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Saturday, 25 July 2026

लक्ष्मण शक्ति प्रसङ्ग व राम का विलाप


 लक्ष्मण शक्ति प्रसङ्ग व राम का विलाप

         आज बहुत दिनों बाद पण्डित जी मन्दिर पर आए. कौन पण्डित जी ! भई ! अब कई माह से आए नहीं तो उनको भुला ही बैठे ! अरे वही, जो अक्सर शाम के समय मन्दिर पर आते हैं, कुछ गुनगुनाते हुए, साथ मे झोला जिसमें कुछ पोथी-पत्रा होता है, श्रोतागण जुट जाते हैं तो प्रायः राम कथा से कोई प्रसङ्ग उठाते हैं या श्रोतओं में से कोई किसी धार्मिक / पौराणिक प्रसङ्ग पर प्रश्न उठाता है तो शङ्का समाधान करते हैं. कुछ  भजन कीर्तन आदि भी होता है. वही पण्डित जी मन्दिर पर आए. आए तो कुछ गुनगुनाते हुए और बैठ कर, झोला-वोला रख कर आसन सा जमाया और उच्च स्वर में गान करने लगे _

 

हा  गुन  खनि  जानकी  सीता ।  रूप   सील   ब्रत    नेम  पुनीता ॥             

 लछिमन   समुझाए  बहु  भाँती ।  पूछत   चले    लता    तरु    पाँती ॥

हे  खग  मृग  हे  मधुकर  श्रेनी ।  तुम्ह    देखी    सीता     मृगनैनी ॥

खंजन सुक कपोल मृग मीना । मधुप   निकर   कोकिला  प्रबीना ॥

कुंद  कली   दाड़िम  दामिनी । कमल    सरद  ससि   अहिभामिनी ॥

बरुन  पास   मनोज  धनु  हंसा । गज  केहरि  निज सुनत प्रसंसा ॥

श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक  सकुच  मन माहीं ॥

सुनु  जानकी  तोहि  बिनु आजू । हरषे  सकल  पाइ  जनु  राजू ॥

किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥

 

एक तो स्वर उच्च, उसपे  सुमधुर कण्ठ, स्पष्ट उच्चारण, दूजे जाने-पहचाने हुए, सो सुनकर लोग जुटने लगे. जुटान का मतलब यह नहीं कि भारी भीड़ हो गयी, सौपचास लोग इकट्ठे हो गए. वही आठदस लोग जिनमें चार- छह और आ जुटते थे, आए. आने पर गान में व्यवधान तो पड़ा किन्तु यह खीझजनक न होकर आनन्ददायक था. राम-जोहार होने लगी.

 

राम-राम पण्डित जी ! पांय लागी पण्डित जी ! सब कुशल तो हैं, बहुत दिन बाद दिखे सो चिंता हो रही थी.’

 

ख़ुश रहो भाई ! जियत रहो बचवा ! अरे चिंता हो रही थी तो यह नहीं कि घर आकर देख जाते, खोज-ख़बर ले जाते कि कैसे हैं कि यहाँ देखने के बाद चिंता हुई. सही बात है, आँख से दूर तो मन से दूर !’

 

रामराम ! कैसी बात कर रहे हैं. ऐसा नहीं है के समवेत स्वर उठे. एक ने कहा,

 

हम गए थे आपके घर मगर आप थे नहीं. पण्डिताइन ने बताया कि गाँव गए हैं. हाल-चाल ले , कुछ नाजपानी ले और कईयौ  सादी  बियाह भी रहें  सो वही का निपटावत आवत हुइहें अगले हफ्ता मा.’

 

मान लिया भई, मान लिया कि मुहदेखी चिंता नहीं कर रहे हो. अब गाँव में तो अब भी जेठ में लगन ज़ोरदार होती है और इस बार तो जेठ भी दो पड़ गए तो खूब विवाह हुए.’

 

अरे काहे के दुई जेठ ! ई सब बांभनन के चोंचला आंय. ई बताव कि दुई जेठ हैं तो का साल मा तेरह महिना भए ?  हमका तनखा औ आपका तेरह महिना की पेंशन मिली ? का स्कूल मा फीस औ बस का चार्ज तेरह महीना का देक पड़ा ?’

