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Wednesday, 5 August 2020

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – रामराज्य

लेखक – आशुतोष राना

विधा/विषय – राम पर कथा और कथेतर का मिश्रण

प्रकाशक – कौटिल्य बुक्स, 20, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली

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“राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय, सहज सम्भाव्य है ।”

 

                                        सचमुच, राम का उदार चरित्र है ही ऐसा कि उसे ह्र्दयङ्गम कर लेने पर हर  व्यक्ति, घटना और उसके कारण तथा परिणाम में सब शुभ ही दिखता है, सब मङ्गलकारी होता है और कोई चरित्र खल नही रह जाता. रामकथा में अनेक खल चरित्र हैं. सबसे बड़ा खल चरित्र रावण है, शूर्पणखा, कुम्भकर्ण आदि खल चरित्र हैं और राम पक्ष में   अपयश की पात्र, वनवास का कारण बनी कैकयी है और राम के चरित्र में भी बालि वध, सीता परित्याग और शम्बूक वध आदि ऐसे मोड़ हैं जो उनके चरित्र पर धब्बा से हैं किन्तु यह रामराज्य पुस्तक के लेखक, आशुतोष राना, की सम्यक्‍ दृष्टि, अध्ययन और अन्तर में पैठी सकारात्मकता है कि उन्होने इन खल चरित्रों और घटनाओं ( बालि वध तथा शम्बूक वध का विवेचन इस पुस्तक में नही किया गया है ) में भी उनका कल्याणकारी हेतु देखा और उनके चरित्र को सकारात्मक रूपो में प्रस्तुत किया. उन चरित्रों का बोधगम्य भाषा शैली में इतना विशद विवेचन किया है कि उनके उस खल व्यवहार के पीछे का कल्याणकारी कारण उपस्थित हो जाता है.  उन चरित्रों के दिखने में राम विरोधी कार्यों को किसी न किसी तरह औचित्य प्रमाणित करने की चेष्टा नही की बल्कि उनका ऐसा विश्लेषण किया कि उनके प्रति सहानुभूति नही बल्कि आदर का भाव उत्पन्न होता है. 

 पुस्तक में क्रमानुसार / अनवरत रूप से रामकथा नही है बल्कि पात्रों, स्थान व घटनाओं का विवेचन किया है, कथा से अधिक विवेचन है ( कहीं कहीं विशद विवेचन इस कथा को  कथारसिक पाठक के लिये बोझिल भी कर देता है )  इसी कारण मैने इसे कथा के साथ ‘कथेतर’ की श्रेणी में भी रखा.

 पुस्तक में 11 अध्याय हैं जिनमें पहला कैकेयी पर, दूसरा सुपर्णा- शूर्पणखा पर, पञ्चवटी पर दो अध्याय हैं. लङ्का नाम से दो अध्याय हैं, लङ्का पर तीन अध्याय हैं जिन्हे विजयपर्व नाम से दिया है, ये विजयपर्व युद्धकाल के हैं जो कुम्भकर्ण, विभीषण और रावण का विवेचन करते हैं और अन्तिम अध्याय सीता परित्याग है.

 कैकेयी ही राम के वनवास और प्रकान्तर से दशरथ की मृत्यु का कारण बनी. मन्थरा द्वारा भड़काये जाने पर कैकेयी ने राजतिलक की पूर्व रात्रि को दशरथ को वचनजाल में फंसा कर राम को चौदह वर्ष का वनवास और भरत को राजगद्दी का वर मांगा जिसे वचन हार चुके दशरथ ने पूरा किया. राम को वनवास मिला, उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी वन को गये और राम का वियोग सह न पाने के कारण दशरथ ने प्राण त्याग दिये. भरत, जिनके लिये राज्य मांगा गया, उन्होने भी इसे स्वीकार न किया और अपनी माता की निन्दा की. इस प्रकार कैकेयी संसार की घृणा की पात्र बन गयी.

