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Tuesday, 16 December 2025

आती है उर्दू ज़बाँ आते आते

नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो

कि आती  है  उर्दू  ज़बाँ  आते आते.

                                   सही बात कही दाग़ देहलवी ने. उर्दू ज़बाँ तो आते-आते आती है,

इस शेर को देने से यह न समझ लीजिएगा कि मैं कुर्ता-पायजामा/ जींस-कुर्ता पर शाल ओढ़ कर, हाथ में लिए, सीने से ऐसे कोई चर्चित/ उर्दू की किताब लगा कर  कि सबको कवर दिखता रहे, देहली के मशहूरजश्न--रेख़्तामें हो आया और उसकी रपट-वपट पेश करूँगा. निशा- ख़ातिर रहें, ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा बल्कि यह पूजा को धन्यवाद है, आभार ज्ञापन है कि उसने मुझेरेख़्ता उर्दू लर्निंग गाइडउपहार दी. नाम में लर्निंग गाइड लगा होने से अंदेशा हो सकता है कि कहीं अंग्रेजी में तो नहीं. अब देख कर मैं निशा-ख़ातिर हो गया कि हिन्दी में है. हिन्दी माध्यम से उर्दू सीखना कुछ कुछ वैसा ही हो सकता है जैसे कुछ ने अंग्रेजी सीखने का प्रयास हिन्दी माध्यम से किया.

                                      अब सवाल ये कि उसने यह किताब मुझे क्यों भेजी ! इसलिए कि उर्दू में मेरी रुचि है, अगर बोलने वाला उर्दू का उद्भट विद्वान न हो, बहुत गाढ़ी उर्दू न बोले तो कुछ-कुछ समझ भी लेता हूँ मगर लिख नहीं सकता, लिखा हुआ पढ़ नहीं सकता. तो उर्दू, खास तौर पर उर्दू गद्य मूल रूप में पढ़ने की इच्छा, लिख सकने की ( उर्दू में साहित्य सृजन नहीं, ऐसे ही नाम-वाम, ख़त वगैरह) सलाहियत आ जाय,  इसे  ध्यान में रख कर भेजी, बहुत शुक्रिया पूजा ! वैसे भी वह बहुत भली, स्नेहवान ( चलन को देखते हुए भी स्नेहवती नहीं कह रहा हूँ ) और संवेदनशील है. कौन सी किताब मेरी रुचि की है/रुचि होगी, किन्तु कतिपय कारणों से मैंने खरीदी नहीं, मुझे व अन्य सुपात्रों को यदा-कदा और अयाचित/ अप्रत्याशित भेजती रहती है. फिर से बहुत-बहुत आभार.

                                            जैसा कि मुझमें कुटेव है कि मैं दीर्घसूत्री प्रवृत्ति का हूँ, समास नहीं, व्यास शैली में बात करता हूँ, विषयान्तर हो जाता है, एक पोस्ट में कई बातें घुसेड़ देता हूँ कि पाठक / श्रोता बोर होने लगता है , बिना पढ़े स्क्रॉल किए जाने/ नीला ठिंगा टिका देने की सम्भावना बढ़ जाती हैइस पोस्ट में भी है. दो वाकया हैं जब मैंने उर्दू सीखने की की ओर कदम बढ़ाया, दो कदम बढ़ा भी मगर ऐसा व्यवधान आया कि सीखना खण्डित हो गया, सीख न सका. वो बयान तो कर रहा हूँ मगर पहले वह बयान होता तो किताब की अभिस्वीकृति और उसे आभार सबसे नीचे चला जाता, बिना पढ़े स्क्रॉलिए उसे देख न पाते सो पहले खण्ड में किया. अब सुनें वो बयान जब मुझे उर्द् क्लासेस ज्वाईन करने के बाद कतिपय कारणों से छोड़ना पड़ा. यह उन लर्नेच्छुओं के लिए सचेतक भी होगा जो सीखने जा रहे हैं कि वे ऐसे व्यवधान आने पर भी लर्नपथ से न डिगें.

