रेणु की पंचलाइट और सतीनाथ भादुड़ी की विलायती 'लालटेन' !
क्या पंचलाइट का
आधार सतीनाथ भादुड़ी के उपन्यास का एक प्रसङ्ग है !
रेणु की 'पंचलाइट' अद्भुत कहानी है, बहुत
रसदार प्रसङ्गों से भरी, ऊपर से ग्राम्य जीवन का रस तो है ही
जो छोटी-छोटी बातों में जीवन रस पा लेते हैं. मान-अपमान, बहिष्कार-अपनाना,
ईर्ष्या, लोक संस्कृति, हँसी-उदासी
... सब पा लेते हैं.
महतो टोली के लोग
ज़ुर्माना के पैसे से रामनवमी के मेले से पेट्रोमैक्स खरीदते हैं. पेट्रोमैक्स नाम
तो शहराती लोगों लोगों के लिए है, शहर में भी बहुतेरे
इसे गैस/गैसबत्ती कहते हैं तो महतो टोली के पंचलाइट या पंचलैट. पंचलैट इसलिए कि यह
पंचायत की सम्पत्ति है. खरीदने में भी गाँव वालों की भोली चतुराई के रोचक प्रसङ्ग
हैं कि कैसे दुकानदार पर रोब डाला, उसे ठगने नहीं दिया.
अब ले तो आए पर उसे जलाए कौन,
कोई तो उसे जलाना (गाँव की बोली में बालना )नहीं जानता. पंचलैट
बालने की उठापटक में बामन टोली का हँसी उड़ाने का खूब खांचा खींचा है रेणु ने ,
"... पंचलैट के सामने कान पकड़ कर उठा बैठी लगाओ तो जलेगी ...
"
उनकी नाक कटने को है कि ध्यान आता
है गोधन जानता है पंचलैट बालना पर उसे तो जात बाहर किया गया है काहे से कि वह
छिछोरा है. मुनरी को सलम-सलम (सनम) करके सलीमा का गाना गाकर छेड़ता है. ख़ैर,
टोले की इज़्ज़त का सवाल है तो उसका हुक्का-पानी खोल दिया जाता है.
तमाम दिक्कत और किरासिन तेल न होने के बावजूद वह गरी के तेल से ही पंचलैट बाल देता
है.
इस सफलता और ख़ुशी में उसे समाज में
शामिल किए जाने की मुहर तब लगती है जब गुलरी काकी (मुनरी की अम्मा) कहती हैं,
'आज रात
मेरे घर में खाना गोधन.'
यह तो संक्षेप है,
कहानी में रेणु ने इन प्रसङ्गों को सजीव कर दिया है खास शैली और
वर्णन से.
आज पंचलाइट की याद
क्यों ?
इसलिए कि सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास 'ढोड़ाय
चरितमानस' (मूल बांग्ला नाम 'धोराई
चरितमानस') पढ़ते हुए एक प्रसङ्ग पर पहुँचा तो लगा, अरे ! यह तो 'पंचलाइट' जैसा
है. रेणु ने सतीनाथ भादुड़ी को अपना साहित्यिक गुरु कहा है. रेणु का जन्म 1921 में हुआ था और सतीनाथ भादुड़ी का 1906 में. 'ढोड़ाय चरितमानस 1949 से 1951
के बीच लिखा गया और रेणु ने कहानी पंचलाइट 1957-1958 के बीच
लिखी. पंचलाइट का रचनाकाल ढोड़ाय चरितमानस के बाद का है और रेणु सतीनाथ भादुड़ी को
अपना साहित्यिक गुरु मानते थे तो सहज ही माना जा सकता है कि पंचलाइट का आधार ढोड़ाय
चरितमानस का 'विलायती लालटेन' प्रसङ्ग
है. उसमें जो वर्णन है, वह पंचलाइट में विस्तार से और बहुत
अच्छे ढंग से है.
