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Saturday, 14 June 2025

टेलर का लेबल और धोबी का मार्का

 पुलिस को सड़क किनारे झाड़ियों में एक लाश की सूचना मिली. एक आदमी बाईक से कहीं जा रहा था, उसे हल्के होने की ज़रूरत महसूस हुई. बाईक रोकी, सड़क से उतर कर झाड़ियों तक गया. निवृत होकर चेन बन्द कर रहा था कि एक पैर दिखा, झाड़ी के अन्दर तक घुसने पर पूरी लाश दिखी. ज़िम्मेदार नागरिक था सो पुलिस को फोन किया और पुलिस आने तक वहीं रुका भी रहा. लाश करीब चालीस साल के आदमी की थी. हत्या किसी धारदार चीज़ से गला रेत कर की गयी थी. हत्या कहीं और की गयी, लाश वहाँ लाकर फेंकी गयी क्योंकि न खून बिखरा था, न संघर्ष के कोई चिन्ह थे और न मर्डर वेपन बरामद हुआ. पहचान के लिए मोबाईल, पर्स या कोई कार्ड, कोई कागज, बिल, रसीद, कोई टैटू/गोदना, कोई बर्थ मार्क, घड़ी आदि कुछ न था. चप्पल, कपड़े साधारण थे, जेब में रुमाल, कुछ नोट और सिक्के मिले - उनसे पहचान में कोई मदद होनी न थी. लाश की फोटो, चेहरे का क्लोज अप लिया गया, लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवायी गयी और क्लोज अप के पोस्टर जगह जगह चस्पा कर दिए गए. फोटो दिखा कर आस पास पूछताछ की गयी पर पहचान न हुई और न ही किसी ने पोस्टर देख कर सम्पर्क किया. आस पास के थानों में भी किसी चालीस साल के आस पास के आदमी की गुमशुदगी की रिपोर्ट हुई थी, न इस थाने में.

ऐसे में लाश की पहचान नहीं हो पा रही थी तब पुलिस को उसके कपड़ों का ख़याल आया. शर्ट पर दर्ज़ी का लेबल लगा था जिस पर टेलर का नाम (दुकान का नहीं ) और इलाके व शहर का नाम लिखा था. इतने सुराग के सहारे पुलिस उसकी शिनाख़्त के लिए निकली. लेबल पर दर्ज़ शहर का वह इलाका तो जैसे दर्ज़ीबाड़ा था, लाईन से टेलर ही टेलर थे (है ना आश्चर्यजनक इलाका ) कुछ दुकानों पर पूछताछ के बाद पुलिस को अहसास हुआ कि यह तो बड़ा टाईमखाऊ और ऊबाऊ तरीका है. तब उन्होंने इलाके बड़े और अच्छे टेलर, मंझोले टेलर, छोटे टेलर और घफ से काम करने वाले टेलर के अनुसार बांटा (एक और संयोग, पुलिस की सुविधा के लिए उस इलाके में टेलर इसी तरह बसे थे, एक उप इलाके में एक स्तर के टेलर ) यह तरीका कारगर रहा और एक छोटे टेलर की दुकान से पता चला कि मोहन टेलर (लेबल पर यही नाम था ) घर से काम करता है. पुलिस वहाँ पहुँची तो मोहन ने शर्ट अपने यहाँ से सिली होने को स्वीकारा और लेबल पर लिखे नम्बर से रसीद बुक देख कर बताया कि यह कोई रेगुलर ग्राहक नहीं. पहली बार आया, इसका नाम-पता, फोन नम्बर भी रसीद पर नहीं लिखा. टेलर तक पहुँचने के बाद भी कोई सूत्र न मिलने पर नाम-पता न लिखने की लापरवाही के लिए समुचित फटकार लगायी. वे जाने को ही थे कि एक पुलिसिए की नज़र लेबल पर लगे काले निशान पर पड़ी. मोहन से पूछने पर उसने कहा कि वह ऐसा कोई निशान नहीं लगाता, ऐसे निशान धोबी लगाते हैं तो यह किसी धोबी का निशान हो सकता है. इस बार टेलर जैसी कवायद की ज़रूरत न थी क्योंकि जब शर्ट घर से काम करने वाले टेलर से सिलवायी तो धुलवायी भी किसी ऐसे ही धोबी से होगी, किसी लाण्ड्री से नहीं. थोड़ी ही पूछताछ के बाद घर से काम करने वाली धोबन का पता चला जिसने अपना निशान पहचाना. यह तो रसीद या रजिस्टर वगैरह भी न रखती थी पर पुलिस की सुविधा के लिए इस ग्राहक का नाम और घर मालूम था. फोटो देख कर भी उसने पहचाना कि इसी आदमी ने यह शर्ट धोने को दी थी. अब पुलिस के पास उसकी पुख़्ता पहचान थी, बस कत़्ल का उद्देश्य, कात़िल और कत़्ल कहाँ और कैसे हुआ, अकेले किया या और लोग भी शामिल थे ... जैसे काम थे.  

