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Friday, 30 April 2021

“छापक पेड़ छिवलिया … “ करुणा का महा आख्यान !

 

“छापक पेड़ छिवलिया … “ करुणा का महा आख्यान !

 


ये सोहर जब भी सुनता हूँ, मन द्रवित हो जाता है. दुःख से भी बढ़ कर चीत्कार, विवशता और क्रोध के भाव उमड़ते हैं. गायक का मन भारी होने लगता है तो स्वर भी भारी होकर टूटने लगते हैं और सुनने वाला भी करुण हो जाता है. प्रेम, निष्ठुरता, सामन्तशाही, विवशता और विवशताजन्य शाप का आख्यान है यह सोहर.

 

धरोहर अभिषेक  की एक पोस्ट पर कभी इस सोहर की चर्चा हुई थी, तब इसे प्रस्तुत करने को कहा था किन्तु पोस्ट ओझल हुई तो यह बात भी आयी-गयी हो गयी. कल फिर किसी की प्रतिक्रिया/टिप्पणी से यह पोस्ट दिखी तो फिर बात छिड़ी तो फिर तकादा हुआ और हुई यह पोस्ट.

 

संक्षेप इस सोहर पर कुछ बात. राम जन्म का उत्सव मनाया जा रहा है. दावत के लिए शिकार लाया गया है, उन्हीं में एक हिरन भी है. हिरन का शिकार होने से पहले ही हिरनी को आभास हो जाता है कि राजकुँअर जी की छट्ठी है तो शिकार होगा और मेरा हिरन भी मारा जायेगा. इसी आशङ्का में हिरनी ढाक के पेड़ के नीचे उदास खड़ी है. हिरन उदासी का कारण पूछता है तो वह मन का डर बताती है. ऐसा ही होता है. हिरन को शिकारी ले गये तो व्याकुल होकर हिरनी भी पीछे-पीछे दौड़ी. हिरन का माँस रसोई में रांधा जा रहा है और हिरनी विवश खड़ी देख रही है. मचिया पर कौशल्या राम को लिए बैठी हैं तो हिरनी विनती करती है कि मांस तो रसोई में पक रहा है हमें उसकी खाल ही दे दो, पेड़ से टांग लेंगे, देख कर हिरन की मौजूदगी लगेगी, उसी को देख कर जी लेंगे. कौशल्या खाल देने से भी मना कर देती हैं कि हिरनी, घर जाओ ! खाल तो हम न देंगे, उससे खँजड़ी मढ़ायेंगे, मेरे राम उसे बजा कर खेलेंगे. हिरनी बेचारी क्या कर सकती थी. मन मार कर लौटती है. जब-जब खँजड़ी बजती है तब-तब उस खँजड़ी पर मढ़ी खाल की उस ध्वनि को सुनकर हिरनी को हिरन की याद आती है. ऐसी दशा में वो उसी ढाक के पेड़ के नीचे चली जाती है. वहीं खड़े-खड़े अपने हिरन को बिसूरती है. कातर दीठ से राह निहारती है.

 

अब देखें सोहर

 

छापक पेड़ छिउलिया पतवन धनवन हो

तेहि तर ठाढ़ हिरिनिया मन अति अनमन हो।।

 

चरतहिं चरत हरिनवा हरिनी से पूछेले हो

हरिनी ! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझेलु हो।।

 

नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो

हरिना ! आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो।।

 

मचियहिं बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो

रानी ! मसुआ सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू नू हो।।

 

पेड़वा से टाँगबो खलरिया मनवा समुझाइबि हो

रानी ! हिरी-फिरी देखबि खलरिया जनुक हरिना जियतहिं हो

 

जाहु हरिनी घर अपना, खलरिया ना देइब हो

हरिनी ! खलरी के खँजड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहेनू हो।।

 

जब-जब बाजेला खँजड़िया सबद सुनि अहँकेली हो

हरिनी ठाढि ढेकुलिया के नीचे हरिन के बिजूरेली हो।।

 

अब एक-एक बन्द का अर्थ देखें –

 

ढाक का ( छापक को ढाक/छूल कहते हैं और छिवलिया का अर्थ है छाँव ) एक छोटा सा घने पत्ते वाला पेड़ है. ये खूब लहलहा रहा है. इसी पेड़ के नीचे हिरनी खड़ी है, लेकिन वो मन से बहुत बेचैन है.

 

चरते-चरते हिरन ने हिरनी की इस दशा को देखा. उसने पूछा, ‘हे हिरनी, तुम उदास क्यों हो? क्या चारागाह सूख गया है या तुम्हारा मन पानी के अभाव से व्याकुल है.’

 

हिरनी ने कहा, ‘हे प्रिय, न तो चारागाह ही सूखा है और न ही मैं पानी बिना मुरझा रही हूं. बात कुछ और है. आज राजाजी के यहां उसके पुत्र की छट्ठी है. वे आज तुम्हें मार डालेंगे.

 

जैसा कि हिरनी को आशङ्का थी, आगे वैसा ही हुआ. और जानवरों के साथ उसके हिरन का भी शिकार हुआ. उसके मांस का भोज हुआ. राम-जन्म पर राज्योत्सव हुआ. इधर मृत्यु, उधर सत्ता का उत्सव. हिरन के मारे जाने पर हिरनी राजा दशरथ की रानी कौशल्या के पास जाती है. वो रानी से अपना अनुरोध कहती है:

                                                                                                   रानी कौशल्या मचिया पर बैठी हुई हैं. हिरनी विनती कर रही है, ‘हे रानी, हिरन का मांस तो आपकी रसोई में सीझ ही रहा है. आपसे एक विनती है, हिरन की खाल ही हमें दिलवा दीजिए. मैं इसे पेड़ पर टांगूंगी. हेर-फेरकर देखा करूँगी. अपने मन को समझाऊंगी कि हिरन तो जीवित है, जी रहा है.