 

अरे भाई ! यह सब तो पञ्चाङ्ग और काल गणना के विचार से है, उसी में इसका महत्व है, लौकिक व्यवहार जैसे वेतन, पेंशन आदि के लिए नहीं. वह सब व्यवहार तो ग्रिग्रेयिएन कलेण्डर के अनुसार ही  होता है, जनवरी से दिसम्बर या वित्तीय वर्ष अप्रैल से  मार्च तक का होता है. उसमें भी धरती के घूमने की गति के अनुसार व अन्य कारणों से समय समायोजन के लिए हर चौथे साल फरवरी 29 दिन की हो जाती है, कभी सुना होगा कि घड़ियां कुछ सेकेण्ड आगे या पीछे की गयीं, वैसा ही इस काल गणना में भी है. देखा भी होगा कि बहुत से पर्व दो दिन के पड़ जाते हैं. कुछ लोग उदया तिथि लेते हैं तो कुछ नहीं लेते. तो सबकी सन्तुष्टि के लिए शुद्धतावादी उदया तिथि, इस राशि से उस राशि में ग्रह के प्रवेश आदि के हिसाब से मनाए, जो इतना हिसाबी नहीं है वह दफ़्तर में छुट्टी के हिसाब से मनाए. कभी तिथि की  हानि भी होती है अर्थात एक ही दिन दो तिथियां होती हैं. यह सब पञ्चाङ्ग़, शुभ साईत, गणना की शुद्धता के लिए हैं काहे से कि पर्वादि, विवाह मुहूर्त आदि इसी कैलेण्डर के हिसाब से होते हैं. मूहूर्त वगैरह की गणना हिन्दी माह की तिथि के हिसाब से होती है किन्तु सबके लिए प्रचलित ग्रेग्रेयियन कलेण्डर के हिसाब से  बताया जाता है. निमन्त्रण पत्र आदि में अंग्रेजी माह के अनुसार डेट लिखी जाती है ताकि सबको सुविधा हो. ‘

 बस बस पण्डित जी ! आपकी यह आदत अच्छी नहीं लगती कि कुछ पूछो तो मार विद्वता झाड़ने लगते हैं. आधा समय तो इसी में निकल जता है.’

 शुरू तो तुम लोग ही करते हो. अब शङ्का निवारण भी तो ज़रूरी है. यह बताओ कि अब सन्तुष्ट हो दो जेठ के बारे में.’

हाँ पण्डित जी ! अब कौनो संका सेस ना  रही. संका करब तो फिर मार आधा घंटा निवारन करिहो.’

 तो भई जो पञ्चाङ्ग के हिसाब से हुआ करे उसमें मीन मेख न किया करो. मीन मेख भी करते हो और मानते भी हो. अब तो जेठ हुए तो बड़े मङ्गल के भण्डारे भी तो चार के बजाय आठ हुए. उसमें तो मीन मेख नहीं किया.’

 अरे बैठ ससुरे ! पहले सवाल  उठावत है फिर पण्डित जी समाधान करें तो कहत है कि टैम खोटी कर रहे. हाँ पण्डित जी ! आप क्या गा रहे थे ? शायद सीता हरण के बाद राम का उन्हें ढूँढते हुए विलाप था !’

 हाँ भई ! वही गा रहे थे. जब मारीच को मारा और उसने कपट मृग का चोला त्याग कर अपना असली रूप दिखाया तभी राम जी को शङ्का हो गयी कि कोई चाल है मुझे कुटी से दूर ले जाने की, फिर लौटते हुए जब मार्ग में लक्ष्मण जी मिले तो अनिष्ट की आशङ्का और प्रबल हुई कि यह क्यों सीता को अरक्षित छोड़ कर आये. कुटी पहुँचने पर पता चला कि सीता जी नहीं हैं. अब अपने आप तो बिना सूचना के अकेले जातीं न तो अनिष्ट की आशङ्का और बलवती हुई. सुध बुध तो खो ही गयी, प्रलाप सा करने लगे. उनकी तलाश में निकले, अब वन में कोई मनुष्य तो थे ही नहीं, वनवासी कोल-किरात आदि भी घने जंगल से दूर बस्ती बना कर रहते थे तो राह में जो पशु-पक्षी, वनस्पति मिलीं उन्हीं से पूछने लगे. इसी आकुल प्रलाप का वर्णन तुलसी जी ने अरण्यकाण्ड में किया है. आज उसी प्रसङ्ग का स्मरण हो आया सो उसी का गान करने लगा.’

 राम जी लक्ष्मण के साथ जगह-जगह सीता जी को खोज रहे हैं कि होंगी तो इसी वन में कहीं होंगी, रास्ते में मनुष्य तो कोई मिला नहीं तो जो पशु-पक्षी मिले, उन्हीं से पूछा, यहाँ तक कि लताओं पेड़ों से भी पूछा.

                  हे पक्षियों, हे हिरन, हे भौंरों की पांत क्या तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है ? हे खञ्जन, तोतों, कबूतरों, हिरनों, मछलियों, भौंरों, गान में प्रवीण कोयल, कुंद कलियों, अनार, बिजली, कमल, शरद के चाँद, नागिन, वरुण के पाश,कामदेव के धनुष, हंस, हाथियों, सिंह … ‘ख़ुश तो बहुत होगे आज तुम लोग !’ अब तो तुम सब अपनी खूब प्रशंसा सुन रहे होगे !

