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Tuesday, 4 August 2020

मानस की अंर्तकथा

मानस की अंर्तकथा

मड़ैया के बाहर चबूतरे पर अधेड़ वय का एक आदमी खुपरिया पर हाथ धरे अनमना सा बैठा था. लोग -जा रहे थे मगर वो सब देखते हुए भी मानों किसी को देख नही रहा था. पहनावे और धज से वो कोई भगत लग रहा था. एक धोती मात्र पहने, ऊपर के बदन पर जनेऊ बस और माथे पर तिलक. सर घुटा हुआ और सिरोमूल पर गौ खुर के बराबर मोटाई की शिखा. वो ध्यान में नही बल्कि चिंतामग्न था. बीच-बीच में कपार से हाथ हटा कर, ‘हो मोरे राम, अरे राम होकह उठता तो कभी किटकिटा उठता. लोग भी देखते तो अनदेखा करते हुए निकल जाते. मड़ैया के बीच में दरवाजा था, दोनो तरफ चबूतरा था जिस पर छप्पर छाया हुआ था. आले में एक दीपक रखा था और दो आसनी चबूतरे पर गोल करके रखी हुई थीं. कुटिया का दरवाजा खुला था और दिख रहा था कि अन्दर कुछ पुस्तकें, कुछ कागज, मसि पात्र और कागजों का पुलिन्दा रखा था और एक ग्रन्थ सा भी बंधा रखा था. कागजों के पास एक थाली में दूसरी थाली से कुछ ढका हुआ रखा था और पास में एक लोटा और एक घड़ा जिस पर मिट्टी का ही ढक्कन था. अन्दर रखे सामान से निश्चित रूप से वह कोई कवि था और कुछ लिखते या पढ़ते में ऊब कर बाहर आकर बैठ गया था. अन्दर अलगनी पर एक दो धोतियां और रामनामी चादर टंगी थी. यह भी आभास होता था कि उस घर में कोई घरनी नही थी क्योंकि तो अलगनी पर कोई जनानी धोती-ओढ़नी वगैरह थी और ही रसोई का कोई चिन्ह. सम्भवतः वह कहीं से मांग-जांच कर खा लेता था या यजमान दे जाते होंगे. इतने कम सामान और घरनी के होने से निश्चिन्त जीवन में भी जाने क्या चिंता थी उसे जो मूड़ पर हाथ धरे चबूतरे पर बैठा था और बीच-बीच में  ‘हो मोरे राम, अरे राम होका उच्छवास भर रहा था.  

पाँय लागी महराज ! का भवा ! सब ठीक तो है ना ! कुछ ज्वर कि उदर  शूल कि बाहु पीड़ा वगैरह तो नही ? “

 “अरे कौन है भाई ?”

हम हैं महराज, चरनदास ! आपका ऐसे कपार पे हाथ धरे बैठे देखा तो आशङ्का हुई कि कुछ गड़बड़ है !”

अरे नही भाई ! कुछ नही, ऐसे ही जी उचाट है .”

ऐसा का भवा महराज ! तनि हमे बताईये तो कुछ उपाय किया जाय. मगर ठहरिये, सञ्झा  बेरिया हो रही, अँधेरा हो रहा और दिया-बाती भी नही की. आप बैठें , हाथ-मुह धो के चैतन्य हों और दिया-बाती करें , बैठ कर बात की जाय तो आपका कुछ जी हल्का हो. कोई समस्या हो तो हम हैं ना आप सबके सेवक, चरनदास

चरनदास के साथ इतनी बातचीत से ही तुलसीदास का जी कुछ संभला, वे कुटिया के अन्दर गये, दिया बाती की और एक दिया बाहर चबूतरे के एक आले में रखा और लोटे में पानी लेकर हाथ मुह धोने लगे और चरनदास ने एक आसनी बिछाई और वहीं बैठ गया. अब हाथ-मुँह धोकर धोती के छोर से मुह पोंछते हुए तुलसी भी उसके पास आसनी डाल कर विराजे.

चरनदास बहुत चलता-पुर्जा और धूर्त प्रकार का व्यक्ति है और धूर्त के लक्षणों के अनुरूप ही बहुत मधुरी बानी बोलता है. करता धरता स्थायी रूप से कुछ नही मगर हर काम में उसका दखल है. कौन सा काम ऐसा है जो वह करा नही सकता. हर काम के लिए काम के लोगों से उसके सम्बन्ध हैं और इसी में वह चार पैसे का डौल भिड़ा लेता है. जिसका काम कराये, उससे तो कुछ कुछ लेता ही है, जिसके द्वारा काम कराये, उससे भी कुछ कुछ खींच ही लेता है. खुले तौर पर कहें तो दलाल किस्म का आदमी है. कोई उसके चक्कर में फंसना नही चाहता मगर वहशिकारकी हालत भाँप कर ऐसी सहानुभूति दिखाता है, ऐसा बिछा जाता है कि अगले को लगने लगता है और तो सब उसकी विपदा में साथ नही दे रहे, कट कर निकल जाते है और एक ये है कि हर मदद को तैयार.

इधर ये चरनदास तुलसी को यूँ बैठा देख कर पास आया कि कुछ काम का डौल बंधे तो उधर तुलसी भी चिन्ताग्रस्त किसी सहारे को ही सोच रहे थे. रामचरित मानस वो लिख चुके थे. अवधी में अद्भुत ग्रंथ था. इससे पहले के धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे जो पण्डितों की भाषा थी. आम जनता को समझ आती और जिन्हे आती भी, उन्हे धर्मधुजी छूने / बाँचने देते. ऐसे में तुलसी ने लिख तो लिया किन्तु पाण्डुलिपि भर थी उनके पास. काशी के पण्डित उनका बहुत विरोध कर रहे थे कि पूज्य राम कथा को भाखा में लिख दिया, सब लोग पढ़ेंगे तो हमारा क्या होगा. तुलसी इसे छपवाना चाहते थे कि इसकी अधिक से अधिक प्रतियां हों, कम से कम दाम पर या निःशुल्क बाँटी जांय तो जन-जन में राम कथा का प्रसार हो. अनेक प्रयास कर चुके थे किन्तु कोई प्रकाशक तैयार हुआ और ही कोई प्रतिलिपिकार. जिन एक दो प्रकाशकों  ने रुचि भी दिखायी तो पैसा इतना मांगा कि तुलसी ग्रंथ की गठरी उठा कर लौट ही आये. पैसा कहाँ धरा था तुलसी के पास ! “मांग के खाईबो, मसीत में सोईबोवाली वृत्ति थी तुलसी की. ऊपर से स्वाभिमानी इतने कि कहते ही थे काहू की बेटी सो बेटा बियाहिबोसम्पत्ति थी नही और कुछ ऐसा करते थे कि धन आवे. रामभजन ही  उनका जीवन आधार था और राम के बाद जो आराध्य देव थे वे थे हनुमान जी तो वे और तो सब देते थे, धन नही. तुलसी भी तो यही मांगते थे, “बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु कलेस विकारधन की मांग तुलसी ने की और ही हनुमान जी ने इस विषय में कोई विचार किया. राम से भी हर बारदेहु भगति मोहि अनपायनीही मांगा. अब आत्मिक  सुख तो भगति से मिला परन्तु ग्रंथ की अनेक प्रतियां बनवा कर , ज़िल्दबंद कराने को तो भौतिक धन चाहिये, सो तुलसी के पास था नही. एक बार तो यह सोचा कि स्वयं ग्रंथ की प्रतियां बना कर वितरित करें किन्तु इसमें तो बरसों लग जाते. यही विकलता उन्हे घुलाए दे रही थी कि भाखा में रामचरित का गान किया कि जन-जन तक पहूँचे और धन के अभाव में पहूँच ही नही पा रहा. उधेड़बुन में थे कि चरनदास ने बात छेड़ी,

का महराज ! दिया-बाती कर चुके, संध्या वंदन हो गया किन्तु अब भी गुमसुम ! मुझसे तो देखा नही जा रहा. अपना हितू जान कर मुझसे कहें, हो सकता है मै कुछ सहायता कर सकूँ.”

उच्छवास सी भरकर तुलसी बोले, “ क्या कहें चरनदास ! इतने भाव और परिश्रम से रामचरित मानस लिखा किन्तु कोई प्रकाशक तैयार नही. जन-जन में भाखा में राम कथा के प्रसार का मेरा सपना अधूरा ही रह जायेगा क्या ! अब धन तो मेरे पास है नही कि ग्रंथ प्रकाशित करवा सकूँ. “

चरनदास की आँखों में चमक आयी कि प्रकाशन की व्यवस्था करूँ तो तुलसी से भी कुछ खींच लूँ और प्रकाशक से भी. प्रतिलिपिकार तो उसका साला ही है जिसे उसने अपने सम्पर्कों की बदौलत यह काम शुरू कराया था और काम दिलाता भी है सो मुफ्त में या कम से कम दाम पर प्रतिलिपियां भी हो जायेंगी, प्रकाशक से तो बाज़ार दर से कुछ कम पर शुल्क लेगा तो प्रकाशक भी खुश और उसकी भी कुछ बचत इधर से भी. उसने सुन रखा था कि तुलसीदास जी की पहुँच राजदरबार तक है. खानखाना अब्दुर्रहमान रहीम तो इनके परम मित्र हैं और बादशाह अकबर भी कई बार बुलावा भेज चुके हैं. मीराबाई  भी इनको बहुत मानती हैं और वे राजघराने की हैं. वो किसी से कह देंगी तो ग्रंथ चुटकियों में प्रकाशित हो जायेगा तब मेरा क्या  काम ? उसने हिला हिला कर पक्का कर लेने की नियत से पूछा,

महराज ! आपके पास धन नही किन्तु रहीम जी तो अपके मित्र हैं, बादशाह अकबर भी आपको बुलावा भेजते हैं. उनसे इस सम्बन्ध में चर्चा नही की क्या ? वे चाहें तो राजकोष से ही व्यवस्था हो जाय या फिर राजकीय पुस्तकालय से ग्रंथ प्रकाशित जाय.”

