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Monday, 8 April 2024

इलाज की पैथियां और डॉक्टर-मरीज़


 इलाज की पैथियां और डॉक्टर-मरीज़

इलाज की जो पैथियां हैं, उनमें अक्सर झगड़ा सा रहता है. पैथियां तो क्या ही झगड़ा करेंगी, उनके मानने वाले/विरोधी, मरीज़, डॉक्टर और कई बार जो इनमें से कुछ भी नहीं हैं -झगड़ते हैं, अपनी की तारीफ और दूसरी को बुरा, बल्कि बेकार, बताते हैं. बहुत बार तो ज़ोर अपनी पैथी के गुण, रामबाणिता बताने से अधिक दूसरी पैथी को बेकार सिद्ध करने पर रहता है. इसके लिए उनकी भुक्तभोगिता आवश्यक नहीं, पूर्वाग्रह और श्रेष्ठताग्रन्थि होती है, कभी तो धर्म/अतीत के व्यामोह भी इस पक्षधरता के पीछे होते हैं.

 

पैथियां कई हैं किन्तु मुख्य तीन हैं - ऐलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद ! यूनानी और नेचुरोपैथी का नम्बर इनके बाद आता है. इन दोनों से पहले उपचार की एक और पद्वति का नम्बर आता है जिस पर बहुतों को प्रगाढ़ आस्था है, वे इसे कभी तो सबसे ऊपर रखते हैं तो कभी उपचार की सब पैथियों से निराश हो जाने के बाद - वह 'पैथी' है झाड़-फूंक, दुआ-ताबीज, तन्त्र-मन्त्र, टोना-टोटका आदि. यह 'पैथी' बहुधा समानान्तर भी चलती रहती है, 'जिस पैथी से इलाज करा रहे हैं, वह तो चलने ही देते हैं, यह भी साथ ही करते हैं. कोई हर्ज़ तो है नहीं. सांप के काटे, बिच्छू के डंक मारने पर बहुत लोग झड़वाने को ही प्राथमिकता देते हैं. बहुत बार इस चक्कर में पीड़ित की जान पर बन आती है. पीलिया में भी बहुतेरे दवा और परहेज भी करते हैं, साथ ही झड़वाते भी हैं. लखनऊ में कुकरैल नामक नदी, अब नाला, है. कुत्ता काट ले तो सुई लगवाने के साथ उस नाले में नहाने का टोटका भी लोग करते रहे हैं. लकवा की अवस्था में जंगली (सिलेटी रंग वाले) कबूतर का खून प्रभावित हिस्से पर मलने का टोटका भी किया जाता था. दवा के साथ यह भी किया जाता था. इस प्रकार के और भी कई टोटके हैं जिनका आधार किवदन्तियां और आस्था है. ठीक हो जाने पर श्रेय लोग इन 'पैथियों' को ही देते थे.

 

आयुर्वेद होम्योपैथी की बुराई बहुतेरे ऐलोपैथिक डॉक्टर जोशोखरोश से करते हैं. कई तो इनसे चिढ़ते हैं. मरीज़ अगर इनका ज़िक्र भर कर दे तो बिदक जाते हैं. अगर मरीज़ पहले इन पैथियों की शरण में रहा हो और उसके बाद इनकी शरण में आया हो और इन्हें बता दे तो ये पैथी के साथ-साथ मरीज़ को जली-कटी सुनाते हैं.

 

एक दृष्टान्त पहले का है और एक अभी हाल का. साल -डेढ़ साल में मेरा यूरिक एसिड बढ़ जाता है. तब पैर के अँगूठे में बहुत दर्द होता है, पैर रखते नहीं बनता. ऐसे ही एक बार बढ़ा तो पहले होम्योपैथिक दवा ली, फिर ऐलोपैथिक डॉक्टर के पास गया. कभी होम्योपैथिक दवा से ठीक हो जाता है तो कभी समय लगता है तो तत्काल राहत के लिए पैथी बदलता हूँ. इन डॉक्टर को दिखाने के साथ यह भी बता दिया कि कल से होम्योपैथिक दवा ले रहा हूँ मगर फायदा नहीं हुआ. इतना बताना था कि डॉक्टर भड़क गये. बोले, 'होम्योपैथी का नाम मत लीजिए मेरे सामने ! अब मेरे पास क्यों आये हैं, उसी से इलाज कीजिए !'

अब दवा लेनी थी तो चुपचाप सुन लिया, दवा ली और दो दिन में दर्द कम हुआ, फिर चला गया.

दूसरे वाकये का ये है कि हम दोनों ही अलग-अलग व्याधियों से ग्रस्त हैं. शरीरं व्याधि मन्दिरं ! कुछ तो यह बात और कुछ वयजनित व्याधियां. मुझे अस्थमा और अक्सर खांसी- जुकाम का पुराना मर्ज़ है जो जाड़े और बदलते मौसम में उभर आता है. श्रीमती जी को उदर/पाचन विकार, घुटनों में दर्द और थकान, कमज़ोरी है. ब्लड प्रेशर की गोली दोनों लोग खाते हैं, उन्हें थायरायड भी है. हम लोग ऐलोपैथिक इलाज करते हैं, कभी-कभी होम्योपैथी पर शिफ्ट हो जाते हैं. वे अक्सर, मैं बहुत कम

 

इस बार सोचा लग कर आयुर्वेदिक इलाज किया जाए. कई परिचित बाबा रामदेव के पैकेज में रह कर आये तो बहुत लाभ बता रहे थे. वहाँ तो नहीं गये, लखनऊ में ही एक अस्पताल में गये. उन्होंने परीक्षण वगैरह किया और एक सप्ताह पंचकर्म कराने को कहा. उसे स्थगित करने तक एक माह दवा लेने को कहा. आहार तो बिल्कुल बदल दिया, कुछ चीज़ें बिल्कुल बन्द कर दीं, कुछ बढ़ा दीं तो कुछ नयी शामिल कीं. मांसाहार बिल्कुल बन्द, चाय-कॉफी बन्द, दूध दुग्ध निर्मित पदार्थ बन्द, गेहूँ की रोटी के बजाय मोटे अनाज की और हरी सब्ज़ी मिला कर, चाय के स्थान पर एक आयुर्वेदिक पेय, चावल बन्द या ब्राउन राईस, फल और सलाद बहुत बढ़ा दिये, तीन चौथाई क्षुधा इन्हीं से शान्त करनी थी. कई तरह के बीज और मेवा खाने थे और साथ में दवा भी.