                                    आशुतोष जी ने इस अध्याय में बताया है कि इन वरदानों को मांगने के पीछे कैकेयी की भरत के निष्कण्टक राज्य की लिप्सा नही थी अपितु राम जी ने ही उनसे यह प्रार्थना की थी. राम केवल अयोध्या तक सीमित न रह कर जन के बीच जाकर उनके कष्ट निवारण करना चाहते थे. वे राजा नही जननायक के रूप में लोगों को साथ जोड़ना चाहते थे. अयोध्या के राजा के रूप में यदि रावण एवं उसके अनुचरों के विरुद्ध युद्ध छेड़ते तो यह राज्य विस्तार लिप्सा होती. कैकेयी के समझाने पर भी उन्होने उन्हे सहमत कर ही लिया और राम का आग्रह व जन कल्याण को ध्यान में रख कर वे युगों तक रहने वाले इस लाञ्छन को स्वीकार करने को तैयार हो गयीं. यब बात राम और कैकेयी के अतिरिक्त किसी को नही पता थी.

                              कैकेयी के देव / जन कार्य में सहायक होने को लगभग सभी ग्रन्थकारों ने माना है. तुलसी ने मानस में इसे सरस्वती द्वारा बुद्धि फेर कर देव और जनहित साधना बताया. राम के प्रति कैकेयी का अनन्य प्रेम और राम का उनके प्रति आदर और विश्वास मानस में भी है, मैथिलीशरण गुप्त के “साकेत” में भी और बाद के कई उपन्यासों ( शलभ अग्निहोत्री की रामकथा सीरीज, मदनमोहन शर्मा ‘शाही’ का उपन्यास, “ लङ्केश्वर’ व कई अन्य ) में है किन्तु इस किताब में जैसा सहज और विद्वतापूर्ण निरूपण है, वैसा अन्य में नही. पुस्तक परिचय में इससे अधिक बताया भी नही जा सकता, उचित होगा कि पढ़ॅं. कैकेयी ( व अन्य खल पात्रों के ) बारे में आपकी धारणा बदल जायेगी.

इसी प्रकार सुपर्णा-शूर्पणखा अध्याय में शूर्पणखा  और राम का परिचय, सम्भाषण, राम और शूर्पणखा की सौजन्यता आदि मोहित करने वाली और विश्वासयोग्य है. शूर्पणखा ने रावण के उद्वार के आशय से अपने पिता, विश्रवा, की प्रेरणा से यह प्रसंग सम्पादित किया.

इसी प्रकार वन में सीता को अग्नि को समर्पित करके उनकी छाया को सामने लाने का प्रसंग लाक्षणिक है. वस्तुतः राम सीता को आसन्न संकटों के लिये प्रशिक्षित कर रहे थे, उन्हे कठोर प्रशिक्षण की अग्नि में तपा कर सीता का नया निखरा रूप तैयार कर रहे थे.

 

कैकेयी, शूर्पणखा, सीता ही क्यों – हर चरित्र की बहुत विशद और सकारात्मक विवेचना है जिसका भान पढ़ने पर ही होगा.

                                     पुस्तक हार्डबाउण्ड है, चिकने और मोटे कागज पर है, छपाई बढ़िया और त्रुटिहीन है और कठिन शब्दों के अर्थ भी दिये हैं. इन विशेषताओं को देखते हुए इसका मूल्य ( पाँच सौ रुपया ) अधिक होते हुए भी अधिक नही है. मूल्य के अतिरिक्त एक और बात कथारसिकों के लिये बाधक हो सकती है. चरित्रों  का निरूपण करने की प्रक्रिया में संवाद / स्वकथन बहुधा लम्बे, गरिष्ठ और दर्शन से हो गये हैं – ऐसा लग सकता है कि सरस रामकथा नही, प्रवचन सुन रहे हैं किन्तु खल पात्रों की सकारात्मकता को उभारने के लिये यह आवश्यक था, इस दृष्टि से यह दोष नही, गुण है.