नही चरनदास ! यह मेरा स्वभाव नही. उनसे काव्य चर्चा होती है, धर्म और भक्ति पर बात होई है, उस चन्दन में मै स्वार्थ की कीच मिलाना नहीं चाहता. मैं तो रोटी भी किसी से नही मांगता. यजमान दे जाते हैं नही तो तुलसीदल खाकर सो रहता हूँ. मेरा जो कुछ है वह यह राम गुन रचना है, अब उसके लिये किसी से भीख मांग कर अपने को और प्रभु को क्यों छोटा करूँ.”

यह जान कर चरनदास को बहुत सन्तोष हुआ. कहीं तुलसी के मन में उन लोगों से सहायता लेने की बात जाती तो उसका कोई काम ही था. अब सोचने लगा. प्रतिलिपिकार तो तय कर ही चुका था, अब प्रकाशक तय करना शेष था. परिचितों की ओर मन के घोड़े दौड़ाने लगा किरामकृपा प्रकाशनका नाम कौंधा. हाँ, यह ठीक रहेगा. है तो कांईया, पूरा व्यापारी है मगर भगत भी है. प्रतिष्ठान का नाम भीरामकृपा प्रकाशनरखा है. रामचरित मानस के लिये सस्ते में तैयार हो सकता है. अब तुलसी से कुछ कैसे खींचूँ. इनके पास तो फूटी कौड़ी नही दिखती. हाँ कुछ जेवर वगैरह हों तो काम चल जायेगा. चलो टटोलने में क्या जाता है.

महराज ! यह तो राम का काम है और मै जब तक यह करा दूँगा, चैन लूँगा. राम काज कीन्हे बिना मोहि कहाँ विश्राम. एक-दो प्रकाशकों को मै जानता हूँ और प्रतिलिपिकारों को भी, तो काम तो बनता दिखता है. मगर महराज, आप तो ठहरे भगत आदमी और मेरे लिये यह आपका और राम का काम है मगर और लोग तो कुछ नही तो लागत तो लेंगे ही. राम का काम जान कर लागत में से भी कुछ छोड़ दें तो भी वो तो संसारी जीव हैं, उन्हे तो चाहिए ही. कुछ है आपके पास ?”

मेरे पास कहाँ कुछ ! अगर होता तो काहे का झींखना था, अब तक प्रकाशित करा चुका होता.”

महराज ! मैं क्या आपकी साध और हालत जानता नही. कौन सा पूरा पैसा लग रहा है ! लागत से भी कम लगेगा. नगद तो कुछ गहना-गुरिया तो होगा.आप जैसे विरागी उसको रख कर क्या करेंगे. कुटिया भी खुली रहती है, कोई चोर ले गया तो रह जायेंगे छूछे !  अपनी साध पूरी करने में लगाईये ना इस धन को. अब चलता हूँ, प्रकाशक से बात करके कल दोपहर में आता हूँ, तब साथ चलेंगे. समझिये कि रामचरित मानस का प्रकाशन हो गया और यह जन-जन तक पहुँच गया, जैसी आपकी साध है. अच्छा परनाम ! कल आता हूँ.”

चरनदास तो चला गया मगर तुलसी के मन में आस जगा गया. उपाय भी बता गया. गहना- गुरिया ! हाँ धरा तो है कुछ एक सन्दूक में. अब क्या है, कुछ याद नही रहा. रत्ना के लिये गढ़ाया था. अब जब बरसात की उस रात को रत्ना ने तिरस्कार और घृणा से भगा दिया तो बात ऐसी लगी कि सब लौकिक विषय-वासना उसकी झिड़की के साथ ही बह गयी. तब से वह लौटी और ही तुलसी उसे लेने गये. उसका जो सामान था, वैसे ही रखा रहा. अब जब रत्ना ही नही तो गहना रख कर क्या करूँगा ? अच्छा है, राम काज में लग जाये. सोच-विचार करते हुए तुलसी ने कुटिया के कोने में रखा सन्दूक खोला. रत्ना की साड़ियां थीं और उसके नीचे एक पुटकिया में गहने बँचे थे. साड़ी हटा कर पुटकिया निकालते हुए तुलसी विचलित हुए, लगा जैसे रत्ना को ही स्पर्श कर रहे हों और वह कह रही हो, “ कुछ कटुवचनों का इतना बड़ा दण्ड ! पहले तो प्रेम की अति कर दी और फिर उपेक्षा की. शिव ने जैसे सती को त्याग दिया था, वैसे ही तुमने भी त्याग दिया अपनी रत्ना को. मानी इतने कि उस रात के बाद खबर भी ली कि रत्ना जीती भी है कि मर गयी. और अब मुझसे इतनी विरक्ति कि गहने भी हटाये दे रहे हो. अरे ! जब इतना ही मन से उतर गयी थी तो ये साड़ियाँ और गहने काहे रखे रहे, बहा देते इन्हे गङ्गा में. तुलसी के अन्तर में कुछ पिघलने सा लगा. लगा कि रत्ना की स्मृतियों को, इन गहनों को भले ही कोने में उपेक्षित रख छोड़ा था किन्तु इन्हे वे अलग कर पायेंगे. तभी उन्हे रत्ना की बात याद आयी जिसने उनकी जीवनधारा को राम की ओर मोड़ दिया, “ अस्थि चर्ममय देह मम तापर ऐसी प्रीति ... “ इसी याद और बहते आँसुओं के साथ उनकी दुविधा भी बह गयी. जब राम में ही जीवन लीन कर दिया तो इन गहनों से कैसा मोह. रत्ना ने पहले भी उनकी जीवनधारा बदली थी और इस समय भी वह संदेश दे रही थी. “ ... बस ! इतना दुर्बल है राम से नेह का धागा कि धागों से बनी यह साड़ियां छूते ही चटकने लगा. जब मुझे प्रेरणा माना, मेरे उद्बोधन से राम काज में लग गये तो क्यों भावुक होकर दुर्बल हो रहे हो. राम के लिए तो तन- मन और जीवन भी न्योछावर है तो इन गहनों की क्या बिसात. प्रसन्नचित्त से गहने निकालो और अपनी साध पूरी करो जो सारे जगत का कल्याण करेगी. मेरे गहने राम काज में काम आयें, इससे अधिक उनकी क्या उपयोगिता ! तुलसी के मन का सारा दुचित्तापन बह गया और गहनों की पुटकिया सिरहाने रख कर लेट रहे. कल चरनदास आयेगा, प्रकाशक के पास जायेंगे, ग्रंथ छपेगा और राम कथा पण्डितों के प्रपञ्च से मुक्त होकर दिग दिगन्त में व्याप्त होगी. सोचते-सोचते उन्हे नींद गयी.  

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अगले दिन दोपहर से पहले ही चरनदास गया. तुलसी के पास से निकलने के बाद वह घर नही गया था बल्कि रामकृपा प्रकाशन के मालिक, रामदास के घर गया. रात्रि को उसे आया देख कर रामदास की आँखें चमक उठीं कि हो हो कोई मुर्गा फंसा है. रामदास का  बहुत सा काम इसकी बदौलत चलता था. ये कवियों / लेखकों की तलाश में रहता और जो ऐसे होते कि ग्रंथ तो लिख मारा किंतु छप नही पा रहा, तो उन्हे पटा कर यहाँ ले आता.चलते पुर्जे कवियों का तो काम इधर उधर से , राजकीय कर्मचारियों से सांठ गांठ करके हो जाता या जो गांठ के पूरे होते वे किसी भी प्रकाशन से ग्रंथ प्रकाशित करवा लेते किन्तु जो गांठ के पूरे होते और ही राजकर्मचारियों के चहेते और ही किसी धनी मानी के चारणउन्हे ये चरनदास ले आता. वे नगद तो देते किन्तु गहना या फिर खेत वगैरह देकर भी ग्रंथ प्रकाशित करवाने का प्रयास करते, उनका काम यह करता और गहना या खेत वगैरह नगद से अधिक ही होता. दोनों का एक दूसरे को देख कर प्रफुल्लित होना स्वाभाविक ही था.

आओ चरनदास ! किसे ला रहे हो कल और ग्रंथ क्या है ? गद्य है कि काव्य ? “

बंधु ! एक है तुलसीदास, उसने एक महाकाव्य लिख मारा है, ‘रामचरित मानसमगर उसे प्रकाशित नही ्करवा पा रहा. पैसा उसके पास है नही और राजदरबार में पहुँच तो अच्छी है मगर अपनी ही अकड़ में रहता है सो उनका उपकार लेगा नही.”

वो तुलसीदास तो नही जो गङ्गा किनारे कुटिया में रहता है और यजमानों के भरोसे भोजन पानी चल रहा है ?”

हाँ, हाँ ! वही है.”

अरे उसके पास क्या होगा ! पत्नी पहले ही लात मार कर भगा चुकी है, काशी के पण्डितों से निभती नही. वो इससे बहुत रिसाने हैं कि रामायण को भाखा में लिख दिया और उसका मञ्चन भी करता रहता है जिसेरामलीलाकहता है. कई बार रामलीला के दौरान ही उत्पात हुआ और उसे टीम टमरा समेट कर भागना पड़ा. बाबा ! इसका ग्रंथ प्रकाशित करने में कुछ लाभ नही. देने को छदाम नही, गहना-गुरिया भी क्या होगा और काशी के पण्डितों से वैर अलग ! तुम तो कोई दूसरा तलाश करो तो आओ.”

बंधु ! जैसा  सोच रहे हो, वैसा भी कोरा नही है. मैने अभी उसका मन टटोला तो बता गया कि पत्नी का कुछ गहना है उसके पास. मैने उकसाया कि अब इतने दिन पत्नी आयी तो अब क्या आयेगी. गहना रामकथा के प्रकाशन के पुनीत कार्य में लगाओ.”

कितना होगा गहना ?”

चरनदास ने अनुमान लगाया कि गले का, हाथ का तो होगा ही. नाक-कान का , हल्का-फुल्का गले में और मांगटीका तो औरत पहने ही रहती है, शेष भारी हार और कङ्गन आदि घर में रखे रहते हैं सो वे तो होंगे ही. सोच विचार कर बोला,

कहाँ होगा बहुत ! जैसी उसकी हालत है तो चाँदी का कुछ और  एक आध सोने का निकल आये वही बहुत है. खेत वेत तो हैं नही उसके.”