                    बेल, स्वर्ण, केला ! अब तो तुम लोगों के मन में तनिक भी शङ्का व संकोच न होगा ! हर्षित तो ऐसे हो मानो सारे संसार का राज-पाट मिल गया हो ! हे जानकी ! तुम्हारे बिना ये सब अभिमान में  फूल उठे हैं. प्रिया ! तुमसे यह स्पर्धा कैसे सहन की जा रही है ! तुम शीघ्र प्रकट क्यों नहीं होतीं !

                          इस प्रकार विरह में ऐसे आकुल होकर प्रलाप करते फिर रहे थे जैसे अति कामातुर हों. ‘

 ऐं पण्डित जी ! यह क्या ! यह सब खग, मृग, भौंरे वगैरह सीता जी के हरण पर ख़ुश क्यों हो रहे थे ? और बेला, स्वर्ण और केला आदि क्यों अभिमान में फूल उठे ? यह कुछ समझ में नहीं आया ! प्रभु की कैसी लीला है ?’

 प्रभु की लीला तो है ही ! तुलसी बाबा ने तो हर ऐसे प्रसङ्ग के बाद ही, जिसमें ज़रा भी आभास हो, प्रश्न उठे कि भगवान यह क्या कर रहे हैं, तुरन्त ही कोई चौपाई, दोहा अदि डाल दी है कि भ्रमित मत होना ! यह सब लीला है. प्रभु ने मनुष्य का चोला धरा है तो साधारण आदमियों जैसी बात व आचरण कर रहे हैं. आज की शब्दावली में कहो कि रोल में पूरी तरह उतर कर निभा रहे हैं अन्यथा तो वे परम ब्रह्म हैं, सब जानते हैं.

                   अब सुनो इन सबके ख़ुश होने और अभिमान करने का कारण ! यह साहित्यिक कारण है, काव्य रस और अलंकार से सम्बन्धित है.  काव्य में सुन्दर स्त्रियों/ नायिकाओं की उपमा इन सबसे दी जाती है, इनसे तुलना की जाती है और इन्हें हीन ठहराया जाता है. नायिकाओं  के अङ्गप्रत्यङ्ग की तुलना करते हुए कहते हैं ना कि नासिका तोते की चोंच के समान या उससे अच्छी है, आँखें हिरनी की आँखों से भी सुन्दर अर्थात बड़ी-बड़ी हैं. बिहारी ने भी कहा है, ‘हरिनी के नैनान ते हरि नीके ए नैन.‘ इसके गुनुगनाने के आगे भँवरे का गुनगुनाना भी फेल है या काली अलकें ऐसी हैं जैसे भ्रमर पंक्ति. मुख चन्द्र से भी अच्छा है. ग्रीवा शंख के समान है.

                       कविगण सौन्दर्य और अङ्ग-प्रत्यङ्ग वर्णन में चेहरे और गरदन तक ही सीमित नहीं रहते, और नीचे उतरते जाते हैं. उन्नत और पुष्ट वक्ष बेल के समान, शरीर की कांति तप्त स्वर्ण से भी अधिक दीप्तिमान है, सुडौल जंघाएं केले के तने के समान या उससे भी सुडौल हैंहिन्दी के रीतिकालीन कवि ही नहीं यह वर्णन और तुलना करते हैं, संस्कृत के  कवि तो उनसे भी चार बांस ऊपर हैं.

                       अब जब सीता जी वन में थीं तो ये अपमानित होते रहते थे, चिढ़े रहते थे कि सीता जी का ये-ये अङ्ग तुमसे बेहतर है, तुम तो उनके  सामने कुछ भी नहीं होवगैरह, वगैरह ! तो जब सीता जी का हरण हो गया, वे वन में नहीं रहीं तो अब किससे उनकी तुलंना होती, वे किसकी तुलना में निम्न कहे जाते ! अब वे अपना उपमान स्वयं थे, तो ख़ुश हो गए, अपमान में फूल उठे कि देखो, अब तो हम ही हम हैं, कोई नहीं है हमारे मुकाबले ! यही इन सबके हर्षित और गर्वित होने का कारण है.

                     अब इसमें तुलसी की चतुराई देखो. प्रत्यक्ष सीता सौन्दर्य का वर्णन नहीं किया, उनकें अङ्ग-उपाङ्ग की बात नहीं की और इन सबके हर्षित और अभिमान से फूल उठने की बात कहते हुए जता भी दिया कि सीता जी कितनी सुन्दर और सुडौल देहयष्टि की थीं. ऐसे किया उन्होंने मर्यादा का पालन,कुछ कहा भी नहीं और सब कुछ कह भी दिया.’

