कहने को कर्कश बोली वाला कौआ बहुत चतुर, बल्कि धूर्त पक्षी होता है मगर होता मीठा गाने वाला कोयल है . जब मादा कोयल के अण्डे देने का समय होता है तो नर, कौआ के घोसले के पास जाकर खूब चिलगुहाड़ मचाता है, उसे उकसाता है, गुस्सा दिलाता है. तंग आकर कौआ उसे भगाने का उपक्रम करता है, वह लड़ते हुए उसे दूर ले जाता है. घोसला असुरक्षित हो जाता है तो मादा कोयल उसमें अण्डे दे आती है. अण्डे एक जैसे होने से कौआ उसे अपने अण्डे समझती है और सेती रहती है. समय पर जब अण्डे फूटते हैं, बच्चे निकलते हैं, बोलते हैं तभी कौए को पता चलता है. इस तरह कोयल दम्पति बिना मेहनत के उससे अपने बच्चे जनवा लेते हैं.
यह मैंने बचपन से पढ़ा-सुना ! बेचारे कौए
! क्या वास्तव में कौए इतने बेवकूफ होते हैं ?
कोयल में यह धूर्तता और कौए में यह बेवकूफी क्या जीन्स में
होती है जो अब तक चली आ रही है. क्या अब भी कौआ और कोयल का यही सम्बन्ध है,
कोयल के बच्चे अब तक ऐसे ही पैदा होते हैं ?
मुझे तो यह एक बोध/नीति कथा लगती
है जो और कुछ सिखाने के लिए गढ़ी गयी और आज तक चल रही है.
ऐसे तमाम लोक विश्वास और कथाएँ हैं जो
रोचक ढंग से बातें सिखाने के लिए बनीं और फैलीं,
जैसे पञ्चतन्त्र की कथाएँ.
उनको तो हम जानते हैं कि लोक में
प्रचलित विश्वास हैं, कथाएँ हैं, सच नहीं किन्तु बहुत से लोग,
शिक्षित भी, जज भी ऐसी बातों को सच मानते हैं. मोर के आंसुओं से मोरनी
के गर्भवती होने की बात एक जज साहब ने गम्भीरता और विश्वास से कही थी. 'भै गति सांप-छछून्दर केरी'
मुहावरा आज भी बहुतेरे मानते हैं. सांप चूहे के धोखे
छछून्दर को पकड़ ले, पूरा न निगला हो तो जाने कैसे,
शायद गंध व स्वाद से,
सांप को पता चला कि यह तो धोखा हो गया. अब न निगल सकता है,
न उगल. निगले तो मर जाए,
उगले तो अंधा हो.
सांप के अंधे होने का एक और लोक विश्वास है,
स्त्री की परछाई पड़ने से भी अंधा हो जाता है. एक दोहा भी है
-
'नारी की झांई पड़त अंधा होत भुजंग।
कबिरा तिन की कौन गति,
जो नित नारी संग॥'
नारी और दाम्पत्य द्रोही है यह बात. हैरत
तो यह कि तमाम लोग मानते हैं कि नारी की झांई पड़ने से सांप अंधा हो जाता है. न
इसका कोई प्रमाण है, न हमने देखा. इसमें यह संशोधन भी हो गया कि हर नारी की झांई
पड़ने से नहीं, गर्भिणी स्त्री की झांई पड़ने से अंधा होता है.
ऐसे तमाम नीति और उपदेश वाले
दोहे, कहावत, लोकोक्तियां हैं जिनका सार न ग्रहण करके लोग थोथी बातों से चिपटे हैं.
उन सबका उल्लेख नहीं कर रहा,
आप सब कौए-कोयल वाली बात बताएं. क्या पहले कभी कोयल के
बच्चे ऐसे ही होते थे या अब भी होते हैं ?
और कोई ऐसे विश्वास याद आ रहे हों तो बताएं,
बतकुच्चन हो जाए, थोड़ा मेला लगे पोस्ट पर.