यहाँ यह कहने की
किञ्चित भी धृष्टता नहीं कर रहा कि रेणु की कहानी उस प्रसङ्ग की नकल है. बस रेणु
ने उससे प्रेरणा ग्रहण की होगी.
रेणु अद्भुत कथाशिल्पी थे.
उन्होंने वह प्रसङ्ग पढ़ा होगा, उसमें उन्हें एक पूरी
कहानी की सम्भावना लगी होगी और फिर उसे स्वतन्त्र कहानी के रूप में बहुत कुशलता से
मोहक रूप में ढाला. वह एक नामालूम सी साधारण घटना थी उपन्यास नायक ढोड़ाय के जीवन
की जिसे रेणु ने अद्वितीय कहानी में ढाल दिया. रेणु की कहानी में वह ग्राम्य
प्रवृत्ति का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है. उस कहानी में रेणु ने रोमांस और उसकी
सुखान्त परिणिति दिखाई जो उपन्यास के प्रसङ्ग के बिल्कुल नहीं है. यहाँ रेणु के
अद्भुत शिल्प का पता चलता है.
बहरहाल, कोई
तुलनात्मक टिप्पणी नहीं है, न ही आक्षेप जैसा कुछ. बिना वह
प्रसङ्ग पढ़े उपरोक्त सारा कुछ वाग्विलास ही है. इसलिए वह प्रसङ्ग दे रहा हूँ ताकि
मेरा यह सब कहना, दोनों का साम्य आपकी अदालत में आए.
वैसे जिन सुधी
पाठकों ने 'ढोड़ाय चरितमानस' पढ़ा
होगा, निश्चित ही उन्होंने भी यह साम्य नोट किया होगा. ऐसे
जो सुधी पाठक फेसबुक पर, उनमें भी जो यह पोस्ट देख रहे हैं,
उन्होंने ऐसा कुछ लक्ष्य किया क्या ?
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रेणु
की पंचलाइट और सतीनाथ भादुड़ी की विलायती 'लालटेन'
!
देखें 'ढोड़ाय चरितमानस' का
वह अंश जिसका बहुत सरसता से विस्तार रेणु ने ‘पंचलाइट’ में किया है –
… विलायती ‘लालटेन’ के लिए
बाबा ने अयोध्या जी से तीन रुपए भेजे हैं. कागज में कुछ नहीं लिखा हुआ है. बाबा के
हाथ का छुआ पत्र – ढोड़ाय कितनी तरह से उसे उलट-पलट कर देखता है. कितने छुटपन की याद
उसे आती है. रमिया के अलक्ष्य में वह चिट्ठी सूँघकर देखता है – बाबा की जटा की गन्ध
उसमें मिलती है या नहीं. फिर यत्न के साथ उसे रमिया के बनाए हुए मूँज की ‘पोहती’ में
रख देता है.
महतो कहते हैं, “बड़े खर्च का रास्ता है, - अर्थात
‘लालटेन’ जलाने में बड़ा खर्च है. बाबा ने तेरा भला किया या बुरा, कहना कठिन है.
छड़ीदार सहमति प्रकट करता है, “ जिसे दिवालिया
बनाना हो, उसे जमींदार लोग हाथी खरीद देते हैं. फिर सँभालो उसका खर्च.”
हरिया का लड़का कहता है – यह सब है पंचायत की
तरफ से खरीद कर रखने की चीज़ ! दस-पाँच लोगों के काम-काज से पंचायत का जरा उपकार होता
है. नौजवानों का दल कहता है – अरे रखो भी ! पंचायत की ‘सतरंजी’ खरीदने की बात हम बचपन
से सुनते आ रहे हैं, सो आज तक नहीं खरीदी गई. फिर ‘विलायती लालटेन’ जलाकर जोगीरा और
बलबाही का नाच नचाएँगे पंच लोग ! इतने रुपए जुर्माने में आते हैं, सो सब क्या होते
हैं ?
महतो यह प्रसंग दबा देना चाहते हैं.