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उन्हें आगे का काम करने दें, हम-आप टेलर के लेबल और धोबी के मार्के पर बात करें. जो न जान पाए हों उन्हें बता दूँ कि यह एक अपराध सीरियल 'क्राईम पट्रोल' के एक एपिसोड का सीन है. इसमें टेलर के लेबल और उस पर धोबी के मार्के जैसे सूत्र से लाश की शिनाख़्त हुई. वैसे अब का समय हो, घटनास्थल कोई शहर हो तो यह सूत्र काम ही न करेंगे, बल्कि मिलेंगे ही नहीं. पहले जिस स्तर का भी आदमी हो, अधिकांश लोग स्थानीय टेलर से सिलवाए कपड़े ही पहनते थे, अब तो दशक से ऊपर हुआ, लोग रेडीमेड ही पहनते हैं. जब से तमाम ब्राण्ड्स आ गये, हर जगह छोटे-बड़े ब्राण्ड्स के आउटलेट खुल गये, पहले ही दिन से 40% से 60% या अधिक छूट, दो के साथ चार फ्री के ऑफर आये, मॉल की बहुतायत हुई ... बहुतेरे परम्परागत लोग भी रेडीमेड पहनने लगे. सिलाना महँगा पड़ता है और प्रतीक्षा भी करनी होती है. कई बार तो सिलाई के दाम में सिली सिलाई शर्ट मिल जाती है तो अब किसी की शर्ट पर टेलर का लेबल पाये जाने की सम्भावना अति क्षीण है. तो यह सूत्र तो गया हाथ से !
रेडीमेड का वर्चस्व बढ़ने पर भी लोग सूट, कोट, सदरी, शेरवानी आदि टेलर से सिलवायी हुई ही पहनते थे. शादी में सूट तो ज़रूर ही 'अपने' टेलर से सिलवाते थे, दो बार तो ट्रायल होता था, तीसरी बार में फाईनल होकर मिलता था तो सीधे शादी या रिसेप्शन पर पहना जाता था. रेडीमेड के दौर में भी जेन्ट्स टेलर की वकत थी. वे लेबल तो लगाते थे मगर सीरियलों में लाश की शिनाख़्त के सिलसिले में इन पर टेलर के लेबल का कोई स्कोप नहीं है, काहे से कि सूट, शेरवानी आदि में मर्डर होते ही नहीं. वैसे तो मर्डर के लिए कोई ड्रेस कोड नहीं होता मगर सीरियलों में मर्डर साधारण कपड़ों में ही होता है. क्यों महँगे सूट, शेरवानी को खून और चाकू/गोली वगैरह के निशान से खराब किया जाय, कास्ट्यूम किराए पर आते हैं, वापस भी न होंगे. वैसे अब सूट, सदरी, शेरवानी भी शादी तक में लोग रेडीमेड पहनने लगे हैं.
तो आज के कालखण्ड वाला सीरियल हो तो लाश की शिनाख़्त के लिए टेलर का लेबल आप्रसङ्गिक है, होगा ही नहीं कपड़ों पर. रेडीमेड पर जो लेबल होता है उससे बस ब्राण्ड, कपड़े की किस्म, मिश्रण अनुपात और धुलाई निर्देश आदि पता चलते हैं, कील ठोक कर दुकान का नाम नहीं.

अब आते हैं धोबी के मार्का पर. टेलर के लेबल की तरह आज के दौर में यह भी आप्रसङ्गिक है. हतप्राण ग़रीब हुआ तो हाथ से बालटी/टब में कपड़े धोता होगा. मध्यवर्गीय गृहस्थ हुआ तो घर पर वॉशिंग मशीन होगी. लाण्ड्री से धुलाता होगा तो अब लाण्ड्री वाले मार्का लगाते ही नहीं. नम्बर वगैरह कपड़े पर नहीं लिखते बल्कि पतले बकरम के टुकड़े पर लिख कर कपड़े के साथ कच्चे धागे से नत्थी कर देते हैं जिसे कपड़ा देते समय खोल कर फेंक देते हैं. घर से काम करने वाले धोबी भी अब नहीं लगाते, वैसे भी अब धुलाई का काम एक चौथाई ही रह गया है, प्रेस करने का काम होता है और प्रेस के लिए आये कपड़े पर भी कोई मार्का नहीं लगाते. तो शिनाख़्त का और कोई ज़रिया न होने पर धोबी का मार्का वाला सूत्र भी गया.