 

हमने यह किया. मुझे तो बहुत फायदा हुआ, रोज सुबह इन्हेलर लेता था, कभी-कभी शाम को भी. अब उसकी ज़रूरत नहीं, सांस नहीं फूलती. खांसी-जुकाम भी ठीक हो गया, एसिडिटी भी. महीना पूरा हो रहा है उनके अनुसार आहार लेते

 

मुझे तो बहुत फायदा हुआ, श्रीमती जी को बिल्कुल नहीं. खाना अलग बेमज़ा हुआ और तकलीफ वैसी की वैसी. उन्होंने दवा बन्द कर दी, सामान्य आहार पर शिफ्ट हुईं और पहले वाली ऐलोपैथिक डॉक्टर को दिखाया, तकलीफ के साथ आयुर्वेदिक इलाज लेने के बारे में बताया. डॉक्टर साहिबा भड़की तो नहीं पर उपहास और उपेक्षा भाव से हँसते हुए खूब चुटकियां लीं. कहा, 'किसने बता दिया ! किसी ने राय दी होगी तो सोचा ट्राई कर लेते हैं पर आख़िर आना पड़ा यहीं !' दवा वगैरह लिखी और फिर चुटकी ली, 'अब कोई बता देगा फलां जगह स्पा वगैरह से ठीक कर देते हैं तो वहाँ भी जायेंगी.' उनकी चुटकियों को देखते हुए यह नहीं बताया कि इनको तो बहुत फायदा है. दो दिन हुए, अब श्रीमतीजी को ऐलोपैथिक दवा से ही आराम है.

 

तो कोई पैथी बुरी या निष्प्रभावी नहीं. आयुर्वेद में दवा से अधिक आहार और परहेज पर पर ज़ोर है. दवा भी ऐलोपैथी की तरह तुरन्त या एक-दो डोज में असर नहीं करती, समय लेती है. फिर सबके शरीर की प्रकृति रोग का फैलाव भिन्न भिन्न होता है. अब हमें ही लें - कई दवाएं आहार सम्बन्धी निर्देश हम दोनो के कॉमन थे पर मुझे आशातीत लाभ हुआ, उन्हें बिल्कुल नहीं. शायद इसका कारण शरीर की प्रकृति के अलावा यह भी रहा कि मैंने दवा और आहार सम्बन्धी निर्देशों का लगभग कड़ाई से पालन किया.

 

कुछ विषयान्तर और विस्तार हो गया. बात डॉक्टरों की दूसरी पैथियों से चिढ़ने और उन्हें बेकार मानने की हो रही थी. मैंने पाया कि इस मामले में ऐलोपैथिक डॉक्टर अपेक्षाकृत अधिक चिढ़ने होते हैं जबकि होम्योपैथ और आयुर्वेदिक नहीं या उतने तो कतई नहीं. वे ऐलोपैथी इलाज करने के बारे में तटस्थ होकर सुन लेते हैं पर उसकी बुराई नहीं करतेचिढ़ते नहीं, ताना नहीं मारते. शायद इसका कारण यह भी हो कि वे जानते हैं कि मरीज़ ऐलोपैथी से निराश होकर या ऊब कर या हमारे विज्ञापन/दावों से आकर्षित होकर, इस पैथी पर विश्वास करके या आजमाने के लिए आया है. वे चिढ़ कर या चिढ़ व्यक्त करके ग्राहक अनेक सम्भावित ग्राहक खोना नहीं चाहते. एक सन्तुष्ट मरीज़ दसियों लोगों में प्रत्यक्ष उदाहरण के साथ बिन पैसे प्रचार करता है जिनमें से कुछ नये लोग आते हैं.

 

वैसे कुछ वैद्य (आयुर्वेद वाले) हकीम (यूनानी वाले) भी चिढ़ने होते हैं पर ऐलोपैथिक डॉक्टरों की तुलना में बहुत कम. कुछ रामदेव जैसे बड़बोले भी हैं जो ऐलोपैथी को केवल सार्वजनिक तौर पर नकारते बल्कि उसके विरुद्ध प्रचार करते हैं. यह और बात है कि बावजूद इसके वे ऐलोपैथी की शरण में जाकर ठीक हुए. ऐसे ही इन्हें नकारने वाले सद्गुरु भी और भी कई संत कोटि के. ये डॉक्टर नहीं धन्धेबाज हैं. अपना धन्धा चलाने को ऐसे वक्तव्य देते हैं. रामदेव तो औषधि निर्माता और व्यापारी भी हैं. योग का भी धन्धा है और अस्पताल भी. खैर, वे बड़बोलेपन के कारण अदालत का सामना कर रहे, माफी मांग रहे, लताड़ खा रहे.

                       आप इन सबका बस मज़ा लें, वक्तव्यों चिढ़ से मनोरंजन करें,्डॉक्टर या और किसी से बहस करें और जिस पैथी से फायदा हो, उससे इलाज करें. इस मामले में एकनिष्ठ/प्रतिबद्ध रहें, बेधड़क और आराम होने पर निःसंकोच अविलम्ब अन्य पैथी पर शिफ्ट हों.