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एक बार, जुलाई, 2018 में, कपूरथला, लखनऊ में एक संस्था ( नाम अब याद नहीं) द्वारा उर्दू सिखाने का कैम्प . कैम्प मतलब टेण्ट वेण्ट लगा कर नहीं, वहीं के एक हॉल में, लगा. ऑफलाइन था, शाम को दो घण्टा क्लास होती थीं. हमने भी नाम लिखाया. तन्मयता से सीख भी रहे थे, दो ही क्लास अटेण्ड किए थे कि हम लोगों ने एक मित्र के साथ बिठूर जाने का कार्यक्रम बना लिया. दोनों मित्र सपत्नीक सुबह निकले. खूब मज़े किए, स्नान-दर्शन वगैरह करके दोपहर में लौटे. वे मित्र राजाजीपुरम में उतर लिए, हम लोग दुबग्गा की तरफ से लौट रहे थे कि दुबग्गा मोड़ के पास आकर विचार बना समधियाने होते चला जाए. सोचा कि एक घण्टा बैठेंगे. वहाँ गए तो घण्टा भर बाद हमने वापसी की अनुमति मांगी तो उन्होंने और रुकने का आग्रह किया. हमने बताया कि हमारी क्लास है तो उन लोगों को आश्चर्य हुआ, ‘अब काहे की क्लास ?’  जब बताया तो बोले, ‘अरे छोड़िए क्लास-व्लास, इतने दिन बाद तो आये हैंकुछ देर बाद फिर जाने को कहा तो बोले कि अब इस उम्र में ये क्या झञ्झट पाल लिया. बैठिए, मछली बनवाते हैं, खाना खाकर ही जाईएगा. अब रिश्ता ऐसा कि अधिक कुछ कह न सकते थे, ऊपर से ऐसा प्रेमपूर्ण आग्रह फिर यह भी कि क्लास के पक्ष में हमारे अलावा कोई नहीं, श्रीमती जी भी नहीं. बहुमत के आगे समर्पण कर दिया और खाना वगैरह खा कर रात को ही लौटना हुआ.

                        खाली यही एक दिन का व्यावधान न था, अभी और भी सुनें. हुआ यह कि नदी में से पत्नी वर्ग तो डुबकी मार कर, थोड़ा नहा कर निकल आया पर हम दोनों ( मैं और मित्र जुगुल ) करीब एक घण्टा पानी में रहे. उस समय तो कुछ नहीं लगा मगर घर लौटते न लौटते थकान और बदन दर्द करने लगा. सोने के समय तक बुखार और जुखाम ने भी पकड़ लिया. तीर्थ स्नान और दर्शन का जो फल मिला हो, हम शहरातियों को नदी में इतना नहाने का फल मिल गया, तुलसी बाबा भी कहे हैं, … मज्जन फल पेखिय तत्कालातो हम लोगों को मज्जन फल तत्काल मिला. बुखार आदि ने तीन दिन लिया. अब इतने दिनों की क्लास छूट गयी तो अब जाकर क्या करता, वैसे भी दो दिन की क्लास और बची थी. इस तरह मेरा यह प्रयास विफल हुआ. बाद में पता चला कि मज्जन फल केवल मुझे ही नहीं मिला, जुगुल भी तीन दिन इन्हीं सब से पीड़ित हुए.

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दूसरा वाकया पहले के कई साल बाद ऑनलाइन क्लास का है. अभिषेक शुक्ल उर्दू के अच्छे जानकार, अध्येता हैं, शाइर भी हैं. मुशाइरों में भी शिरकत करते हैं और एक ग़ज़ल संग्रहहर्फ़ ए आवाराराजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुका है जो अमेज़न पर भी उपलब्ध है. इसके अलावा स्टेट बैंक में अधिकारी भी हैं, व्यक्तिगत मित्र तो हैं ही. वे उर्दू सिखाने की ऑनलाइन क्लास भी संचालित करते हैं. पूजा इन दिनों उनकी क्लास अटेण्ड कर रही है.