अब सीरियल में पुलिस की सुविधा के लिए अदबदा कर कोई शर्ट टेलर से सिलवाए, मार्का लगाने वाले धोबी से धुलाए तो बात और है.
अब उन्हें लाश के पास से मोबाईल, पर्स या कोई कार्ड, कोई कागज, बिल, रसीद, कोई टैटू/गोदना, कोई बर्थ मार्क, घड़ी आदि बरामद न हो तो कोई और तरीका दिखायें, ये टेलर का लेबल और धोबी का मार्का अब हजम न होगा.

बात हो ही रही है तो इस पर भी हो जाय कि टेलर लेबल और धोबी मार्का क्यों लगाते होंगे. इसलिए तो नही ही लगाते होंगे कि किसी का खून हो, शिनाख़्त का कोई और पुख़्ता ज़रिया न हो तो इन्ही से शिनाख़्त हो जाय. टेलर तो अपनी दुकान की पहचान, विज्ञापन व इसलिए लगाते होंगे कि ग्राहक के कपड़े देख कर कोई पूछे, 'बड़ी बढ़िया फिटिंग है, कहाँ से सिलवाई ?' तो ग्राहक नाम-पता बता सके. मगर इन सबमें लेबल का तो कोई रोल है ही नहीं. ग्राहक बिना लेबल देखे ही बतायेगा कि शर्ट उतार कर लेबल देख कर/कॉलर पलट कर लेबल दिखाएगा ? लेबल बहुधा ऐसी जगह होता है जो सामने न दिखे, शर्ट में कॉलर के नीचे और पैण्ट में जिप के पास. तो विज्ञापन वाला उद्देश्य भी नहीं, फिर क्यों ? एक उपयोगिता समझ में आती है. बड़े और मंझोले टेलर सारा काम ख़ुद या दुकान के कारीगरों से नहीं सिलवाते. वे नाप लेकर, कपड़ा कटिंग करके घर से काम करने वाले दर्ज़ियों को देते हैं, वह सिल कर देता है. अब उसके पास कई टेलरों का काम आता है तो पहचान के लिए /कपड़े आपस में गबड़ न जाएं, हर टेलर अपना लेबल भी देता है जिसे वह दर्ज़ी उसके कपड़ों पर लगाता है - दोनों को सुविधा. और कोई कारण तो समझ आता नहीं लेबल लगाने का. पुलिस/प्रशासन ने भी अनिवार्य नहीं किया है लेबल लगाना.

ऐसे ही धोबी के मार्का का है. वह तो निश्चित ही ग्राहक की पहचान के लिए, कि किसका कपड़ा धुलने को आया है, मार्का लगाता है. चूंकि बहुत से ग्राहक नियमित रूप से धोबी से ही कपड़े धुलाते हैं. अब हर दूसरे दिन या हफ्ते कपड़ा आये तो हर बार नया तो होगा नहीं. ऐसे हर बार मार्का लगाते रहे तो कुछ ही माह में कपड़े की उस जगह, जहाँ मार्का लगाते हों, जगह ही न बचती होगी तो उन्होंने अलग चिट पर लिख कर नत्थी करना या कोई वैकल्पिक तरीका शुरू किया.

अब आप बताएं - क्या आप टेलर से सिलवा कर पहनते हैं या रेडीमेड और क्यों ? शिफ्ट हुए तो क्यों, नहीं हुए तो क्यों ? कपड़े धोबी से/लाण्ड्री से धुलवाते हैं ? यह मार्का लगाने वाली प्रथा कबसे शुरू हुई होगी ? क्या त्रेता में वह धोबी, जिसने सीता जी के बारे में वह बात कही, कपड़ों पर मार्का लगाता होगा ?
प्रश्न और भी होंगे - करिए और जवाब दीजिए ! वैसे भी यह पोस्ट 'निठल्ला चिंतन' है, खलिहर हों तो, खलिहर नहीं पर खुरपेंची हों तो समय निकाल कर कुछ कहें. 