पुस्तक चर्चा – तितली उड़ी


 पुस्तक चर्चा – तितली उड़ी

कोरोना एक बड़ी महामारी थी, विभीषिका थी जिसके साथ आयी महीनों की तालाबन्दी, जिसे लॉकडाउन नाम से अधिक जाना गया. लॉकडाउन में घर से निकलने पर पाबन्दी, कोई आवा-जाही तो दूर, घर से निकलने पर भी पाबन्दी. कोई निकलए तो पुलिस की प्रताड़ना और 14 दिनों के लिए कोरोनटाईन किया जाना. निकलना दण्डनीय अपराध बन गया था. पुलिस के डर को छोड़ भी दें तो कोरोना का डर सबसे बड़ा था. यह घोर संक्रामक था. कोरोनाग्रस्त व्यक्ति के संपर्क में आने पर कोरोना हो सकता था जिसका परिणाम मौत भी था तो लोग एक दूसरे को देखने तक से डर रहे थे, छूने की कौन कहे. केवल आवश्यक सेवाओं वाले ( पुलिस, स्वास्थ्य कर्मी, बैंक, दवा की दुकानें खुली थीं और राशन आदि की दुकानें भी पूरी सुरक्षा व्यवस्था के साथ और सोशल डिस्टेंस ( एक दूसरे से छह फुट की दूरी रखना ) के साथ खुली थीं, बाद में शराब को भी आवश्यक मानते हुए सरकार ने इन्हें भी खोलने की छूट दी. निकलने पर रोक, तो काम धंधा बन्द. जिनकी सरकारी नौकरी थी, उन्हें तो आर्थिक दिक्कत नहीं हुई किंतु जो रोज कमाने – खाने वाला वर्ग था, उसकी मरन थी. धंधा नहीं तो चूल्हा नहीं जल सकता. चूल्हे में आग हो न हो, पेट में तो आग जलती ही है जो खाने से शांत होती है. काम नही तो इस आग को शांत करने का उपाय नहीं. ऐसे में अगर कोई कोरोनाग्रस्त हो जाए तो ईलाज मुश्किल क्योंकि उसके लिए पैसा नहीं. कोरोना ने उन्हें तो पीड़ित किया ही जिन्हें कोरोना हुआ, उन्हें और भी अधिक पीड़ित किया जो काम धन्धा बंद होने के कारं घर में बन्द थे.
ऐसे ही लोगों में थीं धन्धे वालियां/ सेक्स वर्कर्स. इनमें शरीर बेच कर जीवन यापन करने वाली तो थीं ही, उन पर आश्रित दलाल व अन्य बच्चे-बच्चियां, बूढ़ी औरतें भी थीं. कोरोना के कारण उनके ग्राहक भी नहीं आ रहे थे – पुलिस से अधिक कोरोना का डर. समाज के अन्य वर्गों पर तो खूब लिख गया, रोज कमाने – खाने वालों की व्यथा, पलायन करते श्रमिकों की व्यथा तो अख़बार, टी.वी. व अन्य माध्यम से सामने आयी, सरकर व अनेक स्वयं सेवी संस्थाओं ने उनकी सुध ली, खाने – पीने से लेकर दवा व अन्य ज़रूरत की चीज़ें बांटी किंतु सेक्स वर्कर्स लगभग उपेक्षित ही रहे. न सरकार ने इन पर समुचित ध्यान दिया, न NGO’s ने. अख़बार, चैनल और तत्कालीन साहित्य में भी ये अछूत ही रहे. पलायन करके श्रमिकों पर उपन्यास भी आये, डाक्यूमेण्टरी भी बनी किंतु सेक्स वर्कर्स की दिक्कतों पर साहित्य जगत भी चुप्पी साधे रहा. ऐसे में इनकी मुसीबतों पर कल्याण आर. गिरि. ने उपन्यास लिखा, ‘तितली उड़ी’. यह उपन्यास सेक्स वर्कर्स की दिक्कतों के साथ एक अन्य वर्ग की दिक्कतों पर भी मानवीय दृष्टिकोण से प्रकाश डालता है जो काम बंद होने व पैसा आने के रास्ते बंद होने के कारण मज़बूरी में ढके छुपे रूप से देह व्यापार के धंधे में उतर पड़ा जिसका शोषण नये बने दलालों ने भी किया. यह वर्ग था प्राईवेट सेक्टर में काम करने या पढ़ाई के लिए महानगरों में रह रही लड़कियों का. प्राईवेट सेक्टर में अधिकांश का काम छूट गया. काम बंद तो आय बंद किंतु मकान का महँगा किराया तो चढ़ ही रहा था, रोज खाने के लिए भी पैसे न थे. घर वापस जाना भी मुश्किल, एक तो कोई साधन नहीं और जो थे भी उन्होंने किराया इतना बढ़ा दिया कि देना मुश्किल. ऐसे में लड़कियों के सामने एक यह रास्ता नज़र आया कि वे दबे छुपे ढंग से देह व्यापार से पैसा इकट्ठा करें ताकि किराया दे सकें, रोज का खाना चले या घर जाने को पैसा हो सके. कुछ मकान मालिकों ने भी उनकी मज़बूरी का फायदा उठाया. इस वर्ग की समस्या को भी ‘तितली उड़ी’ मे व्यक्त किया गया है.
उपन्यास का केंद्र है कमाठीपुरा जो सेक्स व्यापार की सबसे बड़ी मण्डी है. एक NGO है जो इस इलाके में राशन, दवाएं व अन्य सामान बांटता है. नायक उसी NGO में है और कुछ और लड़के लड़कियों के साथ कमाठीपुरा में यह सामग्री बांटने जाता है. इसी के दौरान ऐसे ऐसे करुण अनुभव हुए जिन पर बस विवश होकर रह जाना ही पड़ा. राशन के लिए छीना झपटी, सबको एक बड़े कुनबे की ज़रूरत का सामन मिल नहीं पाता तो सेक्स वर्कर का राशन के बदले ‘कुछ भी कर लेने’ का विवश और बेशर्म ऑफर, बूढ़ी या यौन रोग से पीड़ित सेक्स वर्कर्स का उन्हीं के समुदाय द्वारा बहिष्कार आदि दिल दहलाने वाला है. है तो यह उपन्यास किंतु सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि इन सेक्स वर्कर्स के सामने यह समस्या और भी भीषण रूप में रही होगी क्योंकि लोग इन्हें उपेक्षित किए रहते हैं. ऐसे में भी कुछ ग्राहक जोखिम उठा कर आते हैं और मज़बूरी का फायदा उठा कर कम रेट देते हैं. येह वर्कर्स NGO वालों से दवाओं के साथ कण्डोम की भी मांग करती हैं, ग्राहक आते हैं तो धंधा तो करना ही है.
समानान्तर भी व्यथा कथाएं चलती हैं. पैसे की किल्लत से जूझ रही कामकाजी लड़कियां ‘आपदा में अवसर’ तलाश लेने वाले एक के माधयम से अपनी तस्वीरें उसे देती हैं जिन्हें मोबाईल पर ही परिचितों को भेज कर उनकी बुकिंग करता है. सब्जी तक उधार ले रही लड़कियों पर सब्जी वाले की भी नियत है और वह उधारी के बदले सेक्स चाहता है. ऐसी ही एक लड़की की मज़बुरी का नायक फायदा तो नहीं उठाता किंतु उसे अपने रूम पर रहने देता है क्योंकि उसके मकान मालिक ने उसे किराया न देने पर निकाल दिया और उसके पास घर जाने के पैसे नहीं. NGO संचालिका की अलग व्यथा कथा है और इसी में है कमाठीपुरा में बेचने के लिए लायी गयी एक नाबालिग लड़की की जिसकी पहचान बस रूपा नाम और नाभि के नीचे तितली का टैटू है. वह लड़की बचा ली जाती है.
ऐसी कई कहानियों और घटनाओं को समेटे है यह उपन्यास. चूंकि इसमे कथा, बल्कि कथाएं, हैं सो यह कोरोना के दौरान राहत और बचाव कार्य की रपट भर न होकर रोचक उपन्यास हो गया है.