                 हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता । कहहिं सुनहिं बहु विधि सब संता ॥


एक फिल्म-एक किताब रंगरसिया – Raja Ravi Varma

महान चित्रकार, राजा रवि वर्मा, के जीवन पर आधारित केतन मेहता की एक फिल्म है, “रंगरसिया” जब फिल्म की घोषणा हुई तब से ही इस फिल्म को देखने की आस संजोये था, घोषणा के तीन साल के बाद फिल्म बनी किन्तु जाने कब रिलीज हुई, कहां लगी, लगी कि नही लगी या मै बाहर तैनात रहा ... किस्सा कोताह ये कि फिल्म न देख सका, हसरत रह गयी थी सो इस लॉक डाउन में पूरी हुई और डेस्क टॉप पर यू ट्यूब की मेहरबानी से आख़िरकार देख ही ली यह फिल्म. यह फिल्म रणजीत देसाई के उपन्यास “राजा रवि वर्मा” पर आधारित है. यह फिल्म अंग्रेजी में  Color of Poisons नाम से बनी है.

अब राजा रवि वर्मा की पेण्टिंग्स देख कर उनके जीवन के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई या उनके बारे में पढ़ कर उनकी पेण्टिंग्स  ढूंढ- ढूंढ कर ( कहीं जाकर नही भई, सब नेट पर मौजूद है ) देखी या किताब पढ़ कर जिज्ञासा बढ़ी – सब गड्ड मड्ड है. बहरहाल, किताब 2016 में पढ़ी. किताब मराठी में है और अंग्रेजी में अनुवाद विक्रान्त पाण्डेय् ने किया है. मज़बूरी में किताब अंग्रेजी में पढ़नी पड़ी क्योंकि उसका हिन्दी अनुवाद तलाश करने पर भी नही मिला. अब फिल्म देखी तो लगभग पूरी किताब फिर से पढ़ डाली. फिल्म देखी और किताब से भी गुज़रा तो दोनों के बारे में तुलनात्मक जैसा कुछ प्रस्तुत करने का विचार आया . अब तुलनात्मक विवरण जैसा कुछ है या चूँ-चूँ का मुरब्बा बन पड़ा है – जो कुछ है हाज़िर है.

फिल्म और किताब की तकनीक में बहुत अन्तर होता है. किसी फिल्म पर किताब बहुत कम लिखी गयी हैं किन्तु किताबों पर बहुत सी फिल्में बनी हैं. किताब पर फिल्म या सीरियल बनाने में बहुत सी बातें / प्रसंग छोड़ दिये जाते हैं तो व्यावसायिक और दृश्य माध्यम होने के नाते रचनात्मक छूट लेते हुए कुछ नये प्रसंग शामिल किये जाते हैं जो किताब में नही होते या किताब के प्रसंगों को बदल कर प्रस्तुत किया जाता है – ऐसा इस फिल्म में भी है. बहुत से  ब्योरे किताब में बहुत विस्तार से और प्रभावी ढंग से वर्णित किये होते हैं तो किताब के कई सपाट और सूचनात्मक विवरणों को फिल्मकार बड़े सजीव और रोचक ढंग से फिल्मांकित करता है. इन दोनों माध्यमों की खूबी और खामी का अनुभव वे नही कर सकेंगे जिन्होने केवल आलोच्य किताब पढ़ी, फिल्म नही देखी या फिल्म तो देखी है किन्तु किताब नही पढ़ी. एक माध्यम से साक्षात करने वालों से अनुरोध है कि दूसरे माध्यम से भी होकर गुज़रें तो पूरा आनन्द आयेगा. जिन्होने किताब भी पढ़ी और फिल्म भी देखी है, वे अवश्य ही इस बात की तस्दीक करेंगे.   