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यह प्रश्न ज़रूर
उठ रहा होगा कि बिना सन्दर्भ के यह कौआरार क्यों मचाई ! रिटायर होने का यह मतलब तो
नहीं कि इन सब में उलझाते रहें.
तो भईया,
सन्दर्भहीन नहीं यह. तमिल साहित्यकार पेरुमाल मुरुगन का
उपन्यास 'नर -नारीश्वर' (हिन्दी अनुवाद Badri Varma / मोहन वर्मा द्वारा)पढ़ते हुए कौआ प्रसङ्ग आया. अब उन्होंने
क्या लिखा, आप इच्छुक हों
तो आगे पढ़ें
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… ठीक है, कर लो पैदा बच्चे. पर क्या तुम्हे यह भी पता है, ज़िन्दगी कैसे जी जाती है. कभी तुमने कौवे की तरफ देखा है ? उसे जब अण्डे देने होते हैं, तब ताड़ के पेड़ पर जाकर घोसला बना लेता है, अण्डों को सेता है और फिर उन्हें फोड़ता है. ढूँढ-ढाँढ कर उनके लिए दाना लाता है और उनकी तब तक देखभाल करता है, जब तक उनके पंख नहीं निकल आते. एक बार यह हो जाए तो तुम्ही बताओ, क्या रिश्ता रह जाता है माँ और उनके बच्चों के बीच ? वे अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं. अब तुम्हारे पर निकल आये, जाओ जाकर खोजो अपने को. ज़िन्दगी को इसी तरह जीना चाहिए. इसके बजाय हम लोग, बच्चे पैदा करते हैं, पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, उनकी शादियां करते हैं और उनके लिए धन-दौलत जोड़ने के चक्कर में संघर्ष संघर्ष करते रहते हैं. क्या यह भी कोई तरीका है ज़िन्दगी जीने का ?अगर मैं कौआ या कोयल होता, तो मैं भी सोचता बच्चे पैदा करने के बारे में … ‘
- पेरुमाल मुरुगन के उपन्यास ‘ नर – नारीश्वर’ से .
पेरुमाल मुरुगन के
उपन्यास का यह वह अंश है जिसे पढ़ते हुए मुझे कौवे – कोयल
और कोयल का अण्डे सेने, उनकी देखभाल करने के झञ्झट से बचने के लिए चतुराई / धूर्तता
से कौए से यह सब करा लेने के बारे में ख़याल आया.
इस अंश में यद्यपि यह बात नहीं आयी कि कौआ बेचारा धोखे में यह
सब करता है किंन्तु इस अण्श की अन्तिम पंक्ति में कोयल का उल्लेख करके यह संकेत दे
ही दिया कि कौओं से कोयल का सम्बन्ध है, वह सम्बन्ध और क्या होता इनके अण्डे
देने / सेने के बारे में प्रचलित लोकश्रुति के अलावा. उड़ने
लायक बड़ेद हो जाने पर कोयल के बच्चों के मन में देवकी – यशोदा
वाला असमंजस आता होगा क्या –
‘ओ रे कन्हैया ! किसको
कहेगा तू मैया … ‘ जैविक माँ कोयल और पास पोल कर जन्म देने वाला कौआ !