कल्याण आर. गिरि का यह दूसरा उपन्यास है. उनसे kalyangiri555@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. कोरोना काल के इस उपेक्षित वर्ग की व्यथा का दस्तावेज है यह उपन्यास.

पुस्तक – तितली उड़ी
लेखक – कल्याण आर. गिरि
विधा – उपन्यास
प्रकाशक – हिन्दीनामा
पेपरबैक, 112 पृष्ठ, दाम 175/- 

पुस्तक चर्चा – SUNDAR KANDA- An Interpretation in English

 पुस्तक चर्चा – SUNDAR KANDA- An Interpretation in English

रामचरितमानस सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला महाकाव्य है जिसे धार्मिक ग्रंथ का दर्जा प्राप्त है. सात काण्डों के इस ग्रंथ में ‘सुंदरकाण्ड’ का पाठ सबसे अधिक किया जाता है. हनुमान जी के चरित को समाहित किए हुए इस काण्ड में सीता की खोज के लिए हनुमान जी के लङ्का प्रयाण से सेतुबन्धन की पूर्वपीठिका ( सागर द्वारा पुल बनाने का सुझाव देना ) तक का वर्णन है. इस काण्ड में 60 दोहे हैं.
जन-जन में व्याप्त इस ग्रन्थ का परिचय देने की आवश्यकता न थी किन्तु परिचयात्मक उल्लेख इसलिए किया कि कुछ दिन पूर्व अख़बार में Ministhy S. द्वारा रामचरितमानस के अंग्रेजी अनुवाद के बारे में पढ़ा. सहज ही कौतूहल हुआ कि अवधी के इस काव्य का अंग्रेजी में कैसा अनुवाद किया गया होगा. श्लोक, दोहा, चौपाई, सोरठा, छंद आदि का काव्य की तरह भावानुवाद किया गया अथवा अर्थ किया गया. यह भी जिज्ञासा थी कि अनुवाद कैसा है ? अर्थात अनुवाद में अर्थ को तोड़ा-मरोड़ा तो नहीं गया. इन जिज्ञासाओं के शमन के लिए पुस्तक देखना आवश्यक हो गया.
गूगल पर खोजा तो पता चला कि Ministhy S. Nair उत्तर प्रदेश कैडर में IAS अधिकारी हैं और लखनऊ में वाणिज्यिक कर आयुक्त ( प्रतिनियुक्ति पर ) हैं. वे केरल की हैं. पुस्तक की भूमिका में उन्होंने बताया कि स्कूल में हिन्दी से उनका ‘प्रेम-घृणा सम्बन्ध’ था (In School, I had a love-hate relationship with Hindi.) हिन्दी क्षेत्र में पोस्टिंग के दौरान उनका हिंन्दी के विविध रूप / लोक भाषाओं – अवधी, ब्रज भाषा, बुंदेलखण्डी, खड़ी बोली, भोजपुरी आदि से परिचय हुआ और वे रामचरितमानस की ओर आकृष्ट हुईं. भाषाओं के इन रूपों से प्रगाढ़ परिचय के साथ इस धार्मिक ग्रन्थ की कथावस्तु, भाषा-शैली, गेयता, लोकप्रियता आदि से प्रभावित होकर इसका अनुवाद करने का निश्चय किया ताकि अहिन्दीभाषी भी इसका रसास्वादन कर सकें. सबसे पहले सुन्दरकाण्ड का अनुवाद किया, बाद में अन्य काण्डों का. तृप्ति जी ने इस पुस्तक की तलाश में मदद की और अमेज़न का लिंक भेजा, मैंने सुन्दरकाण्ड मंगाया.
किताब में मूल काव्य ( श्लोक, दोहा, चौपाई आदि ) हिन्दी में, देवनागरी लिपि में दिया है, उसके साथ अंग्रेजी (रोमन ) में लिखा है ताकि अहिन्दीभाषी आसानी से पढ़ सकें, उसके बाद काव्य का गद्य में अनुवाद किया है. अनुवाद सरल और त्रुटिहीन है. किताब की छपाई व बाईण्डिंग उत्कृष्ट है, मोटे और चिकने कागज पर लाल और काले रंग के अक्षरों में छपी है, साथ में प्रसङ्गानुसार सुन्दर रंगीन चित्र भी दिये हैं. किताब का आवरण व कुछ पृष्ठों के कुछ चित्र चस्पा कर रहा हूँ जिनसे बात और स्पश्ट हो जायेगी. साथ में Ministhy S. Nair जी का चित्र ( प्रथानुसार किताब के पृष्ठ आवरण पर नहीं दिया, गूगल से टीपा ) भी चस्पा कर रहा हूँ.