Vivek Shukla and 13 others

Tuesday, 4 March 2025

बूट ( हरा चना ) व काका हाथरसी की कविता ‘चना-चीत्कार’

 बूट ( हरा चना ) व काका हाथरसी की कविता ‘चना-चीत्कार’

पिछले दिनों लाये - हरा चना ! वैसे इसे बूट भी कहते हैं. कच्चे और कोमल हरे चने का स्वाद ही और होता है.

चना के पौधों में जब  बूटे (फलियां) नहीं आये होते हैं, पत्तियां कोमल होती हैं, डंठल कड़े नहीं हुए होते, तब इसे साग के रूप में लहसुन-मिर्चा के नमक के साथ कच्चा खाते हैं. खट्टा सा स्वाद होता है. बचपन में छत पर घमाते हुए खूब चने का साग खाया. हमारे बचपन में चना का साग खूब बिकने आता था, निकटवर्ती गाँवों से लोग डलिया में या साईकिल पर रख कर बेचने आते थे, बाज़ार में सब्ज़ी वालों के पास तो मिल ही जाता था. अब साग कभी दिख गया तो दिख गया.

इन्हीं पौधों में बूटे जाने पर उसे बूट कहते हैं. इसके हरे चने खाये जाते  हैं. पॉश इलाकों में तो यह शायद ही मिलता हो, गाँव से लगी बाज़ारों, सब्ज़ी मण्डी आदि में मिल जाता है. हमारी तरफ, जानकीपुरम में, खूब मिलता है. इधर कुछ सालों से इसे छील कर हरे चने बेचने का चलन भी है. परिवर्तन चौक वाले हिस्से के पास पुल के फुटपाथ पर कई दुकानें हैं जिनमें हरा चना मिलता है. जिनके पास छीलने का समय नहीं या घर ले जाकर छीलने का झञ्झट नहीं करना चाहते किन्तु खाना चाहते हैं, वे इन्हें ले सकते हैं. हम तो सीजन में कम से कम एक बार तो लाते ही हैं मगर हम छिले हुए नहीं बल्कि बूट ( पत्तों, डण्ठल समेत. झाड़ – जिसकी फोटो लगायी है) लाते हैं. हमें तो आनन्द छील कर खाने में आता है.

इसके थोड़ा सूखने पर बूटे व उसमें के चने कड़े होने लगते हैं तब इसे आग में भून कर खाते हैं जिसे होरा/होरहा कहते हैं. शहरों में प्रथम दो अवस्थाओं में तो मिल भी जाता है, होरा दुर्लभ सा ही है.  लौड़ी तैनाती के दौरान खूब होरा खाया. होरा पार्टी होती थी जिसमें होरा के साथ अन्य ग्रामीण व्यञ्जन होते थे.

बूट खाते हुए बचपन में पढ़ी काका हाथरसी की कविता ‘चना-चीत्कार’ याद हो आयी. उसमें अन्नकूट दरबार लगा, सभी अनाजों के बाद चने ने अपनी व्यथा सुनायी. इतने मज़ेदार – चटपटे और मीठे व्यञ्जन कि प्रभु के मुहँ में भी पानी आ गया. कविता है ही इतनी मज़ेदार कि उसका कथ्य और आंशिक रूप से अब तक याद है. अब पूरी तो याद नहीं और वह किताब है नहीं तो नेट की शरण में गया. कविता तो मिल गयी किंतु कहीँ-कहीं वर्तनी से लेकर अन्य अशुद्धियां थीं, कुछ शब्द मिसिंग थे तो कुछ दूसरे ही थे जिनकी संगती कविता से नहीं बैठ रही थी. यथामति सुधार करने के उपरान्त प्रस्तुत कर रहा हूँ. कुछ अशुद्धि हो और जिन्होंने कविता पढ़ी हो और सही याद हो या किताब हो – कृपया सुधार बता दें, पोस्ट में संशोधन कर दूँगा. फिलहाल, जैसी है, आनन्द लें ‘चना-चीत्कार’ का.