 

कौशल्या साफ मना कर देती हैं

                            हे हिरनी, तुम अपने घर जाओ. ये भी मुझसे नहीं होगा. मैं हिरन की खाल तुम्हें नहीं दूंगी. इस खाल से खँजड़ी मढ़ी जाएगी. इसे मेरे बेटे राम बजाएंगे. इससे खेलेंगे.

 

असहाय हिरनी लौट आती है, लेकिन

                                       उस खँजड़ी पर मढ़ी खाल जब-जब बजती है, तब-तब हिरनी उस ध्वनि को सुनकर अनकती है. (अनकना का मतलब अनुभव करना और याद आना दोनों है) ऐसी दशा में वो उसी ढाक के पेड़ के नीचे चली जाती है. वहीं खड़े-खड़े अपने हिरन को बिसूरती है. कातर दीठ से राह निहारती है.

 

इस सोहर का एक बन्द और है जो बहुधा गाया नहीं जाता ( या मैनें नहीं सुना ) उसमें विवश होकर जाने से पहले हिरनी कौशल्या को शाप देती है कि

 

जैसे सुन्न हमरो निकुंज बन अउर बृंदावन हो 

रानी! वइसे सुन्न होइहैं अजोध्या रमइया बिनु हो॥

                                                     जैसे हमारा कुञ्ज और वृन्दावन सूना हो गया है, हे रानी ! वैसे ही अयोध्या भी राम के बिना सूनी हो जायेगी.

                                                 ***************************

कुछ बातें सोहर और इस सोहर परः

 

सोहर मुख्यतः जन्मोत्सव का गीत है, लोक गीतों में यह संस्कार गीतों की श्रेणी में है किन्तु कुछ ब्याह गीतों को भी सोहर कहते हैं. सोहर उल्लास का, बधाई देने का, मङ्गलकामना का गीत है किन्तु यह सोहर करुण है, निष्ठुरता का गीत है और शाप का भी. लोक गीतों में कब उल्लास का स्वर करुण हो जाय, पता नहीं चलता – एक रपटीली ज़मीन पर गीत चलते हैं जो अनजाने और अनचाहे ही रपट कर करुणा की ओर चले जाते हैं. ब्याह गीतों में सिखावन और विदाई करुण आख्यान ही हैं जो बेटी के पराये घर जाने की टीस में कि उससे साथ कैसा व्यवहार हो, आँख नम कर देते हैं. ब्याह गीतों में ही नकटा यूँ तो हँसी-मज़ाक है किन्तु यह नारी जीवन की करुण कथा / विद्रूप भी है कि जो उसके साथ होता है / जो वह नहीं कर सकती/ सामान्य अवस्था में नहीं कह सकती – नकटा में सब खुल कर कह देती है सो सोहर के इस आख्यान के करुण होने में अचरज न करें.

 

यह सोहर भोजपुरी का है और लोग इसे अवधी का भी बताते हैं. हम इस पचड़े में नहीं पड़ते कि यह भोजपुरी है कि अवधी – यह जानकार और विद्वत जन बतायें.

 

साथ ही एक बात और कि कोई यह वितंडा न खड़ा करे कि भला ऐसा भी कहीं हुआ होगा ! दशरथ की रसोई और रामजन्म का उत्सव – भला मांस पका होगा या मांस तो वे लोग खाते नही थे ! या फिर कौशल्या जी इतनी क्रूर और निष्ठुर नहीं हो सकती ! यह आक्षेप है… आदि, इत्यादि ! तो भईया ! यह लोक है. लोक का संसार शास्त्रीयता की सीमाओं से परे है. वह जो कुछ देखता और सोचता है – उसे गीतों, कथाओं और खेल में ढाल लेता है. वह भगवान से हँसी का नाता भी रखता है, गरियाता भी है, रूठता भी है. मिथिला में राम से परिहास का नाता है और दशरथ से भी. ब्याह की गारियों में चारों भाई, दशरथ, शांता … सब ‘न्योते’ जाते हैं वैसे ही जैसे सामान्य ब्याह की गारियों में सम्बन्धी. लोक जो भोगता है, उसे मज़बूती, स्वर और विश्वसनीयता देने के लिए पहले हुए या वर्तमान राजाओं / चरित्रों में आरोपित करता है सो कथ्य को इसी लोक दृष्टि से देखें.

Thursday, 11 March 2021

शिवरात्रि पर शिव विवाह का प्रसङ्ग


 “जय राम जी की ! जय हनूमान जी की ! जय होय भोले नाथ की औ साथ मा जय होय पंडी जी की !” पंडी जी , आज कौन प्रसंग सुनइहो ?

