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Wednesday, 23 October 2024

पुस्तक चर्चाः अन्दाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा

 


पुस्तक चर्चाः अन्दाज़--बयाँ उर्फ़ रवि कथा

किताब ममता कालिया के संस्मरण है., साथी, प्रेमी, पति, लेखक, व्यवसायी, सम्पादकजाने कितने रूप धारे रवीन्द्र कालिया के. मगर ठहरिये, यह संस्मरण केवल रवीन्द्र कालिया के या रवीन्द्रममता कालिया भर के नहीं हैं, वस्तुतः कोई भी संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा या फिर डायरी उसी व्यक्ति की नहीं होती जो उसे लिख रहा है या जिसके बारे में लिखा जा रहा है बल्कि उस दौर के परिवेश के बारे में होती हैउसमें वो शहर भी होते हैं जहाँ-जहाँ वो रहा और काम किया, वे संस्थान भी होते हैं जिनमें काम किया, उनकी बाहरी से लेकर अन्दरूनी बातें होती हैं, वे सब काम होते हैं जो उसने किये, उन सब लोगों के बारे में होता है जिनसे उसका कैसा भी साबका पड़ा, उस दौर की संस्कृति, परम्परा, रीति-रिवाज --- गरज ये कि क्या-क्या नहीं होता एक ऐसी किताब में. यह संस्मरण भी मात्र रवीन्द्र कालिया-ममता कालिया का नहीं है, मुम्बई (तब बम्बई), इलाहाबाद और कई शहरों का है, रवीन्द्र के प्रिण्टिंग प्रेस व्यवसाय का है, मात्र साहित्यिक रिश्तों का नहीं नितान्त घरेलू रिश्तों की बात भी है, रवि की अच्छी-बुरी बातों / आदतों का हैएक बड़े फलक को समेटे हुए है जो एक किताब में शायद सिमट नहीं पायाइसी का सिलसिला है ममता कालिया की इसके बाद की संस्मरणात्मक किताब, “ जीते जी इलाहाबाद”. बहरहाल इस चर्चा में बात सिर्फ़ अन्दाज़--बयाँ उर्फ़ रवि कथा की.

किताब रवि की बीमारी से शुरू होती है और बीमारी के भी इस स्तर तक पहुँच जाने के कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और 9 जनवरी, 2016 की रात को उनकी मृत्यु हुई. संस्मरण रवि कथा के अन्तिम अध्याय से शुरू होता है, एक प्रकार से संस्मरण फ्लैश बैक में चलते हैं. रवि के जिगर में फोड़ा हो गया था, इसे उनकी मयनोशी से भी जोड़ना असंगत होगा. मयनोशी की चर्चा विस्तार से रवीन्द्र कालिया नें संस्मरणात्मक पुस्तकग़ालिब छुटी शराबमें यत्र-तत्र की है
रवीन्द्र के पेट में फोड़ा था, इलाज एलोपैथिक चल रहा था किन्तु बीमारी की वजह से / के दौरान उनकी रुचि होम्योपैथी में बहुत हो गयी. उन्होंने इसका विशद अध्ययन किया और छोटे-मोटे डॉक्टर से हो गये. अपने पर भी प्रयोग करते और मिलने वालों को भी उपचार बताते, दवाईयाँ देते. उनके होम्योपैथी अध्ययन और प्रयोग के बारे में ममता जी ने लिखा है,

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मयनोशी तो अगस्त 2011 से ही छूट गयी थी जब पेट दर्द रहने लगा. अब उनकी शामें होम्योपैथी चिकित्सा के अध्ययन में डूबी रहतीं. कमाल की बात यह कि उन्होंने हर एलोपैथिक दवा का होम्योपैथिक विकल्प ढूँढ लिया था. होम्योपैथी और ज्योतिष शास्त्र में उनकी पुरानी दिलचस्पी थी. होम्योपैथिक दवाओं की अनिवार्यता हमारे जीवन में हमेशा बनी रही… “
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दो नवम्बर से ग्यारह नवम्बर 2011 में जब उनकी YYY90  रेडियो सर्जरी हुई तब भी होम्योपैथिक दवाओं का डिब्बा और किताब उनके साथ अपोलो हॉस्पिटल गयी. होश आने पर वहाँ की नर्सों और वार्ड ब्वॉय आदि से उनके मर्ज़ पूछकर किताब से अध्ययन करके मीठी गोलियाँ देना रवि का सबसे प्रिय काम था. बड़ा बेटा अनिरुद्ध कहता, ‘पापा अपनी आँखों को आराम दीजिए, ये सब अस्पताल के लोग हैं, इन्हें अच्छे से अच्छा इलाज मिल जाता होगा.’
          
रवि कहते, ‘मेरी दवा से इनकी बीमारी जड़ से मिट जायेगी यह तो सोच.’ … “

होम्योपैथी विषयक ये अंश इसलिये दिये कि अन्य साहित्यिक विवरण तो अन्यत्र मिल जायेंगे, ये विवरण ममता जी या घर वाले ही दे सकते थे

संस्मरणों में 30 जनवरी, 1965 को रवीन्द्र कालिया से चण्डीगढ़ मेंकहानी सवेराकी गोष्ठी में परिचय के हैं जिसकी परिणिति 12 दिसम्बर, 1965 को  शादी में हुई. उसके बाद रवि कथा के कई प्रसङ्ग जिनमें धर्मयुग की नौकरी, प्रिण्टिंग प्रेस , लेखन, गोष्ग्ठियाँ, सम्मेलन और सम्पादन के संस्मरण हैं. संस्मरण तो लगभग सभी साहित्यकारों / आलोचकों, सम्पादक-सह-लेखकों के साथ हैं किन्तु सर्वाधिक रोचक / रोमाञ्चक और  स्तब्ध करने वाला संस्मरण कृष्णा सोबती का है. पढ़ कर यही विचार आता है कि साहित्य में उदात्त सोच रखने वाला व्यवहार में ऐसा भी हो सकता है.