                                तो मैंने उनकी क्लास अटेण्ड करने की सोची, न केवल सोची बल्कि की भी. क्लास रात में होती थी. तीन दिन क्लास अटेण्ड की. अच्छा सिखा रहे थे और मैं सीख भी रहा था. अब तक सिखाया लिख-पढ़ लेता था. गृह कार्य के रूप में अभ्यास भी करता था  कि भतीजे की शादी आ गयी. और शादियों में तो एक या दो दिन, बारात और रिसेप्शन के दिन जाना होता है मगर यह घर की शादी थी तो सारे कार्यक्रमों यथा, छेईदरेती, तेल-मैनसबमें जाना था. गए भी. जब क्लास का समय हुआ तो ड्राईंग रूम में मोबाईल, पेन और कागज के साथ आसन जमाया. अब शादी वाला घर, तमाम मेहमान भरे हुए और मैं मोबाईल लेकर क्लास अटेण्ड कर रहा. हेडफोन यूजता नहीं हूँ तो वाल्यूम ऑन करके सुन रहा था. महिलाओं का कार्यक्रम अन्दर था मगर ड्राईंग रूम में भी लोग थे, शोर भी था और वे लोग कौतूहल से मुझे देख रहे, खास तौर पर किशोर और युवा वर्ग कि ताऊ जी ये क्या कर रहे हैं ? इतने व्यवधान के बीच भी क्लास की मगर श्रोता/ दर्शक वर्ग को क्या, मुझे भी बहुत अटपटा लग रहा था, असुविधा भी हो रही थी. दूसरे दिन माङ्गलिक कार्यक्रमों से हटने की गुंजाइश न थी. उसके बाद बारात और एक दिन छोड़ कर रिसेप्शनइन सबमें यह प्रयास भी सफल न हो सका. सकल पदारथ हैं जग माही, भाग्यहीन नर पावत नाहीं 

                                       इस असफल प्रयास के बाद कोशिश न की. कुछ और चीज़ो के ( जैसे तैराकी, ड्राईविंग, संगीत, योग और ध्यान … ) साथ  पूजा ने अभिषेक शुक्ल की क्लास अटेण्ड करना शुरू की और मुझे यह किताब भेजी. अच्छी किताब है. ऑनलाइन / ऑफलाइन सीखने की अपेक्षा इसमें कमी यह कि यह किताब पढ़ना-लिखना तो सिखा सकती है, तलफ़्फ़ुज (उच्चारण ) नहीं सिखाती. प्रत्यक्ष सिखाने वाला उर्दू शब्दों का सही उच्चारण भी सिखाता है, आप सुनकर सीख सकते हैं कि कौन सा शब्द कैसे बोला जाता है. किताब से सीखने में सुविधा यह कि अगर बीच में व्यवधान आ भी जायें ( जैसे मेरे आए या और भी तरह के ) तो भी आप वहीं से शुरू कर सकते हैं जहाँ से छोड़ा था, पिछले सबक भी दोहरा सकते हैं. किताब और प्रत्यक्ष सीखने/सिखाने की बात अलग है, अगर व्यवधान न आयें, आयें तो उनसे निपट सकें तो मैं किताब के बजाय उनसे सीखने की संस्तुति करता हूँ.

