पुस्तक चर्चा; काफ़ी के कप में चाय
अभी एक कथेतर किताब पढ़ कर पूरी की. किताब
यात्रा वृत्तांत है, सामान्य यात्रा
वृत्तांत नहीं बल्कि जगहों के साथ उनसे सम्बद्ध प्रख्यात
साहित्यकारों और उनकी रचनाओं पर सांकेतिक जानकारी देती है. सांकेतिक
ऐसे कि बस लेखक का नाम व उसकी किताब ( नाटक व फ़िल्म भी ) की
जानकारी भर देती है, बस नामोल्लेख भर समझिए, विस्तार
से विवेचन नहीं करती. उन लेखकों व कुछ पेण्टिंग्स से सम्बन्धित जगहों , संग्रहालय
आदि का भी उल्लेख है कि फलां लेखक यहाँ रहता था, यह
वो कैफ़े जिसमें
वे अक्सर आते, बैठते और कॉफ़ी / वाइन
पीते थे.
यह वह थिएटर है जिसमें फलां प्रख्यात लेखक का एक नाटक मञ्चित
हुआ था, लेखक का एक लेखक मित्र भी बड़ी मिन्नतों के बाद नाटक में मुख्य पात्र का रोल करने को राजी तो हुआ किन्तु
कतिपय कारणों से वह नाटक मे नहीं आया, नाटक उसके बिना ही
हुआ. क्यों राजी नहीं हुआ, नाटक
फिर उसके बिना हुआ और कौन थे वे लेखक, वह कतिपय कारण क्या
था जिससे उसने मुख्य रोल करने के लिए सहमति देने के बाद भी छोड़ दिया, नाटक
का नाम क्या था – इन प्रश्नों के उत्तर से बेहतर होगा कि उतना अंश ही देखें –
… “मैंने
सार्त्र को मुम्बई में पढ़ा था. ये कितना अजीब लगता
है कि वो असल में एक जीता-जागता इंसान था जो यहाँ रहता था. यहाँ
से सड़क पर करके सामने दिख रहे Café’ de Flore में
जाकर अपनी पार्टनर Simone
De Beauvoir
के साथ बैठकर जाने
क्या-क्या बहसें करता था. फिर
वापस आकर इसी लैंप के पास बैठ कर लिखता होगा. तुम्हें
पता है, यहाँ एक थिएटर है Theater du Vieux-Colombier, जहाँ
उनका नाटक Huts Clos (
No Exit) पहली बार प्रदर्शित किया गया था. तुम
वो देखना चाहोगी
?”
“चलो.”
हम दोनों उनका घर पार करके आगे की तरफ बढ़े. दाहिने
हाथ पर एक गली में घुसते ही हमें वो थिएटर मिला.
“ 27 मई, 1944 को पहली बार वह नाटक खेला गया था. सार्त्र
ने कामू से पूछा था इस नाटक में मुख्य किरदार करने के लिए. बहुत
मिन्नतों के बाद कामू ने हाँ कहा था. पर
रिहर्सल शुरू होते ही कामू का अफ़ेयर इस नाटक की अभिनेत्री से शुरू हो गया. वो
अभिनेत्री सार्त्र की Muse थी
उस वक़्त. मुझे लगता है इसी वजह से जब ’ No Exit’ नाटक
पहली बार खेला गया था तो उसमें कामू नहीं था .” …
( बाद
के प्रदर्शनों में कामू था या नहीं,
इस पर लेखक ने कोई प्रकाश नहीं डाला है )
इस अंश में जगह का
नाम है. केवल जगह का नाम नहीं कि लेखक वहाँ गया बल्कि वह जगह आम पर्यटकों
में नहीं बल्कि साहित्यिक रुचि के लोगों के बीच क्यों मशहूर है, यह
इस वर्णन से स्पष्ट होता है.
इस अंश में पात्र वहाँ मौजूद है
तो बता रहा है, जहाँ वो मौजूद नहीं भी है या नहीं गया है, वहाँ के
भी लेखकों के बारे में बताता है कि अगर वह वहाँ जाता तो किन लेखकों की वजह से जाता
या वह जगह किन साहित्यकारों की वजह से जाने योग्य है, क्यों
साहित्यिकों के बीच मशहूर है. ऐसा
ही एक अंश देखें -
... काफ़्का की वजह से मेरी यात्राएँ शुरू हुई थीं. मैं पहली बार प्राग काफ़्का और निर्मल वर्मा के लिए ही आया था. उसके बाद से मेरी हर यात्रा किसी-न-किसी लेखन या लेखक की वजह से होती रही.