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वर्ष 1990 मेंवर्तमान साहित्यके सम्पादक विभूति नारायण राय ने कहानी विशेषांक का प्रस्ताव रखा था उनका विचार था कि पन्द्रह-बीस कहानियों में हिन्दी के सशक्त कथालेखन को प्रतिनिधित्व मिल सकता है. उन्होंने रवि से कहा, “ कालिया जी इसका सम्पादन आप कीजिए.” …
रवीन्द्र कालिया प्राणपण से जुट गये, देश भर में लेखकों को कहानी मंगवाने के लिए फोन खटखटाने शुरू किये. जब कोई खास अंक निकलने वाला होता है तो कुछ रचनाकार तो इतने भले और भोले होते हैं कि सम्पादक के एक फोन पर कहानी लिखने बैठ जाते हैं और पूरी होते ही, बिना नाज़-नखरे के उसे पोस्ट कर देते हैं. इक्का-दुक्का लेखक-लेखिकाएँ चाहती हैं कि सम्पादक रोज़ फोन कर उनकी और कहानी की तबियत और ख़ैरियत पूछता रहे. रवि हर लेखक-लेखिका की नब्ज़ जानते थे. उन्होंने यह फर्ज़ नियम से निभाया.
                  
हशमत ने कहा कि वे इसके लिए ख़ासतौर पर कहानी लिख कर देंगी, पर हाँ, कालिया उन्हें चार्ज्ड ( Charged) रखे. हशमत पसंद करती थीं सम्पादक उन्हें तवज्जो दे और विशिष्टतम माने.
        
रवि को इसमें कोई एतराज़ नहीं था क्योंकि वे तो सन 1963 से ही हशमत के प्रशंसक रहे थे … “

बहरहाल उन्होंने हशमत ( कृष्णा सोबती ) से रोज फोन कर करके उन्हें चार्ज रखा. वे भी कहानी की नोक पलक सँवरवाने के लिए फोन करतीं एक बार रात के पौने एक बजे फोन किया. अन्ततः कहानी मिली किन्तु बिना नाम, शीर्षक के. रवि ने फोन करके पुष्टि की. कहानी थी लड़की’.  रवि ने फोन पर कहानी दुरुस्त करायी और उसकी तारीफ में तीन पत्र उपेन्द्रनाथ अश्क़, मार्कण्डेय और दूधनाथ सिंह से अग्रिम लिखवा लिए ( पत्रों के अंश और कृष्णा सोबती की कहानियों के बारे में ममता जी के विचार आप किताब में ही पढ़ें ) कहानी और वह अंक खूब चर्चित हुआ.
                                 
बाद में रवि ने कृष्णा जी पर एक लम्बा संस्मरण लिखाहमारी कृष्णा जीपूरा संस्मरण उन्हें फोन पर सुना कर उनकी अनापत्ति और प्रकाशन की समति ली और वहतद्भवमें भेज दिया. ‘तद्भवके सम्पादक, अखिलेश जी, ने भी कृष्णा जी को पूरा संस्मरण फोन पर सुनाया और पूछा कि यदि उन्हें किसी अंश पर एतराज़ हो तो सम्पादित कर दें. उन्होंने कालिया को समझदार कहते हुये संस्मरण छापने की अनुमति दी. संस्मरणतद्भवके अप्रैल 2006 के अंक में छपा. 2007 में कॄष्णा जी दिल्ली में कालिया आदि से मिलीं. जिन, वोदका और व्हिस्की आदि के दौर भी चले और एक सुबहजनसत्तामें कालिया और संस्मरण पर हमला जैसा लेख लिखामेरे छह फुटिया एडिटर साहबऔरकथादेशमेंसंस्मरण देवकीनन्दन खत्री का फिक्शन नहीं होतासंस्मरण के् लेखक, रवीन्द्र कालिया और छापने वाले सम्पादक, अखिलेश द्वारा पूरा संस्मरण सुनाने और अनापत्ति जैसा प्रकाशन की अनुमति लेने के बाद उनसे कोई बात किये बिना अकस्मात लगभग साल भर बाद इस तरह का हमला स्तब्धकारी है. विस्तार भय से पूरा नहीं दे रहा हूँ, यदि किताब में रुचि जाग्रत हो रही हो तो सम्पूर्ण विवरण किताब में पढ़ें.

हर अध्याय के प्रारम्भ में एक शेर दिया है, अधिकांश शेर ग़ालिब के हैं. किताब पेपरबैक है छपाई त्रुटिहीन है किन्तु आज के चलन के हिसाब से कागज लुगदी से कुछ ही बेहतर है. अच्छा हो कि प्रकाशक दाम कुछ बढ़ा दिया करें किन्तु कागज बढ़िया (सफेद और चिकना ) प्रयोग करें. यह दूसरा संस्करण है और किताब के अन्त में फ़ोटो एलबम भी है.
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पुस्तकअन्दाज़--बयाँ उर्फ़ रवि कथा
विधासंस्मरण
लेखकममता कालिया
प्रकाशकवाणी प्रकाशन ( पेपरबैक्स )
अन्यप्रथम संस्करण सितम्बर 2020, द्वितीय संस्करण नवम्बर 2020
         
किंडल में भी उपलब्ध
         
पृष्ठ 196, मूल्य
299/-

 