“ जय जय होय जजमान ! आज तो महाशिवरात्रि का पावन पर्व आय, आदिशक्ति औ शिव के बियाह का. भोलेनाथ का बियाह तो और कौन प्रसंग सुनाइब ! आज तो शिव-पार्वती का बियाह प्रसंग चली औ आज शिवरात्रि है औ बियाहौ रातै मा होत है सो कथा देर रात तक चली. अब भक्तगनौ आय गये हैं तो सिरीगनेश कीन जाय भोलेनाथ के कौतुक भरे बियाह का. “
“ बिल्कुल ! अब इहौ मा कौनों साईत घड़ी बिचारेक है का. मुदा एक निहोरा आय. बाबा तुलसी भी रामचरित मानस अवधी मा कहिन हैं, शिव-पार्वती का बियाह “पार्वती मङ्गल” भी अवधी मा आय, हम-आप औ हियां के जादातर लोग अवधी समुझ लेत हैं, बोलतौ हैं औ रसौ लेत हैं भाखा मा, मुदा बहुत से लोग ई सिकायत कीन्ह कि रस तो है भाखा मा मुदा अवधी समुझ मा नाइ आवत है. जो सुनावत हो ऊका समुझ तो लेइत है मुदा जोरि-गांठ के कौनिउ तनी ! अवधी समझे मा दिक्कत होत है तो पंडी जी ! भले अइसे लोग दसै-पांच होयं मुदा सबका मान राखेक चाही. ई तो हरि कथा आय सबका रस मिलेक चाही. भाखा औ भाषा के चक्कर मा काहे कुछ लोग कथा से विमुख होयं औ दोख हमका-आपका लगे तो पंडी जी अबते कथा खड़ी बोली मा कहौ.
“ ठीक है यजमान. वैसे इस आग्रह में अवधी समझ में न आने की अपेक्षा यह भाव अधिक है कि अवधी को गवाँरु भाषा मान लिया गया है, वो भी अवध में ! लोगों का बोलने का अभ्यास भले न हो किन्तु समझ तो सभी लेते ही हैं किन्तु वही भाव कि समझना भी स्वीकार किया तो अभिजात्य समाज उन्हे भी गवाँर – देहाती मानेगा. विडम्बना यह कि ऐसे लोग भी अन्य लोकभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं / बोलियों में रुचि लेते हैं और समझ भी लेते हैं. भोजपुरी गाने तो खूब छाये हुए हैं, हरियाणवी और पंजाबी गाने भी खूब सुनते और पसन्द करते हैं, डी.जे. पर धमाल तो बिना भोजपुरी और हरियाणवी गानों के फीका रहता है मगर अवधी में शर्म आती है. खैर, हम तो कथावाचक ठहरे सो कथा उस भाषा में कहेंगे जिसे सब लोग समझ लें आनन्द लें. तो बोलिये आदियोगी शिव और आदि शक्ति भवानी की जय. कथा का आनन्द लें और हाँ ! कथा में कुछ हास-परिहास भी रहेगा, उसमें तो आपत्ति नही है ना ! किसी की भावना न आहत हो जाय.
“ अरे नही पण्डित जी. हास- परिहास से तो कथा में रस आ जाता है और भगवान भोलेनाथ तो ठहरे परम कौतुकी. सभी देवगण कौतुकी हैं. शिव जी ने भी कौतुक किया और बाबा तुलसी ने भी तो इस कौतुक का बखान किया है. आप कुछ अपनी तरफ से गढ़ कर थोड़े न कहेंगे. आप निर्द्वन्द्व होकर कथा सुनायें.”
“ तो सज्जनों ! चित्त लगा कर शिव जी के विवाह की कथा सुनें. शिव जी हैं तो आदि देव किन्तु दोनों देवों से अलग. कर्पूरगौरं अर्थात कपूर की तरह गौर वर्ण के हैं किन्तु शरीर पर भस्म लपेटे रहते हैं, चिता भस्म. शिव अर्थात कल्याणकारी हैं किन्तु भयङ्कर और अमङ्गल वेष बनाये रहते हैं. शरीर पर भस्म और व्याघ्रचर्म, बस ! श्रंगार में सर्प लपेटे, शीश पर गङ्गा जो जटा-जूट में अटक कर रह गयीं, मस्तक पर चन्द्र सो चन्द्रमौलि व चन्द्रशेखर भी कहाये. कभी कपाल भी उनकी हथेली पर बहुत काल तक चिपका रहा सो कपाली कहाये. रहने का कोई घर नहीं, शम्शान में या कैलाश पर. गण भी भूत-प्रेत और वाहन भी बैल. अब भले ही त्रिदेवों में एक हों, जगदीश्वर हों . अब ऐसे नङ्ग-धड़ङ्ग , घर-बार से हीन, संगी-साथी ऐसे को लड़की कौन देता. सो इनके विवाह में अड़चनें शुरू से रहीं. वैसे तो कोई जामाता बना नही रहा था किन्तु दक्ष प्रजापति की पुत्री, सती, ने शिव को पसन्द किया और क्यों न करतीं. वे तो आदि शक्ति, सदा ही शिव में समाहित थीं तो दक्ष की पुत्री रूप में उन्हें वरण तो शिव का ही करना था सो शिव को वरा. अब विवाह तो हो गया किन्तु दक्ष ने इससे स्वयं को इतना अपमानित अनुभव किया कि शिव क्या, अपनी पुत्री सती से भी नाता तोड़ लिया. यज्ञ किया तो सब देवों को न्योता पर सती को नही बुलाया. इतना ही नहीं, यज्ञ में शिव का भाग भी नही रखा. अब पिता पर स्नेह और मायके में यज्ञ के कारण सती वहाँ गयीं तो किन्तु शिव का निरादर और पिता की उपेक्षा से क्षुब्ध होकर यज्ञ कुण्ड में स्वयं की आहुति दे दी. बाद में शिवगणों ने यज्ञ विध्वंस किया और दक्ष को समुचित दण्ड मिला. ये सब कथा आप सती मोह प्रसङ्ग में सुन चुके हैं, सो अति संक्षेप में नीरस ढङ्ग से बखाना, अब सुनें शिव के दूसरे विवाह, पार्वती से विवाह, की कथा.
वही सती हिमवान के घर पार्वती रूप में उत्पन्न हुईं. अब शिव जी सती के वियोग में थे, उनकी विवाह करने की कोई मंशा न थी इधर पार्वती शिव जी को वर रूप में पाने हेतु घोर तप कर रही थीं. किन्तु शिव जी सब जानते हुए भी विवाह के इच्छुक ही न थे. अब शिव योगी तो थे ही, कौतुकी भी कम न थे. जानते थे कि वही सती हैं जो पार्वती के रूप में उत्पन्न हुई हैं, विवाह तो करना ही होगा किन्तु मनौना करवा रहे थे. वो काहे को उतावलापन दिखाते और हिमवान भी ऐसे वर से अपनी सुघढ़ पुत्री का विवाह करते, अब तो वे दुहाजू भी थे. जब नारद ने हिमवान को पार्वती का हाथ देखकर भावी वर के लक्षण बताये तो वे बहुत दुखी हुए.
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥

अब बताईये भला, जिस कन्या के बारे में उसके माता-पिता से बताया जाय कि गुणहीन, अनाथ ( माता-पिता विहीन ), उदासीन, संशयहीन ( लापरवाह ) योगी, जटाधारी, निष्काम नङ्गा और अमङ्गल वेष वाला पति मिलेगा – तो उन्हे कैसा लगेगा ! इससे तो बिटिया कुँवारी ही भली. तब नारद जी ने शिव के लक्षण बखाने कि ठीक यही लक्षण शिव जी के हैं और वे प्रतिष्ठित देव हैं , बड़े हैं, समर्थ हैं और समर्थ को कोई दोष नही लगता.

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कौ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोष गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥

संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥

खूब समझाया कि गङ्गा जी में तो शुभ-अशुभ सब जल बहता है उन्हे कोई अपावन नही कहता. सूर्य, अग्नि और गङ्गा जी की भाँति समर्थ को दोष नही लगता - तरह-तरह से समझाया. हिमवान कुछ कुछ मान भी गये किन्तु मैना, हिमवान की पत्नी और पार्वती जी की माता, ने तो साफ मना कर दिया कि घर-वर और कुल हमारे अनुरूप हों तब ही विवाह कीजिए अन्यथा नही. भले बेटी कुमारी ही रहे, घर ही रहे किन्तु ऐसे अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नही करूँगी –

जौं घरु बरु कुलु होई अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥
न त कन्या बरु रहे कुआरी। कंत उमा मम प्रानपियारी॥
इधर हिमवान विचलित, मैना तो मान ही रहीं ऊपर से पार्वती जिद करें कि विवाह तो शिव जी से ही करेंगे और तप करने का दृढ़ विचार प्रकट किया. इधर ये असमंजस तो उधर शिवजी भी कम नही, वो तो विवाह को ही राजी नही. अब देवताओं को चिंता हुई कि शिव जी विवाह ही न करेंगे तो उनका पुत्र कहाँ से होगा जो तारकासुर का वध करके देवताओं को त्रासमुक्त करेगा. ब्रह्मा जी की सलाह से सबने अनुनय-विनय की पर वे माने ही नही. उनके आराध्य राम – सो वे रामभजन मे ही रत रहने लगे –

जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयौ विरागा॥
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥

जब सबके प्रयास निष्फल हो गये तो राम प्रकट हुए और उन्होनें शिवजी को समझाया, विवाह का अनुरोध किया और शिवजी ने उसे आज्ञा मान कर शिरोधार्य किया –

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मांगे देहु॥

तब भी शिवजी तैयार नही थे किन्तु राम की मर्यादा रखने को राजी हुए –

कह सिव जदपि उचित यह नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥

अब जब सब तय हो गया कि विवाह करना है और पार्वती जी से ही करना है तब भी विवाह की अड़चनें कम न हुईं और शिवजी ने ही अड़चनें डालीं. उन्होने सप्त्रऋषियों को भेजा अपने विरुद्ध भड़काने को कि परीक्षा लें. सप्तॠषियों के भड़काने पर भी वे अडिग रहीं और उनसे यह सुनकर भी शिवजी स्वयं वेश बदल कर भड़काने गये

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मांगि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥

अब बहुत क्या विस्तार करना, शिवजी ने खूब हिला-हिला कर पक्का कर लिया. धन्य है पार्वती का प्रेम कि वे तब भी शिवजी से विवाह को दृढ़ रहीं. लो भई सब मान गये, हिमवान को संदेशा भी भेज दिया गया, विवाह की तिथि निकल आयी, सब तैयारियाँ हो गयीं, बारात सजी तो फिर शिवजी ने कौतुक किया. जो धजा थी, उससे भी विकट वेश बनाया. अब ब्याह को जा रहे हैं बारात लेकर किन्तु धजा कैसी वही साँप के ही कुण्डल और कङ्गन , जटाओं का मुकुट और उस पर भी साँप लपेटे , भभूत रमायी और बाघम्बर लपेट लिया कि चलो भाई –
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥

जैसे वो, वैसे ही उनके बाराती. जस दुलहा तस बनी बराता –

कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कौ बहु पद बाहू॥
बिपुल नयन कौ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥

तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बने॥

ऐसी बारात देख कर विष्णु और अन्य देवगण तो अलग होकर चले. वे सब सुन्दर, सुदर्शन, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित, वैभवशाली रथ और पर सवार, सुमधुर वाणी वाले – कहाँ इनके साथ शोभते सो वे अलग चले. ऐसी बारात देख कर बच्चे तो डर कर भाग गये और मैना, पार्वती की माता, परछन के समय ऐसा विकट वेश देख कर अपने भवन में भाग आयीं और शिवजी जनवासे को गये –

कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
बिकट वेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेखा॥
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥

गौरा को गोद में बैठा लिया, कहने लगीं कि भाड़ में जाय विवाह. मैं तुम्हे लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी या आग में जल जाऊँगी या समुद्र में डूब मरूँगी. चाहे घर उजड़े या बदनामी हो – यह विवाह तो अब न होगा –

कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागईं॥
तुम्ह् सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घरु जाउ अपजसु हौउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥

अब ये तो ढिठाई थी शिवजी की कि विवाह में भी ये कौतुक किया. खैर, सबने खूब समझाया-बुझाया तब विवाह हुआ और बड़े उछाह से , विधि-विधान से हुआ. खूब दावत उड़ी और महिलाओं ने गारी भी गाईं. दावतों का वर्णन बाबा तुलसी ने खूब किया है, शिव विवाह में भी और राम विवाह में भी और गारी भी दोनों विवाह में गायी गयी.

भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥

सो जेवनार कि कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परसन निपुन सुआरा॥
नारिरूंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी।

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहिं।
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥
जेवँत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।
अचवाँइ दीन्हें पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥

सो सारी अड़चनों, विघ्न बाधाओं – जो कि कौतुक ही थे – के बाद उमा-शंभु का विवाह हुआ, हिमवान ने भरपूर दहेज दिया, मैना ने गौरी को सिखावन दी, मैना को ममता विलगित देख कर शिवजी ने सास को बहुत समझाया, उनकी शङ्का दूर की, देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की, दुन्दुभि बजायीं, शिव विवाह सम्पन्न हुआ.

शिव-पार्वती विवाह का वर्णन गोस्वामी तुलसिदास जी ने एक छोटे काव्य, “पार्वती मङ्गल” में भी किया है. श्रोतागण ऊबने लगे हैं सो उसका बस एक छन्द सुनें और आमोद-प्रमोद का भाव ग्रहण करते हुए निज निज गृह पधारें –

मगनयनि बिधुबदनी रचेउ मनि मंजु मंगलहार सेा।
उर धरहुँ जुबती जन बिलोकि तिलोक सोभा सार सो॥
कल्यान काज उछाह व्याह सनेह सहित जो गाइहैं ।
तुलसी उमा संकर प्रसाद प्रमोद मन प्रिय पाइहै॥




Monday, 21 December 2020

सीता हरण और लक्ष्मण रेखा

 


सियाबर रामचन्द्र की जै ! पवनसुत हनूमान की जय ! बोलो सब सन्तन की जै !

सामने दरी पर बैठे लोगों ने दोनों हाथ उठा कर जयकारा लगाया. कुछ लोगों ने, जो इधर-उधर कुर्सी डाले बैठे थे, बुदबुदाते हुए जयकारा लगाया और जो घरों के अन्दर थे या खिड़कियों पर लटके हुए थे, उन्होनें वहीं से हाथ जोड़ लिये. टेण्ट के बाहर मूंगफली, पान-मसाला और चाय बेचने वालों ने भी वहीं से जयकार की कि भईया, जै तो ठीक मगर तुम्हारे लिये ही बैठे हैं पुड़िया लेते जाओ, मूंगफली ले लो और कहोगे तो अन्दर चाय दे जायेंगे. छोटा सा पण्डाल था. पण्डाल क्या, चार तखत जोड़ कर मञ्च बना था और तीन तरफ कनातें लगीं थीं, ऊपर तम्बू तना था. मञ्च पर राम दरबार की फ्रेम की हुई फोटो रखी थी जिस पर माला चढ़ी थी, साड़ियों की सजावट और एक चौकी पर फलों के ढेर में छुपे सिंहासनासीन शालिग्राम जी. एक-दो डब्बे मिठाई के और एक थाली में आरती का सामान और माईक के सामने धोती-कुर्ता, शाल-तिलकधारी, हारमोनियम के साथ बैठे पण्डित जी.

जयकारा आदि के बाद पण्डित जी बोले, “ हाँ तो भक्तों ! आज सीता-हरण प्रसंग की कथा होगी. सीता मैया ने एक हिरन देखा जिसकी खाल सोने की तरह चमक रही थी और उस पर रत्न जड़े हुए थे. जब वह कुलाचें भरते हुए पास से निकला तो देखा सोने की तरह क्या, वह सोने का ही हिरन था. फिर क्या था, मैया ललचा गयीं और राम जी से कहा, “  ऐ जी ! मुझे वो हिरन ला दो ना. हिरन न लाओ, उसका शिकार कर लाओ और उसकी खाल ले आओ.” राम जी बोले, “ हटो, तुम भी ना ! अरे कहीं सोने का हिरन होता है ! और अगर हो भी तो क्या वो जिन्दा होता है. अरे यह सब राक्षसी माया है, इसमें न फंसो” तो सीता जी बोलीं, “ नाथ, अलसा रहे हो कि डर रहे हो.  अब माया हो कि ब्रह्म ! हम तो सोने के हिरन की खाल लेंगे. अब जाओ ना शिकार करने.” अब सीता मैया हठ कर बैठीं औ तिरिया हठ तो अप सब जानतय हो, तो राम जी चले उसके पीछे और लछमन जी से कह गये कि देखे रहना, भाभी को छोड़ कर कहीं जाना नही. वन में बहुत राक्षस घूम रहे हैं. मैं इसका वध करके तुरन्त आया.