किताब अहिन्दीभाषियों के लिए तो उपयुक्त है ही, हिन्दीभाषियों में भी नयी पीढ़ी के बच्चों व किशोरों के लिए बहुत उपयोगी है. अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं. पाठ्यक्रम और बोल चाल में हिन्दी के सीमित प्रयोग के अतिरिक्त उनका हिन्दी साहित्य से बहुत ही कम परिचय है, धार्मिक ग्रन्थों और उनमें भी काव्य ग्रन्थों से तो न के बराबर. ऐसे में यह किताब उन्हें इस ग्रन्थ से परिचित करायेगी. रोमन में वे मूल को पढ़ सकेंगे और सरल गद्य में उसका अर्थ भी. इससे ग्रन्थ से परिचित होने के साथ मूल में उनकी रुचि जाग्रत होगी और वे मूल भाषा में पढ़ने को उत्सुक होंगे. इस दृष्टि से भी Ministhy S. Nair जी का काम महत्वपूर्ण और स्तुत्य है. मैंने अपनी नातिन को इसे देने का इरादा किया है, आने पर उसे दूँगा. आप भी इसे देखें और बच्चों को दें.
किताब नगीन प्रकाशन, मेरठ से प्रकाशित है और अमेज़न पर उपलब्ध है. पेपरबैक संस्करण है और दाम है 250/-




Wednesday, 20 December 2023

ज़ीरो प्वाईंट

सड़क पर एक SUV आ रही थी. दोनों तरफ जंगल के बीच सिंगल लेन, साफ-सुथरी सड़क थी. कहीं – कहीं कच्ची तो कहीं खड़ंजा किंतु तेज़ चलाने योग्य थी. ऐसी सुनसान सड़क तो स्वाभाविक ही रफ़्तार तेज़ थी और SUV थी तो और भी तेज़. दूर तक न कोई वाहन आगे था, न पीछे, पिछले पंद्रह मिनट से तो ऐसा ही था. रात के दो बजने वाले थे ऐसे में वन विभाग की गश्ती गाड़ियों को छोड़ कर निजी वाहन बहुत कम ही निकलते हैं ऐसे में यह कौन था और कहाँ जा रहा था. काले रंग की गाड़ी थी और अकेला ही आदमी था, स्पीड भी एक सौ बीस से क्या कम रही होगी ! यह क्या ! तेज़ी से जा रही गाड़ी को ऐसा ब्रेक लगा जैसे अचानक कोई सामने आ गया हो. स्पीड इतनी तेज़ थी और ब्रेक अचानक लगे तो टायरों के घिसटने की आवाज़ हुई और स्पीड के कारण गाड़ी बजाय रुकने के बायें होते हुए पूरी घूम गयी, ऐसी कि बिल्कुल ही दूसरी दिशा में हो गयी, यही गनीमत कि गाड़ी पलटी नहीं. शायद इसलिए कि सड़क पर न कोई दूसरी गाड़ी थी और न ही टकराने को कुछ, या शायद ड्राईवर इतना कुशल था कि अकस्मात ब्रेक लगाने के बावजूद उस पर से सन्तुलन न खोया. मगर गाड़ी को ब्रेक क्यों लगाना पड़ा, वो भी ऐसे ! ज़रूर सामने कुछ आ गया था मगर वहाँ दूर-दूर तक कोई न था, न सामने और न ही किसी साईड में. टायरों की रगड़ के अलावा सड़क पर ऐसे कोई निशान न थे कि कोई टकराया हो और न ही किनारे के पेड़ों पर कोई रगड़ कि कोई टकराता हुआ नीचे ढलान में जा गिरा हो. फिर ब्रेक लगाने की क्या वजह थी ? कुछ तो उसने सामने टकराने को उद्यत देखा था तभी तो ऐसे खतरनाक ढंग से ब्रेक मारी. क्या कोई भूत था जो दिखा और तुरन्त ही गायब हो गया या फिर केवल उसे ही दिखा ? या फिर उसे कोई नज़र का धोखा हुआ होगा, मृग मरीचिका जैसा, जो केवल उसे ही दिखा ? जो भी हो, अब गाड़ी पूरी घूम कर दूसरी दिशा में मुह किये हुए रुकी थी. उसकी बायीं साईड पर बड़ा सा डेण्ट और कुछ स्क्रैच थे जो चीखचीख कर कह रहे थे कि ज़रूर कोई बहुत तीव्र गति से साईड से टकराता हुआ गया है, इतनी तेज़ी से कि थॉर जैसी पॉवरफुल और मज़बूत गाड़ी पर भी ऐसा डेण्ट और खरोंच आ गये.