Monday, 14 October 2024

पुस्तक चर्चाः साँपों की सभा-अनूप मणि त्रिपाठी


 पुस्तक चर्चाः साँपों की सभा-अनूप मणि त्रिपाठी

हास्य-व्यंग्य की किताब ‘साँपोँ की सभा’ वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर छोटे किंतु चुटीले और सार्थक व्यंग्य लेखों का संग्रह है, कुछ तो इतने छोटे कि चार-पाँच पंक्तियों के, बल्कि इससे भी छोटे, पर चुटकुले नहीं बल्कि सार्थक व्यंग्य हैं. कथा न होते हुए भी कथा से रोचक, शायद इसलिए कि पढ़कर बरबस ही आज के जाने-पहचाने, रोज घटित होते ही जा रहे राजनीतिक परिदृश्य आँखों के सामने आ जाते हैं, फौरन ‘मन की बात’ आती है कि अरे ! यही तो हुआ/हो रहा है. व्यंग्य की विशिष्ट पहचान कि बहुधा अन्तिम पंक्ति में स्तब्ध कर देने वाला/ तिलमिला देने वाला तथ्य उद्घाटित होता है, इनमें बखूबी है. लगभग सारे ही राजनीतिक व्यंग्य हैं और राजनीतिक परिदृश्य को आच्छादित किए हुए आज के सर्वाधिक राजनीतिबाज की याद दिलाते हैं. साथ ही कोई सपाटबयानी नहीं, लाउडनेस नहीं पर मारकता भरपूर. प्रसिद्ध कथाकार, शिवमूर्ति, ने जो इस संग्रह के पृष्ठ आवरण पर कहा है, वह अनूप जी के व्यंग्य की विशेषता को समझने में सहायक है, किताब की ही तरह उनका कहना भी महत्वपूर्ण है.
किताब में कोरोना काल की भयावहता, संवेदनहीनता, आम जनता को उसके हाल पर छोड़ दिये जाने, 'आपदा में अवसर' के मंत्र को व्यावसायियों द्वारा, जिनमें मुख्यतः अस्पताल और डॉक्टर रहे, पूरी निर्लज्जता से अपनाने के उदाहरणों के अलावा संवेदनशीलता, सामाजिक सद्भाव और ज़िम्मेदारी का भाव भी 'माटी' में व्यक्त हुआ है. इसमें तो यह एक कथा है, वास्तव में राजनीतिबाजों के असर से बेअसर इस तरह के सद्भाव की कई मिसाल दोनों तरफ से देखने को मिली.
'कसाई बाड़े में एक मौत हो गयी. मरने वाला अलेला रहता था. उसके रिश्तेदारों को ख़बर कर दी गयी पर कोरोना के डर से कोई आने को तैयार नहीं.
''' 'कोई मिट्टी छूने को तैयार नहीं चचा ... जबकि बार-बार बताया गया है कि मरहूम को किरौना नहीं हुआ था, अफवाह थी, पर कोई मानने को तैयार ही नहीं...' किशोर फैज़ान ने सारी बात एक साँस में कह डाली.
'अब ज़्यादा देर करना मुनासिब नहीं. मिट्टी खराब होगी !' कलीम मियाँ बोले जो फैज़ान के अब्बू थे.
'ज़िन्दगी भर अकेला रहा, अब देखो अकेला चल दिया!' फारुख़ मियाँ का यह कहते-कहते गला भर आया.
'उठाइए भाई जान!' आमिर बोला. सब आगे बढ़े. फारुख़ मियाँ ने अपनी उम्र की परवाह न करते हुए ज़नाजे को कन्धा दिया, पर थोड़ी देर बाद ही जिया साहब ने उनकी जगह ले ली.
फारुख़ मियाँ ज़नाजे के आगे चल रहे थे. वे चिहुँके. जैसे उन्हें सहसा कुछ याद आ गया हो !
वे भर्राई आवाज़ में बोले, 'राम नाम !'
पीछे से आवाज़ आयी, 'सत्य है !'
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कोरोना पर ही गंगा में बहती लाशों पर दो-तीन से पाँच-छह लाईनों के 10 नश्तर 'लाशों की बहती कहानियाँ' में हैं.
शीर्षक रचना 'साँपों की सभा' का पाठ स्वयं अनूप जी के मुह से सुना है, शिवमूर्ति जी ने भी फ्लैप पर इसका एक टुकड़ा दिया है, किताब में पढ़ें.
अन्य में 'शहर का नाम रोशन...' एक महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न उठाति है कि क्या शहर का नाम केवल वे ही लोग रोशन करते हैं जो यूपीएस्सी में चयनित होते हैं ? और लोग क्या किसी तरह शहर का नाम रोशन नहीं करते ? कौन हैं वे लोग और किन कामों से शहर का नम वास्तव में रोशन करते हैं, यह 'शहर का नाम रोशन...' में देखें.
'क्रान्तिकारी' वर्दी के डर से हकलाते-तुतलाते क्रान्तिकारियों की सच्चाई है तो 'बढ़ती हुई शुभकामनाएँ' मार सुबह-शाम अनवरत ठेली जा रही व्हाट्सऐपीय शुभकामनाओं से आक्रान्त और चिढ़े की कातर पुकार / विद्रोह है, व्हाट्सऐपियों को इस बारे में गम्भीरता से सोचना चाहिए.
यह कुछ वे कथाएँ हैं जो राजनीतिक नहीं, समाजशास्त्रीय हैं. किताब अवश्य पढ़ें, कथ्य व कलेवर से गरिष्ठ नहीं, पतली सी किताब है.
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किताब - साँपों की सभा, लेखक - अनूप मणि त्रिपाठी
प्रकाशक - लोकभारती पेपरबैक्स
पृष्ठ - 150, दाम 250/-

Thursday, 19 September 2024

अथ श्री हयग्रीव अवतार कथा !