पेरुमान मुरुगन ने
इसी उपन्यास में एक जगह और कौए को याद किया है,
उसकी कर्कश बोली से तुलना करते हुए,
‘ … काली
पोन्ना से कभी भी ऊँची आवाज़ में नहीं
बोलता था. यहाँ तक कि अगर वह उसे खेत में काम करने के लिए आवाज़ देता,
तो भी वह उसे चिल्ला कर नहीं बुलाता था. वह निकट आकर ऐसी
आवाज़ में पुकारता जैसे कोई कौवा उसके गले में अटका हुआ हो. पोन्ना को बुरा लगता था,
वह काली के ऊपर चीखती चिल्लाती थी और उससे झगड़ा करती थी …
‘
कुछ
उपन्यास
के
बारे
में
–
पेरुमाल
मुरुगन का यह उपन्यास ‘नर-नारीश्वर’ तमिल के ‘मादोरुबागन’ का हिंदी अनुवाद है जिसे बद्री वर्मा / मोहन वर्मा ( मोहन वर्मा उनका लेखन नाम है ) उपन्यास काली – पोन्ना की व्यथा कथा है. काली से विवाह के बाद पोन्ना माँ नहीं बन पाती. उन दोनों में बहुत प्रेम है किन्तु सन्तान की कमी महसूस करते हुए भी वे विभिन्न अवसरों पर सन्तान न होने की कमी शिद्दत से महसूस करते हैं. अनेक अवसरों पर समाज में और्फ माङ्गलिक कार्यों में उनका अपमान / बहिष्कार सा
होता है. अपने घनिष्ठ रिश्तेदार भी बांझ होने के कारण पोन्ना और काली को कुछ रस्मों में भाग नहीं लेने देते. फसल के एक उत्सव, बीज बुवाई में पोन्ना को भाग लेने के कारण फसल खराब होनेद की आशंका से लांछित किया जाता है. काली को भी बाज़ार में कई अवसरों पर उसके मित्र ही ताना मारते, नामर्द भी कहते हैं. दोनों समधिने मिल कर काली के दूसरे विवाह की बात करते हैं किन्तु काली मना कर देता है. तत्कालीन समाज में नियोग जैसी प्रथा भी है जिसमें रथयात्रा उत्सव में स्त्री पुजारियों से समागम द्वारा गर्भवती होती है. समाज इसे स्वीकार करता है. काली की माँ, पोन्ना की माँ, काली का साला … सभी लोग रथयात्रा में देवताओं से सन्तान प्राप्ति को सहमत हैं उस पर दबाव भी डालते हैं किन्तु काली मना करता है. क्या हुआ, यह आगे इसी व्यथा का चित्रण है. उपन्यास में पढ़ें
यह उपन्यास एक त्रयी के रूप में है जिसके अगले खण्ड ‘पोन्ना की अग्निपरीक्षा’ और ‘पोन्ना का अभिशाप’ हैं. मोहन वर्मा के उपहार से तीनो मेरे पास हैं व कुछ अन्य किताबें भी.
अनुवाद अच्छा है और सरल शब्दावली में है. तत्कालीन परिवेश और काली का अंर्तद्वन्द्व बहुत अच्छी तरह व्यक्त हुआ है.
यह उपन्यास ‘हार्पर हिन्दी ( हार्पर कॉलिंन्स पब्लिशर्स, इण्डिया) द्वारा प्रकाशित हैं.
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अब
कौओं
पर
कुछ
और
बनाम
साहित्य
में
कौए
कौआ पालतू पक्षी नहीं है किन्तु इसका इन्सानों से सदैव ही निकट सम्बन्ध रहा है. वह मुंडेर
पर बोल बोल कर अतिथि के आने का संकेत देता है तो सुनने वाली उसे दूध – भात
खिलाने और सोने से चोंच मढ़ा देने का आश्वासन देती है, ‘… दूध-भात की दोनी दैहों, सोने
चोंच मढ़ैहों …’ यह आश्वासन कभी पूरा किया या नहीं या कोयल से ठगे जाने के बाद
वह बेचारा ‘धूर्त’ पक्षी प्रतीक्षारत / प्रोषितपतिका
नायिकाकों द्वारा भी ठगा गया ! सालिम अली सहित अन्य पक्षी विशेषज्ञों द्वारा भी इस बारे में
कहीं कुछ नहीं बताया गया, आपको पता हो / इस बारे में अध्ययन किया हो तो आप ही बताएँ.