 फिल्म के क्रेडिट्स में बता दिया गया है कि यह फिल्म इस किताब पर आधारित है अतः आधार किताब को ही मान रहा हूँ वैसे किताब भी प्रमाणिक जीवनी नही बल्कि राजा रवि वर्मा के जीवन पर आधारित उपन्यास है अतः हो सकता है लेखक ने भी वैसी रचनात्मक छूटें ली हों जैसी कि फिल्म में ली गयी हैं.    

 फिल्म फ्लैशबैक दर फ्लैशबैक है. फिल्म मुम्बई में आयोजित एक नीलामी से शुरू होती है. एक हॉल में राजा रवि वर्मा की पेण्टिंग्स की नीलामी हो रही है, नीलामी में राजा रवि वर्मा की ‘विश्वामित्र-मेनका’, उर्वशी-पुरुरवा’ जैसी बहुचर्चित पेण्टिंग्स हैं. इधर नीलामी हो रही है तो बाहर उग्र भीड़ है जो इस नीलामी का विरोध कर रही. विरोध का कारण वही पुराना है जो राजा रवि वर्मा के जीवनकाल (1848 से 1906 तक ) में था –  देवी-देवताओं और पौराणिक व मिथकीय चरित्रों व घटनाओं का नग्न/ अश्लील / कामुकतापूर्ण चित्रण और  पूज्य देवी-देवताओं और भगवान को मन्दिरों से निकाल कर जन साधारण के बीच ले आना, उनकी बिक्री करना. उस समय भी उन पर मुकदमा चला था. बड़ोदा के महाराज, सयाजी राव गायकवाड़, ने उन्हे सराहा और हर प्रकार से सुविधा दी, जन सामान्य ने उनकी पेण्टिंग्स को खूब सराहा व श्रद्धा से देखा तो ब्र्ह्मज्ञान मण्डल के प्रमुख वेदशिरोमणि चिन्तामणि शास्त्री ने इन्ही बातों को लेकर उन पर मुकदमा कर दिया जिसमें राजा रवि वर्मा के तर्क सुनने ( उन्होने मुकदमा ख़ुद लड़ा था, वकील नही किया था क्योंकि उनके अनुसार वकील केवल कानून, सबूत, गवाही आदि जानते हैं कला के बारे में नही और यह मुकदमा कला पर है ) मुकदमे में राजा रवि वर्मा और उनकी कला को निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया गया. किताब या वास्तव में तो उनके चित्र सराहे गये, उन्हे नुकसान नही पहुँचाया गया किन्तु फिल्म में जब बोली सात करोड़ पर फाईनल हो रही थी, पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद उग्र भीड़ हॉल में घुस आयी और उनके चित्रों को फाड़ डाला, जला दिया. कला, जो कुछ विवादित रही हो, उसका यही हश्र होता आया है. राजा रवि वर्मा से लेकर हुसैन तक ने यह झेला.

फिल्म और किताब – दोनों में उनकी कला यात्रा को दिखाया गया है – फिल्म में बहुत संक्षेप में, किताब मे विस्तृत ब्योरों के साथ. देवी देवताओं को साकार करने वाले, उन्हे चेहरा/ मानवीय रुप देने वाले से आगे बढ़कर कला जगत्‍ में राजा रवि वर्मा का एक और विशद योगदान रहा है, पेण्टिंग्स को प्रिण्ट करने का, एक पेण्टिंग के हज़ारों प्रिण्ट निकालने का. प्रिण्ट के द्वारा ही उनके चित्र घर-घर तक पहुँचे. प्रिण्ट न किये जाते तो उनके चित्र बडोदरा स्थित लक्ष्मी विलास पैलेस ( जहाँ उनके अधिकांश चित्र प्रदर्शित हैं ) और आर्ट गैलरियों में ही रह जाते या धनकुबेरों के यहां ही होते. आम जनता उन्हे देख भी न पाती खरीदना तो दूर ( अब भी पेण्टिंग्स सब लोग नही खरीदते – बहुधा दाम के कारण ) जर्मनी में पेण्टिंग्स को प्रिण्ट करने की तकनीक थी. राजा रवि वर्मा ने जर्मनी से मशीनें आयात कीं और तकनीशियन बुलाये ( प्रमुख तकनीशियन Schleicher – नाम का सही उच्चारण मुझे नही मालूम ) और प्रिण्ट शुरू किया.