तो क्या फायदा ! कोई दूसरा लाओ.”

अरे भाई ! अब हर बार धंधा ही देखो ! खुद रामदास हो, प्रतिष्ठान का नामरामकृपा प्रकाशनहै औररामचरित मानसके प्रकाशन मे वणिकवृत्ति दिखा रहे हो. सोचो ! भाखा में रामकथा हाथों हाथ ली जायेगी. तुम्हारे प्रकाशन से आया और तुमने-हमने और तुलसीदास ने ढंग से प्रचार कर दिया तो कुछ ही दिन में पाँच हज़ार प्रतियां तो हाथों हाथ बिक जायेंगी. एक माह में ही दूसरा संस्करण निकालने की नौबत जाय तो कहना. प्रकाशन के बाहर कोई रामायण मण्डली बैठा देना जो मानस गान करती रहेगी. उसका खर्चा तो चढ़ावे से ही निकल आयेगा, उसमें तो तुलसी भी बैठ जायेगा. वो धुँवाधार प्रचार होगा कि इसकी कमाई से ही दूसरा प्रकाशन खोल लोगे. मैने तो नाम भी सोच लिया है, ‘मानस प्रकाशनतुलसी ने और भी ग्रंथ लिख रखे हैं. कुछ उसकी वृत्ति बाँध देना तो सारे ग्रंथमानस प्रकाशनसे ही प्रकाशित होंगे. कल लाता हूँ उसे. और हाँ, उसे बहुत मूसने का उपक्रम मत करना, बेचारा वैसे ही दरिद्र है, बस रामकथा के भाखा में प्रसार के लिये पत्नी के गहने उत्सर्ग करने को राजी कर पाया. अब चलता हूँ.”

दूसरे दिन जब वह कुटिया पहुँचा तो तुलसी मानस की एक प्रति, जो उन्होंने स्वयं तैयार की थी,  साफ कपड़े में बांधे तैयार बैठे थे. गहने भी एक पोटली में बांध कर धोती की फेंट में लपेट लिये थे. चरनदास को आता देख कर आतुरता से बोले,

भैया, बड़ी देर कर दी ! बात तो हो गयी है ना प्रकाशक से ? “

हाँ महराज, बड़ा भैया-मुनवा करके, राम काज का निहोरा देकर समझा पाया हूँ. गहने तो धर लिये हैं ना ?”

हाँ, हाँ भैया ! अब चलो.”

तुलसी सर पर ग्रंथ की गठरी उठाये और कमर टटोलते साथ चले. नगर में जब प्रकाशन पर पहुँचे तो चरनदास ने कहा,

महराज, तनि गहने तो दिखाओ क्या हैं. और कोई हल्का गहना मुझे दे दो, मैं ऊपर देख कर आता हूँ  कि कार्यालय में है कि नही. बात से फिर तो नही जायेगा. लालची आदमी है  किन्तु क्या करे, उसे व्यापार चलाना है. पेशगी दे दूँगा तो बंध जायेगा.”

तुलसी ने आड़ में पुटकिया खोली. एक मटरमाला थी, एक हार था और दो कङ्गन. उसने मटरमाला ली और कहा कि वह देख कर और पेशगी देकर आता है, तब तक वे वहीं ठहरें. ऊपर सीढ़ियों में ही मटरमाला मिर्जई की अन्दूरनी जेब में रख ली और ऊपर पहुँचा. रामदास उसी की बाट जोह रहा था.

अकेले रहे हो ! क्या वह नही माना गहने लाने को ?”

उतावले हो बंधु. वो आया है. बड़ी मुश्किल से मना पाया हूँ और तुम्हे आगाह भी कर दे रहा हूँ कि मन में चाहे जो हो, ऊपर से भक्ति ही दिखाना और ऐसा जताना कि राम काज के लिये लागत से कम ले रहे हो. गहने देख कर टूट पड़ना ! मेरा हिस्सा उसके जाते ही दे देना. राजी हो तो कहो उसे ऊपर लाऊँ नही तोभक्त प्रकाशनवाले भी तैयार हैं और बिक्री से उसे आधा फीसदी देंगे भी. तुम एक फीसदी दो तो यहां लाऊँ नही तो जा रहा हूँ उधर.”

अरे कैसी बात करते हो. ये कोई पहला काम तो है नही तुम्हारे साथ. लाओ उसे.”

सीढ़ियां फलांगता हुआ तुलसी के पास पहूँच कर बताया कि बड़ी मुश्किल से मटरमाला पेशगी देकर मना पाया हूँ और बिक्री में आपके हिस्से की भी बात कर ली हैपूरे आधा फीसदी ! अब बयाना वगैरह की बात करना, कहीं बिदक जाय

तुलसी और वो ऊपर पहुँचे. गद्दी पर मानस रखा और आशा भरी दृष्टि से दोनों की ओर देखा कि कोई बात प्रारम्भ करे. बात रामदास ने ही शुरू की,

प्रणाम महराज ! नाम तो बहुत हो रहा है आपका, लीला भी खेलवा रहे हैं तो अब तक ग्रंथ प्रकाशित क्यों नही कराया ?”

क्या बतायें भैया, रामजी की अभी इच्छा रही होगी. अब उनकी प्रेरणा से यह चरनदास भेंटा गया और इसके उपक्रम से आप से भेंट हुई. अब आपकी कृपा हो तो यह ग्रंथ प्रकाशित हो जाय.”

हाँ,  हाँ ! क्यों नही ! दिखाईये तो ग्रंथ.”

तुलसी ने गठरी खोली और ग्रंथ दिखाया. देख कर दोनों की आँखें फैल गयीं, वृहद ग्रंथ था. उसने देखने को मांगा. बीच-बीच से पढ़ा, हाथ में उठा कर वज़न सा किया. तुलसी को धुकधुकी लग गयी कि क्या कहेगा. उसने अन्दर से एक और कर्मचारी को बुलाया. उसने भी उनकी ही तरह परखा. फिर उच्छवास सी भरते हुए बोला,

महराज ! ग्रंथ तो बहुत बड़ा है. रामकथा क्या महाकाव्य है पूरा. सात काण्ड हैं और सबसे छोटे काण्ड, किष्किन्धाकाण्ड में ३० दोहे हैं, अरण्यकाण्ड में ४६ और सुन्दरकाण्ड में ६०, शेष चारों काण्डों में डेढ़-डेढ़ सौ से ऊपर हैं. दोहों के बीच औसतन छह चौपाईयाँ हैं और प्रत्येक काण्ड के मङ्गलाचरण में संस्कृत के श्लोक. ऊपर से अवधी में है. मेरे कर्मचारियों का तो संस्कृत में अभ्यास है, अवधी के दो जानकार भी तो बुलाने ही पड़ेंगे. ग्रंथ भी वृहद है सो सामान्य आवरण से काम चलेगामोटी दफ्ती का सज़िल्द संस्करण तैयार करना होगा. फर्मा बनाना, शुद्धि देखना, प्रतिलिपि बनाने और फिर दफ्तरीगिरी में कुशल लोग लगेंगे. बहुत पैसा लग जायेगा. मैं रामकाज में कुछ लूँगा, कुछ पल्ले से भी लगा दूँगा किन्तु अन्य कर्मचारियों को तो देना होगा. आपकी स्थिति देख कर लगता तो नही कि इतना दे सकेंगे. है कुछ गहना-गुरिया आपके पास ?”

अब भईया ! बड़ी आस लेकर आया हूँ. जैसे भी हो, तुमको ही करना है. रामकाज अरु मोर निहोराकहते हुए तुलसी ने पुटकिया खोली. एक हार और दो कङ्गन देख कर आँखों में आयी चमक को छुपाते हुए उपेक्षा से बोला, “ये क्या महराज ! इतना तो कागज और प्रकाशन की मजूरी में भी कम पड़ेगा. प्रतिलिपिकार को कहाँ से दूँगा. आप ले जाईये ग्रंथ कहीं और.”

अब भईया जो है बस यही है. अब जैसे भी हो राम काज मान कर कर दो.”

तुलसी दैन्य भाव में गये. भक्त में तो यूँ भी दैन्य होता है. चरनदास ने देखा कि अब अभिनय अधिक हो रहा है. कहीं तुलसी निराश होकर चल दे तो मटरमाला लौटानी पड़ जायेगी सो एक आँख से तुलसी को आश्वस्त करता और दूसरी से रामदास को बरजता प्रकट मॅं बोला,

अरे बंधु रामदास ! अब हर सौदे में कमाई नही देखी जाती. रामकाज है और महराज बड़ी आस लेकर आये हैं. अब तुम पीछे हटोगे तो क्या हम कहीं और जायेंगे. तुम तो कह रहे थे कि कुछ अपने पास से लगा कर लागत से कम लोगे. अपनी बात पर रहो. बहुत घाटा होगा तो बिक्री पर तुलसी अपने हिस्से से भरपाई कर देंगे. अब इतने पर मानते हो कि ... ‘

बात पूरी होने पायी कि कहीं और जाने की घुड़की से उसने ग्रंथ उठा कर माथे से लगाया और इस प्रकार प्रकाशन की सहमति दी. गहने तिजोरी में रखे और तुलसी को एक माह बाद ज़िल्दसाजी से पहले पाठ की शुद्धि देखने और संशोधन के लिये आने को कहा. तुलसी ने कृत्कृत्य से होते हुए माथे में हाथ लगा कर प्रणाम किया और दोनों को ढेरों आशीर्वाद दिये और जाने को उद्वत हुए. चरनदास ने कुटिया तक छोड़ आने को कहा किन्तु तुलसी बोले कि अब वो सीधे घाट के मन्दिर जाकर माथा टेकेंगे फिर कुटिया जायेंगे. तुलसी के जाने के बाद दोनों ने एक दूसरे की हथेली पर हथेली मारी और बधाई दी. बात का खरा निकला रामदास, तुरन्त तिजोरी खोली. हार तो कागज, कर्मचारियों के मेहनताने, छपाई और ज़िल्द बंधाई में लग जाने की बात कहते हुए दो कङ्गनों में से एक चरनदास को दिया. चरनदास ने भी उदारता दिखाते हुए टेंट में खोंस लिया, मटरमाला वह पहले ही अन्दर कर चुका था तो उसे संतोष था. एक परिचर को जलपान लाने को कहते हुए रामदास बोला.