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आप उर्दू लिपि पढ़ना और लिखना सीख भी जाएँ तो इसके यह मानी थोड़े ना कि आप उर्दू साहित्य से परिचित हो गए, अदबी उर्दू लिखनेबोलने लगे. अरे भई !  आओ उर्दू सीखेंटाइप के कोर्स करके या यू ट्यूब पर अथवा ऑफलाइन/ऑनलाइन सिखाने वालों के क्लास अटेण्ड करके आप सिर्फ उर्दू लिपि को पढ़ना और उस लिपि में लिखना सीखते हैं, उसके अदब में नहीं उतर जाते, उसमें निष्णात नहीं हो जाते. लिपि पढ़ लेना, उस लिपि में लिख लेना, सही उच्चारण के साथ बोल लेने का मतलब पूरी तरह नहीं कि आपको उर्दू आती है. यह समझ आंशिक ही है, भाषा ज्ञान का मतलब यह नहीं कि आप उसके साहित्य में भी उतर गए और साहित्य रचना करने लगे. ऐसा सभी भाषाओं के साथ होता है. हिन्दी में भी है , संस्कृत में भी व अन्य किसी भी भाषा में. हिन्दी  हमारी मातृ भाषा है, लिख-पढ़-बोल-समझ लेते हैं किन्तु इतने भर से आप हिन्दी के विद्वान थोड़े न हुए. यह सब आरम्भिक / बेसिक जानकारी है. अधिक या गहन जानकारी के लिए आपको साहित्य मेंशास्त्रीय / क्लासिक साहित्य से लेकर आधिनिक / समकालीन साहित्य में उतरना होगा, ‘नई वाली हिन्दीको भी जानना होगा. इसके बावजूद आप विद्वान न हुए, उसके लिए तो पूरा जीवन कम है, हाँ कुछ लोगों से अधिक जानते हो सकते हैं तो तमाम लोगों की अपेक्षा बहुत कम जानने वाले हुए. बिना साहित्य में गहरे पैठे आप उस भाषा के प्रयोक्ता भर हुए. ऐसे ही हिन्दुओं में कर्मक़ाण्ड/ पूजा पाठ कराने वाले पण्डित यह सब संस्कृत में ही सम्पन्न कराते हैं तो वे संस्कृत के विद्वान थोड़े न हुए, वे भी प्रयोक्ता भर हैं. तो कहने का आशय यह कि उर्दू ही नहीं, कोई भी ज़ुबाँ आती है आते आते ! 


                                                       वह तो भला हो उर्दू अदब को हिन्दी में अनूदित करने और उसे देवनागरी लिपि में लिखने/प्रकाशित करने वालों का कि मुझे ही नहीं, बहुतों को उर्दू अदब से परिचित होने का मौका मिला. इसमें बहुत बड़ा योगदान मुशायरों का भी है, श्रोता/ दर्शक के रूप में शामिल होकर नामचीन से लेकर नवोदितों तक के कलाम सुने तो रुचि और समझ भी हुई. उर्दू की शाइरी वाली अल्पमोली/ पेपरबैक किताबें भी खूब निकलीं जिनका दाम कम पर सामग्री स्तरीय होती थी. शाइर केन्द्रित किताबें भी होती थीं जिनमें एक शाइर की जीवनी, उसकी शाइरी की विशेषता/ विश्लेषण और चुनिन्दा कलाम होता था, सोने पर सुहागा यह कि कठिन शब्दों के अर्थ भी दिए होते थे. अब भी ऐसी किताबें आती हैं, शाइरी के अलवा उर्दू गद्य भी अनुवाद के माध्यम से हम तक पहुँचा, इनमें भी हर पेज पर नीचे लाइन खींच कर कठिन शब्दों के अर्थ  भी दिए होते थे. मुशायरों और इन किताबों से हम न केवल उर्दू अदब से परिचित हुए बल्कि यह मुगालता भी होने लगा कि हमें उर्दू आती है. अब एक ही कसर रह गयी थी, वह यह कि हम उर्दू लिपि न पढ़ सकते थे, न ही उस लिपि में कुछ लिख सकते थे. दूसरे यह भी कि मूल किताबों को पढ़ने की इच्छा भी जाग्रत होने लगी. वैसे तो तमाम भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं के विपुल साहित्य में से कुछ हिन्दी अनुवाद के माध्यम से ही पढ़ा किन्तु उन भाषाओं को सीखने की ललक न हुई. उर्दू की इसलिए हुई कि यह भाषा हिन्दुस्तानी हैहिन्दी और उर्दू की खिचड़ी. दोनों ऐसे मिली हुई और आम बोलचाल में बोली जाती हैं कि कहना मुश्किल है कि हम उर्दू बोल रहे हैं या हिन्दी. आम बोलचाल की भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दों की भरमार हो तो वह शुद्ध हिन्दी और फारसी के या उर्दू के साहित्यिक शब्द की भरमार हो तो उर्दूवरना दोनों में कोई अन्तर नहीं. तो इस भाषा की लिपि से परिचित होने का शौक़ चढ़ा. यही कारण है कि लोग उर्दू सीखना यानि कि उस लिपि को पढ़ना और लिखना सीखने की ओर उन्मुख होते हैं.