किताब में तो और भी बहुत कुछ है क्किन्तु फिल्म मुख्य रूप से राजा रवि वर्मा की कला यात्रा में उनकी प्रेमिका और तमाम पेण्टिंग्स की मॉडल, सुगन्धा, मुकदमे और प्रिण्टिंग प्रेस पर है. 

बात लम्बी हो रही है सो अब कुछ बातें किताब और फिल्म में अन्तर पर –

-         उर्वशी-पुरुरवा पेण्टिंग की रचना प्रक्रिया फिल्म में एक दृश्य मॅं निपटा दी गयी है जबकि किताब में एक कलाकार की लगन को भली भांति वर्णित किया गया है. पौराणिक कथा के अनुसार उर्वशी और पुरुरवा उस समय नग्नावस्था में थे और उन्होने उस अवस्था में एक दूसरे को देख लिया था सो शर्त के अनुसार उर्वशी उन्हे छोड़ कर स्वर्ग को उड़ गयी. पेण्टिंग में उर्वशी ( या मॉडल, सुगन्धा ) का वक्ष अनावृत्त है. अब इस अवस्था में ( वक्ष पर से कपड़ा हटा होने पर ) कलाकार को मॉडल के चेहरे पर क्षोभ, विस्मय, क्रोध, आघात, लज्जा .... के वो भाव नही मिल रहे थे जो वह चाहता था. कई दिन इसी में बीते, सुगन्धा अनावृत्त खड़ी होती किन्तु वे चित्र न बनाते. एक दिन उसके सब्र का बांध टूट गया और क्रोधित हो उठी कि चित्र तो बहाना है तुम बस मुझे नग्न देखना चाहते हो मैं जा रही हूँ. अब क्षोभ,  क्रोध, आघात, लज्जा आदि के वही भाव सुगन्धा के मुख पर थे जिनकी वह उर्वशी के मुख पर कल्पना कर रहा था. तब उन्होने उसे फ्रीज़ करके पेण्ट करना शुरू किया. फिल्म में इतना विस्तार किया जाता तो शायद वास्तव में वही घटित होता जो फिल्म के अन्त में है – इसे पोर्न ठहराया जाता,

-        मुकदमें में नाटकीयता के लिये चित्रकार के राजा होने का मखौल बनाते हुए पूछा गया है कि वे कहां के राजा हैं, उनका भौतिक राज्य कहां है तब फ्लैशबैक में वह घटना है जब उन्हे राजा की उपाधि दी गयी. किताब में मुकदमा सीधे मुद्दे पर आता है, इस बात का ज़िक्र नही होता,

-        सबसे बड़ा अन्तर  यह है कि फिल्म में सुगन्धा की गवाही भी दिखायी गयी है जबकि किताब में सुगन्धा क्या, किसी की गवाही नही है. फिल्म एक दृश्य माध्यम है और ऐसा करने से फिल्म अधिक नाटकीय होती सो उसकी गवाही डाल दी,

-        मुकदमें में राजा रवि वर्मा को सजा होने की आशंका से सुगन्धा ने आत्महत्या कर ली. किताब मे उसने ज़हर खाया और राजा रवि वर्मा की गोद में दम तोड़ा जबकि फिल्म में उसे फांसी लगा कर आत्महत्या करना दिखाया है और कलाकार के आने से पहले वह मर चुकी थी. फांसी शायद अधिक ‘ग्लैमरस’ या नाटकीय होती,