इसमें कोई घाटा नही हुआ, चार पैसे बच भी जायेंगे, कोई और मुर्गा है दृष्टि में !”

है बंधु ! अपना तो काम ही यही है. बृज में एक भक्त कवि है, अंधा है वो मगर क्या खूब कृष्ण के पद गाता है ! कृष्ण की बाल लीला का तो ऐसा वर्णन कियाहै जैसे सब आँखों से देख रखा हो. भक्त है सो चतुर नही और निर्धन भी है. अब वर्षा ऋतु बीत जाय तो शरद ऋतु के प्रारम्भ में ही उसके पास जाता हूँ. कुछ कुछ तो होगा उसके पास नही तो और कवि देखूंगा. प्रकाशनोत्सुक कवियों की कमी है क्या ?”

मेरे होते हुए कहीं और क्यों जाओगे, मैं जाने दूँगा भला.”

अब तक जलपान गया, दोनों उसमें लग गये. बाद की कथा तो आप जानते ही हैं. प्रकाशन हुआ और वो धुँआधार लोकप्रियता मिली उसे कि छह माह में ही चौथा संस्करण एक लाख प्रतियों का हुआ


. आज भी वोबेस्टसेलरहै.

रामजी ने सबका भला किया. चरनदास और रामदास तो मालामाल हुए ही तुलसी की भी साध पूरी हुई. इसी पूर्णिमा कोमानस प्रकाशनका उद्घाटन है, तुलसी के करकमलों से गद्दी पूजन होगा, आखिर और ग्रंथ भी तो प्रकाशित होने हैं तुलसी के.

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Saturday, 22 February 2020

शिव जी का कपाली नाम !



जय भोलेनाथ.
सब पंचन का शिवरात्रि की राम राम. शिवरात्रि मा राम-राम ! तो भईया, शिव केर ध्यान राम जी मा लगत है उई उनका आराध्य मानत हैं तो राम जी शिव जी का. शिव जी तो उनपै इत्ते फिदा हैं कि जब पारवती जी उनकी परीक्षा लीन, सीता का भेख धरि के, तो शिव जी उनका त्यागै दीन. काहे ते कि एक तो राम जी की परीक्षा लीन, दूजे पूछे पर झूठ बोलिन कि कुछौ परीक्षा-वरीक्षा नाई लीन, तुमरी नाइ परनाम कीन औ चलि दिहेन औ तीजे ई कि उइ सीता का भेख धारिन औ सीता तो मा दाखिल आंय तो माता का भेख धरै वाली का भार्या कैसे मानी. ई सब प्रसंग तुलसी बाबा रामचरित मानस के बालकांड मा बखानिन हैं. रामौ जी शिव जी का मानत रहें, लंका के सागर तट पर् सिवलिंग की थापना करके पूजा कीन और कहिन कि जो हमका मानी औ शिव केर अनादर करी ऊ कलप भर घोर नरक मा वास करी. लंकाकांड मा तुलसी बाबा राम के मुख से कहिलाइन हैं –

“ लिंग थापि विधिवत करि पूजा । सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥“
“ सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥
              संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
             ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥“

( अब नर कहिन हैं तो ई न जानेव कि नारिन का कौनों दोख नाई लगत है, ई उनहू पर लागू होत है. ई तो कहे का चलन आय के नरै कहा जात है. नरभक्षी सेर के सामने नारी पड़ि जाय तो का ऊका न खईहे के हम तो नरभक्षी बाजित है, नारी का काहे भक्षी ! )

तो भईया, रामनवमी मा कहो जयसंकर और महासिवरात्रि मा राम-राम. बाबा तुलसी दुइनों का एक दूजे का भगत दिखाय के सैव-वैष्नव  का वैमनस्य खतम कईके सन्मवय साधिन हैं तो हमहू राम-राम कहेन.

सिव तो बहुतै पुरान आंय, पुरिखा ! आदि पुरुख, अनादि, अनन्त, अजन्मा. ऊ तो ब्रह्मा के बराबर के आंय बल्कि उनतेऊ बड़े, सक्तिसाली और उनहू का दंड दे का समरथ राखे वाले. एक प्रसंग बखानित है जब सिव ब्रह्मा का दंड दीन औ ऊका प्रायश्चितौ कीन. सृष्टि के प्रारम्भ की बात आय, ब्रह्मा देवन का जनम दै चुके तो अपने वक्षस्थल से एक नारी का जनम दीन, नाम बुदबुदात भये उचारिन – गायत्री के सतरूपा के सावित्री के सरस्वती – इत्ते धीमे बोले के उनके मानसपुत्रन का कछु स्पष्ट न भवा मुदा ऊ सुन्दर लड़की का नाम सरस्वती भवा. अब ब्रह्मा ऊपै मोहित भये. ई मोह पुत्री पै ममता या वात्सल्य वाला न हुईके वासना वाला रहे. जब ऊ कन्या उनकी पैकरमा करत रहे तो जिधर ऊ घूमै, ब्रह्मौ ऊधरै मू घुमाय लें. ऊका लालसा से निहारैं. अईसे सर घुमाय के देखै की कोसिस मा ऊ जिधर जाय, ब्रह्मा का एक सर उग आवै. ई तनि उनके तब पाँच सर भये. उनके मानसपुत्रौ ई देखत रहें, मनहीमन गुस्सायें, धिक्कारें मुदा कुछु करि न सकत रहें. पुत्रन का तो भगाय दीन मुदा सिव का पुत्री पर कुदृष्टि बरदास न भई. ईहौ भवा रहे के ब्रह्मा केर पाँचवा मुख शिव का कुछ घमंड से अपमानजनक कहि दिहिस. सिव भैरव के भयंकर रूप मा प्रगटे औ आपन बांए हाथ के अंगूठा के नाखून से ब्रह्मा केर पाँचवा सर काट दिहिन. अब भा ई के जब सिव ऊ सर का उछाल के फेंके चहिन तौ ऊ उनकी हथेली से चिपकु गा. लाख जतन कीन छुड़ावै का मुदा अलगै न होय. ऊ सर हथेली पर चिपका रहा. यही बदे सिव केर एक नामु कपाली भा. अब ई रहै तो एक गम्भीर अपराध तो सिव तीरथ-तीरथ घूमत फिरे कि जाने कऊन तीरथ के महातम ते ई सर छूट जाय औ उनका अपराध का विमोचन होय. अब सिव भटकत फिरैं औ उनके पाछै नारि रूप धारि के ब्रह्महत्या फिरै. देवदार के वनन से भटकत भये सिव पहुँचे मृगशीर्ष के आँठवें दिन एक मशान मां औ अर्ध्य देत देत ऊ कपाल चूर-चूर हुई कै गल गा. सिव का अपराध मोचन भा औ ब्रह्महत्या भूमि की दरार मा समाय गै.

तमाम प्रसंग आंय सिव महिमा के. ई प्रसंग पुरानन मा बखाना है मुदा हम लीन है रॉबर्तो कलासो की किताब “क” से जो इतालवी से अंग्रेजी मा और फिर हिन्दी मा अनूदित है. अनुवादक आंय देवेन्द्र कुमार औ किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकासित भै है.

आजु महासिवरात्रि के पर्व पर सिव महिमा हम अवधी मा बखानेन काहे ते आजु मातृ भाखा दिवस आय औ हमार मातृभाखा तो अवधी आय. अवधी का गोड़ लागि के परनाम. आप पंचन का भाखा समझै मा कहु दिक्कत होय तो माफी चाहित है, बेखटके पूछ लिहो जो न समझ आवै. वईसे सिव महिमा आय तो सिव परताप ते दिक्कत न होयक चही.
जय भोलेनाथ !


बस मे बातें बनाम बस मे बातें बनाम मेरी बातें एवं कुछ बस प्रसंग


बस मे बातें बनाम बस मे बातें बनाम मेरी बातें एवं कुछ बस प्रसंग

चिकित्सा अवकाश पर रहने के बाद ड्यूटी पर लौंड़ी जा रहा था. वैसे तो रेल मार्ग भी है किन्तु पहुँचने का समय और उधर से वापसी का समय ऐसा है जो मेरे लिये उपयुक्त नही है जबकि बस सेवा दिन भर उपलब्ध है सो अभी तक बस से ही आया-गया हूँ, इस बार भी बस से जाना हुआ और संयोग यह कि घर से बस अड्डा (आलमबाग) बहुधा आटो से जाना होता था, वह यात्रा भी सिटी बस से की. कुल मिला कर बस मे ही रहा.

रविवार होने से भीड़ इस समय कम थी, साईड वाली सीट पर एक सज्जन बैठे थे उनके बगल भी एक, बाक़ी सीटों पर भी थे लेकिन मेरी जद मे इतने ही थे. कुछ लोग इतने बातूनी होते हैं कि कोई मिला नही कि बातें शुरू. कई बार तो ऐसा भी होता है कि ये बातवीर किसी को सम्बोधित न करके स्वगत कथन सा कुछ इतनी ऊंची आवाज़ मे करते हैं कि कम से कम आस पास वाले तो सुन ही लें, तब भी कोई प्रतिक्रिया न दे तो ये बाकायदा उसे सम्बोधित करके बात शुरु कर देते हैं. इस प्रकार के बातवीर देश दुनिया के किसी भी विषय पर बात छेड़ सकते हैं, किसी सार्थक चर्चा या विमर्श का उद्देश्य इनका होता नही और बहुधा नकारात्मक ही रहते हैं. मै यात्रा मे बहुधा सुनता ही हूँ, किसी बातचीत मे बहुत कम ही शामिल होता हूँ. तो उन सज्जन ने बगल वाले को शामिल करते हुए बातें शुरु कर दीं. वो बेचारा शामिल तो क्या था बस हां, हूं, ठीक कह रहे हैं, ऐसा हाल सब जगह है… कहते हुए उन्हे सुन रहा था. इंजीनियरिंग कालेज से चारबाग के बीच उनकी बातों मे से, सार संक्षेप रूप मे, कुछ सुनें-

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TET की मेरिट के बारे मे कुछ लोग केस दायर कर दिये हैं. वो कह रहे हैं कि मेरिट केवल इस परीक्षा के आधार पर ही न बने बल्कि उसमे हाईस्कूल, इण्टर और ग्रेजुएशन के मार्क्स भी जोड़ कर मेरिट निकाली जाय ताकि जिनके मार्क्स अच्छे रहे हैं, उन्हे इसका फायदा मिले. अब बताओ, सब नकल करके अच्छे मार्क्स ले आये हैं वही TET मे छा जायें.