“ ढोड़ाय अच्छी तरह देखभाल कर लालटेन खरीदना.
काँच बजा लेना – ठनन ! ठनन !!”
“ मैं क्या उतना पहचानता हूँ ? महतो, नायब, तुम
ही लोग क्यों नहीं चलते कल सुबह विलायती लालटेन
का सौदा कर देने ?”
रतिया छड़ीदार आँख मारकर महतो को न मालूम क्या
तो इशारा करता है.
“नहीं, नहीं, कल हम लोगों को सुविधा नहीं होगी,
एक काम है.”
“अरे. फट फट करते हो, तुम लोग तो मेरे ठेहुने
की उम्र के हो. मेरे माथे का केश धूप में नहीं पका है. हम लोगों को हटाना चाह रहे हो
कल सुबह हरखू के बाप का तेरहाँ करने के मतलब से ! इतना भी क्या मैं नहीं समझता ?”
ढोड़ाय ! तुम ही जाना सामुअर की ग़ाड़ी में – कल
भोर को जब वह काम पर जाएगा. उसने साहबों के यहाँ अनेकों विलायती लालटेन जलाए हैं. और,
गाड़ी पर जाने से चीज भी देगा मजबूत. “
महतो के कहने के अनुसार ढोड़ाय
सामुअर के साथ लालटेन खरीदने तो जाता है, पर सुबह नहीं, अपरान्ह में. सुबह क्या ढोड़ाय
जा सकता है ? बूढ़े अपने को चाहे जितना ही चालाक समझें,उनके अँगुली उठाते ही ढोड़ाय का
दल उनके सारे मतलबों को समझ जाता है.
खबरदार ढोड़ाय, सुबह कहीं नहीं जाना. नहीं, नहीं
तो पाँच-पाँच बनैले भैंसो का ताल सँभालना – पाँच क्यों, छड़ीदार को भी गिनो – छह – वह
हम लोगों से नहीं होगा.
दूसरे दिन सुबह, झगड़ा और गालियों के बीच माथा
मुड़वा का पर्व शेष होता है. ततमा लोगों के किरिया-करम में पूरन नाऊ को महतो और नायब
लोगों ने मना कर दिया था – हरखू के बाप के तेरहाँ में किसी का भी सर न मूड़ना. ढोड़ाय
पकड़ कर ले आता है मरगामा से उस नाऊ के लड़के को.
भाग्य था कि सामुअर के साथ
ढोड़ाय लालटेन खरीदने गया था. नहीं तो वह ठगा ही गया था. सामुअर था इसलिए बतला दिया
कि बत्ती में दुकानदार लोग बड़ा ठगते हैं, - नीले कोर वाली बत्ती लेना. उसी रात सामुअर
ढोड़ाय के के घर पर विलायती लालटेन जला देता है. भीड़ अधिक नहीं हुई थी. महतो-नायबों
के दल बिगड़े हुए हैं ! वे ढोड़ाय के यहाँ आ ही नहीं सकते हैं. और ढोड़ाय का दल था कि
हरखू के घर पर तेरहाँ के भोज के आयोजन में व्यस्त.
रमिया कहती है, “ एकदम दिन की तरह प्रकाश हुआ
है न ? सामुअर ढोड़ाय को कहता है – ऐसी बत्ती खरीदी तूने, एकदम दुकान की बत्ती है यह
! अब खोल दे एक दुकान. तेरी बहू होगी मोदियाइन, सौदा तौलेगी – “रामे राम, राम, रामे
राम दो, दुये दू – तीन.”
रमिया हँसकर लोट पड़ती है…
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है तो यह पंचलाइट की अपेक्षा
बहुत छोटा प्रसङ्ग पर शायद रेणु ने पंचलाइट के सूत्र इसी प्रसङ्ग से लिए होंगे, उसे
अपने कथा बुनने के कौशल से पंचलाइट में गूंथ कर विस्तार दिया हो सकता है.
आपको लगा कुछ ऐसा ?

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