अमिताव घोष की 'द ग्लास पैलेस' पढ़ने के बाद मैं रत्नागिरि गया था. फिर उनकी 'द हंगरी टाइड'
पढ़ते ही सुन्दरबन में जाकर रहा था. निर्मल वर्मा की वजह
से शिमला और उन्हीं की वजह से जब भी दिल्ली जाता था, एक बार हुमायूँ की दरगाह ज़रूर जाता था. रस्किन बॉण्ड की वजह से लैंडोर और
जिम कार्बेट की वजह से मैं उत्तराखण्ड के जंगलों की ख़ाक छानता रहा था. फिर मैंने
लिस्ट बनाई थी कि फ़र्नाडो पेसोआ और सारामागो के लिए एक दिन पुर्तगाल जाऊँगा, कार्ल ओवे क्नाउसगार्ड के लिए नॉर्वे घूमना है और एलेना फ़ेरांटे को पढ़ने के
बाद इतनी तेज़ इच्छा हुई कि कैसे भी नेपल्स चला जाऊँ. नूरी के हाथों में एलेना
फ़ेरांटे की किताब देखकर अचानक मेरी नेपल्स जाने की इच्छा और बढ़ गई थी ...
संग्रहालयों में भी अगर पेरिस है तो वहाँ के लूव म्यूजियम आदि, जहाँ
पेरिस जाने वाल हर पर्यटक ज़रूर जाता है, का उल्लेख नहीं है, शायद
इसलिए भी कि वहाँ कोई मशहूर लेखक नहीं रहता है. पेरिस
की पहचान जैसे एफ़िल
टॉवर का उल्लेख है तो बस इस तरह के वाक्यों में निपटा दिया गया है –
‘ दूर
एफ़िल टॉवर की लाइट दिख रही थी / तभी
मेरी निगाह चमकते हुए एफ़िल टॉवर पर पड़ी / दूर एफ़िल टॉवर दिख रहा था …
किताब में यह सब स्थान अधिकतर यूरोप के हैं, पर्याप्त
बर्फीले, ठण्डे . यह
शहर बहुधा वे हैं जो किसी नदी के दोनों किनारों पर बसे हैं, उन्हें
एक पुल से पार करके दूसरे हिस्से में जाना होता है. वहाँ लेखक ( किताब
का पात्र ) बहुत ठण्ड महसूस करता है. वह
ठण्ड से बचाव के लिए पर्याप्त गरम कपड़े लेकर नहीं जाता या ले भी जाता है तो उन्हें
होटल में छोड़ कर, वहाँ की ठण्ड को जानते हुए भी स्वेटर या जैकेट पहने बिना
ही निकल पड़ता है, देर करता है ताकि भयंकर ठण्ड में ठिठुरने का अहसास कर सके. भारत
में बंबई ( किताब में मुंबई नहीं लिखा है) है, कलकत्ता
है किन्तु ज़िक्र भर है. थोड़ा वर्णन
कश्मीर का है पर उसमें भी वह थोड़ा लंबा प्रवास गुरेज़ में
करता है जो अत्यधिक ठण्डा,
पाकिस्तान की सीमा पर है. वहाँ
भी वह गरम कपड़े नहीं ले जाता है
. ठण्ड से कांपने पर होटल मालिक से
मांग कर स्वेटर पहनता है.
उस होटल में उसके अलावा कोई और नहीं ठहरा होता है. अगर
वह होटल से जैकेट, स्वेटर आदि पहन कर निकला भी तो ठण्ड को खूब अच्छी तरह
आत्मसात करने के लिए जैकेट खोल देता है, स्वेटर उतार देता है
और सिर्फ़ टी शर्ट में कांपता,
ठिठुरता,
ठण्ड को अपने अन्दर घुसाता, ठण्ड
से शरीर सुन्न पड़ जाने की अवस्था तक टहलता रहता है. ठण्ड
के प्रति इतने आत्मघाती प्रेम की अनुभूति पाठक को भी उस ठण्ड में खींच ले जाता है. इस तरह पाठक भी भयंकर ठण्ड और उसके ठण्ड प्रेम का अहसास करता
है. ठण्ड
के अहसास के लिए भी यह किताब पढ़ें.
शहर के कई कैफ़े
/ रेस्तरां का , पी
गयी कॉफ़ी / बियर/
वाइन/
डिनर की भी
बात है,
उनके मूल नाम और वर्तनी में.
कुल मिला कर ‘कॉफ़ी के कप में चाय’ बहुत
अच्छा यात्रा वृत्तांत है.
जगहों के साथ मौसम, कैफ़े, लेखकों, उनकी
किताबों, संग्रहालयों, पेण्टिंग्स
आदि के बारे में बहुत जानकारी मिलती है, आप अगर विदेशी क्लासिक
साहित्य के रसिया हैं, उन्हें पढ़ा है या जानते भर ( मतलब
नाम व सन्दर्भ से परिचित भर
) हैं पर उनसे मिले नहीं हैं तो आपको
इसमें बहुत रस मिलेगा. नहीं जानते या पढ़ा तो आप प्रभावित तो हो ही जाएंगे, हो
सकता है कि लेखक के ज्ञान,
रुचि और जानकारी से आतंकित भी हों कि लेखक ( किताब का लेखक, किताब में पात्र नहीं जो लेखक है ) ने कितना अधिक पढ़/ गुन
रखा है, वह भी उत्कृष्ट
/ क्लासिक/ विश्व
साहित्य ! न केवल पढ़ा बल्कि उन जगहों पर खूब घूमा भी है. आप चमत्कृत हो सकते हैं कि लेखक कितना विकट पढ़ाकू है और कितना
विकट यायावर ! उसकी यायावरी वैसा पर्यटन नहीं है कि टूर ऑपरेटर से बुकिंग
करा ली, लक्ज़री शिप/ प्लेन/ कार/ बस
से घूमते हैं, लक्ज़री होटलों में ठह्रराए
जाते हैं, बेहतरीन खाना खाते, चर्चित
टूरिस्ट प्लेस पर जाते और खरीदारी करते हैं. उन्हें
तो सब करा-कराया मिलता है बस पैसा खर्च करना होता है. वह
यायावरी नहीं, यायावरी तो वह है जो विकट यायावर, राहुल
सांकृत्यायन ने की या लेखक ने.