-        इसी प्रकार प्रिण्टिंग प्रेस और Schleicher के बारे में है. फिल्म में कलाकार की Schleicher से भेंट एक कैसीनो में होती है जहां वो नकली नोट ( प्रिण्ट किया हुआ ) चलाने की कोशिश में है जो बिल्कुल असली लगता है. यहीं से राजा को आईडिया मिला कि जब नोट का असली  जैसा प्रिण्ट बन सकता है तो पेण्टिंग्स का भी. किताब में महाराज बड़ौदा विदेश में पेण्टिंग्स के प्रिण्ट और यह तकनीक देख कर आये थे और उन्होने ही इसके लिये प्रोत्साहित किया.  Schleicher उन चार तकनीशियन में प्रमुख था जो मशीनों के साथ जर्मनी से आये,

-        फिल्म में दादा साहब फाल्के से दो बार उनकी भेंट दिखायी है, प्रेस बेचने पर उन्होने ऋण चुकाने के बाद  बची राशि दादा साहब फाल्के को देने को कहा जबकि किताब में उनसे भेंट का या ऐसा कोई प्रसंग नही है बल्कि स्वामी विवेकानन्द जी से भेंट का एक चैप्टर है जो कि फिल्म में नही दिख्गया.


अन्तर और तुलना बहुत है किन्तु वैसे ही पोस्ट बोर करने लायक लम्बी हो रही है सो फिल्म देखें, किताब पढ़ें, बेहतर होगा – दोनों करें.

    

फिल्म और किताब से इतर कुछ बातें कर लूँ. विश्व की सबसे मँहगी साड़ी ( ४० लाख ) पर राजा रवि वर्मा के चित्रों की नकल है, इस साड़ी में  बेशकीमती १२ रत्न और सोने की ज़री का भी इस्तेमाल किया गया है.

                                    राजा रवि वर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व में रुचि जाग्रत करने का श्रेय मुम्बई के क्युरेटर, Sachin Kaluskar, को है. कई साल पहले लखनऊ की कलास्रोत आर्ट गैलरी में राजा रवि वर्मा के लिथोग्राफ्स की प्रदर्शनी लेकर आये. वहीं उनसे भेंट हुई, बातचीत हुई, रुचि बढ़ी और काफी कुछ जानकारी हुई. वे फेसबुक पर भी मेरे मित्र हैं, उनका आभार.

फिल्म                                                           किताब

रंगरसिया                                                       Raja Ravi Varma





निर्देशकः केतन मेह्ता                                     लेखकः रणजीत देसाई ( मराठी में )

मुख्य पात्रः रणदीप हुड्डा ( राजा रवि वर्मा )           अनुवादकः विक्रान्त पाण्डेय्‍ ( अंग्रेजी )

                नन्दना सेन ( सुगन्धा )                      प्रकाशकः Harper Perennial

                परेश रावल ( सेठ गोवर्धन दास )

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Tuesday, 4 August 2020

भूत-वूत कुछ नही होता !

भूत-वूत कुछ नही होता !

इतवार की बात है, एक किताब की सोहबत में था कि घण्टी बजी. घर में कोई था नहीं, कूकी एक कार्यक्रम में गयी थी और श्रीमती जी किटी में तो घर में मेरा राज था. टी. वी. बन्द किया, चाय बनायी और किताब लेकर बैठा. जो घटनाक्रम चल रहा था वह बस आगे क्या होगा के बिन्दु पर था कि उस मायाजाल को भेदती सी घण्टी बजी. खल तो गया मगर गेट पर दुर्गा को देख कर खलन काफूर हो गयी. वो मेरे पुराने और पक्के दोस्त है और बेतकल्लुफ भी. किताब पढते देख कर बोले क्या यार, किताब में घुसे रहते हो ! फिर किताब देखी तो चौंके, किताब थी, "भुतहा हवेली". बोले, "अबे, तुम भूत-वूत तो मानते नही और पढ रहे हो भुतहा हवेली. हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और ! मैने कहा मानता क्यों नहीं, मै तो भूत भी मानता हूं, भविष्य भी और वर्तमान तो हस्तामलकवत है. हां वो वाला भूत नही मानता जो रात में निकलता है, पीपल पर या खण्डहर में या सुनसान जगहों पर रहता है, लोगों को पकडता है या सवार हो जाता है और या तो बिना शक्ल के काले साये सा होता है या फिर कंकाल. फिर बातें होने लगीं. वो भूत होता है की दलीलें देते रहे और मैं भूत का मजाक उडाता रहा. खैर, बातें बहुत हुईं, चा पानी भी हुआ और भूत पुराण का समापन उनके इस कथन से हुआ कि बेट्टा, जब भूत से पाला पडेगा तभी समझोगे ! काफी देर और बातें हुईं और जब वो गये तो शाम होने को थी.