 राम-राम पण्डित जी ! सीता माता और उनके ऐसे वर्णन से मन में विकार आता. यह रसिकों वाली चर्चा छोड़ें और सीता जी को  खोजते हुए राम जी की विकलता और विलाप की कहें, बड़ा करुण प्रसङ्ग है.’

             

अब तुम लोग न पूछते तो मैं काहे बताता ! सचमुच बड़ा करुण प्रसङ्ग है. अब आगे की कथा सुनो. ‘

                     आगे की कथा कहने का उपक्रम कर ही रहे थे कि  दो लोग और आते दिखायी दिए. जाने पहचाने थे, कथा वार्ता में सक्रिय भागीदारी करते थे और शङ्कालु भी थे. कथा में अक्सर ही कोई न कोई प्रश्न उठाते थे. व्यवधान तो पड़ता किन्तु यह व्यवधान भी सबके हित का होता था.

                       उन्हें आते देख पहले से उपस्थित श्रद्धालुजन शङ्कित हुए कि लो, अब ये आ गए हैं तो कोई न कोई शङ्का उठा कर कथा रस भङ्ग ही करेंगे. लोगों की मुखमुद्रा और फुसफुसाहट से पण्डित जी ने उनके मन की बात भांप ली. लोगों की उनके प्रति दुर्भावना का निवारण करते हुए उन्हें नाम लेकर स्वागत करते हुए आमन्त्रित किया और कहा,

 कथा के बीच प्रश्न तो कई लोगों के मन में उठते हैं किन्तु कुछ संकोच में तो कुछ श्रद्धा भाव के कारण कि अब जो भी है, प्रभु की माया है. इसमें संदेह उचित नही, इसलिए वे चुप ही रहते थे. न पूछने से उनके मन की शङ्का मन में ही रह जाती. मानस की शुरुआत में ही सरोवर के रूपक से बाबा तुलसी ने ऐसों की उपमा सरोवर के पास रहने वाले दुष्ट, विषय भोगों में ही रुचि रखने वाले, कामी जन से की है जो इस सुन्दर सरोवर के बगुले, कौए हैं जो  मानस श्रवण के अधिकारी ही नहीं हैं-

 अति खल जे विषई बग कागा । एहि सर निकट न जाई अभागा ॥

 संबुक  भेक  सिवार  समाना । इहाँ  न विषय  कथा रस  नाना ॥

 तेहि कारन आवत हिय हारे । कामी   काक   बलाक   बिचारे ॥

 आवत एहिं सर अति कठिनाई । राम कृपा बिनु  आइ न जाई ॥

                                  

              तो क्यों वे प्रश्न उठा कर इन अधम लोगों में नाम लिखाएं. जो किसी लोभ, जैसे प्रसाद या समय काटने के लिए आ भी गए तो आ कर भी व्यर्थ ही बैठते हैं. इस सरोवर में स्नानादि का आन्द नहीं ले पाते औरे घर जाते हुए मार्ग में भी लोगों से निन्दा ही करते हैं

 जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई ।  जातहि   नीद   जुड़ाई   होई ॥

 जड़ता जाड़ विषम उर लागा । गएहुँ न मज्जन पाव अभागा ॥

करि न जाइ सर मज्जन पाना ।फिरि आवै समेत अभिमाना ॥

 जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥

 

                           तो क्यों प्रश्न उठा कर ऐसे लोगों में नाम लिखावें जो इस कथा के अधिकारी ही नहीं. अगर किसी तरह आ  भी गए तो आनन्द नहीं ले पाते और दूसरों से निंदा ही करते हैं. अब ऐसा कोई क्यों होना चाहेगा, इसी से वे अपनी शङ्का गले से अन्दर घोंट लेते हैं, वह शङ्का कफ की तरह उनके अन्दर ही रह जाती और कष्ट देती है.

                             तो जो शङ्का हो, उसके निवारणार्थँ  निःसंकोच पूछ लेना चाहिए. प्रश्न उठने पर भी इन सब कारणों से न पूछने वालों ने सरोवर के रूपक वाली यह चौपाईयां तो याद रखीं किन्तु इसी काण्ड में आगे प्रयागराज में याज्ञवल्क्य के आश्रम में भरद्वाज जी द्वारा कही चौपाईयां याद न रखीं

 नाथ     एक   संसउ    बड़     मोरें । करगत   बेदतत्त्व   सबु   तोरें ॥

 कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥

                  तो जब भरद्वाज जी जैसे ज्ञानी ने इन सब की चिंता किए बगैर पूछ लिया तो आपको क्या दिक्कत हो और प्रश्न पूछने वालों के प्रति दुर्भावना क्यों हो.’

       पहले से उपस्थित लोगों से इतना कह कर पण्डित जी आगन्तुकों में से  एक को सम्बोधित करके बोले,

आओ शङ्कानाथ ! बहुत उद्विग्न दिख रहे हो ! कहो, क्या बात है जिससे इतने उद्विग्न हो ?’