                           इन्होने तो फैसला दे दिया कि जिसके भी अच्छे नम्बर हैं, सब नकल करके आये हैं, गोया मेहनत से अच्छे नम्बर आ ही नही सकते. इन्हे तो नम्बर और पढ़ाई – लिखाई मे कोई सम्बन्ध ही नही लगता या फिर मान बैठे हैं कि TET बिल्कुल पाक – साफ तरीके से हुई है बाक़ी सब मे धांधली / नकल है. वैसे ये न TET की मेरिट के पक्ष मे होंगे, न अन्य परीक्षाओं के अंक शामिल करके मेरिट बनाये जाने के मे. मेरा दावा है कि अगर बगल वाले भाई साहब, जिन्हे सम्बोधित करके इन्होने एकालाप शुरू किया या कोई और, केवल TET की ही मेरिट को आधार मानने की बात कहे होते तो ये इसी उत्साह से उन सब परीक्षाओं के अंक शामिल किये जाने की वकालत कर रहे होते. 

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नौकरी के लिये कई परीक्षायें आज होनी थीं तो शहर मे कई लाख परीक्षार्थी आने थे. तकरीबन हर रविवार ही कोई न कोई परीक्षा होती है तो यातायात व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है. हमारे बातवीर का अगला विषय था. बोले, “बैठते हैं पांच लाख तो नौकरी पाँच हज़ार को भी नही मिलती है, इतनी बेरोजगारी है. परीक्षा पास भी कर लो तो भी बिना घूस दिये या बहुत ऊंची सिफारिश के नौकरी मिलती ही नही. बड़ी खराब स्थिति है.

                         इस तरह के विचार तो हर एक के ही होते हैं. बेरोज़गारी है भी किन्तु यह छद्म बेरोजगारी है. “ छद्म बेरोज़गारी “ की व्याख्या अर्थशास्त्र मे की गयी है. यह वह स्थिति होती है जब कोई अपना / अपनी क्षमता का रोजगार न करके कोई विशेष रोजगार ही ढूंढता है और अन्य कोई विकल्प आजमाता ही नही. अब जैसे हर कोई सिर्फ सरकारी नौकरी या कुछ विशेष संस्थाओं मे नौकरी को ही रोजगार मानता है, किसी अन्य कार्य या प्रोफेशन (पेशा तो अब एक निन्दित वृत्ति के लिये प्रयुक्त किया जाने लगा है, प्रोफेशन व प्रोफेशनर से जो भान होता है, उसी कार्य मे लगे होने पर भी पेशा व पेशेवर कहने पर सम्मान / सामाजिक स्वीकृति का वो भाव पैदा नही होता ) मे लगे होने पर उसे रोजगार नही मानता. कोई दुकान कर रहा है या बीमा या अन्य कोई एजेन्सी लिये है या पुश्तैनी काम कर रहा है तो भी अपने को बेरोजगार कहता है. जब रोजगार का मतलब सिर्फ सरकारी या कुछ खास जगहों की नौकरी से ही लगाया जायगा तब तो भयंकर बेरोजगारी है ही. आप या कोई, “बच्चू, बैंक मे लगे हो तो यह सब कह लो !” कह कर भले ही इस सिद्धान्त को खारिज कर दे किन्तु है यह सत्यता ही.

                            जहां तक घूस और पहुँच से नौकरी पाने का सवाल है तो यह अंतिम सत्य नही है. होता है ऐसा भी किन्तु सारी नौकरियों मे नही. मुझे तीस साल बैंक मे हो गये, इस बीच नौकरी पाये तमाम लोगों मे अनेक परिचित भी रहे किन्तु अभी तक नही सुना कि घूस/पहुँच से नौकरी मिली हो. मल्टीनेशनल कम्पनियों की नौकरियों मे भी ऐसा नही. तीन परिचित PCS J करके जज हैं, एक मित्र की पत्नी, साली और साला सरकारी स्कूल मे टीचर बने, साढ़ू के दामाद रेलवे मे इंजीनियर हैं --- किसी ने भी न घूस दी, न सिफारिश लगवाई. एक दूसरा उदाहरण भी है. एक सम्बन्धी हैं जो ऐसे विभाग मे रहे हैं जहां पर छींकने – खासने मे भी घूस / पहुँच की बात जगप्रसिद्ध है. उनका इसी सिस्टम पर विश्वास है किन्तु नौकरी की शुरुआत से ही उनकी पत्नी लखनऊ से बाहर पोस्ट रही हैं और वे अपने छोटे भाई की चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिये आज से करीब पाँच साल पहले दो लाख लेकर घूम रहे थे – उनकी पत्नी आज भी लखनऊ से बाहर हैं और भाई की नौकरी नही लगी. नौकरी सिर्फ इसी से मिलती है, ऐसा मानने वाले ही ठगे जाते हैं. कोई दिन नही जाता जब यह ख़बर न छपती हो, “नौकरी / प्रवेश के नाम पर लाखों ठगे “ तो यह धारणा सत्य तो हो सकती है किन्तु एकमात्र सत्य नही.

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“ आपको मालूम है, मुलायम सिंह ने यम. पी. मे जिसे टिकट दिया है उसने TET की लिस्ट थमा दी है कि इनका तो होना ही है”

                            इनकी तरह के कई बातवीर हैं जो नेताओं, अफसरों और माफिया के बारे मे, उनके कामों, फैसलों आदि के बारे मे इतने विश्वास से बताते हैं जैसे वे उनके रनिवास से लेकर गुप्त मीटिंग्स तक सबमे शामिल रहते हों और हर निर्णय उनसे पूछ कर नही तो सलाह लेकर ही किये जाते हों. ये उनकी “अन्दर की बात” इतना जानते हैं जितना अपने अन्दर की न जानते होंगे. जब वे “ये अन्दर की बात है” या “ सच्ची बात हमसे सुनो” टाईप की टिप्पणी करें तो पूछ लें कि आपको किसने बताया या क्या आपके सामने यह बात हुई, बस पूछा हुआ तो न बतायेंगे, जो बताने जा रहे होंगे वह भी नही बतायेंगे. “ जब आपको विश्वास ही नही तो क्या फायदा बताने का “

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इन्ही का एक बस एक प्रसंग और. खाली सीटों पर धूल थी. एक लड़का बैठने को हुआ किन्तु धूल देख कर ठिठक गया. आप बोले, “ बैठ जाओ, धूल मे बैठने वाले ही ऊपर उठते हैं.”

                 लड़का बाद मे ऊपर उठने के आश्वासन पर अभी अपनी पैंट गंदी करने को तैयार न हुआ, देख - दाख कर कम गंदी सीट को हाथ से झाड़ कर ऊपर उठने का मौका गंवा दिया. फिर वही कि इनकी बात सत्य तो हो सकती है, एकमात्र सत्य नही. इनकी बात मे “ही” का तड़का न होता तो बात का वज़न न घटता.

इस तरह के बातवीरों के बस मे सिर्फ बातें ही होती हैं और बातों पर कोई टैक्स तो लगता नही तो कोई शामिल हो न हो – छौंके जाओ बातें.

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चारबाग तक इतना ही सत्संग रहा. आगे भी बस से जाना हुआ, तो हाज़िर हैं हमीरपुर से महोबा तक के दो प्रसंग –

प्रसंग एकः शेखी

परिचालक

(अभी चढ़े यात्री से) - “टिकट?”

यात्री -             “पहचानते नही हो क्या, नये हो ? तीन साल से चल रहे हैं, MST है.”

परिचालक -         “MST है तो दिखाओ न “

      यात्री ने एहसान सा करते दिखायी, फोटो पुरानी लगी थी.

परिचालक –         “ फोटो तो नही मिल रही ? “

यात्री –             “तो मिलाओ न, पुरानी फोटो है, तुम शकल नही मिला पा रहे हो तो

                   हम क्या करें. ”

             परिचालक ने “कौन उलझे ऐसों से” के भाव से MST वापस की.

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प्रसंग दोः कुतर्क


यात्री ने टिकट मांगा और सौ का नोट दिया. परिचालक ने हस्बे मामूल टिकट के पीछे बकाया रकम लिख दी, बस शुरू हो गया यात्री – परिचालक संवादः

यात्री –       हमसे तो पैसे पहले ले लिये और बकाया लौटाओगे बाद मे. टूटे

            लेकर चला करो.

परिचालक -   कोई नयी बात है क्या ? हमेशा से ही ऐसा होता है. इतनी ही

            ज़ल्दी हो तो टूटे दिया करो. बकाया लिख तो दिया है, ले

            लेना उतरने से पहले.

यात्री -       अभी दो, जब तुम्हे हम पर भरोसा नही तो हमे भी नही.

     

    एक अन्य यात्री ने बीच – बचाव जैसा करते हुये कहा, “ अरे, ले लेना बाद मे, इन लोगों को हिसाब रखना पड़ता है. कहीं चेकिंग – वेकिंग हो गयी तो फंस जायेगा.


मित्रों, ये यात्री न तो पहली बार बस यात्रा कर रहे थे और न ही यह पहला वाकया था. मुझे तो लगा कि ये लोग इस पंक्ति को चरितार्थ कर रहे थे,

            “बड़े लड़ैया महुबे वाले, जिनसे हार गयी तरवार”    

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कुछ वर्तनी प्रसंगः

-    चारबाग के एक होटल के तीन तरफ बोर्ड लगे हैं –

    एक पहलू पर लिखा है – होटल आर्शीवाद,

    दूसरी तरफ -          होटल आशीर्वाद, और

    तीसरे पर -            होटल आर्शिवाद.