अन्नकूट के दिन  लगा,  दीनबन्धु  दरबार,

अन्नदेव  क्यू मे लगे,  मूंग, बाजरा, ज्वार।

मूंग, बाजरा, ज्वार, चना, जौ, अरहर, मक्का

चावल घायल हो गया, दिया गेहूँ ने  धक्का।

मोठ  हुई  घायल,  उरद जी  बचकर भागे,

चटर्-पटर कर  मटर  बढ़ गयी सबसे आगे।

 

सभी केस  सैटिल हुए,  रहा एक ही शेष,

कृपसिंधु ने अंत में,  लिया चने का केस।

लिया चने का केस,  बिचारा खड़ा रो रहा,

भगवन ! मुझ पर भारी अत्याचार हो रहा।

बड़े-बड़े  ग्यानी-ध्यानी  भी  मुझे  सताते,

काट-पीस कर अलग-अलग व्यञ्जन बनाते।

 

इंसान की तो क्या  चली, नहीं बचे हैं  आप,

चने बने व्यञ्जन  प्रभु, खा जाते  चुपचाप।

खा जाते  चुपचाप,   सलोना  सोहनहलुआ,

दालसेव,  नुकती,  ढोली,  बेसन के लडुआ।

होले – छोले - सत्तू   परावठे   मिस्से,

रक्षक ही भक्षक हैं,फरियाद करूँ फिर किससे ?

 

मेरा बुरा है हाल,  दिया चक्की मे  डाल,

फिर पीसा मुझे तो, बनी  चने की  दाल।

बनी चने की दाल, फिर से  मुझको पीसा,

पीड़ा से  चिल्लाया, मिमियाया बकरी सा।

फिर भी  बेदर्दी इंसान को  दया न आयी,

गरम तेल में  तला, पकौड़े कुगत बनायी।

 

मुझे  भाड़ में  भून कर  चिल्लाते  मक्कार,

चने   खाईये   कुरमुरे,   गरम  मसालेदार।

गरम  मसालेदार  प्रभु  सुधि  भूले  तन की,

सुनी करुण यह कथा, लार टपकी भगवन की।

छोड़  यह मीठी  बातें, स्वाद आ रहा  मुझको,

भाग यहाँ  से  अन्यथा  खा जाऊँगा  तुझको।

Friday, 28 February 2025

मोहल्ले में रामायण और कुछ यादें

 

मोहल्ले में रामायण और कुछ यादें


शिवरात्रि के अवसर पर मोहल्ले ( कॉलोनी ) के एक घर में रामायण बैठी. घर , मन्दिर या सार्वजनिक स्थान पर रामचरित मानस के अखण्ड पाठ को रामायण बैठना/ बिठाना या अखण्ड रामायण बिठाना ही कहते हैं. अखण्ड के अलावा शनिवार या मंगलवार या दैनिक या ऐसे ही केवल सुन्दरकाण्ड का भी पाठ होता है, इसे अखण्ड रामायण नहीं कहते. तो रामायण बैठी, जैसा कि प्रथा है, लाउडस्पीकर लगा कर इसका पाठ होता है. अब तो बड़े स्पीकर / साउण्ड बॉक्स होते हैं, पहले भोंपूनुमा होते थे जिन्हे हॉर्न भी कहा जाता था. यह बहुधा छज्जे पर बाहर की ओर मुह किए हुए बांधे जाते हैं और दोनों दिशाओं में लगाए जाते हैं ताकि लोग घर पर लेटे – बैठे – काम करते भी पाठ सुन सकें, यहाँ भी व्यवस्था परिपाटी के अनुसार ही थी. बहुधा आवाज़ फुल ही रहती है, यहाँ भी थी. धार्मिक आयोजन होने के कारण प्रायः कोई आपत्ति नहीं करता. कुछ भद्रजन रात से सुबह तक आवाज़ बंद कर देते हैं या कम कर देते हैं, यहाँ भी ऐसा ही किया गया. नियमित पाठ करने वाले, जैसे कि मैं, दो-तीन चौपाईयां सुन कर जान जाते हैं कि कौन सा काण्ड और उसका कौन सा प्रसङ्ग चल रहा है किंतु जो नहीं जान पाते वे भी ‘आरति श्री रामायन जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥‘ सुन कर समझ जाते हैं कि पाठ संपूर्ण हो गया है, आरती हो रही है. अब (सम्भवतः) आवाज़ बन्द हो जाएगी, बहुधा हो भी जाती है, बहुत बार नहीं भी होती. प्रायः चौबीस घण्टा में रामायण सम्पन्न हो जाती है. हवन आदि का प्रसारण भी उसी पर होता रहता है, कभी –कभी बातें भी. कभी उसके बाद भी बंद नहीं होती, लाइव भजन, रिकॉर्डेड भजन, फ़िल्मी धुनों पर भजन, भोजपुरी गाने, अन्य फ़िल्मी गाने बजते रहते हैं. बहुधा ऐसी जगह संध्याकाल में भोज होता है. यहाँ भोज का तो नहीं पता किंतु लाउडस्पीकर पर शिव भजन, ‘लोकप्रिय’ भोजपुरी गाने चालू हैं. ख़ैर, यह भी शाम तक का ही है (सोचा यही था पर रात के ग्यारह बज रहे हैं और धम-धम इफेक्ट के साथ गाने चालू हैं )