 

अथ श्री हयग्रीव अवतार कथा !

अभी कुछ ही दिन भये कि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन के दिन हमने फेस बुक नाम्ना प्लेटफार्म पर विष्णु भगवान के हयग्रीवावतार ( जिसमें धड़ मानव का और सर हय अर्थात अश्व अर्थात घोड़े का )  का चित्र देखा और अति संक्षिप्त परिचय के साथ व्हाट्स ऐप नाम्ना एक अन्य प्लेटफार्म पर पोस्ट कर दिया. उस पोस्ट के साथ हम जिज्ञासुजनों को आमन्त्रित भी किये कि जिस किसी जन को इस संदर्भ में कोई जिज्ञासा हो, करे ! यथाजानकारी शमन का प्रयास किया जायेगा ! हे मित्रों ! घोर कलिकाल, कि इन कथाओं के श्रवण व चर्चा में किसी जन ने किञ्चित रुचि न प्रकट करी सिवाय एक जिज्ञासु, उत्तम भाई, के. वे जिज्ञासा के साथ अनुरोध करते भये कि स्यात कथा कलेवर से कुछ पुष्ट होगी सो उचित प्रतीत होता है कि फेसबुक पर तो इसका परिचय व अंश पोस्ट किया जाय औ ब्लॉग पर संपूर्ण रूप में कहा जाय सो उनके अनुरोध का मान रखते हुए हम कह रहे हैं.

कथा वाचन के समय हम स्वयं को व्यास गद्दी पर और सम्मुख जिज्ञासु उत्तम भाई को मुख्य यजमान के रूप में विराजमान तथा अन्य सुधीजन को नीचे दरी / कुर्सियों पर व कुछ इधर उधर के तांक झांक करते ( ऐसे जो फेसबुक / ब्लॉग पर आते तो हैं पर न कोई रिएक्शन देते, न कमेण्ट करते ) मन की आंखों से देख रहे हैं.

कथावाचन एवं श्रवण के पूर्व हम स्पष्ट कर देना उचित समझते हैं कि किसी प्रकार की दक्षिणा, सीधा, वस्त्र, पात्रादि एवं विधि विधान की हमारी ओर से कोई मांग नही है तथापि जो श्रद्धालुजन श्रद्धा स्वरूप यह सब अथवा पत्रं पुष्पं इत्यादि अर्पित करने की अभिलाषा करें तो हम उसमें बाधक न होंगे. साथ ही यह भी निवेदन है कि कथा को भक्ति भाव से अथवा कौतूहल से अथवा मिथक कथा अथवा गल्प – जो भी भाव हो, उससे ग्रहण करें. साथ ही व्यास पीठ पर होने के नाते यह हमारा अधिकार है कि कथा में हम अपनी छौंक लगाते चलें – कृपया इस इस अधिकार का हनन करने का प्रयास न करें, इसका मान रखें. यजमान गण की जो शंकायें होंगी, कृपया कथा के समापान तक धैर्य रखें. कथा के उपरांत टिप्पणी सत्र होगा, उसमें यथाशक्ति समाधान का प्रयास किया जायेगा. कथा के समापन पर कोई आरती, हवन, भोज अथवा प्रसाद वितरण न होगा तथा सारी ही कथा गद्य में है, नृत्य गानादि की कोई व्यवस्था न होगी. संकल्प श्रावण में किया था किंतु अब भादों चल रहा है और भादों में भागवत का विधान है अस्तु भागवत न होते हुए भी इसे भागवत ही मानें.

     ---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा प्रथमोध्याय सम्पन्न ----

 

द्वितीय अध्याय –

यह कथा देवी भागवत में वर्णित है, जो जन अधिक जिज्ञासु हों वे देवी भागवत पढ़ने को सलाहित हैं, कथावाचक को तंग न करें. तो एक बार की बात है, भगवान विष्णु सदा की भांति क्षीरसागर में शेषशैय्या पर अधलेटी मुद्रा में विश्राम कर रहे थे. कौमोदकी गदा दक्षिण जंघा के पार्श्व में रखी थी, सुदर्शन चक्र वाम तर्जनी पर मंथर गति से घूम रहा था, एक कर में कमल और एक कर अभयमुद्रा में शिथिल सा था, शीश पर मुकुट, गले में वनमाला, कौस्तुभ मणि और वक्ष पर भृगु के चरण चिन्ह सुशोभित हो रहे थे और श्रीमुख पर मन्द मन्द मुस्कान थी जो कालांतर में चित्रित की जाने वाली मोनालिसा की मुस्कान की अपेक्षा लक्षगुणित रहस्यमयी और मोहक थी. श्रीचरणों के समीप लक्ष्मी जी चरण चापन कर रही थीं. श्रीहरि लक्ष्मी जी का अलौकिक रूप निहार रहे थे. लक्ष्मी जी आज कुछ अधिक ही सुंदर और मोहक लग रही थीं और प्रभु उस छवि पर मुग्ध हुए जा रहे थे, इस उपक्रम में उन्हे पता ही न चला कि उनकी उनकी मन्द मुस्कान हास्य में बदलती जा रही है. वे आल्हाद के वशीभूत हँस रहे थे. लक्ष्मी जी के हाथ तो उनके चरण पर थे किंतु दृष्टि उनके श्रीमुख पर थी. पहले उन्हे ताकते और फिर हँसते देख कर लक्ष्मी जी ने समझा कि वे उन पर हँस रहे हैं, उनका उपहास कर रहे हैं. हे मित्रों ! कोई भी स्त्री अपने रूप पर कोई विपरीत टीका-टिप्पणी सहन नही करती फिर ये तो हँसी उड़ाना लगा और वह भी लक्ष्मी जी का.  उन्होनें एक बार विचार किया होगा कि श्रंगारादि में कोई कमी या असंगति तो नही हो गयी किंतु ऐसा कुछ उनके ध्यान में न आया तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उन्होने विष्णु जी को शाप दिया कि तुम्हारा सर कट कर गिर जाये. रूप का तिरस्कार न करके कुछ और किया होता तो सम्भवतः ऐसा घोर शाप न देतीं, पावं पकड़ कर, घुमा कर क्षीरसागर में ही फेंक देतीं तो हँसने का दण्ड मिल जाता, अकस्मात सागर में गिरने से हँसी लुप्त हो जाती और वे तैर कर पुनः शेष पर आ जाते किंतु रूप का अपमान ! दण्ड अपेक्षाकृत अधिक था किंतु अब मुख से शाप निकल गया तो श्रीहरि ने कोई प्रतिकार न किया ( किस पति का साहस है प्रतिकार का ! ) हे मित्रों ! यदि यह विचार आ रहा हो कि हास्य को उपहास समझना और वह भी लक्ष्मी जी द्वारा और फिर मृत्युदण्ड – तो हे श्रोतागण, आप भ्रम में हैं. प्रभु के समस्त कार्यों का कोई हेतु होता है – ऐसी व्यवस्था हमारे ग्रंथकार कर गये हैं. तो प्रभु ने शाप अंगीकार किया. शाप में कोई ऐसा निर्देश न था कि यह तत्काल क्रियान्वित होगा अथवा कुछ कालोपरांत और कहां होगा सो शाप ने भी कुछ ढील ले ली और उस समय क्रियान्वित न होकर किसी उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करने लगा.