                हम भी लोग में ही आते हैं  तो हम कैसे न उन्मुख होते, हुए मगर देर से हुए, यह और बात  कि दो प्रयास हुए. हमारी ही तपस्या में कमी रही होगी वरना सिखाने वाले तो समर्पित रहे, काबिल रहे.

 

Saturday, 13 December 2025

कैब वाला कवि !

 

कैब वाला कवि !



कैब वाला कवि !

11 दिसम्बर को राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह, कैसरबाग, लखनऊ में 'अवधी समारोह -2025' का आयोजन हुआ. वृहद आयोजन था, पूरे प्रदेश व नेपाल से अवधी प्रेमी और साहित्यकारों ने भागीदारी की. दिन भर का आयोजन था, 11:00 बजे से होना था किन्तु पंजीकरण आदि में समय लगता अतः आगन्तुकों से 10:00 बजे आने का अनुरोध किया गया. मैं भी घर से करीब 9:45 पर निकला. कैब बुक की. जो कैब आयी उसके ड्राईवर महोदय बड़े बातूनी और रोचक थे, घर से थोड़ी दूर निकलने पर पता चला कि वे कवि भी हैं. शायद यह भी उनके बातूनी होने का कारण था. बातें तो कैब स्टार्ट करने के पाँच मिनट के अन्दर ही शुरू कर दीं. 

पूछा, 'राय उमानाथ बली वही ना जिसमें नाटक वगैरह होते हैं ?'

'हाँ वही !'

'तो नाटक तो शाम को होते हैं, अभी से क्यों जा रहे हैं ?' उन्होंने कौतूहल व्यक्त किया.

             कोई भुन्नहा होता तो कह देता कि आपसे मतलब ? मैं चाहे जिस समय जाऊँ, आपको क्या ! आप गाड़ी चलायें बस ! लेकिन एक तो मैं भुन्नहा नहीं, दूसरे उनका लहजा बहुत नर्म, शिष्ट था, लग रहा था कि सहज जिज्ञासा है बस. सो बताया,

'नाटक नहीं, आज एक दूसरा कार्यक्रम है, 'अवधी समारोह' उसमें दस बजे पहुँचना है.'

'इसमें क्या होगा ? कैसा कार्यक्रम होगा ?'

'इसमें अवधी भाषी लोग, लेखक और कवि इकट्ठा होंगे. एक किताब का विमोचन होगा, अवधी पर चर्चा और फिर अवधी कवि सम्मेलन होगा.'

'अवधी वही भाषा ना जो हमारी अम्मा, दादा और बूढ़ पुरनिया बोलत रहें.'

'हाँ वही. अवधी तो हम लोगों की मातृभाषा है. लखनऊ के आस पास रायबरेली, उन्नाव, बैसवारा, बाराबंकी, गोण्डा, फैज़ाबाद, लखीमपुर वगैरह की भाषा अवधी है और अवधी तो नेपाल में भी बोली जाती है.'

'हैं नेपाल में भी !' उसने आश्चर्य से कहा.

'हाँ, वहाँ तो अवधी माध्यम से पढ़ाई भी होती है. आख़िर सीता जी का मायका है और राम जी तो अवध के हैं.'

'आप पहाड़ी टोपी लगाए हैं, उधर के हैं क्या !'

'नहीं, हम तो लखनऊ के ही हैं. टोपी तो इसलिए लगाए हैं कि ठण्ड है और भाभी नहीं रहीं तो बाल बनवाए थे.'