रामायण का यह आयोजन प्राचीन काल से चला आ रहा है, बचपन और उसके पूर्व से तो मुझे पक्का मालूम है, तुलसी बाबा के समय से ही रहा होगा. गाँव में चौपाल पर, होता था. शहर में श्रमिक वर्ग रात में भजन, बिरहा, आल्हा, कजरी, सावन आदि ऋतु व लोकगीत, होली के अवसर पर फाग व रामायण गाया करता था. मण्डियों में पल्लेदार (बोझा उठाने वाले) रात में नियमित रूप से यह करते थे. गिरमिटिया मज़दूरों के पास मानस का गुटका भी होता था, जहाँ भी वे गये, बसे – रामायण गाया करते थे. कारागार में भी कुछ बंदी नियमित रूप से रामायण, भजन व पूजा-पाठ करते हैं. बहुधा कारागार में मन्दिर भी होता है.

रामायण पाठ हुआ तो यादों की पोटली खुली. हमारे बचपन से युवावस्था तक रामायण में लोग बुलौआ का रास्ता नहीं देखते थे या परिचित – अपरिचित का भेद नहीं करते थे. जब्‌-जहाँ रामायण बैठी और लाउडस्पीकर की ध्वनि कान में पड़ी, नहा कर जाना कर्तव्य मान कर जाते थे, घण्टा – दो घण्टा या अधिक पाठ में शामिल होते और हाथ जोड़ कर चले आते. कुछ तो क्ई बार जाते थे, जब सुनते कि पाठ करने वाले कम हो गए हैं, ध्वनि थकी – थकी सी आ रही है, पहुँच कर मोर्चा संभाल लेते. कुछ तो रात में रुकते. कुछ ‘रामायणियों’ की इसमें प्रसिद्धि भी थी, वे आग्रह पर या स्वेच्छा से यह निर्वहन करते थे. नितान्त अपरिचित, राह चलते भी पाठ कर जाते थे, ऐसे घर में कोई रोक न होती थी. मैं स्वयं कई जगह जाया करता था, मोहल्ले या मन्दिर में तो अवश्य ही. पिता जी निर्देशित कर जाते थे कि रामायण पढ़ने चले जाना. बचपन से ही नित्य रामायण पाठ का अभ्यास है, अब कभी – कभी क्रम भंग हो जाता है. प्रातः नास्ते के बाद मैं और पिता जी रामायण लेकर बैठते, एक चौपाई वे पढ़ते, एक मैं, ऐसे करीब आधा घण्टा तो पढ़ते. इसके बाद हम भोजन करते, वे ऑफिस जाते और मैं स्कूल, लंच ले जाने की प्रथा हमारे यहाँ न थी, नौ-सवा नौ तक भरपूर भोजन कर लेने से लंच की ज़रूरत भी न पड़ती.

एक बार मोहल्ले में सार्वजनिक रामायण बैठी. मन्दिर का जीर्णोद्वार हुआ था. मेरे बचपन से अब तक करीब चार बार जीर्णोद्वार हो चुका है और मन्दिर विस्तृत होता गया है. पुराने मोहल्ले के, अमानीगंज चौराहा, अमीनाबाद, मेरा जन्मस्थान, पर इस शिव मन्दिर की स्थापना हम कुछ बच्चों ने की थी. सम्बन्धित लोगों के अलावा, अब शायद लोगों को यह याद न हो, स्वीकार न करें. उनमें से कुछ तो अब रहे नहीं या तितर-बितर हो गये हैं. तब संकीर्तन मण्डलियों का ज़ोर था. मोहल्ले-मोहल्ले संकीर्तन मण्डलियां थीं. जवाबी कीर्तन भी होते थे. कानपुर व लखनऊ में इनका बोल बाला था. कानपुर की जवाहर जिद्दी की मण्डली बहुत मशहूर व जवाबी कीर्तन में अजेय सी थी. कीर्तन में बंगाल के चैतन्य महाप्रभु की तरह हरिनाम संकीर्तन या आज के ‘इस्कॉन’ की तरह ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ या मठ / आश्रम की तरह कीर्तन नहीं बल्कि फ़िल्मी धुनों पर कोई धार्मिक प्रसङ्ग गाये जाते थे. जवाबी कीर्तन में एक मण्डली जिस धुन पर जो प्रसङ्ग गाती, दूसरी जवाब में उसी या दूसरी धुन पर वही प्रसङ्ग गाती. न गा पाने वाली हार जाती, विजेता को शील्ड व घोषित नकद पुरस्कार मिलता, उपविजेता को भी छोटी शील्ड व कम रकम मिलती. कीर्तन के बीच में श्रोता नकद ईनाम की बौछार करते रहते.