   ---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा द्वितीयो ध्याय सम्पन्न ----********************************************

तृतीय अध्याय

तो मित्रों ! आप चिंता में पड़ गये होंगे कि आगे क्या हुआ ? विष्णु भगवान का शीश कट कर गिरा या नही. उसके बाद वे जीवित रहे कि वैकुण्ठवासी भये ! वैसे वो क्या वैकुण्ठवासी होंगे, वो तो वहीं रहते ही हैं,  वो तो हम मृत्युलोक, उसमें भी भारतवर्ष के और उसमें हिंदू, प्राणियों के मरने पर कहा जाता है. बाक़ी धर्मावलंबी और अन्य देशों के लोगों का क्या होता है, हमें नही मालूम ! एक मुसलमान कवि ने कहा भी है, “ हिंदुन के नाथ हो तो हमरा कछु निहोरा नही, जगत के नाथ हो तो हमरी भी सुधि लीजिये. “ ये तो हट कर चर्चा हो गयी, इससे भी बड़ा प्रश्न यह सर उठा रहा है कि यदि शाप क्रियान्वित हुआ और, जैसा कि सबको विदित है, वे मरे भी नही तो इसके बाद उनके और लक्ष्मी जी के दाम्पत्य सम्बन्ध पूर्ववत मधुर रहे अथवा उनमें तिक्तता आ गयी ? क्या श्रीहरि ने उसके अननंतर लक्ष्मी जी की ओर चितवते हुए हँसना तो दूर, मंद स्मित सहित देखना भी बंद कर दिया – हे मित्रों, डर और उसमें भी पत्नी से डर आदित्य को भी ग्रस सकता है. पूजा नाम्नी एक श्रोता ने तो इसके कपोल - कल्पित होने का प्रश्न भी किया – हे यजमानगण ! यह सब अतिप्रश्न हैं, कथा श्रवण के समय इनके पूछने से श्रोता और वक्ता – दोनों को दोष लगया है जिसका निवारण श्रोताओं द्वारा उपवास रख कर वक्ता को एक सप्ताह तक दोनों पहर सुस्वादु भोजन कराने से होता है. सो अब चित्त लगा कर श्रवण करो कथा, शंका समाधान टिप्पणी सत्र में किया जायेगा.

तो इसके कुछ कालोपरांत विष्णु भगवान एक युद्ध के बाद क्लांत होकर यूं ही एक पेड़ से टिक कर विश्राम करने लगे और निद्रादेवी ने उन्हे अपने अंक में ले लिया. उनका शार्ङ्ग नामक धनुष उस पेड़ के तने से टिका था और उसकी प्रत्यञ्चा भी चढ़ी थी. उसी समय एक कीट ने धनुष की प्रत्यञ्चा को कुतरना शुरू कर दिया और कुतरते – कुतरते वह डोरी कट गयी और विष्णु जी के गले से जा लगी और झटके से उनका सर कट कर भूमि पर जा गिरा. यह देखते ही हाहाकार मच गया. सब देव देवियां एकत्र हुए और देवी की सलाह से यह तय पाया गया कि घोड़े का सर काट कर विष्णु जी के कबंध पर लगा दिया जाय और विश्वकर्मा जी ने ( उन्होनें क्यों ? वे तो शिल्पी थे. वैद्य तो अश्विनीकुमार थे, उनसे यह कार्य क्यों नही कराया गया – इस बारे में देवी भागवत कुछ नही कहता ) ऐसा ही किया गया. हे जिज्ञासु जन ! वह दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का था. उस पुरुष का कबंध तो विष्णु का था किंतु सर घोड़े का अतः यह अवतार हयग्रीव अवतार कहा गया.