( लो भईया, हमे जितनी स्पेलिंग्स आती थीं, सब लिख दीं, अब छांट लो

  जो तुम्हे ठीक लगे )

              ***********************

रास्ते मे एक नेता जी की कई होर्डिंग्स लगी हैं जिन पर लिखा है –

   क्रिसमस, नववर्ष एवं गणतन्त्रता दिवस की बधाई.

अब यह चलन हो गया है कि नेता (बहुधा सत्ताधारी दल के) ऐसे ही होर्डिंग लगवा कर कई पर्वों की बधाई एक साथ दे देते हैं. राम भी खुश, रमज़ानी भी, रजिन्दर सिंह भी और रिचर्ड भी. उम्मीद है जुलाई – अगस्त मे “गणतन्त्रता दिवस” की तर्ज पर लिखा होगा,

        “ रक्षाबन्धन और स्वतन्त्र दिवस की बधाई “

               ********************

एक दुकान के बोर्ड पर लिखा देखा,

               “ कृण्णा सर्विस सेन्टर “

कृष्ण को कृष्णा, किशना, किश्ना, किसना, क्रिशना, क्रिसना…. तमाम तरह से लिखा जाता है तो इसी पर हाय – तोबा क्यों ? हरि अनन्त. हरि कथा अनन्ता. 

“इति बस प्रसंग सम्पन्न”


राज नारायण

Sunday, 11 January 2015

कला और कलाकारों के प्रति कुछ

महान डच चित्रकार विन्सेन्ट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित इरविंग स्टोन के उपन्यास “ Lust for Life”  ( हिन्दी मे इसी नाम से अशोक पाण्डेय द्वारा अनूदित, संवाद प्रकाशन से प्रकाशित ) मे इस कलाकार की कला यात्रा – सह - जीवन यात्रा का एक प्रसंग है, जब वह लंदन मे एक आर्ट गैलरी मे नौकरी कर रहा होता है. जैसाकि होता है, आर्ट गैलरियों मे मूल चित्र के साथ अधिकतर प्रिंट / अनुकृतियां (नकल) बेचे जाते हैं. मूल तो एक ही होता है, मूल कलाकार भी दुबारा वही चित्र पेण्ट करे तब भी, तो लोग अपनी कलापिपासा कैसे शांत करें. जो मूल खरीदने की हैसियत नही रखते उन्हे भी अपनी इस पिपासा को शांत करने का अधिकार है, कुछ लोगों को यह भी दिखाना होता है कि वे केवल धनवान ही नही हैं, बड़ा घर ही नही है बल्कि सुरुचि सम्पन्न भी हैं, कला पारखी और संरक्षक भी हैं और इन सबसे भी अधिक आख़िर गैलरियों के मालिकों को धन्धा भी चलाना होता है --- शायद इन्ही कारणों से मशहूर कलाकारों के काम के प्रिंट / नकल खूब बनती हैं और बिकती भी हैं… तो जिस स्टोर मे विन्सेन्ट सेल्समैन था, वहां भी प्रिंट / नकल भी बिकती थी.

एक दिन एक अमीर महिला अपने नये मकान के लिये कुछ कलाकृतियां खरीदने आयी. विन्सेन्ट को उसे अटेण्ड करना था. उस महिला ने उसे अपनी ज़रूरत बतायी, दीवारों की नाप, खिड़कियों की संख्या और लोकेशन बतायी जिनके लिये वो चित्र चाहती थी और यह भी बताया कि बेहतरीन चीज़ों के लिये उसे खर्च की चिन्ता नही थी. वह चाहे कलाप्रेमी थी या कलाप्रेमी होने का दिखावा करना चाहती थी किन्तु कला की समझ उसे बिल्कुल नही थी और इस बात को उसने छिपाया भी नही. वह उस सेल्समैन (विन्सेन्ट) से बेहतरीन कलाकृतियों के चुनाव मे सहायता चाहती थी और उसने उसकी समझ और सदाशयता पर पूरा भरोसा किया था. खर्च किये जाने वाले पैसों के बदले उसकी यह अपेक्षा उचित थी उसका यह अधिकार भी था और उसकी अपेक्षा को पूरा करना विन्सेन्ट का कर्तव्य भी. लिकिन विन्सेन्ट ने उसकी कोई सहायता नही की क्योंकि वह उकताया हुआ था, अपने जीवन से असन्तुष्ट था और इन सबसे भी बढ़कर, “… अपने फूहड़ भड़कीले पहनावे और बेहूदा व्यवहार से वह औरत विन्सेन्ट के लिए मध्यवर्ग की उद्देश्यहीनता और व्यापारिक जीवनशैली का प्रतीक बनती गई… “ जब वह कुछ चित्र चुन चुकी तो ---

“तो,” सन्तुष्ट होकर वह बोली, “मेरे ख़्याल से मैने उम्दा चुनाव किया है.”

“अगर आपने आंखे बन्द करके भी छांटा होता, “ विन्सेन्ट बोला, “तो भी शायद आप इससे बुरा तो नही ही करतीं.”

आप समझ ही सकते हैं कि इसके बाद क्या हुआ होगा ! वह औरत दहाड़ी, बिना कुछ खरीदे गालियां देती बाहर निकल गयी. गैलरी के मालिक –

मि. ओबॉक गुस्से से पगला गए, “ प्यारे विन्सेन्ट,” वे बोले, “ तुम्हे हो क्या गया है ? तुमने सप्ताह का सबसे बड़ा ऑर्डर तबाह कर दिया, ऊपर से उस महिला का अपमान किया.”

“मि. ओबॉक, आप मेरे एक सवाल का जवाब देंगे ?”

“बोलो क्या है ? मुझे ख़ुद तुमसे कुछ सवाल पूछने हैं.”

विन्सेन्ट उस औरत के छांटे प्रिंट एक तरफ हटाकर, मेज़ पर कुहनियां टिका कर बोला, “आप मुझे बताइए कि क्या एक आदमी अपनी इकलौती ज़िंदगी को बेहद मूर्ख लोगों को बेहद मूर्ख लोगों को घटिया कलाकृतियां बेच कर सही ठहरा सकता है ?”

इसके बात का वार्तालाप बहस और कुछ, “या रब न वो समझेंगे हैं, न समझेंगे मेरी बात …” टाईप का है जिसमे कुछ समाजवाद, कुछ पूंजीवाद उर्फ कला को बेच कर / नासमझों को उल्लू बनाकर मुनाफा कमाने पर लानत, कुछ कला की समझ आदि है. इस प्रकरण का अंत वही हुआ जो आप समझ रहे हैं और जो होना भी चाहिये था … विन्सेन्ट को नौकरी से निकाल दिया गया.

यह एक महान कलाकार की और कला की त्रासदी है कि उसे उसके जीवनकाल मे वह सम्मान और पहचान नही मिली जिसका वह हक़दार था. वॉन गॉग के ही नही, कला की लगभग सारी विधाओं के उन कलाकारों के साथ ऐसा ही होता है जिनका काम कुछ ऐसा होता है जो कुछ कला बोध की मांग करता है. चित्रकला की ही बात करें तो अमूर्त, माडर्न, प्रयोगवादी, प्रतीकात्मक, आधुनिक, समकालीन … और भी कई ऐसी ही शैलियों के चित्रकारों ( नामचीनों को छोड़ दें जिनकी कृतियां विश्व की प्रसिद्ध गैलरियों की शोभा बढ़ाती हैं और लाखों से लेकर करोड़ों मे बिकती हैं, कला का प्रतिमान हैं और जिन पर बहस होती है तथा स्थापित, स्थापित होने मे प्रयासरत से लेकर नवोदित चित्रकार उन पर चर्चा / बहस करता पाया जाता है ) की हमेशा से यह शिकायत रही है कि लोगों को कला ( या उनकी कला ) की समझ ही नही है. लोग उन्हे समझ ही नही पाते – न उन्हे और न उनके काम को. वह तो न जाने कितने प्रतीक, बिम्ब और गहन अर्थ चित्र मे भरते हैं, चित्र मे लगाये रंग ही नही उनके शेड और स्ट्रोक तक का विशिष्ट अर्थ है, माध्यम का चयन भी बहुत कुछ कहता है… किंतु ये कूढ़मग़ज उसे समझ ही नही पाते. और तो और, संगी-साथी भी मुह पर तो वाह-वाह करते और पीठ पीछे खिल्ली उड़ाते हैं. कला के मठाधीशों के लिये तो जो उनके मठ का जोगी नही – उसका काम तो बस केनवास पर कूची फेरना है. बस अपने जैसे लोगों के बीच चर्चा होती है लेकिन जनता मे कुछ होता ही नही. प्रदर्शनी लगती है, लोग आते हैं, देखते हैं … मुह बाये / मुह बिचका कर / समझने का स्वांग करते हुए देखते हैं – खरीदता कोई नही. अगर खरीदता भी है तो कौन – वही होटल वाले, मल्टीनेशनल कम्पनियों वाले या वैसे ही नवधनाढ्य जिसका एक नमूना वॉन गॉग से दो-चार हुआ था. इन खरीदारों के लिये तो चित्र बस शो-पीस है या अपने को कलाप्रेमी/ पारखी/ संरक्षक साबित करने का माध्यम. हम इन ढोंगियों के लिये चित्र बनाते हैं या अपने को अभिव्यक्त करने के लिये ! हम इतने सशक्त माध्यम से अभिव्यक्ति करते हैं और जनता है कि…

मित्रों, वास्तविकता भी यही है, लोगों को कला की समझ ही नही है ऐसे मे बस अपने जैसे लोगों के बीच कला विमर्श करने के अलावा चारा भी क्या है. तभी तो, कोई कला प्रदर्शनी देख लीजिये – कलाकार कोई भी हो – अधिकांश दर्शक वही जाने-पहचाने होते हैं. प्रदर्शनियों मे नियमित जाकर देखिये – आप पहचानने लगेंगे कि ये तो वही हैं जो अलां मे थे और फलां मे भी – परमानेण्ट दर्शक होते हैं.