हे भक्तों ! भगवान तो सब जानते हैं. वे मनुज अवतार में थे सो लीला कर रहे थे वरना क्या वो जानते न थे कि यह रावण का फैलाया खटराग है. यह मारीच है जो कपट मृग बन कर आया है और मुझे दूर ले जाकर, लक्ष्मण को धोखे से बुलाकर सीता को हर ले जायेगा. यह मैया भी जानती थीं मगर लीला करनी थी. राम जी उधर चले, वह कभी प्रकट होता तो कभी छिप जाता. कभी लगता कि बस हाथ से पकड़ लेने की दूरी पर है तो अगले ही पल जैसे कोसों दूर. गोस्वामी जी ने बड़ा सुन्दर वर्णन किया है. यह कह कर पण्डित जी हारमोनियम बजा कर गाने लगे -

कबहुँ  निकट पुनि  दूर पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ  छुपाई॥

प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥

तब तकि राम कठिन सर मरा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥

लछिमन कर प्रथमहि लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥

 

पहले तो वह दुष्ट राम जी को दूर ले गया और जब राम जी ने उसे तीर मारा तो उनकी आवाज़ में लछमन जी को पुकारा. हा लक्ष्मण ! हा सीते !! यह  कातर पुकार सीता जी के कान में पड़ी तो वे व्याकुल हो उठीं और बोलीं, “ देवर जी, इनके प्राण संकट में हैं और वे मदद के लिये तुम्हे पुकार रहे हैं. तुरन्त दौड़ो .”

लछमन जी बोले, “माता, भैया राम को कौन संकट में डाल सकता है. यह उस दुष्ट की चाल है कि मैं उधर जाऊँ और इधर आप अकेली हों तो आपका कुछ अनिष्ट हो. भैया ने पहले ही कहा था कि ये सोने का हिरन नही, किसी राक्षस की माया है. मैं आपको छोड़ कर कहीं नही जाने वाला.” तब सीता मैया ने लछमन को कुछ लगने वाले बातें कहीं  कि तुम्हारे मन में खोट आ गया है.

जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥

भ्रूकटि बिलास सृटि लय होई। सपनेहुँ  संकट  परै  कि  सोई॥

मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥

 

हे भक्तों ! भला माता सीता लछमन को ऐसे कह सकती हैं. यह भी लीला थी जो दोनों मिल कर खेल रहे थे. रावन समझ रहा था कि उसने राम जी को माया में फंसा लिया मगर प्रभु उसे फंसा कर मरन की ओर ले जा रहे थे. अब जब सीता जी बारम्बार कहने लगीं, उन्हे लांछित भी किया तो लछमन जी ने धनुष की नोक से कुटिया के सामने भूमि पर एक रेखा खींच दी और कहा, “ माता, इसे मत लांघना. इसके अन्दर आप सुरक्षित हैं. यह कह कर वे चले. इधर रावन निशंक होकर आया और बड़े दर्प से कि अब तो सीता अकेली है, कुटिया की तरफ बढ़ा. लेकिन ये क्या ! एक बिजली सी कौंधी, उसे झटका लगा और वह सहम कर पीछे हट गया. फिर उसने संभल कर धीरे से एक पैर बढ़ाया तो आग की लपट उठी और उसने पैर वापस खींच लिया. अब उसने ध्यान लगाया तो देखा कि एक अर्धवृत्त जैसी रेखा खिंची है जिसे पार किये बिना कुटिया में जाया नही जा सकता और पार करने में जान जा सकती है यह तो वो देख ही चुका था सो उसने माया से जोगी का भेस बनाया और  भिक्षाम्‍ देहि ! का घोष किया. अब गृहणी के द्वारे कोई भिक्षुक आये तो वह कैसे खाली हाथ जाने दे सो सीता मैया अन्न-फल लेकर चलीं. अब उन्हे तो मालूम था कि लक्ष्मण ने रेखा खींची है जिसे लांघना नही है सो उन्होनें कहा, “ महराज, द्वार पर आकर भिक्षा ले लीजिए” अब रावन कैसे जाता तो उसने दुर्वासा सा अभिनय किया. चेहरा तमतमा उठा, जटा फटकार कर गुस्से में बोला, “ देवी ! हम जोगी हैं, गृहस्थ के द्वार नही जाते. भिक्षा देना है तो यहां आकर दो नही तो आज भूखे ही सो रहेंगे.” अब मैया कैसे किसी को अपने द्वारे से भूखा और असन्तुष्ट जाने देतीं, ऊपर से जोगी-जती को, धर्म भी जाता है और कहीं श्राप दे दे तो क्या न अनिष्ट हो जाय. गृहस्थ और जोगी का मान रखने को सीता मैया कुटिया से बाहर निकलीं. अब जगत्माता को लक्ष्मण रेखा क्या व्यापती, निःशंक होकर रेखा पार की. ज्यों ही मैया ने रेखा पार की, रावण ने कपट वेश त्यागा और उन्हे उठा कर आकाश मार्ग से ले भागा. वैसे रावण भी जानता था राम और सीता की महिमा को और यह भी जानता था कि उसकी मुक्ति राम जी द्वारा वधे जाने में ही है तभी उसने मन ही मन मैया सीता के चरणों की वन्दना की. गोस्वामी जी कहते हैं –

तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय  जब नाम सुनावा॥

कह सीता धरु धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा॥

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि काल बस निसिचर नाहा॥

सुनत  बचन  दससीस रिसाना। मन  महुँ  चरन बंदि  सुख माना॥

 

              क्रोधवंत  तब  रावन  लीन्हिसि  रथ  बैठाइ।

             चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥

 

“ठहरिये पण्डित जी ! एक शङ्का है ! “

“बैठ शंकालु कहीं के ! हर बात में मीन-मेख, हर जगह शंका ! राम कथा में भी शंका उठाता है. अरे जब विश्वास ही नही तो कथा में आया क्यों और जब आ ही गया है तो चुपचाप बैठ कर सुनता क्यों नही.”