हे श्रोता गण ! अब यह अति प्रश्न न करने लगियेगा कि यदि घोड़े का सर लगाया जा सकता है तो क्यों नही विष्णु जी का ही सर लगा दिया गया और अश्व एवं मानव की संरचना, शिरायें, रक्तादि भिन्न गुण सूत्र के होते हैं, कैसे वे मैच किये. हम पहले ही सचेत कर चुके हैं कि ये अतिप्रश्न हैं कालांतर में बुद्ध ने इनका निषेध किया है. अगर आप प्रायश्चित करने को उतारू ही हैं तो हम क्या कर सकते हैं. पूर्व में भी मानव एवं पशु के सर धड़ की यह असंगत संगति हुई है. गणेश की कथा तो विदित ही होगी. इसके अतिरिक्त दक्ष प्रजापति का शीश शिव के गण वीरभद्र ने काट कर हवनकुण्ड में भस्म कर दिया था तो उनके धड़ पर अज अर्थात बकरे का सर लगाया गया था. नृसिंहावतार का भी स्मरण होगा, आधा नर आधा सिंह. कुछ काल के लिये श्रीहरि ने ही माया से नारद का मुख वानर का कर दिया था – तो ये नयी बात नही है. अब आप हयग्रीवावतार की कथा का श्रवण कर चुके हैं तो इसका हेतु जानने को भी व्याकुल हो रहे होंगे. चतुर्थ अध्याय में सुने हयग्रीवावतार का हेतु.

 

---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा तृतीयोध्याय सम्पन्न ----     ********************************************

चतुर्थ अध्याय

यदि आप धार्मिक कहें अथवा मिथक – इस कोटि के ग्रंथों का पाठ करते हैं अथवा प्रवचन सत्संगादि में जाते हैं तो निश्चित ही ज्ञात होगा कि देखने में भले ही विचित्र अथवा निरुद्देश्य लगे अथवा यह प्रश्न उठे कि क्या भगवान भी सामान्य मनुष्यों का सा आचरण करते थे किंतु उनके प्रत्येक कार्य का एक प्रयोजन होता है. उसे ही सिद्ध करने को यह अवतार अथवा अटपटी घटनायें होती हैं. कर्तव्य, दया, ममत्व अथवा स्नेह के वशीभूत साथी देवगणों से कुछ ऐसे कार्य हो जाते हैं जो तत्काल अथवा भविष्य में घोर संकट उत्पन्न करते हैं. उन्ही संकटों के निवारण / भूल सुधार के लिये यह नाना प्रकार के अवतार होते हैं सो इस अवतार का भी एक प्रयोजन है.

इस अवतार का हेतु जानने के लिये हे श्रोतागण ! हमें फ्लेश बैक तकनीक का उपयोग करना होगा. हम लिये चलते हैं आपको बिना किसी उपकरण के इस अवतार के भी पीछे के युग में जब सर्वत्र जल की अधिकता थी. शेषशायी विष्णु सदा की भांति उस दिन भी शेष शय्या पर लेटे थे. आपको तो मालूम ही है कि उनकी नाभि से कमल निकला हुआ है, सामान्य कमल की तरह इसकी नाल जल में नही है ( जाने कमल पोषण कहां से ग्रहण करता होगा ) बल्कि विष्णु जी की नाभी से ऊपर वायुमण्डल में है. उस विशाल कमल पर चतुरानन (तब उनका एक सर शिव जी काट चुके थे ) 

“ … तो उसे जोड़ा क्यों नही गया या उसकी जगह और कोई सर नही लगाया गया और वे जीवित भी रहे – सर था कि केश … “ – बार बार कह रहा हूं कि बातें बाद में करें, मुझे सब सुनाई दे रहा है, हां तो कमल पर  ब्रह्मा जी बैठे थे. उनके हाथों में वेद शोभायमान थे. विष्णु जी की दृष्टि कमल पर दो बिंदुओं पर केंद्रित हो गयी और उन दो बिंदुओं से मधु और कैटभ नामक दो दैत्यों ने जन्म लिया ( ये कौन खुसुर-फुसुर कर रहा है कि जन्म कहीं ऐसे होता है ? कहा ना, टिप्पणी सत्र में यह सब होगा ) दैत्य भी ऐसे दुष्ट कि ब्रह्मा के हाथ से वेद छीन कर सागर में गोता लगा गये. अब वेदों पर खतरा था तो विष्णु जी तुरंत सागर में कूदे और उनसे युद्ध करके उनका वध किया मगर वेद फिर भी हत्थे न लगे. वे दैत्य कुछ अधिक ही दुष्ट थे ( कैसी संतानें थी विष्णु जी की ! ) उन्होने वेद एक अन्य दैत्य, हयग्रीव, को सुपुर्द कर दिये थे. अब विष्णु जी ने हयग्रीव को तलाशा और उसका वध करके वेद पुनः ब्रह्मा जी को सौंपे.

 

अब हयग्रीव की कथा सुनें. इस दैत्य ने भी अन्य दैत्यों / दानवों / राक्षसों की भांति बड़ा कठोर तप किया था. तप पर जब देवी प्रकट भयीं तो इसने भी अन्य दैत्यों / राक्षसों की भांति अमर होने का वर मांगा. अब अमर होने का एकाधिकार तो देव प्रजाति को था तो और किसी को कैसे दिया जा सकता था, देवी ने इसे और कोई वर मांगने को कहा तब इसने यह वर मांगा कि इसे केवल वही मार सके जिसका सर घोड़े का और धड़ मानव का हो. बेचारा देवताओं के छल और जुगाड़ को कहां जानता था ! देवी ने तुरंत एवमस्तु कहा और अंर्तध्यान भयीं. अब तो यह निर्द्वंद्व हो गया, सबको सताता, राज्य पर कब्जा करता. युद्ध में यह अजेय था क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति ही न था जो घोड़े के सर और मानव के धड़ वाला होता. जब इसके अत्याचार बहुत बढ़े तो विष्णु और देवी ने मिल कर लक्ष्मी जी की मति फेर दी, उन्हे विष्णु जी को हँसता देख कर अपने रूप के उपहास का भ्रम हुआ और उन्ही की प्रेरणा से ऐसा शाप दिलाया. उसी योजना के आधीन विष्णु जी युद्ध में क्लांत होकर प्रत्यञ्चा चढ़ा हुआ धनुष छोड़ कर सो गये, किसी देव ने कीट रूप में प्रत्यञ्चा काटी जिससे उनका सर कट कर गिर गया, वे हयग्रीव भये और हयग्रीव नामक दैत्य का वध हुआ और वेद पुनः ब्रह्मा जी को सुपुर्द किये गये.