ठीक है, जनता को कला की समझ नही, किन्तु आपने क्या किया उसे समझाने के लिये, उसमे रुचि जगाने के लिये, कला बोध को परिमार्जित करने के लिये और परमानेण्ट दर्शकवर्ग के अलावा नये दर्शक / आम जन को जोड़ने के लिये ? जनता को यह बताने के लिये कि आप इस चित्र के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं, आकृतियों को इस तरह बनाने के पीछे क्या है, यह ऑब्जेक्ट जो आपने उसके वास्तविक रंग और शेड के बजाय किसी और रंग और शेड मे पेण्ट किया है तो क्यों? क्यों आपके चित्र की औरतें वैसी नही हैं जैसी वास्तव मे होती हैं, पक्षी वैसे क्यों नही हैं और इमारतें वैसी क्यों नही जैसी मे आप भी रहते हैं, अलग तरह की क्यों हैं और आप अभिव्यक्त क्या करना चाह रहे हैं ?

क्या कहा ! आप क्यों बतायें ? आपकी ज़िम्मेदारी नही बनती जनता मे कला बोध जगाने की ! तो भईया, किसकी बनती है ? आप तो कला विद्यालय मे कई वर्ष शिक्षा लेकर, सतत अभ्यास करके, तमाम पढ़ कर और गुरुओं के निर्देशन मे ये शैली विकसित कर पाये हैं किन्तु आम दर्शक ने तो यह सब नही किया है ना ! वो कैसे समझेगा ये बारीकियां. आप नही बतायेंगे तो और कौन, और आपने कोई शर्त तो रखी नही कि आपकी प्रदर्शनी देखने वही आयेगा जिसमे इतनी समझ हो --- तो यह रोना क्यों और ऐसा करेंगे तो आपकी कला और आम जन के बीच यह दूरी बनी ही रहेगी.
मै यह अपेक्षा नही करता कि प्रदर्शनी के पूर्व / दौरान आप प्रशिक्षण सत्र आयोजित करें या व्याख्यान देने लग जायें किन्तु इतना तो कर सकते हैं कि जब कोई आपके चित्र के सामने खड़ा हो और तुरन्त हट जाये / सामान्य से कुछ अधिक देर तक देखे तो उससे संवाद करें, पूछें कि उसका क्या विचार है, जानने की कोशिश करें कि क्या उसने वही समझा जो आप कहना चाहते थे. हर दर्शक से नही मगर कुछ दर्शकों से तो कर ही सकते हैं ना ! मगर आप ऐसा नही करते. आप रहते तो पूरे टाईम मौजूद हैं प्रदर्शनी मे, मगर उन्ही के इर्द-गिर्द जो आपके संगी-साथी हैं या परमानेण्ट दर्शक. आम जन को तो उपेक्षा से देखते रहते हैं.

सबकी नही कहता किन्तु अधिकांश कलाकारों मे यह उच्चताबोध / अहमन्यता रहती है कि ये है क्या मेरे सामने! ऊपर के प्रसंग मे वॉन गॉग ने इसके अलावा और क्या किया ? उस महिला की मदद तो बिल्कुल नही की बल्कि उसका मज़ाक उड़ाया. अगर वह उसे सही सलाह देता और चुनाव मे मदद करता तो अच्छी कलाकृतियां बिकतीं, उसे कुछ समझ आती और वह अपने जैसे लोगों को प्रेरित करती. कला को भी कुछ बढ़ावा मिलता और कलाकार को भी. इस रवैये से तो कला और आम जन की दूरी बढ़ी ही.

ऐसा नही कहता कि सारे कलाकार इस मानसिकता से ग्रस्त हैं. कुछ सकारात्मक उदाहरण भी हैं. अभी कुछ दिन पूर्व एक प्रदर्शनी लगी(#) उसमे मै तीन बार गया. हर बार संयोजक को हॉल मे पाया और बिना किसी पूर्व परिचय (और बिना मेरी कलाकारों जैसी ‘धज’ के) के मुझ आम जन को भी उन्होने चित्रों के बारे मे, उनका सन्दर्भ, तकनीक, फोटो खींचने की तकनीक, कलाकार के बारे मे बताया और कुछ विमर्श जैसा भी किया और ऐसा उन्होने मेरे साथ ही नही बल्कि हर उस दर्शक के साथ किया जो तनिक भी रुचि लेता दिख रहा था. अब वे संयोजक मेरे मित्र ( फेसबुक पर ) भी हैं. अभी एक-दो दिन पहले की बात है. मैने फेसबुक पर एक चित्र देखा ($) मैने पोस्टकर्ता कलाकार से उसके बारे मे कुछ जानकारी चाही और उन्होने उदारतापूर्वक मुझ नितान्त अजनबी / आम जन को बताया, कला के बारे मे कुछ समझ पैदा की. अब वे फेसबुक पर मित्र भी हैं. कहने का आशय मित्रों, कि आम जन के बीच जाने के फायदे हैं और इससे कला की समझ पैदा होगी, आपका और कला का मान बढ़ेगा, कला और कलाकार उन्ही परमानेण्ट दर्शकों के बीच सीमित होकर नही रहेगा.  
एक बात और है जो कला और आम जन के बीच दूरी बढ़ाती है – वह है कीमतें. कोई भी चित्र देखिये, हज़ारों से कम नही होता. अभी एक चित्र (*) .देखा है, यह कुछ कम कीमत का है अन्यथा तो सब इससे काफी ऊपर से शुरू होते हैं. जब केवल अभिव्यक्ति ही नही, बिक्री भी महत्वपूर्ण है (आख़िर, ईजल, केनवास, रंग, ब्रश और रोटी मुफ़्त तो आती नही – कलाकार को यह तो चाहिये ही) तो दाम भी ऐसा हो कि लोग खरीद सकें या फिर आप ये न कहें कि ऐसे लोग खरीदते हैं जिनके पास कला की समझ नही, पैसा होता है. कीमत तय होती है या लागत के आधार पर (लागत + खर्चे + मुनाफा) या फिर उत्पादन मे लगने वाले समय, कुशलता और दुर्लभता के आधार पर. और भी तमाम कारक हैं पर फिलहाल यहां अर्थशास्त्र पर चर्चा नही हो रही. जब क्रय-विक्रय होना है तो बाज़ार का मांग-पूर्ति का सिद्धान्त चलेगा. दाम वाज़िब रख कर या कला के बारे मे समझ पैदा करके मांग पैदा कीजिये. दाम बहुत ऊंचे होंगे तो खरीदार सीमित से अति सीमित ही होंगे. तब कला की समझ की शर्त, लोकप्रियता की शर्त नही रहेगी – केवल पैसे की होगी जिस पर आपको आपत्ति है.

इस बाज़ारवाद पर कलाकार को दो आपत्तियां हो सकती हैं – एक तो यह कि कला को इस तरह बाज़ार मे नही उतारा जा सकता (अभी भी और कहां है) / यह अभिजात्य वर्ग या उच्च कला बोध वालों को ही शोभा देती है / बाज़ार या हर ऐरे-गैरे के बीच पॉपुलर करना कला / उच्च मानकों का अपमान या क्षरण है … आदि, इत्यादि ! दूसरी आपत्ति यह कि जब यही आम जन हज़ारों का मोबाईल, लाख के आस-पास की बाईक, ब्राण्डेड कपड़े, एसेसरीज वगैरह खरीद सकता है तो स्मार्टफोन की कीमत का चित्र क्यों नही ? बात तो वाज़िब है भई !

पहले पहली बात पर – एक उदाहरण लें. शास्त्रीय संगीत ( मुख्यतः गायन-वादन ) कितना उच्च कला बोध का और श्रमसाध्य है और राजघरानों के बीच रहा है – इस बात को सभी जानते हैं. इस क्षेत्र के कलाकार जब जनता के बीच प्रदर्शन देने लगे तो उस महान कला और कलाकारों की लोकप्रियता बढ़ी ही और महत्व, गुणवत्ता, सम्मान आदि किसी मे कमी नही हुई. पहले कैसेट / सी.डी. सैकड़ों की कीमत की होती थी, फिर पन्द्रह से पचास रुपये तक के कैसेट आये और अब नेट पर मुफ़्त भी हैं. जो कलाकार महाराजाओं की निजी महफिलों मे प्रस्तुतियां देते थे, वे लखनऊ महोत्सव व दीगर जगहों पर पण्डाल के नीचे, हज़ारों आम जन के बीच प्रस्तुतियां दे रहे हैं तो भी न उनका मान कम हुआ, न कला बाज़ारू हुई और न ही उसका स्तर गिरा – उलटे और सबका मान बढ़ा. मशहूर नाटकों के मञ्चन मशहूर निर्देशक व कलाकार कभी मुफ़्त, कभी खुले मे तो कभी दस से सौ रुपये के टिकट पर करते हैं और हॉल मे तिल रखने की जगह नही होती. जब उन पर कोई आँच नही आयी तो इस कला और कलाकार पर पर भी कोई आँच न आयेगी. दूसरी बात पर संक्षेप मे – वह आम जन इसलिये इन पर इतना खर्च करता है कि एक तो उसे इनकी प्रत्यक्ष उपयोगिता समझ मे आती है और दूसरे अगर नही समझ आती तो उत्पादक समझ और उपयोगिता पैदा करता है. आप यह समझ और उपयोगिता पैदा कीजिये – आपकी भी कृतियां इज़्ज़त से, आपकी चाही कीमत पर बिकेंगी. बेकार के अहं और उच्चताबोध को लेकर अपना बेहतरीन काम केवल कुछ लोगों के बीच जाया न कीजिये.
  