 ( नाम तो उनका और था पर निरन्तर शङ्का उठाने के कारण परिहास में उन्हें शङ्कानाथ कहते थे, जैसे पण्डित जी जाति से तो ब्राह्मण न थे किन्तु आचरण, अध्ययनप्रियता, कथा सुनाने आदि के कारण लोग उन्हें पण्डित जी कहते थे.)

अब क्या बताएं पण्डित जी ! आज प्रातः स्नानादि के बाद मानस का पाठ करने बैठा , लङ्काकाण्ड चल रहा था. उसमें लक्ष्मण शक्ति प्रसङ्ग पर जब पहुँचा तो लक्ष्मण को मूर्छित पड़े देख कर राम विलाप का प्रसङ्ग आया. उसी से मन विचलित हो गया , क्षुब्ध हुआ कि राम राम ! हे राम ! यह रामजी क्या कह रहे हैं. माना शोक का अवसर है, शक्तिशाली शत्रु सम्मुख है, रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण को वीरघातिनी शक्ति मार कर अचेत कर दिया है. कूछ सूझ नहीं रहा. इधर उनके  प्राण संकट में हैं, उधर सुबह फिर युद्ध होगा. लक्ष्मण का उपचार करेंगे कि युद्ध करेंगे ! इसी शोक में राम विलाप कर रहे हैं और ऐसी बातें कहते हैं कि सामान्य मनुष्य भी न कहे मगर राम जैसे धीर और मर्यादा पुरुषोत्तम कह रहे हैं ! विश्वास नहीं होता. राम पर श्रद्धा ही जाती रही.

                    आपने भी पढ़ा होगा. वे कहते हैं, ‘अगर मैं यह जानता कि वन में भाई का बिछोह होगा तो पिता जी का वचन मानता ही नहीं, वन न आता. न वन आता, न यह सब होता, न बन्धु बिछोह होता.’   राम राम ! राम तो रघुवंश के हैं जिसमें वचन का पालन करना प्रण देकर भी किया जाता है. रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्राण जाएं पर बचन न जाई ॥ और राम जी कह रहे हैं जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥ वचनबद्ध होने के अलावा वे पितृभक्त भी थे, फिर ऐसा कहना ! राम-राम !

            आगे तो और भी क्षुब्ध कर देने वाली बात कही. विश्वास नहीं होता कि राम जी कह रहे हैं कि पुत्र, धन दौलत, नारी मतलब पत्नी, भवन, परिवार आदि तो फिर हो सकते हैं, मतलब दूसरा विवाह किया जा सकता है किन्तु भाई फिर नहीं मिल सकता. अब मैं अयोध्या क्या मुह लेकर जाऊँगा. लोग कहेंगे कि नारी के लिए प्रिय भाई को गँवा दिया ! चलो यह तो शोक की अवस्था में प्रलाप हुआ किन्तु हद तो यह कि वे कहते हैं कि और कोई अपयश सहा जा सकता है, नारी अर्थात पत्नी अर्थात सीता जी को  छोड़ कर लौट जाता क्योंकि नारी की हानि कोई विशेष हानि नहीं है.

           यह राम जी कह रहे हैं ! शिव शिव ! सीता जी को रावण के यहाँ ही छोड़ कर लौट जाते क्योंकि उनकी नज़र में नारी की हानि विशेष क्षति नहीं, मामूली बात है. यह केवल अपनी पत्नी ही नहीं, समस्त नारियों का अपमान है. नारी के लिए उनके मन में यह भाव ! क्या नारी भवन, धन सम्पदा की तरह एक वस्तु है, जड़ सम्पत्ति है ? विश्वास नहीं होता कि राम जी के यह उद्गार हैं. क्या यही मर्यादा है ? लोग क्या यह सीखेंगे कि राम जी नारी हानि को विशेष क्षति नहीं मानते थे ?

         यह मै नहीं कह रहा हूँ मानस के लङ्का काण्ड में तुलसी ने राम के मुख से कहलाया है

 जौं   जनतेउँ  बन   बंधु  बिछोहू । पिता बचन  मनतेउँ  नहिं  ओहू ॥

  सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं   जाहिं  जग   बारहिं   बारा ॥

 जैहउँ  अवध  कवन  मुहु  लाई । नारि   हेतु     प्रिय   भाई   गँवाई ॥

बरु अपजस सहतेउँ जग माही । नारि  हानि  बिसेष  छति  नाहीं ॥

              छि छी ! पढ़ने के बाद मन बहुत खराब हो रहा है. ‘

 हाँ भई, मन खराब होना, क्षुब्ध होना तो स्वाभाविक हैविशेष रूप से अपने आराध्य, श्रद्धा के पात्र, मर्यादा पुरुषोतम से मर्यादा के विपरीत ऐसे उद्गार सुन कर, भले ही वह शोक में विलाप और प्रलाप ही क्यों न हो.’