दूसरे दिन सुबह टहलने निकला. रोज की तरह पार्क के पांच चक्कर लगाये और उसके पीछे के हिस्से में गया. वहां माली ने कुछ बगिया सी लगा रखी है और एक टुटहा पुराना मकान है जिसमें वो रहता है. उससे भी बातें होती हैं. रोज तो बाहर ही मिल जाता था मगर आज नही दिखा तो उसे तलाशता हुआ अन्दर चला गया. अन्दर वो नहीं था, आवाज दी तो उसने कहा, नीचे जाईये. तब मुझे पता चला कि इस टुटहे मकान में तहखाना जैसा भी कुछ है. सीढियां उतर कर नीचे पहुंचा तो डर के मारे वहीं जम सा गया. एक भूत बैठा था और वह एक किताब पढ रहा था. भूत कंकाल वाला था. भूत को मानना और उसके होने के तर्क देना और बात है और साक्षात होना और. हल्का अंधेरा या हल्का उजाला था जो माहौल को डरावना बना रहा था. आवाज निकल रही थी, भागते बन रहा था. तब तो जैसे खून जम सा गया जब उसने मेरी तरफ देखा और बोला, "रुक क्यों गये, आईये ना." अब तो मेरा बेहोश होना ही बचा था क्योंकि आवाज उसी माली की थी. खरखराती सी थी मगर पहचानी जा रही थी. वह उठ कर मेरी तरफ बढा तो मैं भागा और जीने पर चढते समय लडखडाकर गिर गया. सर ऊपर वाले जीने से टकराया और बेहोशी सी गयी. अचेत होते होते लगा कि अब गया.

पता नही कब तक बेहोश रहा मगर जब होश में आया तो वही माली सामने था और मैं उसकी खटिया पर. वो बोला, "क्या साहब, नींद नही पूरी हुई थी तो आज टहलने आते. मैं जरा बाहर गया था, आया तो देखा आप सो रहे हैं, मैने भी जगाया नही." अब तो मुझे उससे डर लग रहा था. उसने कहा,"ऐसे क्या देख रहे हैं जैसे मैं कोई भूत होऊं." वह रोज जैसा सामान्य ही लग रहा था. मैनें उससे तहखाने के बारे में पूछा तो वह हंसा, " क्या साहब ! ज्यादा किताबें विताबें मत पढा कीजिये कि ऊल जुलूल ख्याल आने लगें. तहखाना वहखाना कहां इस मकान में." वाकई मकान की तरह फर्श भी टुटहा था और कोई सीढियां नही थीं. अब लग रहा था कि वाकई मैं सो गया और सपना ही देखा, ये जरूर उस किताब का असर था. अब घर को चला तो सर पर कुछ चमक सी और दर्द भी महसूस हुआ. टटोला तो गूमड सा था जो तस्दीक कर रहा था कि सपना नही, वाकई मैने भूत देखा और भागते समय सीढियों पर गिरा तो गूमड निकल आया. अब सच क्या था - वो माली जो मुझसे बतिया रहा था या फिर वो जो मैनें उस तहखाने में देखा जो अब था ही नही. अब मुझे दुर्गा की बात याद रही थी, "बेट्टा, भूत होते हैं, जब सामना होगा तभी मानोगे."