कौआ बच्चों के साथ खेलने का भी काम करता है, वह उनके
हाथ से रोटी छीन कर ले जाता है,
‘… काग को भाग कहा कहिए जो हाथ सो लै
गयो माखन – रोटी …’
कौए ने यह बाल लीला कृष्ण के साथ ही नहीं, राम
के साथ भी की है, बस वहाँ माखन-रोटी के बजाय पुआ है. राम
आँगन में घुटुरवन चल रहे हैं पुआ भी खाते जा रहे हैं कि कौआ को देख कर उसे बुलाने के
लिए पुआ दिखाते है. वह आता है तो ख़ुश होते हैं, उड़ जाता
है तो पकड़ने के लिए भुजा पसारते हैं और इस बहाने उसे विराट स्वरूप दिखाते हैं.
‘लरिकाईं जहँ जँह फिरहिं तहँ न्तहँ संग उड़ाउँ ।
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ
करि खाउँ ॥
*****
जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥
तब मैं भागि चलेउँ उरगारी । राम गहन कहँ भुजा
पसारी ॥
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखौँ निज पासा ॥
तुलसी का यह कौआ साधारण कौआ नहीं, बड़ा
ज्ञानी ध्यानी है. काकभुशुण्डि नाम है. सुमेरु
पर्वत की उत्तर दिशा में उसका आश्रम भी है जहाँ स्नान – ध्यान आदि के बाद पक्षियों को प्रवचन करता है, राम
कथा सुनाता है. पक्षिराज गरुण भी उसके पास अपनी एक शंका / मोह
का निवारण करने व राम कथा सुनने आये थे. और तो और, इस विलक्षण
कौए की वाणी कर्कश नहीं, मधुर है.
‘करि
पूजा समेत अनुरागा । मधुर बचन तब बोलेउ कागा ॥‘
यह सब तुलसी बाबा ने मानस के उत्तरकाण्ड में बखाना है. मानस
में, अरण्यकाण्ड में एक जगह और कौए का वर्णन है. चित्रकूट
मे फटिक शिला पर राम सीता के साथ बैठे हैं कि उनके बद्धि बल की परीक्षा लेने के लिए
इन्द्र पुत्र जयन्त कौए का रूप धर कर सीता जी के चरण में चोंच मार कर भाग जाता है.
सुरपति सुत धरि बायस बेषा । सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥
सीता चरन चोंच
हति
भागा । मूढ़ मंदमति कारन कागा ॥
पितृ पक्ष में कौओं
का विशेष आदर होता है, उन्हें खीर-पूड़ी आदि अर्पित की जाती है. कओआ
यह खा ले तो माना जाता है कि पितरों तक बलि भाग पहुँचा. निर्मल वर्मा की एक कहानी है, ‘कव्वे
और काला पानी’ उसमें भी अन्त में कौओं का बोलना है जो कहानी को निष्कर्ष बिन्दु
पर ले जाता है. वैसे कौए कर्णकटु स्वर और काले रंग के कारण ही नकारात्मक रूप
में याद किए जाते हैं. किसी गोरी लड़की का विवाह काले लड़के से हो तो विदाई पर एक लोकगीत
का भाव यह रहत्ता है कि ‘मेरी मैदे की लोई ले भागा कागा.’
कौओं पर साहित्य
में इतना ही नहीं, और भी होगा. मैंने इतना ही पढ़ा / इतना
ही याद आया. आपको इनके अलावा याद आ रहा हो तो बताएँ. इस पोस्ट
का समापन अंगिका भाषा में मधुसूदन साहा की कविता से –
कौआ रोजे जावे
छै
सखरी-मखरी खावै
छै।
कहियो बेठै
छप्पर पर
कहियो नैका
टप्पर पर
कहियो उतरी
अंगना में
सुख-सन्देश
सुनावै छै।
ठोचकों मारै ढेरी में
भरलों सूप-चँगेरी
में
मौका मिलथैं
मुनिया के
बिस्कुट तुरत
उड़ावै छै।
कौआ बड़ा सयानो
छै
एक आँख के कानो
छै
साँझ-सबेरे आवी
के
काकी कॅ फुसलावै
छै।
जखनी कौआ ‘काँव’ करै
काकी बाहर पाँव
धरै
बौआ के दुलरावै
ले
शायद काका आवै
छै।"
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