 वही तो ! अब कहिए पण्डित जी ! आप इस बारे में क्या कहते हैं.’

 देखो भई, मैं तुलसी या राम जी का बचाव तो न करूँगा कोई तर्क देकर जैसा बहुत लोग करते हैं. राम जी का क्या बचाव करना, वे तो हम छुद्र मानवों की बुद्धि से परे हैं, देवाधिदेव महादेव, शिव जी भी जिनको पूजते हैं, जो जन-जन की आस्था के केन्द्र व आदर्श हैं, भला उनका बचाव करने की मुझमें सामर्थ्य कहाँ ? बचाव का, उनके कार्य के औचित्य पर प्रश्न और उसका बचाव जैसा सोचना भी दम्भ है. अगर यह कहूँ कि यह तो तुलसी की वाणी है जो उन्होंने राम जी से कहलायी है, उनके मन की सोच है तो यह भी दम्भ जैसा होगा, छोटा मुह, बड़ी बात जैसा. तुलसी भी युगदृष्टा, युगान्तरकारी कवि है, भक्तप्रवर भी हैं सो उन पर भी कुछ कहने की सामर्थ्य मेरी नहीं.’

 तो आप भी मानते हैं कि राम जी ने कहा, चाहे तुलसी ने उनसे अपनी सोच कहलवायी, ग़लत है. नारी विरोधी और छविभंजक है.’

 नहीं भाई ! ऐसा भी नहीं. मतिअनुसार यह प्रयास अवश्य करूँगा कि तुलसी बाबा ने ऐसा क्यों कहा. उनका क्या निहितार्थ था.’

                        अब उपस्थित जनसमूह को भी इसमें रस आने लगा था अन्यथा कथा में बाधा पड़ने पर वे उद्धिग्न हो उठते थे, या तो तितर-बितर होने लगते थे या प्रश्नकर्ता को डपटने लगते थे किन्तु इस बार न केवल चुप थे बल्कि इस पर बात सुनना भी चाहते थे, ऐसा उनकी प्रतिक्रिया से लगा.

 हाँ हाँ, पण्डित जी ! इस प्रसङ्ग पर ऐसे ही विचार हमारे भी मन में उठे पर प्रभु राम पर ऐसा लांछन पाप के समान है, यह सोच कर कान पकड़ कर क्षमा भी मांगी. प्रभु की लीला को हम कहाँ समझ सकते हैं ! अब आप कहें.’

 आप लोगों ने स्वयं ही उत्तर दे दिया यह कह कर कि प्रभु की लीला को हम कहाँ समझ सकते हैं. देखो भाई, स्वयं तुलसी ने हर ऐसे प्रसङ्ग पर तुरंत अगली ही चौपाई में कह दिया है कि भ्रमित न होना, संशय मत करना. यह तो प्रभु लीला कर रहे हैं. मनुष्य रूप में अवतार लिया है तो साधारण मनुष्यों सी सोच दिखा रहे हैं, उनकी सी बात कह रहे हैं वरना तो प्रभु सब जानते हैं, परमब्रह्म हैं. यह लीला है जिससे मनुष्य तो क्या, देवता, नारद और गरुड़ भी न बच सके. पूर्व में सती भी कहाँ बचीं उनकी लीला से ! इस विलाप के तत्काल बाद ही  तुलसी कहते हैं

बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥

उमा      एक      अखंड    रघुराई ।  नर  गति  भगत  कृपाल  देखाई ॥

            अर्थात सोच यानि शोक को छूड़ाने वाले, शोक का नाश करने वाले सोचविमोचन राम आँसू बहा रहे हैं ! वे तो अद्वितीय और अखण्ड अर्थात वियोग रहित हैं. भक्तों को कृपालु भगवान ने मनुष्यों की दशा दिखलायी है कि देख लो, मनुष्य ऐसे ही होते हैं . जो सामने है उस से प्रीत , जो दूर है उसके प्रति निर्मोही. कोई दुख क्या पड़ा, शोक का अवसर हुआ तो ऐसे ही विक्षिप्त की भांति प्रलाप करते हैं. ‘

पर पण्डित जी ! लोग तो इसे भगवान का कहा ही मानेंगे ! तुलसी बाबा ने इसे भगवान राम के मुख से कहलवाया है तो उनके ही वचन और उनकी ही सोच तो हुई. अब हम कैसे अन्तर करें कि यह राम जी कह रहे हैं कि तुलसी की सोच है कि प्रभु की लीला है ?’