कीर्तन मण्डलियों को रामायण मण्डलियों ने, फिर देवी जागरण मण्डलियों ने, अब साईं भजन मण्डली, खाटू श्याम संकीर्तन मण्डली आदि ने विस्थापित कर दिया, उस कीर्तन का तो अब नाम भी न बचा.

हमारे मोहल्ले में था ‘श्री हरि शरण संकीर्तन मण्डल’ उस दल के साथ पिता जी का उठना-बैठना था. वे गाते-बजाते तो नहीं किंतु उत्साह से शामिल होते, साथ जाते. उससे प्रेरित होकर हम बच्चों नें अपनी संकीर्तन मण्डली बनाने की सोची. गायक वगैरह तय हो गये. एक अच्छा गाने वाला लड़का था सुशील. तब प्रायः सबके चिढ़ाने वाले उपनाम होते थे, उसका नाम था सुशील फटही. मैं सुशील फटही की तरफ था. एक थे झब्बू मामा, नाम पता नहीं, झब्बू मामा कहाते थे. उनका छोटा भाई भी दूसरे पक्ष में था. उसने मुझे अपनी तरफ फोड़ने के लिए डराया, ‘तुम सुशील फटली की अलंग से खड़े होइके गइहो ! तुमरे बाप एक … हैं, तुमरी … छांट देहें’ ( … की जगह भदेस शब्द, आज के हिसाब से गाली ) हम डर गये, फूट पड़ गयी, हमने सदस्यता वापस ले ली और कीर्तन मण्डली बनने से पहले भंग हो गयी.

तब दूसरा काम हुआ. हम एक दुकान के बाहर से एक चौकोर पत्थर (जो चबूतरे पर चढ़ने के लिए सीढ़ी की तरह रखा था) उठा लाये, उसे चौराहे पर रखा ( तब इतना आवागमन न था, बच्चे सड़क पर खेला करते थे) उस पर कुछ बटिया (गोल पत्थर) रखे, आधार को खपच्ची, झण्डी से घेरा और बन गया शिव जी का थान. कुछ समय बाद बच्चे भगा दिए गये, बड़ों ने उस मन्दिर को अधिग्रहीत कर लिया, कई बार बनते-बनते अब वह बड़े व भव्य रूप में है. उस पर जन्माष्टमी की झांकी, कीर्तन व अन्य धार्मिक आयोजन होते थे.

जब पहली बार कुछ ढंग का मन्दिर बना, तब बड़े पैमाने पर रामायण बैठी. मैं तब पाँचवे या छठे में पढ़ता था. तब मैं बस नहाने, खाना खाने व देर रात में सोने घर गया, बाक़ी रामायण पढ़ी. तब से रामायण पाठ के प्रति चाव और बढ़ता गया.