---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा चतुर्थोध्याय सम्पन्न ----

( हे संतगण ! कहीं जाईयेगा नही, अभी पञ्चम अध्याय शेष है. यद्यपि वह मूल कथा में नही है किंतु उसे हमने क्षेपक रूप में सम्मिलित किया है, यह आप सबको और उपयोगी लगेगा )

पञ्चम अध्याय

आपने श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा सुनी होगी. उसमें पञ्चम अध्याय में कोई कथा नही है बल्कि यह बताया है कि कथा के चार अध्यायों मे जो पात्र थे वे अगले जनम में क्या भये, जैसे जो विप्र सदानंद थे वो अगले जनम में वे द्वापर में सुदामा भये ( ग़रीब शुरू में वो तब भी रहे ) जो राजा थे वे मोरध्वज भये आदि, इत्यादि सो इस कथा का भी पञ्चम अध्याय यही होने वाला है.

ये जो अवतार हैं, सारे के सारे विष्णु के ही भये और कोई भी अवतार यूँ ही, मन में मौज़ उठी औ प्रभु अवतार ले लिये, टाईप का नही है, हर अवतार का हेतु बताते भये हैं नाना ग्रंथकारों द्वारा लिखित औ सम्पादित ग्रंथकार! कुछ अवतार तो किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति हेतु लिये गये औ उद्देश्य पूरा होने पर भूमि पर बहुत काल तक नही रहे, यूं कहे कि लुप्त हो गये. (जैसे यह हयग्रीवावतार) बाद में किसी काल में कहीं भी न दिखे (मतलब ग्रंथों में) न किसी अन्य अवतार के साथ उनका कोई संग साथ दिखाया गया ( जैसे राम के काल में परशुराम अवतार का आमना सामना भया, अर्थात एक अवतार उद्देश्य पूर्ण होने के बाद भी रहा ) तो कुछ अवतार इतने चर्चित भी न रहे. एक अवतार, कल्कि अवतार, अभी होना बताया जाता है. जब अवतारों की बात रही, ( भावना को ठेस न लगे तो कह दूं कि कल्पना की गयी / मिथक और गल्प में स्थान पाया ) तो देश काल के अनुसार ही उनकी वेषभूषा की कल्पना की गयी यथा कल्कि अवतार की धारणा घोड़े पर बैठे हुए और तलवार लिये हुए की गयी है किन्तु यदि यह अवतार हुआ तो क्या ऐसा ही होगा – इसी वाहन और इसी हथियार से दुष्ट दलन करेगा. बुद्ध तो अवतारवाद, मूर्ति पूजा, आडंबर के विरुद्ध थे – इन्हे भी दशावतार में शामिल कर लिया गया. यह सब घालमेल अवतार के कालनिर्धारण पर प्रश्नचिन्ह लगाता है.

सामान्यतः लोग विष्णु जी के दस अवतारों को ही जानते हैं, दस अवतार ये हैं – 1.मत्स्य, 2.कूर्म, 3.वाराह, 4.नृसिंह, 5.वामन, 6.श्रीराम, 7.श्रीकृष्ण, 8.परशुराम, 9.बुद्ध एवं 10.कल्कि. इनको शामिल करते हुए कुछ अन्य अवतारों का भी उल्लेख ग्रंथों (श्रीमद्भभागवत महापुराण, देवी भागवत, सुखसागर आदि) में मिलता है, उन्हे मिला कर चौबीस अवतार हो जाते हैं. ये चौबीस अवतार हैं – 1.श्री सनकादि (चार बालकों का समूह जो सदा बाल रूप में ही रहता है. धरती पर इनके आने की कोई लिखत ग्रंथों में नही मिलती. ये ऊर्ध्वलोकों में ही विचरण करते हैं.) 2.नारद ( ये तो ब्रह्मा के पुत्र हैं और इन्हे मोह भी हुआ था जिसका भञ्जन विष्णु जी ने ही इन्हे वानरमुख देकर किया था एवं इन्ही के शाप से उन्हे रामावतार लेना पड़ा था. ये तो अवतार – अवतार की टक्कर हो गयी, एक अवतार मोहग्रस्त और एक नें मोह निवारण किया और मोहग्रस्त ने शाप भी दिया – बड़ा घालमेल है ) 3.नर – नारायण ( दो अवतार जो साथ ही रहते हैं – इन्हे कृष्ण और अर्जुन भी कहा जाता है ) 4.मत्स्य, 5.कूर्म, 6.वाराह, 7.नृसिंह, 8.वामन, 9.गजेंद्रोधारावतार, 10.यज्ञ, 11.हयग्रीव, 12.कपिल, 13.दत्तात्रेय, 14.पृथु, 15.ऋषभदेव, 16.मोहिनी, 17.धन्वंतरि, 18.हंस, 19.वेदव्यास, 20.परशुराम, 21.राम, 22.कृष्ण, 23.बुद्ध और 24.कल्कि.  इनमें राम और कृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं और बाक़ी अंशावतार.