गाड़ी से कोई आकर्षक सा रोबीला जवान लड़खड़ाता हुआ उतरा.  वह ग्रे रंग का सूट सा पहने था, कमर पर उसी कपड़े की बेल्ट थी जो गांठ मार कर बांधी हुई थी, ज़ाहिर है, पैण्ट को कसने के लिए नहीं, फैशन के तौर पर. रोबीले चेहरे पर नुकीली मूंछे उसे और रोबदार लुक दे रही थीं. कुल मिला कर फ़िल्म ऐक्टर या मॉडल जैसा युवक था. जब SUV का दरवाजा खोल कर उतरा तो उसकी सजधज  नुमाया हुई, उतनी तेज़ स्पीड में तो बस हल्की सी झलक भर मिली थी. उसकी गाड़ी पता नहीं क्यों तेज़ ब्रेक के साथ पूरी ही मुड़ गयी, बस उलटते-उलटते बची. वह कुशल ड्राईवर भी था तभी तो इतनी स्पीड और अप्रत्याशित गहरे घुमाव के बावजूद गाड़ी को संभाल लिया. गाड़ी पलटी नहीं, इंजन झटका खाकर या किसी चीज़ से टकरा कर बंद नहीं हुआ बल्कि बाकायदा न्यूट्रल में करके इंजन बंद किया. गाड़ी पर ऐसा बेहतरीन कमाण्ड उसके रोब दाब वाले चेहरे और गठे शरीर के अनुकूल ही था मगर उसकी दशा ठीक नहीं थी. वह बहुत रुकता हुआ सा, लड़खड़ाता हुआ उतरा था और उतर कर भी उसकी टांगे कांप रही थीं. हो सकता है वह नशे में हो मगर गाड़ी पर ऐसा ज़बरदस्त कमाण्ड और चेहरे पर दहशत के भाव उसके नशे में न होने या नशा हिरन हो जाने की चुगली कर रहे थे. ऐसा लगता था कि उसने कुछ बहुत डरावना, दहला देने वाला देखा हो, जैसे मौत से साक्षात करके आ रहा हो मगर सड़क पर कुछ ऐसा न था. कुछ दूरी पर मौज़ूद लोगों ने तेज़ी से आते, अचानक ब्रेक मारने से गाड़ी पूरी घूम जाते और रुकते देखा था. उनकी चीख निकल गयी थी कि अब गाड़ी पलटी और उसमें आग लगी. सड़क अब भी खाली थी, दूर तक कोई न था और न ही सड़क पर टायर घिसटने के अलावा और कोई टूट फूट के निशान थे. ऐसा लग रहा था कि अचानक कोई करिश्मा हो गया हो. कई लोगों ने उसे घेर लिया.

गाड़ी रुकते ही उस सुनसान सड़क पर दोनों तरफ से कुछ लोग ऐसे प्रकट हुए जैसे वे गाड़ी का इन्तेज़ार ही कर रहे हों. उन्होंने सड़क को घेर लिया.  यह तो कुँवर साहब हैं !” भीड़ में से कोई पहचान करे बोला. अरे, अरे ! क्या हुआ ! जैसी कई आवाज़ें आपस में गड्ड मड्ड हो गयीं कि कोई ज़ोर से चिल्लाया, “अरे, इन्हें इधर लेकर आओ.” कुछ लोगों नें उन्हें सहारा दिया और उस तरफ लेकर गये जिधर से वह पुकार रहा था. यह फाईबर शीट का बना और टीन की छत की छत वाला एक केबिननुमा कमरा था जिसमें पड़ी कुर्सियों में से एक पर उन्हें बिठा दिया गया और किसी नें उन्हें पानी पेश किया. बैठ कर और पानी पीकर उन्होंने अपनी दशा पर काबू पाया और मुह से निकला, ‘हे भगवान ! आज तो तुमने ही रक्षा की. इसका मतलब लोग जो कहते थे, सच था. मैनें मौत के रूप में साक्षात उसे झपट कर अपनी तरफ आते हुए देखा. अचानक ब्रेक न लगा देता तो वह गाड़ी को रौंद डालता. जाने कैसे वह झोंक में गाड़ी की साईड से टकराया और हम गाड़ी समेत इधर को हो गये. देखो, उधर कहीं ढलान में घायल पड़ा होगा.”

उधर तो कोई नहीं है, किसी तरफ नहीं है. हमने तो देखा था कि सड़क पर कोई भी न था फिर भी गाड़ी को ऐसा ब्रेक लगा.” इतना कहने के बावजूद कुछ लोग दोनों तरफ ऐसा कोई देखने के लिए दौड़ गये जिससे टक्कर हुई थी..

हुआ क्या था और आपने किसे देखा ? कौन तेज़ी से झपटता हुआ गाड़ी को रौंद डालने को आमादा था ?” उसी ने पूछा जिसने उन्हें केबिन में लाने को कहा था.