इसे ध्यान में रख कर ही सम्भवतः
इस किताब का मुख्य पात्र भी एक लेखक है और एक अन्य पात्र फ़िल्मकार.
कुल मिलाकर यह किताब बहुत बढ़िया है, पठनीय
है, मानव कौल के प्रशंसकों
को, उनकी लेखन शैली को पसम्द करने वालों को बहुत पसन्द आएगी. मुझे
भी अच्छी लगी, अपना आप समझ लें !
बस एक बात मुझे अटपटी लगी कि इतने अच्छे यात्रा वृत्तांत
को उपन्यास क्यों कहा ! इसकी श्रेणी कथेतर / यात्रा वृत्तांत न होकर उपन्यास क्यों
है ! किताब के उस पेज पर, जिस
पर प्रकाशन, आवरण ऑर्टिस्ट आदि की सूचना दी जाती है, उस
पर भी A Novel by Manav
kaul लिखा है और पृष्ठआवरण पर भी इसे उपन्यास ही लिखा है. सम्भवतः इसलिए कि दाल में नमक और घी की तरह, हींग
आदि से छौंक की तरह इसमें कहानी भी है. प्रथम पुरुष में लिखे
नायक ‘मैं’
के साथ अन्य भी पात्र हैं जिनकी भी कहानी है. इस
आधार पर इसे कथेतर/यात्रा वृत्तांत की नहीं, उपन्यास
श्रेणी में रखा गया. कुल मिला कर एक किताब में दो का मज़ा है – कथेतर/ यात्रा
वृत्तांत का भी और उपन्यास का भी.
इसमें नायक के अपने पिता से गहरे लगाव का वर्णन है. मूलतः
वे कश्मीर के हैं.
नायक के पिता ने दूसरी
शादी भी की जिससे उन्हें एक बेटी,रूमिका है. इस
दूसरे परिवार को पिता कलकत्ता में रखते हैं. स्वाभाविक
ही नायक के मन में अपनी सौतेली बहन के प्रति चिढ़ है. दोनों
ने एक दूसरे को प्रत्यक्ष नहीं देखा है किंतु इधर कुछ समय से वे मेल के ज़रिए सम्पर्क
में भी हैं. नायक एक उपन्यासकार है और बहन उसकी कल्पना उसके एक उपन्यास
मे नायक, राजिल के रूप में करती है. नायक
की छवि उसके मन में राजिल की है. नायक
ने इंस्टाग्राम पर अपनी सौतेली बहन को देखा है और व्हाट्स ऐप से कुछ बात भी होती है. पिता और उनकी दोनों पत्नियों की मृत्यु हो जाती है. अब
नायक पिता की स्मृतियों को सहेजने / जीने
कश्मीर जाता है और अपनी बहन से मिलने कई देशों की यात्रा करते हुए पेरिस जाता है. अब
उसकी भेंट बहन से हुई कि नहीं, हुई तो उनमें कैसे
सम्बन्ध विकसित हुए
– यह सब आप उपन्यास में
पढ़ें.
फिलहाल
एक वाक्य पढ़ें जो नायक अपनी बहन से मिलने पर महसूस करता है. वे दोनों पहली बार प्रत्यक्ष
मिल रहे होते हैं, इससे पहले दोनों ने एक दूसरे को सोशल मीडिया के जरिए ही जाना था,
कुछ इन्स्टाग्राम की तस्वीरों के जरिए और उसकी बहन ने उसके लेखन के जरिए. बहन के मन
में उसकी छवि उसके एक उपन्यास के नायक राजिल की थी. नायक पाता है कि वह प्रत्यक्ष में
वैसी नहीं थी जैसी सोशल मीडिया पर. वह सोचता है , ‘क्या रूमिका भी सोच रही होगी कि
वह वैसा नहीं है जैसा उसने सोचा/जाना था.
… क्या ऐसा ही होता है कि हम असल में वो होते ही नहीं है जैसे सोशल मीडिया पर
दिख रहे होते हैं,
या हम लिख रहे
होते हैं …
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किताब – ‘कॉफ़ी के कप में चाय’
लेखक – मानव कौल
विधा – उपन्यास
प्रकाशक – हिंद युग्म
पृष्ठ 254, दाम 299/- एडिशन- पेपरबैक
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