कथा्वाचन हयग्रीवावतार का हो रहा है सो हे उत्सुकजन! अब इसी कथा को आगे बढ़ाता हूं. हयग्रीवावतार भया तो भारत भूमि में किंतु फैला जापान और तिब्बत में भी. फैला से यह मतलब न लगाया जाय कि वहां विष्णु के हयग्रीवावतार की पूजा होने लगी. हमारे यहां बुद्ध शांति, प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं. हर जगह मूर्तिकला या चित्रकला में उनके मुख पर अद्भुत शांति और अति मंद मुस्कान छायी रहती है. वे बहुधा पद्मासन में होते हैं और कानों तक फैले बड़े- बड़े नेत्र अर्धनीलिमित अर्थात अधखुले होते हैं . मुख पर शांति के अतिरिक्त करुणा भी विद्यमान रहती है. वे निर्वेद के मूर्तिमान स्वरूप हैं वहीं तिब्बत और जापान में बुद्ध भिन्न भिन्न मुद्राओं और अवतारों में हैं. वे हास्य मुद्रा में भी हैं, क्रोधावस्था में भी और रौद्र रूप में एक योद्धा के रूप में भी मठों की दीवारों पर चित्रित हैं. बुद्ध का यह अवतार ‘अवलोकितेश्वर’ कहा जाता है. कई हाथ, हाथों में भयंकर अस्त्र – शस्त्र लिये हुए और अद्भुत लययुक्त मुद्रा में अवलोकितेश्वर बुद्ध की प्रतिमायें मठ में दिखती हैं. रौद्र और नृत्य का अद्भुत संगम है इन चित्रों और मूर्तियों में. जापान में भी कुछ बौद्ध मठों में “हयग्रीव’ रूप में बुद्ध किंवा अवलोकितेश्वर विराजमान हैं. सिक्किम के संग्रहालय में विभिन्न मुद्राओं बुद्ध / अवलोकितेश्वर की मूर्तियां हैं. बुद्ध ही वहां कृष्ण हैं, शिव हैं और विष्णु हैं. लक्ष्मी व अन्य देवियों को भी वहां तिब्बती मुद्रा और श्रंगार में गढ़ा गया है. शिव की एक विलक्षण प्रतिमा सिक्किम संग्रहालय में है. अनेक भुजाओं वाले शिव रौद्र रूप में युद्धरत हैं और उनकी बाहों में पार्वती जी भी हैं. संग्रहालयों और मठों में फोटोग्राफी वर्जित होने से वे बस आंखों में ही बसे हैं. 

हयग्रीवावतार की मूर्तियां जापान और तिब्बत में होने के बारे में नेट से पता चला, बाक़ी जो कथा कही – वह स्मृति में बसी है, वहीं से ली. इन ग्रंथों का अध्ययन बाल्यकाल से करता रहा हूं सो सब लगभग मालूम ही है, जो छूट जाता है वह फिर से ताज़ा कर लेता हूं, जैसे दशावतार पूरे मालूम थे, चौबीस अवतारों में कुछ देखने पड़े.




थोड़ा विषयांतर – तिब्बत की मठ कला में रौद्र और भयंकर रस का प्राचुर्य है. शांत रस और सौंदर्य भी वहां किञ्चित उसी रंग में है और मांगलिक चिन्ह भी भयंकर ही हैं. मैं जब सिक्किम गया तो कुछ मुखौटे और हैण्डिल लाया भी जो मेरी कुटिया के द्वार पर लगे हैं. तिब्बत और जापान के हयग्रीव विग्रह के साथ अपनी कुटिया के द्वार पर लगे मुखौटे और हैण्डिल का चित्र और. ड्रेगन के चित्र वाली चीन की केतली का चित्र फिर कभी प्रसंग उपस्थित होने पर अन्यथा अधिक जिज्ञासा हो रही हो तो कुटिया पर पधारें.

 

हयवदन नाम से एक नाटक भी है जो गिरीश कार्नाड ने लिखा है.नाटक मूलतः कन्नड़ में है जिसका हिन्दी अनुवाद भी हुआ और मञ्चित भी खूब हुआ. नाटक हयग्रीवावतार के बारे में नहीं, एक लोक कथा पर आधारित है जिसमें दो अभिन्न मित्र हैं, एक कोमल प्रकृति का, संगीतप्रेमी और दूसरा एक पहलवान. पहलवान मित्र एक सुन्दरी पर रीझ जाता है तो गायक मित्र यत्नपूर्वक उसका विवाह उस कन्या से करा देता है. कालांतर में एक यात्रा पर जाते समय देवी को दिए पुराने वचन के अनुपालन में एक मित्र देवी को शीश अर्पित करता है तो मित्र शोक में दूसरा भी अपना सर काट देता है. पत्नी वहाँ से कुछ दूर थी, आने पर वह यह दृश्य देखती है तो देवी से अनुनय-विनय करती है तो देवी बताती है कि इनके सर धड़ पर लगा दो तो ये जीवित हो उठेंगे. पत्नी ऐसा ही करती है किंतु हड़बड़ी में पति का सर मित्र के धड़ पर व मित्र का सर पति के धड़ पर लगा देती है. अब दोनों जीवित हो उठते हैं तो बड़ा धर्मसंकट उत्पन्न होत है कि किसे अपना पति माने ? देह प्रमुख कि मस्तिष्क ? अब क्या होता है और परिणिति क्या होती है ? इसके लिए नाटक देखें अथवा पढ़ें. देवी का चरित्र चित्रण भी बड़ा मज़ेदार व हास्ययुक्त किया है.   

 ---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा पञ्चमोध्याय ( क्षेपक ) संपन्न ---