“ अरे भाई शंकाधर ! कोई लघु या दीर्घ किस्म की शंका हो तो जाओ और दीवार के पास समाधान कर आओ. यह कोई  स्कूल की क्लास है कि पण्डित जी से पूछ कर ही जाना हो. “

“हँसी ठट्ठा मत करो कथा में. यह चार किताबें क्या पढ़ गया है कि हर बात में शंका उठाता है. याद नही, सावन में जब भागवत बैठी थी तब भी इसने ऐसे ही भम्भट किया था. भगाओ इसे !”

“शांत-शांत !  उत्तेजित न हों , झगड़ें नही और इसकी बात भी सुन लें. शंका है तो उसका समाधान भी किया जायेगा.” हाँ तो बेटा ! क्या शंका है तुम्हारी !”

“पण्डित जी ! आप कथा में चौपाईयां और दोहे तो रामचरित मानस के सुना रहे हैं, आप ही नही , सारे ही लोग राम कथा के लिए रामचरित मानस को आधार मानते हैं किन्तु मानस में तो ‘लक्ष्मण रेखा’ का ज़िक्र ही नही. बाबा तुलसी ने कहीं भी नही लिखा कि राम की सहायता को जाते समय सीता की सुरक्षा के लिए उन्होनें लक्ष्मण रेखा खींची थी जिसे सीता जी के अलावा कोई पार नही कर सकता था फिर ये आप कहां से लक्ष्मण रेखा ले आये. आप ही नही, तमाम रामलीलाओं में, फिल्मों में, सीरियलों में लक्ष्मण रेखा दिखायी जाती है, यहाँ तक कि असम्भव सा लक्ष्य पार करने के लिए या मर्यादा के लिए लक्ष्मण रेखा जैसा मुहावरा भी बन गया. कहाँ से हांकी यह लन्तरानी. कहाँ पढ़ा लक्ष्मण रेखा के बारे में. राम चरित के लिए वाल्मीकि रामायण प्रमाणिक माना जाता है, उसमें भी लक्ष्मण रेखा का कोई उल्लेख नही, फिर कहाँ से निकल पड़ी लक्ष्मण रेखा ?”

“बैठ- बैठ“ “निकल बाहर अधर्मी, नास्तिक कहीं का !” “पूज्य धर्मग्रन्थों और पण्डित जी पर शंका करता है ! “ “ कह तो ऐसे रहा है जैसे इसने सारे धर्मग्रन्थ पढ़ रखे हैं ! “  चारो तरफ कौआरोर मच गया.

“ हाँ ! पढ़ रखें हैं ! सारे नही तो कुछ तो पढ़ ही रखे हैं, ये देखिये रामचरित मानस में ही
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥ के तुरन्त बाद अर्धाली है –

बन दिसि देब सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥

लक्ष्मण जी वन और दिशाओं के देवताओं को सौंप कर चले. कहीं रेखा खींचने की बात नही और कुछ दूर जाने के बाद लौट पड़े हों और रेखा खींची हो, ऐसा भी कुछ नही. रावण भी जब आया तो कहीं भी  लक्ष्मण रेखा लांघने की बात नहीं और न ही उसने ऐसा कुछ कहा कि बाहर आकर भिक्षा दो. गोस्वामी जी लिखते हैं –

नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई॥

कह सीता सुनु जती गोसाई।  बोलेहु बचन  दुष्ट  की  नाई॥

तब रावन निज् रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा॥

इसके बाद की चौपाईयां तो आप सुना ही चुके हैं कि कैसे उसने रथ पर बैठा लिया और गागनपथ से उड़ चला. इसमें कहीं भी लक्ष्मण रेखा की बात नही.

वाल्मीकि रामायण में भी ‘अरण्यकाण्ड’ के ४५वें सर्ग में मारीच के आर्तनाद और सीता का व्याकुल होना, लक्ष्मण को जाने को कहना, न जाने पर उन्हे कटु वचन कहना एवं लक्ष्मण का जाना है. वहाँ भी लक्ष्मण के बिना कोई रेखा-वेखा खींचे प्रणाम करके चले जाने की बात है. ४६ से ५०वें सर्ग तक  रावण द्वारा सीता की प्रशंसा, उन्हे बहकाना और सीता का वनवास दिये जाने की कथा सुनाना है. ५१वें सर्ग में सीताहरण है. १७वें श्लोक में यह वर्णन है कि रावण ने कैसे सीता को उठाया, श्लोक नही पढ़ूँगा, भक्तगणों की भावनाएं आहत हो जायेंगी. आपको शङ्का हो तो पढ़ लें और इन लोगों को बता दें, इनमें कहीं भी लक्ष्मण रेखा की बत नही है. दोनों ग्रंथ मैं साथ लाया हूँ कि सीताहरण प्रसङ्ग में लक्ष्मण रेखा की बात होगी ही होगी तो मैं इस शङ्का को उठाऊँगा. अब निवारण करें कि लक्ष्मण रेखा की बात ग्रन्थों में न होते हुए भी जनमानस में कैसे व्याप्त हो गयी.”

“ उचित शंका उठायी युवक ! देखो, रामायण यही दो नहीं, बहुत हैं. तुलसी बाबा ने भी कहा है “… रामायन सत कोटि अपारा… “ अब सौ करोड़ तरह की तो नही सौ प्रकार कहो. विद्वान बतते हैं कि तीन सौ से अधिक रामायण देश के विभिन्न भागों और विदेश में प्रचलित हैं.  कथा भेद भी है, अनेक संस्करण हैं कथा के. सीता को रावण की पुत्री भी कुछ राम कथाओं में बताया है तो कहीं राम सीता भाई-बहन बताये गये हैं तो किन्ही ग्रन्थों में लक्ष्मण रेखा का उल्लेख होना सम्भव है किन्तु समस्त देश और उत्तर भारत में विशेष रूप से लक्ष्मण रेखा का प्रचलित होना उन रामायणों के कारण नहीं. “

“ फिर किस कारण है पण्डित जी, लक्ष्मण रेखा कैसे चलन में आयी ?”