 इसीलिए तो तुलसी ऐसे हर प्रसङ्ग के तुरन्त बाद यह स्पष्ट करना नहीं भूलते कि यह लीला है. भगवान मनुष्य रूप में हैं, साधरण किंतु साहसी और उद्यमशील मनुष्य की तरह अभाव में भी साधन जुटा कर, वानरभालुओं का सहारा लेकर युद्ध कर रहे हैं. सर्वशक्तिमान भगवान का रूप दिखाते तो एक क्षण में ही वहीं बैठे बैठे रावण और सारे आतताईयों का नाश कर देते ! ऐसा करते तो लोगों को प्रेरणा व शिक्षा कैसे मिलती कि जब भगवान ने अभाव, दुख और वियोग झेले किन्तु उनसे पार पाने का उद्यम किया तो सभी लोग ऐसा करें.

                                          जैसे तुम्हारे मन में शंका और अविश्वास हुआ, वैसे ही तमाम लोगों के मन में उत्पन्न होता है किन्तु वे कहते नहीं, अगर कहते हैं तो जिससे कहते हैं तो अगर वह उनका भ्रम निवारण नहीं कर पाता, मोह नहीं हर पाता, औचित्य नहीं बता पाता कि भगवान ने ऐसा क्यों कहा या तुलसी ने भगवान के मुह से ऐसा क्यों कहलाया तो शंका, आक्रोश व अविश्वास बना का बना रहता है. लोग ग़लत समझते हैं तो उन्हें ग़लत मानने लगते हैं.

                                          क्यों, है न ऐसी बात ! अब भक्त हो, राम व तुलसी में आस्था रखते हो तो जैसे तुलसी की कही या राम जी के मुख से कहलाई इस बात को मानते तो तो उन बातों को भी मानों जो कई जगह कही हैं कि यह सब लीला है, भगवान मनुष्य रूप में हैं तो मनुष्यों का आचरण कर रहे हैं. कहो, कुछ सन्तुष्ट हुए कि नहीं !’

 हाँ, कुछ कुछ समझ में तो आयी बात किन्तु फिर भी यह तो है कि लोग उन बातों को अधिक ध्यान रखते हैं जो ऐसी विपरीत हैं. उदाहरण देने लगते हैं कि देखो, स्वयं भगवान ने ऐसा कहा, फिर हम लोग क्या हैं ?’

 हाँ यह तो है किन्तु यह सहज मानववृत्ति है, मनोविज्ञान है कि पचासों अच्छी, नीति वाली बातों को छोड़ कर एक निन्दनीय बात पकड़ लेता है. सफेद कुर्ते पर एक छींट कालिख की हो तो पूरी सफेदी के बजाय सब वह दाग़ ही देखते हैं, चर्चा करते हैं. ऐसा करने का जाने-अनजाने उनका आशय भगवान या कवि के वचन की आड़ मे ख़ुद वही कहने / करने का रहता है कि दुहाई दे सकें कि भगवान ने भी तो कहा  है.

       वहीं दूसरी ओर यदि कठिन धर्म, उदारता या सदाचरण करने को कहो कि कि भगवान ने यह मार्ग बताया तो कहेंगे कि अरे ! वे भगवान हैं, हम छुद्र मानव. हमारी उनकी कहाँ बराबरी. इसलिए यदि कुछ ऐसा निन्दनीय सा विचार आए तो दिल पर हाथ रख कर पूछो, क्या ऐसा कहना और करना ठीक है, शोभनीय है ? निश्चित ही जवाब नहीं में मिलेगा ! तो फिर ऐसी बातों को क्या मन से लगाए रखना, क्षुब्ध होना.’

 उचित समाधान किया आपने, सही कसौटी बतायी. फिर भी, तुलसी बाबा ने ऐसा कहलाया ही क्यों कि उस पर प्रश्न उठे ?’

यह तुलसी के कवि रूप का असर है. कवि में यह विशेषता होती है, बल्कि कुटेव होता है कि अवसर मिलने पर या अवसर उत्पन्न करके ऐसे प्रसङ्ग निकाल लेता है कि नीति वचन, लोगों का चरित्र, दुर्बलता या अच्छी बात पात्रों के मिस कह देता है. कहो कि विद्वता या कविताई झाड़ने का बहाना या मौक़ा निकाल लेता है. तुलसी इन सबसे अछूते थोड़े न हैं, न सूर रहे. उन्होंने भी कूट पद कहे, तुलसी ने भी कि अर्थ करने में दांतों पसीना आ जाए.