ओह ! हे भगवान !”  कुछ क्षण पहले का नज़ारा याद करते हुए उनके शरीर ने झुरझुरी सी ली, चेहरे पर खौफ़ झलक आया, “वह एक बड़ा सा, हष्ट-पुष्ट सांड था. सींगे नीचे झुकाये हुए हमारी तरफ दौड़ता आ रहा था. उसकी सींगे नीचे, पूंछ ऊपर उठी हुई, जैसे धरती को खूंदता हुआ दौड़ा आ रहा था. नथनों से झाग सा और खुरों से चिंगारियां निकल रही थीं. बड़ा सा कुकुद स्पीड की वजह से हिल रहा था. जैसे रामायण काल के मायावी दानव का भाई, दुंदुभि, ही हो जिसने सांड का रूप धर कर बालि को युद्ध के लिए ललकारा था. वह मौत बन कर हमारी तरफ फुंकारता हुआ दौड़ा आ रहा था कि पता नहीं कैसे या शायद ब्रेक लगाने से वह सीधे न टकरा कर साईड से रगड़ खाता हुआ निकल गया और गाड़ी इधर आ गयी.” कहते हुए उन्होंने फिर झुरझुरी ली.

उधर या किसी तरफ तो कोई भी नहीं है और न ही कोई पेड़ वगैरह टूटा है, पत्थर लुढ़कने के भी कोई निशान नहीं.” कुछ देर पहले दौड़ कर गये लोगों ने आते हुए आश्चर्य के स्वर में कहा. “

“तब तो ज़रूर आपने उस भूत को देखा होगा. कुछ साल पहले एक उपद्रवी और खूंखार सांड सड़क पर किसी गाड़ी से टकरा कर मर गया था और अब वह इसी तरह लोगों को दिखता और गाड़ी उलट कर उन्हें मार डालता है. उसका बहुत खौफ़ है. अक्सर रात के एक से चार बजे के बीच दिखता है मगर जिसे दिखता है, केवल उसे ही दिखता है. अगल-बगल के भी किसी को नहीं और उसका शिकार उसकी बलि चढ़ जाता है. आप बहुत किस्मत वाले थे जो उस भूत से सामना होने पर भी बच गये.”

कट !” ज़ोर की आवाज़ गूँजी औरगुड शॉट” , “परफेक्ट ! “वन टेक शॉट” “यह आपके ही बस का है, क्या शॉट दिया है. क्या परफेक्शन के साथ गाड़ी घुमा कर रोकी. दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जायेंगे.” जैसा शोर बरपा हो गया. अबकुँवर साहबबिल्कुल सामान्य थे. दर्प के साथ चलते हुए वह पास खड़ी वैन की तरफ बढ़ गये और जमा लोगों में कानाफूसी शुरू हो गयी,

हुंह ! क्या परफेक्शन से गाड़ी रोकी ! गाड़ी में मैं था, इतनी स्पीड में चलाते हुएब्रेक मार कर मोड़ते हुए रोकी मैंने 

और तालियां पर्दे पर सुपर स्टार जयवीर सिंह को मिलेंगी. लोग अर्से तक यह स्टंट सीन याद रखेंगे मगर इसे ! मेरा तो कोई नाम भी न जानेगा और न ही सूरत !” हिकारत से थूकते हुए उनके बॉडी डबल ने दूसरे स्टंटमैन से कहा.

हम लोगों की यही किस्मत है बॉस ! और यही इंडस्ट्री का चलन. इसे गाड़ी रुकने के बाद उसमें बैठ कर उतरने के सीन और डॉयलाग बाजी के करोड़ों रुपये और हमें कुछ हज़ार. वो तो अब हमारी यूनियन है वरना तो हमारा हक़ मारा जाता था, अपाहिज हो जाने या मर-मरा जाने पर कुछ नहीं, बस कुछ रुपये देकर छुट्टी. अपाहिज होने पर स्टंट लायक भी तो नहीं रहते. हमारा तो बीमा भी नहीं होता था, अब भी मुश्किल से होता है.” दूसरे स्टंट मैन ने भड़ास निकाली.

डॉयलाग तो देखो. सांड का दुंदुभि से मिलान करने की बड़ी तारीफ होगी, लोग इसे शास्त्रों का जानकार भी समझेंगे. यहसांडतो दुंदुभि भी बोल नहीं पा रहा था, कभी दुदुमभी कहता, कभी दुम्बी तो कभी दम्भी ! झल्ला कर कहा सीधे-सीधे सांड या बैल कहो ना ! कुकुद के बारे में भी बोला, ‘कुकुद क्या ?’ बताया कि सांड व बैल की पीठ और गर्दन के बीच जो कूबड़ सा होता है, उसे कुकुद कहते हैं, तब समझा. इस शब्द को भी डॉयलाग से निकलवा देने पर उतारू था वो तो लेखक ने साथ दिया तो यह लाईन शामिल की गयी. तब भी डबिंग में उच्चारण सही किया जायेगा.” डॉयलाग राईटर ने असिस्टेण्ट से भुनभुनाते हुए कहा.

भई ! खाने का इंतेजाम है कि नहीं, कुछ पीने को भी है या सूखे ही काम चलाना होगा? “ यूनिट मैनेजर से असिस्टेण्ट  डायरेक्टर ने पूछा.

सब ए वन इंतेज़ाम है, आप चिंता न करें. ये बताईये कि डिनर के बाद अभी निकलना है या सुबह तड़के. शूटिंग की परमीशन भी सुबह चार बजे तक की है. इसके बाद तो लोकेशन खाली करनी होगी.  

बस डिनर के आधा घण्टा बाद निकलते हैं.”