         फिर कुछ प्रसङ्ग चलने पर उसे कुमाऊंनी, गढ़वाली और नेपाली टोपी का फर्क बताया. इतनी बातें इसलिए भी कि वह शिष्ट और दिलचस्प था, मैं भी बातें कर रहा था और रास्ते में ट्रैफिक बहुत था सो डण्डइया तक में इतनी बातें हो गयीं.

अचानक उन्होंने पूछा, 'आप भी कवि हैं?'

'नहीं, मैं कवि नहीं पर लिखने पढ़ने का शौक़ है.'

'किस विधा में लिखते हैं ?'

'यही, लेख और कहानी वगैरह.'

              अब उन्होंने उजागर किया,

'मैं भी लिखता हूँ.'

'अरे वाह ! किस विधा में.' उन्हें उकसाया.

'मैं कविता लिखता हूँ लेकिन हास्य कविता, प्रेम पर और थोड़ा राजनीति, समाज, देश प्रेम पर भी.'

        फिर थोड़ी इस पर बात हुई कि आज के दौर में हास्य और प्रेम की अधिक ज़रूरत है. बताया कि कई कवि सम्मेलनों में पढ़ चुके हैं, दूरदर्शन पर भी कई बार पढ़ीं, पुरस्कार भी मिले. इसी क्रम में यह व्यथा भी कही कि लोग सोचते हैं कि यह कैब ड्राईवर है, साहित्य से क्या मतलब ! इतनी समझ कहाँ होगी. बात सही है, लोग पेशे और सामाजिक स्तर से भी आंकते हैं. दिलासा दिया, कुछ उदाहरण भी दिए.

              अब हम आई.टी. पार कर रहे थे. रिजर्व पुलिस लाईन के पास बोले, 'मंज़िल आने वाली है, ज़ल्दी से आपको कुछ सुनाता हूँ.' और कई दोहे, एक मुक्तक वगैरह सुनाया. सच कह रहा हूँ कि झेला नहीं रहे थे. दोहे कथ्य की और छन्द शास्त्र की दृष्टि से सही थे, आनन्द आ रहा था. लखनऊ पर एक नज़्म भी सुनाई जिसमें पुराना और नया लखनऊ (लुलु, पलासियो आदि ) भी था. समय कम था और बातें रोचक सो  कहते-कहते भी रौ में उन्होंने गाड़ी प्रेक्षागृह के गेट से थोड़ा आगे रोकी. पैसे देने के साथ फोन नम्बर लिए-दिए, फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेजी. पता चला कि वर्मा हूँ तो और ख़ुश हुए, पूछ ही लिया, 'सर, कौन से वर्मा हैं ? हम तो ... वाले हैं. हमने अपना बताया. बड़ा बढ़िया, रोचक और दोस्ताना सफर कटा. और भी बातें हुईं और ताज्जुब यह कि इतने संक्षिप्त समय में, ड्राईविंग के दौरान.

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ऐसा ही वाकया एक बार पहले भी हुआ कि पेशे से ऑटो ड्राईवर की किताबों में रुचि देखी.

लखनऊ विश्वविद्यालय में NBT के 'गोमती पुस्तक मेला' की तैयारी चल रही थी. उद्घाटन की पूर्व संध्या पर हम दोनों बुक किए ऑटो में अमीनाबाद से घर (जानकीपुरम) जा रहे थे. युनिवर्सिटी के पास पहुँचने पर हमने श्रीमती जी से कहा कि कल के लिए मेले की तैयारी आख़िरी दौर में है. ऑटो वाले ने जिज्ञासा प्रकट की,

'यह कैसा मेला है ?'

'पुस्तक मेला है, किताबों का मेला. सौ से ज़्यादा स्टॉल लगे हैं जिनमें प्रकाशक और विक्रेता किताबें लेकर आये हैं. लाखों किताबें होंगी.'

'किताबें खाली देखने को होंगी या बिक्री के लिए भी.'

'बिक्री के लिए भी मगर देखने पर कोई रोक नहीं, ज़रूरी नहीं कि खरीदें भी.'

'कैसी किताबें होती हैं ?'

