, यौन क्रियाओं को व्यक्त
करने वाले शब्द आदि मुहावरों व तकिया कलाम के रूप में प्रचलन में थे ( अब
भी और शहरों में भी बहुत
‘सभ्य’ लोगों
में भी प्रचलित हैं, बिना ग़ाली के वे बात नहीं करते और मज़े की बात ये कि उसे ग़ाली
नहीं मानते. टोको तो,
‘कौन भो … का
गाली देता है / हम तो ऐसे ही बात करते हैं.’ ).
नौटंकी पर ही रहते हैं
! तो भले ही भदेस व ग़ाली आदि व्यवहार
में रहे किन्तु भरी भीड़ में
, खुले मञ्च से ! तोबा, तोबा ! अब
नौटंकी में इनका कारण क्या था?
तब नौटंकी रात भर चलती थी. अब
कथानक तो मुश्किल से दो घण्टे का होता है तो रात भर कैसे खींचे ? पूरा
कथानक अनवरत पेश कर दें तो भला उसके बाद सुबह तक कौन बैठेगा ? तब
यातायात के इतने साधन न थे.
शहर तक में देर रात कोई साधन न मिलता था, राहजनी
का खतरा अलग ! तो देर रात दर्शक कैसे जाएंगे ! तो
खींचो इसे भोर पहर तक !
अब खींचते कैसे ? तो दुअर्थी/ भदेस/ अश्लील शब्दों से सने संवाद के साथ कॉमेडी, उसमें भी नट-नटी का होना ! औरत ऐसी बार मर्द से/ मर्द औरत से करे तो लोगों को बहुत मज़ा आता है, सभ्य / पारसा लोगों को भी. लोलुपता मौखिक ही छलकने लगती है. फिर एक सीन मुख्य कथा की नौटंकी का … फिर एक तड़कता-फड़कता सा नाच दिलकश, उत्तेजक व कामुक अदाओं, इशारों, लटके-झटके के साथ – भले ही लड़की नहीं, कमसिन लौण्डा हो और दर्शक यह जानते भी हों , तब भी ! अब शास्त्रीय या शालीन नृत्य हो तो कितने रुकेंगे. सब तो कलावन्त / गुणपारखी/गुणग्राहक होते नहीं. अगर हीरामन ‘पान खायें सैंया हमारो … ‘ के बजाय कोई शास्त्रीय नृत्य पेश करती तो हीरामन और उसके जैसी तीन चौथाई से अधिक भीड़ रुकती क्या ? इनका दर्शक/ श्रोतावृन्द तो किसान, मज़दूर, पल्लेदार, मेहनतकश … होता है. तो जो उनको रुचे, वही चीज़ तो पेश करनी होगी ना !
नाच तक ही नहीं, नाच
के बीच ईनाम और नाच वाली का
‘वो शुक्रिया अदा करना’ … उफ़्फ़, कयामत, मार
डाला. पैर की धमक के साथ रुक –रुक
कर ढोलक की थाप के सात,
‘फलाने ने … रुपया
ईनाम दिया है, मैं
… फलाने … का … शुक्रिया
… अदा … करती
हूँ.’ और ढोलक की थाप के साथ ‘झांपब
कुच, झलकाइब आधू’ वाली स्थिति में झुकना, पैर
पटकना … ! मार ही डालता. अब लल्लू पाँच रुपया
दें तो जगधर उनसे कम हैं क्या
! वे दस देते ! लाऊडस्पीकर
पर अपना नाम रकम के साथ सुनना
! बार-बार
होता, रुपये खतम होने तक होता ! गाने
भी कैसे – कैसे,
‘राजा मोरे जोबना का देखो उभार’ श्रेणी
के ! अब
‘राजा’ की
क्या मज़ाल कि न देखें. तो ऐसे खिंचता दो घण्टे का खेल सुबह सूरज निकलने तक.
इन्हीं सब से नौटंकी बदनाम होती गयी. शहर
का सभ्य और अभिजात्य वर्ग इसके नाम से बिदकने लगा. अब
इसे कैसे प्रतिष्ठित स्थान दिलाया जाय ! कैसे स्तरीय मञ्च पर
सुरुचिसम्पन्न दर्शक वर्ग के बीच लाया जाय ! कैसे
नेता-अफ़सर दीप प्रज्ज्वलित करके उद्घाटन करें, पुरानी
लोक शैली बचे. एक ही रास्ता था - पुराना
गायन, अभिनय हो पर फूहड़ता/ अश्लीलता/भदेसपन
न हो, बीच में
‘शुक्रिया अदा’ करने
वाले ईनाम-इकराम न हो ! जब यह न हो तो नौटंकी साफसुथरी और डेढ़-दो
घण्टे में सम्पन्न हो.
ऐसा ही हुआ. इसे सम्भव किया गुलाब बाई की कम्पनी ने और ‘आला अफ़सर’ जैसी, आतमजीत सिंह और उर्मिल थपलियाल जैसों की नौटंकी ने.
मैंने
गुलाबबाई को, उनके प्रदर्शन को नहीं देखा – इसका
मुख्य कारण यह था कि एक तो जब वे नौटंकी में (1938 में ) आयीं,
तब मेरा जन्म ही न हुआ था और जब उनके प्रदर्शन को देखने वाला
हुआ तो इस मामले में ‘तब अति रहेऊँ अचेत’. हाँ
बाद में उनकी बेटी, मधु रानी की ‘दही वाली’ देखी. अब
इसी ढब पर नौटंकी प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त कर रही है, अभिजात्य
वर्ग के बीच स्तरीय मञ्चों पर खेली जाती है, ‘संगीत
नाटक अकादमी’ व
‘पद्मश्री’ जैसे
सम्मान दिए गए और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ग्राण्ट
देती है जिससे हमनें यह नौटंकी की,
और भी कई लोग करते हैं. इसे
इस मुकाम तक लाने में गुलाब बाई का महती योगदान है. उनके
जन्मशताब्दी वर्ष में उन्हें प्रणाम.
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पुस्तक परिचयः
पुस्तक – ‘नौटंकी
की मलिका गुलाब बाई’
लेखक – दीप्ति
प्रिया महरोत्रा
विधा – जीवनी
प्रकाशक – पेंगुइन
पृष्ठ संख्या –268, दाम 199/- ( अब बढ़ गया हो सकता है, मैंने 2010 में ली )
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पुस्तक – ‘अगम
बहै दरियाव’
लेखक – शिवमूर्ति
विधा – उपन्यास
प्रकाशक – राजकमल,
पृष्ठ संख्या – 588, दाम 599/- ( अब बढ़ गया हो सकता है, मैंने 2024
में ली )
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