“देखो ! मानस की रचना प्रक्रिया और उसमें आये व्यवधान के बारे में तो पढ़ा ही होगा. वाल्मीकि रामायण संस्कृत में है जिसे पढ़ने का न सबको अधिकार था और न सब लोग पढ़ सकते थे सो गुसाई जी ने लोक भाषा अवधी में रामचरित मानस की रचना की. अधिक से अधिक लोग जानें रामायण और रामचरित को सो उन्होनें जगह-जगह इसका मंचन किया, रामलीला आरम्भ कीं. गा-बजा कर नाटक की तरह रामलीला खेली जाती. अब जब सड़क पर खेल हो रहा हो तो उसमें केवल श्रद्धालु भक्त ही थोड़े न आयेंगे, हर तरह के लोग आयेंगे. कुछ रस लेने वाले, कुछ नाच-गाने के रसिया, कुछ ‘भगवान की गाथा है तो चमत्कार तो होंगे ही’ के भाव से, तो कुछ उपद्रव करने वाले. अब तुलसी बाबा को तो सबको साधना था, जितने लोग जुड़ें आखिर होगा तो राम कथा का प्रचार-प्रसार ही सो उन्होनें कभी मंचन में लक्ष्मण रेखा जोड़ दी होगी कि लोगों को लगे कि रावण कैसे जगज्जनी सीता मैया को ले जा सकता है, क्या कोई  बाधा न आयी होगी सो लक्ष्मण रेखा जोड़ दी गयी. लोगों को इसमें आनन्द आया, कुछ ने लक्ष्मण रेखा में नारी की मर्यादा रेखा देखी और यह भी कि मर्यादा तोड़ने वाले को दुष्परिणाम भगतना पड़ता है, चाहे वह सीता जी ही क्यों न हों. यह प्रसंग चमत्कारिक था सो चल निकला और जब एक बार चल निकला तो इसे सीताहरण से हटाया ही नही जा सकता था, जनता चिल्लाने लगती. फिर तो बाद के राम कथा ग्रंथों में बाकायदा यह प्रसंग शामिल कर लिया गया और फिल्मों सीरियलों में भी. वैसे तुलसी बाबा ने सीता हरण प्रसंग में तो कुछ नही जोड़ा और न ही  क्षेपककारों ने इसे प्रक्षिप्त किया किन्तु तुलसी बाबा के मन में यह प्रसंग घर कर गया और उन्होनें मानस के ही लंकाकाण्ड में मन्दोदरी द्वारा रावण को समझाने में इसका उल्लेख कर ही दिया कि लक्ष्मण रेखा खींची गयी थी –

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥

रामानुज   लघु   रेख   खचाई।  सो  नहिं  नाघेहु  असि  मनुसाई॥

 

अब समझे कि लक्ष्मण रेखा वाल्मीकि रामायण और मानस में न होते हुए भी कैसे और क्यों जनमानस में व्याप्त हो गयी.”

“समझ गया पण्डित जी, जान गया और मान भी गया. मगर पण्डित जी, जो आपने कहा कि बाद के राम कथा ग्रंथों में लक्ष्मण रेखा प्रसंग है, तो बताईये किसमें है !”

“हाँ, हाँ ! क्यों नही ! सुनों ! पण्डित राधेश्याम कथावाचक बड़े मशहूर हुए हैं और उनसे भी अधिक मशहूर हुई है उनकी ‘राधेश्याम रामायण’ चालू भाषा में लिखी और नौटंकी शैली में नगड़िया और पिपहरी के साथ जब उसका गायन होता है तो अंग-अंग फड़क उठता है. सीता हरण के लक्ष्मण रेखा प्रसंग पर बात उठी तो सब भक्तजन उसका यह प्रसंग सुनें –

      आज्ञावश अब विवश थे, लक्ष्मण आज्ञावन्त।

      जाने   को   प्रस्तुत  हुए, कहने लगे  तुरन्त॥

 

पवनदेव,  तुम साक्षी हो,  हे पक्षीगणों, गवाह  तुम्ही।

मेरी इस धर्म नाव के अब, हे सूर्यदेव! मल्लाह तुम्ही॥

आज्ञा-पालन करता हूँ मैं, बस इतना है सन्तोष मुझे।

रघुराई अगर उलहना दें, तुम कह देना निर्दोष मुझे॥

 

       जाते-जाते भी उन्हें, इतना रहा विवेक।

       सीता के चारों तरफ, रेखा खींची एक॥

 

फिर बोले – जाता हूँ माँ, अब तुम सावधान होकर रहना।

आज्ञा के भीतर  दास रहा, तुम  रेखा के भीतर  रहना॥

इस रेखा का  उल्लंघन कर,  जो  पर्णकुटी  में  आएगा।

है आन उसे यह लक्ष्मण की, वह वहीं भस्म हो जाएगा॥“

 

वाह पण्डित जी वाह ! मज़ा आ गया ! सचमुच  बहुत ओजपूर्ण है ! नगड़िया-पिपहरी होती तो और मज़ा आता. पण्डित जी ! अब कल से नगड़िया-पिपहरी वालों का इन्तजाम करके इसी राधेश्याम रामायण का पाठ हो.

प्रेम से दोनों भुजा उठा कर जोर से बोलिये, ‘राजा राम चन्द्र की जै’