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Friday, 14 August 2026

पुस्तक चर्चाः सिरे से ख़ारिज

 


'सिरे से ख़ारिज़' परसाई परम्परा के सशक्त वाहक, Anoop Mani Tripathi  के ताज़ा, फरवरी 2026 में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह का शीर्षक है. इसमें 25 व्यंग्य लेख, बल्कि इससे भी अधिक क्योंकि 'रावण की कल्पित कहानियाँ' में कई कहानियाँ हैं. यह कल्पित रावण आज के धूर्त राजनीतिजीवियों का, उनमें भी एक सर्वोच्च का प्रतिनिधित्व करता है. बिना नाम बताए भी आप समझ लेंगे कि कल्पित रावण कौन है. 'भारत माता की कहानियाँ' में भी 25 कहानियाँ हैं, भले नावक के तीर की तरह देखन में छोटी पर घाव गम्भीर करने वाली.

                 शीर्षक भले ही 'सिरे से ख़ारिज' है पर आप इस संग्रह से किसी लेख को ख़ारिज न कर पाएंगे.

                        वैसे अनूप मुख्यतः राजनीतिक व्यंग्यकार हैं मगर इन 25 लेखों में सारे के सारे ही राजनीतिक व्यंग्य नहीं, वे आज के दौर के, व्यंग्य और धिक्कार के सर्वथा पात्र राजनीतिजीवी को ही इंगित नहीं करते बल्कि कवियों और आज की कविता पर भी चोट करते हैं.

                  आज बहुतेरे, उनमें भी मञ्चीय, कवियों की कविता ऐसी हो गई है कि उसी की कविता के शब्द शर्माएँ, हताश हो. देखें 'हवा में फड़कते हुए शब्द' की एक कविता के व्यथित शब्दों की व्यथा -

'कविता की एक और किताब आने से

ख़ुश है कवि

मगर शब्द कतई ख़ुश नहीं

वे चाहते हैं कि कविता से

कभी तो

कवि भी

बड़ा दिखाई दे !

          वाकई क्या कवि, क्या लेखक ! बहुतेरे ऐसे हो गए हैं कि उनके संग्रह तो आते जा रहे हैं पर वे नीचे, और नीचे जाते जा रहे हैं. एक व्यंग्यकार ही ऐसा हो सकता है जो अपनी बिरादरी को भी न छोड़े, उनको भी आईना दिखा दे. यह काम अनूप मणि त्रिपाठी ने इस किताब में भी कई बार किया है.

        इस लेख में भी उन्होंने कहा है, '... कवि का वाचाल होना चलता है, मगर कविता का मूक होना अखरता है. वाक्, वाणी का अर्थ ही है बोलना, तो कवि के साथ कविता का भी बोलना ज़रूरी है ! कविता मंचासीन होने की चीज़ नहीं. कविता मंच से उतर कर जब सड़क पर आती है, तो उसका सौन्दर्यबोध कई गुना बढ़ जाता है ... '

               कवि के साथ कविता के गिरने की चिन्ता, उसे सचेत करने का काम अनूप मणि त्रिपाठी ने किया है.

साहित्य के साथ समाज की, उसमें भी गाँव के किसानों की दुर्दशा, तमाम सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, ऋणमाफी आदि के बावजूद उनकी ज़मीनी हक़ीक़त को, कर्ज के कारण आत्महत्या को 'कफनःआगे की कहानी' में बयान किया है.

' ... इधर घीसू को एक से बढ़कर एक जानकारियाँ मिल रही थीं जो उसके कौतूहल को बढ़ा रही थीं. जैसे कि देश आज़ाद हो गया है. अब जमींदार नहीं होते. उनकी जगह अब सरकार होती है. नेता होते हैं. प्रशासन होता है. इन सब के बावजूद हालाँकि साहूकार अभी भी पाए जाते हैं. अब सरकार किसान की फसल का मूल्य तय करती है और उसे खरीदती भी है. यही नहीं चुनाव के बखत सरकार किसान की कर्जमाफी भी करती है. जनता की भलाई के लिए योजनाएँ भी बनाती है. और भी बहुत कुछ ! यह सारी बातें घीसू को कपोलकल्पित लग रही थीं, क्योंकि उसके सामने प्रेमचन्दर की अकड़ी लाश रखी हुई थी ... '

             ***

' ... घीसू आगे बोला, "अरे हारी-बीमारी में मुआवजा नहीं न देती है सरकार ! आत्महत्या करने पर भले दे सकती है"... '

           इसी लेख में, बुलेट ट्रेन की ज़रूरत पर,

           " ... इस देश को बुलेट की ज़रूरत है, मगर इस बुलेट की !" उसने उंगलियों से बन्दूक बना कर इशारा भी किया.

"ई साला नक्कसली वाली बातें कर रहा है ! मरवाएगा सबको !" ...'

          *****

'भारत माता की कहानियाँ' भी हैं. इसमें पच्चीस कहानियाँ हैं जिनमें से कुछ हम फेसबुक पर पढ़ भी चुके हैं. राष्ट्र, भारत माता सत्ताधारियों के जाप करने वाले शब्द हैं मगर अनूप की कहानियों में भारत माता कल्पना से निकल कर सामने आती हैं तो 'अपने ऐसे बेटों' की करतूतों से हतप्रभ रह जाती हैं, हताश हो जाती हैं.

            भारत माता किताबों की दुकान पर संविधान की तलाश कर रही थीं. वास्तव में है नहीं तो किताब में ही पढ़ लें कि क्या लिखा है ! एक दुकानदार ने मना कर दिया कि रखते ही नहीं, डिमांड ही नहीं है.

            निकल कर इण्डियन बुक डिपो नामक दुकान दिखी तो उसमें गयीं.

"संविधान होगा क्या ?"

" है क्या ?" भारत माता ने दुबारा पूछा.

" बिक गया !"

"ओह ! कब !"

"कब का !"

                किताब की झलक मिली हो, रुचि उत्पन्न हुई हो तो किताब पढ़ें.

             **********

पुस्तकः सिरे से ख़ारिज

लेखकः अनूप मणि त्रिपाठी

प्रकाशकः लोकभारती पेपरबैक्स

विधाः व्यंग्य

पृष्ठ 168, दाम 250/- See less

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