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डिनर के बाद थोड़ा रेस्ट और उसके बाद करीब साढ़े तीन बजे पूरी यूनिट रवाना हुई. अब जंगल से निकल कर वे लोग मुख्य सड़क पर और उसके बाद एक्सप्रेस वे पर आ चुके थे. वैन सबसे पीछे थी, उसके आगे तीन गाड़ियां, फिर जयवीर सिंह की लक्जरी गाड़ी, एक डाला और सबसे आगे थॉर चल रही थी जिसे उस वक़्त भी जयवीर सिंह का बॉडी डबल चला रहा था. इस बार वह अकेला नहीं था बल्कि सहायक स्टंटमैन, डॉयलाग राईटर और उसका असिस्टेण्ट भी साथ थे. बातें उसी फ़िल्म की हो रही थीं जिसके एक सीन की शूटिंग कुछ देर पहले हुई थी.

सब्जेक्ट तो वही पुराना है, भुतहा ! उसपे भी सांड का भूत ! चलेगी भी !

चले न चले, हमें तो उतना ही मिलेगा जितना सुपर-डुपर हिट होने पर मिलता. वैसे चलेगी ! जानवर के भूत वाली एक फ़िल्म पहले भी आ चुकी है. 1992 में महेश भट्ट की जुनून. उसमें शेर का भूत था. वह भी ऐसे ही राहुल रॉय की गोली से मर कर भूत बना था, वह हीरो में घुस जाता और कई लोगों को मारता है.”

हाँ, चली तो थी मगर हिट न थी.”

उसकी कास्ट भी तो देखो- राहुल रॉय, पूजा भट्ट और अविनाश वाधवन- जो भट्ट खेमे की फ़िल्मों मे ही आते थे. और इसकी कास्ट - इसमें आज का सुपर स्टार जयवीर सिंह है, हीरोईन सबरीना खान, सेक्स बम ! बोल्ड सीन और रोमांस भी ज़बरदस्त, स्पेशल इफ़ेक्ट, सिनेमेटोग्राफी और मेरे स्टंटचलेगी और ज़बरदस्त चलेगी. “

और स्टोरी, स्क्रीन प्ले और डॉयलाग भी तो देखो किसके ! और म्यूज़िक भी धमाकेदार. ऊपर से दो-दो आईटम सांग भी.”

मगर भाई, थी तो यह फ़िल्म की शूटिंग मगर मुझे सच में सड़क पर वैसा ही सांड दिखा था, वैसे ही झपट कर आता हुआ जैसा तुमने डॉयलाग में लिखा था. तभी तो ऐसे ब्रेक मारा और सीन नेचुरल हो गया. हो न हो, भूत वाली बात सच है. भूत-वूत सब होते हैं.”

यह लोग बातें करते हुए चले जा रहे थे कि अचानक सबके मुह से चीख निकल गयी और ब्रेक पर पांव पड़ गया. अचानक रुकने से पीछे आती गाड़ियों में से दो ने तो बैक में ठोकर मारी और बाक़ी चीं की आवाज़ के साथ इधर-उधर तिरछी होकर रुकीं. भय और विस्मय से सबने देखा कि सड़क पर वैसा ही सांड खड़ा था जैसा स्क्रिप्ट में था. विशाल, खूंखार, सींग झुकाए . जैसे वह ज़मीन फाड़ कर प्रकट हुआ या आकाश से टपका क्योंकि कुछ देर पहले तो दूर तक सड़क खाली थी. इस बार वह दौड़ नहीं रहा था बल्कि अविचल खड़ा गुस्से से घूर रहा था, जैसे फ़िल्म में दिखाए जाने से गुस्सा हो. सबको जैसे सांप सूंघ गया. थॉर सबसे आगे थी, स्टंटमैन कुछ सचेत होता कि वह थोड़ा पीछे हटा और जैसे एक्सिलरेटर लेकर धड़ाम से थॉर को टक्कर मारी. यह टक्कर कम्प्यूटर ग्राफिक से बनाए सांड की नहीं थी, असली थी. धड़ाम की आवाज़ के साथ थॉर ढलान में गिरी और लुढ़कनिया खाती हुई एक पेड़ से टकराई और उलट गयी. एक धमाके के साथ उसमें आग लग गयी. किसी की नज़र सड़क की तरफ नज़र गयी तो डर और ताज़्जुब से वह चीख उठा. सड़क पहले की तरह खाली थी, दूर-दूर तक कहीं कोई नहीं था. न सांड, न कोई और ! हाँ, सड़क पर रगड़ के निशान ज़रुर थे और ढलान के बाद जलती हुई थॉर ! आपस में टकरा कर तिरछी हुई कारें यह बता रहीं थीं कि अभी जो हुआ वह सच में हुआ. सांड ने टक्कर मारी, थॉर गिरी मगर वह गया कहाँ. ज़मीन निगल गयी या आसमान खा गया.

रात का अँधेरा छंट रहा था, एक्सप्रेस वे होने से नियमित पट्रोलिंग की गाड़ी वहाँ से गुजरी. एक तो एक्सीडेण्ट, दूसरे फ़िल्म यूनिट का मामला, सुपर स्टार जयवीर सिंह की मौजूदगी. आनन-फानन में एम्ब्युलेंस वहाँ पहुँची. स्टंटमैन की तो घटनास्थल पर ही मौत हो चुकी थी, बाक़ी तीनों गम्भीर घायलों को अस्पताल शिफ़्ट किया गया. लम्बे इलाज के बाद वे बच तो गये मगर हादसे के असर से बहुत दिन तक उबर न सके. जाँच हुई मगर दुर्घटना का कारण नहीं पता नहीं चला. CCTV में भी कुछ न था, खाली पड़ी सड़क पर गाड़ी रुकती, फिर गिरती नज़र आयी. थॉर के बाक़ी तीनो सवारों और पीछे के कुछ लोगों को पक्का नहीं हुआ कि जो देखा था, वह नज़र का धोखा था या हक़ीकत ! एक्स्प्रेस वे के ज़ीरो प्वाईंट के नाम से कुख्यात उस हिस्से का रहस्य भी ज़ीरो ही रहा.       

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