'सब तरह की ! कविता, कहानी, उपन्यास, धार्मिक, राजनीतिक - सब तरह की.'

'मेडिकल की भी ?'

           अब मैं चौंका. वही बात कि कौतूहल तक तो ठीक ! मेडिकल की किताबों में ऑटो वाले की रुचि ! ये और मेडिकल ! बताया,

'हाँ होंगी ! कोर्स की भी होती हैं, कम्पटेटिव एक्ज़ाम की भी.'

'नहीं, वो नहीं. मतलब, आयुर्वेदिक इलाज, घरेलू नुस्खे की भी होंगी.'

'हाँ, क्यों नहीं ! ये भी होती हैं.'

'जाएंगे किसी दिन.'

               तब तक घर आ गया था तो बात खतम हुई.

            **********

कैब ड्राईवर की बातों में पेशे और सामाजिक स्तर के आधार पर आकलन किए जाने की जो पीड़ा व्यक्त हुई वह सही ही है. हममें से अधिकांश लोग यही धारणा रखते हैं. इससे भी बढ़कर क्षुब्ध करने वाली बात यह कि बात करने, साहित्य या कला सम्बन्धी काम देख कर, सुन कर कायल होते हुए भी विश्वास नहीं कर पाते. इतना उच्चताबोध और ऐसे वर्ग के लिए हिकारत भरी है कि कहते हैं, ' ... होते हुए भी यह खूबी !' यह जो '... होते हुए भी ' पूर्वार्ध है वह बिना नग्न रूप में कहे हुए भी कह जाता है कि यह तो हमारे वर्ग का अधिकार और योग्यता है, इसकी नहीं. इसमें कैसे ?

       खास बात यह कि 'उस वर्ग' की काबलियत से हैरत उसे अधिक होती है जो समान पेशे/क्षेत्र में होता है. एक मज़दूर, सब्ज़ी वाले, कबाड़ी, छोटे दुकानदार, रिक्शावाले की साहित्य/कला में प्रतिभा से अन्य लोगों को उतनी दिक्कत नहीं होती जितनी साहित्यकार/कलाकार को. और लोग उतने स्तब्ध नहीं होते जितने ये उथले कलाकार/साहित्यकार. कोई दुधहा अगर पहलवान हो तो वह इन्हें स्वीकार्य है पर वह कवि, लेखक या पेण्टर (माने चित्रकार) है तो इन्हें दिक्कत हो जाती है. घोसी, पानवाला, लुहार ... कुछ हो मगर साहित्यकार/कलाकार कैसे हो सकता है.

यह उच्चताबोध/दम्भ केवल पेशे के आधार पर ही नहीं, जाति के आधार पर भी होता है. जाति व्यवस्था में चौथे व उससे भी नीचे स्थान में जन्मा कोई साहित्य में, कला में, खेल में, शारीरिक दक्षता में कैसे 'हमसे' आगे या बराबर है ? यह कटु यथार्थ स्वदेश दीपक के नाटक 'कोर्ट मार्शल' में नग्न रूप में व्यक्त है. यह तो यह, 'इन्हें' इस वर्ग का मूंछ रखाना, बुलेट पर चलना, घोड़ी पर बारात ले जाना, चारपाई पर बैठना ... स्वीकार नहीं होता. यह कोई गुज़रे ज़माने की बात नहीं, अब की भी है. अक्सर अख़बार में निकलता रहता है. लगता है यह सिर्फ कहने, पढ़ने भर की बात है, गुनने की नहीं -

'तुलसी या संसार में सबसे मिलिए धाय । ना जाने किस भेष में नारायण मिल जाँय ||'

(चित्र AI से बना है, जान कर उनकी असली फोटो नहीं लगाई मगर बातचीत बिल्कुल असली है, बल्कि कुछ बातें छूट गयी हैं. आपकी तरह मुझे भी लग रहा कि लगभग दस किलोमीटर के सफर और करीब पैतालिस मिनट में विमर्श सहित इतनी बातें कैसे हुईं, मगर हुईं !)