बहुत लम्बा लिख मारा, यह अनाधिकार चेष्टा है, बिना मांगे उपदेश / सलाह ( जिसमे लगभग हर व्यक्ति माहिर और तत्पर होता है ) भी है, बड़बोलापन / छोटा मुह, बड़ी बात भी है और कुछ यह भाव भी हो सकता है कि मै अपने को समझदार मानते हुए मित्रों की समझ पर उंगली उठाते हुए उनका अपमान जैसा कर रहा हूँ – बावजूद इसके कि मै कला का क भी नही जानता … यह सब हो सकता है, किन्तु मै आम जन हूँ और आम जन जो महसूस करता है, उसे कहा. बुरा लगा होगा – क्षमा कीजिये, क्षमा बड़ेन को चाहिये छोटन को अपराध – मुझे विश्वास है कि कलाकार उदार होता है उसी भरोसे इतना कहने की धृष्टता की.


राज नारायण



(#) कला स्रोत , लखनऊ मे राजा रवि वर्मा  (Verma नही, Varma ) के चित्रों (लीथोग्राफ) की प्रदर्शनी, श्री सचिन केलुसकर द्वारा

($)  Knife painting – ‘nature’ made in acrylic medium with knife by Ms. Hema Vishwakarma

(*) An abstract work of Sri Lakshit Soni, Title “Xenium”, Price Rs. 2000.00 at Kala Srot, Lko. 

Sunday, 7 December 2014

पुस्तक चर्चाः “उपसंहार” – काशीनाथ सिंह


पुस्तक चर्चाः “उपसंहार” – काशीनाथ सिंह

पौराणिक चरित्र और उन पर आधारित महाकाव्य सदा से ही अबूझ आकर्षण का केन्द्र रहे हैं. उन चरित्रों का फलक इतना विस्तृत है कि लोग एक बार मे पूरा देख ही नही पाते और कार्य इतने अतिमानवीय कि वे चरित्र श्रद्धा से देखे जाते - जाते अपने जीवनकाल मे ही ईश्वर हो जाते हैं और वे महाकाव्य धर्मग्रन्थों का दर्जा प्राप्त कर लेते हैं. इस दर्जे को प्राप्त होने पर उन चरित्रों व उनके हर कार्य का निरूपण और विश्लेषण उसी नज़रिया से किया जाता है जैसा मूल ग्रन्थ मे है. उससे अलग व्याख्या का जोखिम प्रायः कोई उठाता नही किन्तु समर्थ साहित्यकार उनके कार्यों की निर्मम चीर फाड़ करते हैं और उनके अन्तर को मानवीय संवेगों के अनुसार टटोलते हैं. वे उन प्रश्नों से मुठभेड़ करते हैं जो कभी न कभी हर अध्येता के मन मे उठे होते हैं. महाभारत ऐसा ही महाकाव्य है और उसमे कृष्ण का चरित्र अगम - अगाध है. कृष्ण के मन के ऐसे ही झञ्झावात को पकड़ा है काशीनाथ सिंह ने सितम्बर, २०१४ मे राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अपने नये उपन्यास “उपसंहार” मे.

उपन्यास महाभारत युद्ध के समापन से प्रारम्भ होता है. युद्ध अतिविनाशकारी सिद्ध हुआ, विजेता भी पराजित ही सिद्ध हुए क्योंकि उन्हे जो धरती मिली वह झुलसी हुई थी. विजेता दम्भ से भरे थे और उन्मत्त आचरण वाले हो गये थे. इस महायुद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया किन्तु युद्ध के दौरान ही प्रश्न उठने लगे थे कि क्या वास्तव मे यह धर्मयुद्ध था. प्रश्नों के घेरे मे थे केवल कृष्ण और प्रश्न करने वालो मे थे उनके अपने और सबसे बढ़कर वे स्वयं. उन्हे भी अब लगता था कि जो उन्होने किया, वह धर्म नही था और उस धर्माचरण से जो हासिल हुआ, वह विभीषिका थी. अब उनके अपने ही अधर्म कर रहे थे. महाभारत मे तो अर्जुन को उन्होने अपनों के विरुद्ध युद्ध करन्ने को प्रेरित किया किन्तु अब वे स्वयं अपनों को रोक नही पा रहे थे. उन्हे सब निरर्थक लग रहा था और वे आशंका और अवसाद मे जी रहे थे. परिणिति बहुत त्रासद रही. सता और सचमुच के मद मे चूर उनके कुटुम्ब ने अपनों का वध कर दिया, बचों-खुचों का कृष्ण ने वध किया, बलराम ने आत्महत्या ( सागर मे जलसमाधि ) कर ली और वे जरा नामक व्याध द्वारा पशु के धोखे मे पशु की तरह मारे गये.
कृष्ण के अंर्तद्वन्द्व और अंतिम दिनों की गाथा है उपसंहार. काशीनाथ सिंह की एक अलग ही शैली का परिचय मिलता है इसमे. पूरा तो आप उपन्यास पढ़कर ही जानेंगे, अभी उपन्यास से कुछ अंश देखें जो मेरे विचार से उपन्यास का परिचय दे रहे हैं --


“ … यहीं कृष्ण को ब्राह्मणों को तीज – त्योहारों पर
  दान- दक्षिणा देते समय एक नया अनुभव हुआ
  कि ये जिसकी दान – दक्षिणा और सेवा-सत्कार से प्रसन्न हों
  उसे नारायण बना दें और जिससे असन्तुष्ट हों
  उसे असुर और राक्षस … “
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“ … कैसे समझाऊँ तुझे “ कृष्ण खड़े हो गए – “ बस यही समझो कि प्रत्येक मनुष्य कभी न कभी कुछ ही पलों या क्षणों के लिए ही सही, ‘ किसी न किसी का ईश्वर हुआ करता है. ऐसा एक नही, कई बार हो सकता है. आख़िर ईश्वर है क्या ? मनुष्य के श्रेष्ठतम का प्रकाश ही तो ? और यह प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है, लेकिन फूटता तभी है जब किसी को कातर, बेबस, निरुपाय और प्रताड़ित देखता है. मै भी था ईश्वर. हाँ, मेरी अवधि किन्ही कारणों से थोड़ी लम्बी खिंच गई रही होगी. … चलो अब… “
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“… ‘हाँ, तुमने एक काम ज़रूर किया’ बलराम रुक कर बोले- ‘तुमने युद्ध की शास्त्रीय और पुरानी शैली को नाकारा साबित कर दिया – अपनी छल और कूट बुद्धि से. इसका प्रयोग तुम राक्षसों-असुरों के संहार के लिए करते हो. लेकिन युद्ध मे छल से तुमने जिनका वध किया, वे असुर और राक्षस नही थे. भीष्म, द्रोण, कर्ण – ये अनमोल रत्न थे आर्यावर्त के, जो किसी-किसी युग मे कभी-कभार ही पैदा होते हैं. इन्हे अकेले नही मार सकता था क्या अर्जुन ? फिर वो किस बात के लिए तीनों लोकों मे सबसे बड़ा धनुर्धर कहलाता फिर रहा था ?’
  बलराम कृष्ण की प्रतिक्रिया देखते रहे.
  कृष्ण ने आँखें बन्द कर रखी थीं. चुप थे. … “
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“ … और रही बात ईश्वर की
 तो मै ईश्वर कहो या वासुदेव – होना चाहता था
 क्योंकि उसकी कोई जाति नही होती, वर्ण नही होता, गोत्र नही होता
 अकेला वही है जो वर्णाश्रमों के बन्धनों से मुक्त है.

 और दाऊ, कोई भी हारने के लिए नही लड़ता
 लड़ता है विजय के लिए
 और विजय गांडीव के रास्ते नही मिलती
 मिलती है रणनीति से
 जिसे तुम छल, कपट, झूठ, अधर्म कहते हो
 वे रणनीति के ही अंग हैं
 और मैने ‘रणनीतिकार’ की भूमिका उसी दिन तय कर ली थी
 जिस दिन स्वयं को ‘निःशस्त्र’ घोषित किया था. … “
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“ … शुरुआत की रुक्मिणी ने –
 ‘प्रद्युम्न के दिमाग से यह बात निकल ही नही रही है
 कि आपने बाप का कर्तव्य नही निभाया.
 कहता रहता है हमेशा
 कि सौरीघर से ही सात दिनों के अन्दर
 आधी रात को शम्बरासुर उठाकर ले गया
 और उस आदमी ने जानने की कोशिश ही नही की
 कि कौन ले गया ? कहाँ ले गया ? क्यों ले गया ?
 ऐसा भी कोई बाप होता है क्या ?
 मैने जाना ही नही कि बचपन क्या होता है ?
 माँ-बाप का प्यार क्या होता है ?
 उन्हे जब मेरी फिक्र नही तो मै क्यों करूँ उनकी फिक्र ?
 मै जो कुछ हूँ अपने बलबूते हूँ, किसी का अहसान नही मेरे ऊपर !
 उन्हे ‘पुरुषोत्तम’, ‘जनार्दन’, जगदीश्वर’ जो कुछ होना है
 हुआ करें, हमारे ठेंगे पर ! … “
                  ५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५
“ … लेकिन यह निश्चिन्तता बहुत देर तक नही रह सकी.
 वे इस चिन्ता मे घुलने लगे कि
 जिस लोकराज्य और गणराज्य के लिए
 वे जीवन भर राजतन्त्रों के खिलाफ लड़ते रहे
 उस गणराज्य की अपनी मुश्किले हैं, अपनी समस्याएँ हैं
 और उनका समाधान अगर है तो उन्ही के पास
 जो उन्हे खड़ी कर रहे ह्हैं.
 लेकिन इतना ही वे समझ सकते तो खड़ी क्यों करते ? … “
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“ … ‘लेकिन दारुक ! इधर लगातार मेरे भीतर कुछ गूँज हो रही है. उथल-पुथल मची हुई है. वह जगे मे नही, सोए मे भी सुनाई देती है. महाभारत शुरु होने से पहले ही जब दोनो पक्षों की सेनाएँ आमने-सामने डँट गईं, तो धृतराष्ट्र ने संजय से जानकारी चाही. संजय ने गान्धारी वगैरह को बुलाकर सबके सामने कहा – ‘यतो कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः’ यानि जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं जय है. यह मैने सुना था. इधर बार-बार यही प्रतिध्वनि मेरे कानों मे गूँज रही है कि क्या सचमुच मैने महाभारत मे अठारह दिन धर्माचरण किया था, जिससे विजय मिली ?’ … “ 

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