फिर यह कम कैसे होकर घर पर पाठ करने तक सिमट गया ? हुआ यह कि पहले तो घर वाले, कुछ घनिष्ट मित्र व रिश्तेदार आदि मोर्चा संभाल लेते थे, रात में डटे रहते थे किन्तु कालान्तर में वे ढीले पड़ कर विमुख होते गये. तब रात में जो एक या दो ‘फंस’ जाते, वे थके/ बेमन से गाते रहते कि रामायण खण्डित न हो जाए, जैसे ही कोई आता, वे प्रणाम करके उठ लेते और वह दूसरे के आने तक ‘फंसा’ रहता. बड़ी विषम स्थिति हो जाती. जो भी हो, ऐसी स्थिति होने पर भी रामायण बिठाना तो छोड़ा न जा सकता था. लोग मानते भी थे कि फलां काम हो जाए तो रामायण करेंगे. तीर्थ आदि से आने, गृह प्रवेश आदि पर रामायण और भोज की परिपाटी अब भी है. तो इसका तोड़ यह निकला कि रामायण मण्डलियां बनी, लोग उन्हें बुलाने लगे. शुरू में वे पेशेवर न थे, कोई फीस वगैरह न थी.बुलाने पर आते थे, बहुधा रात संभाल लेते थे, शुरुआत व समापन भी कराते थे. जो आरती में चढ़ावा आ जाए और यजमान जो स्वेच्छा से अर्पित कर दे, सन्तोषपूर्वक ले लेते थे. वे झांझ, मंजीरा, खड़ताल, ढोलक, हारमोनियम आदि लाते थे और फ़िल्मी सहित कई धुनों में लयपूर्वक और गति में पाठ करते थे फिर भी बोल समझ में आते थे और जो रामायणी नहीं भी होते, वे भी थोड़ा प्रयास करने पर उनके साथ, उनकी लय में गा लेते थे. आकाशवाणी लखनऊ से विभिन्न मधुर धुनों में मानस गान प्रसारित होता जिनमें’ हे हा’ की टेक वाली धुन बहुत लोकप्रिय व मधुर थी. मुकेश का गाया सुन्दरकाण्ड व अन्य काण्ड भी बहुत चलन में था.

फिर दौर शुरू हुआ पेशेवर रामायणियों का. ये शुल्क लेते थे और नयी नयी फ़िल्मी धुनों पर बहुत फास्ट गाते थे, इतना फास्ट की बोल पकड़ में न आते थे, गाना ही सुनाई पड़ता था. आम रामायणी भी इनके साथ न गा पाता. वैसा ही समझिये जैसे मिट्टी के अखाड़े में लड़ने वाला पहलवान और रिंग में पेशेवर फाईट वाला रेसलर. दम खम होते हुए भी पुराना या आम भक्त इनके सामने टिक ही न पाता. ये आते ही रामायण कैप्चर कर लगते, आरकेस्ट्रा वालों की तरह सलामी धुन/ ताल-वाद्य्-कचहरी जैसा बजाते और एक गायक सुपर फास्ट स्पीड में आरम्भिक श्लोक व चौपाईयां पढ़ता, दोहा तक आते न आते ग्रुप धुन में गाना शुरू कर देता. हर वाद्य के सामने माईक, दो गायकों के सामने माईक, मार मोहल्ला गुंजा देते. ्बैठे लोग उनका साथ पकड़ ही न पाते, प्रणाम करके उठ जाते. गाने की लय के लिए चौपाईयों के बीच रामा, जय हो, सिया राम या कुछ अन्य शब्द फिट करते हैं. कोई प्रसङ्ग हो, राम वन गमन हो, दशरथ मरण हो, सीता हरण हो, लक्ष्मण शक्ति व राम विलाप हो … फास्ट फ़िल्मी गाना ही सुनाई पड़ता है.

अब ज़माना और बढ़ गया है. दल के साथ समुचित वेशभूषा में पुरोहित भी होते हैं, दो तो होते ही हैं. साज –सज्जा से लेकर सामग्री का ठेका लेते हैं, पूजा कराते, समापन पर हवन कराते हैं, यजमान की इच्छानुसार चौबीस से तीस घण्टों तक में पूर्ण कराते हैं व घर वालों तथा सामान्य लोगों के साथ दे सकने लायक धुन में भी गाते हैं. फीस ग्यारह हज़ार से इक्यावन हज़ार तक होती है.

रामायण की प्रस्तुति में स्थान के अनुसार अन्तर होता है. कानपुर व कुछ जगह (अब लखनऊ में भी) हर काण्ड के बाद लय में आरती होती है, दल के एक-दो सदस्य धीमे स्वर व लय में रामायण पढ़ते रहते हैं ताकि रामायण खण्डित न हो. कुछ रामायणी बीच में झांकी/ लीला भी करते हैं. सजे – धजे लोग प्रसङ्गानुसार अभिनय करते हैं, यथा शिव-विवाह प्रसङ्ग, जन्म प्रसङ्ग, राम विवाह प्रसङ्ग, बारात अवध आने के प्रसङ्ग, लङ्का विजय के उपरान्त अयोध्या आगमन प्रसङ्ग … पर लीला होती है. समय बढ़ जाता है, रोचकता/ मनोरंजन बढ़ता है व मण्डली को चढ़ावा भी आता है.

रामायन सत कोटि अपारा ! अब रामायण बिठाना भी बदल गया है, कई तरह का होता है. आपका क्या अनुभव है और आपके क्षेत्र में कुछ अलग तरह का होता है तो अवश्य बताएँ.