                                    शुरू से ही लो. दशरथ के प्राण त्यागने पर जब भरत जी आए तो उनके मन में बहुत ग्लानि थी, क्षोभ था कि मेरे कारण, मुझे राजगद्दी दिलाने के लिए माता ने एक वर मांगा और मैं निष्कण्टक राज करूँ तो राम को चौदह वर्ष का वनवास मांगा. जब भरत कौशल्या जी के पास जाते हैं तो इस सब से अपनी अनभिज्ञता बताने के लिए खूब उदाहरण देते हैं कि यदि इस सबमें मेरी सम्मति हो तो मुझे फलांफलां गति मिले, पातक लगे. कथा लम्बी हो रही है तो बस एकदो उदाहरण सुनो

 जो  परिहरि  हर  हर  चरन  भजहिं  भूतगन  घोर ।

तेहि कै गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मति मोर ॥

                         बेचहिं    बेदु    धरमु   दुहि   लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥

                         कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी । बेद बिदूषक  बिस्व बिरोधी ॥

                         लोभी      लंपट     लोलुपचारा । जे  ताकहिं  परधनु  परदारा ॥

                         पावौं  मैं तिन्ह कै गति घोरा । जौं  जननी  यहु  संमत मोरा ॥

अर्थात, जो हरि और विष्णु के चरणों को छोड़ कर भूत प्रेतों को भजते हैं तो उनकी जो दुर्गति होती है वही गति मेरी हो अगर इस सबमें मेरी मति हो. जो वेद बेचते हैं, अपने लाभ के लिए धर्म को साधन बनाते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों  के पाप ही देखते हैं, कपटी, कुटिल, कलहप्रिय, क्रोधी हैं, वेद निन्दक और विश्व विरोधी हैं, लोभी, लम्पट हैं, दूसरों की स्त्री व धन पर बुरी नियत रखते हैंमैं उनकी गति पाऊँ अगर इस सबमें मेरा मत हो.

अब यह बताओ कि यह सब कहा होगा ! अरे थोड़ा कहा होगा पर इतनी चौपाईयों भर का नहीं. यह तो तुलसी ने इस बहाने निन्दित और पापकर्म को, उन्हें करने वालों की गति बताई है. प्रकारान्तर से यह सीख है  कि अतिगर्हित कुकर्म क्या-क्या हैं, इन्हें नहीं करना चाहिए. इतना ही नहीं, कवित्व झाड़ने से भी ऐसे शोकपूर्ण, करुण प्रसङ्ग में नहीं चूके. देखो, कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी में अनुप्रास अलंकार है, सब शब्द क से हैं. अब बताओ, कोई अति शोक व ग्लानि में है तो वह बुरे लक्षण बताने में अलंकार ढूँढेगा ? चलो एक शब्द क से हो गया तो सोच कर बाक़ी तीन भी क से ही कहेगा ? ऐसी अवस्था में रस, छन्द, अलंकार पर ध्यान ही न जाएगा. यह तो तुलसी की कविताई है जो ऐसे प्रसङ्ग में भी झाड़ी गयी और इसके बहाने उपदेश भी दिया कि कोई ऐसा मत करना.

                                                             ऐसे अवसर रस, अलंकार और उपमाओं की झड़ी लगाना वैसा ही है जैसे फ़िल्मों में हीरो- हीरोईन घोर शोक में भी पूरे लय-सुर-ताल में गाना गाते हैं. अरे ऐसे मौक़े पर रोना तो ठीक से होगा नहीं, क्रन्दन ही निकलेगा मगर नायक या नायिका पूरे लय-सुर-ताल में गाना गाते हैं. यह कविताई ही है. ऐसे ही तुलसी ने उपदेश, नीति, कवित्व, सांसारिक मानवों की सोच दिखाने के लिए राम जी के मुह से ऐसा कहला दिया. यही ऐसे कथनों व वर्णन का हेतु है.’

 बस, बस पण्डित जी ! आपने इतने अच्छे से और विस्तार से बताया कि मोह जाता रहा, सारा क्षोभ मिट गया. अब आरती-वारती करें, आज कथा तो क्या हुई, सत्संग, प्रवचन और शङ्का समाधान हुआ.’

 हाँ, हाँ पण्डित जी !’ अन्य श्रोताओं की तरफ से भी आवाज़ उठी. ‘अब हमें प्रसाद मिले. कथा का मधुर फल प्रसाद मिलना है. और हाँ, भोजन यहीं करके जाएं, देर हो गयी है, कहीं पण्डिताइन रिसाय के खाना न दें.’

 नहीं भाई, भोजन तो घर पर ही करूँगा. देर होने पर पण्डिताइन रिसियाती ज़रूर हैं, कलह और दुर्वाद  भी करती हैं मर यह उनका लगाव और चिन्ता ही है. कुछ देर बकझक के बाद खाना हम दोनों साथ ही खाते हैं.’


ठीक है, जैसा आप चाहें.’

               इसके बाद आरती हुई, प्रसाद ग्रहण किया और सब अपने घर चले. देखो, कल पण्डित जी किस प्रसङ्ग का बखान करते हैं.

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