जब पढ़ते थे तब मित्र मण्डली में कई ऐसे लोग थे जिनसे हमारी मित्रता किताबों के कारण हुई. सभी बेरोजगार, लगभग समान आर्थिक स्थिति के और विकट पढ़ाकू. अकादमिक नहीं, जासूसी उपन्यास के लती. पैसे सबके पास मतलब भर से कम होते थे, पेट्रोल का खर्चा न था काहे से सब साईकिल वाले थे. कुछ के पास तो साईकिल भी नहीं. तब किराए पर साईकिल खूब मिलती थी और डबल-तिबल सवारी वाली साईकिल खूब दिखती थीं. किताबें भी किराए पर मिलती थीं, किराया चौबीस घण्टे का चार्ज होता था भले किताब तीन घण्टे में निपटा दें. हम सब ऐसे ही थे कि खाना, घर का काम, स्कूल का होम वर्क आदि करते हुए चार-पाँच घण्टे में निपटा देते थे, बिना व्यावधान के लग कर पढ़ें तो दो ही घण्टे में. उसके बाद आपस में किताब बदलना होता था तो बैठकी भी जमती थी. उसी दौर में हमारी मित्र मण्डली में शामिल हुए एक शुक्ला जी (पूरा नाम अब याद नहीं आ रहा ) वे भी विकट 'पढ़ाकू'. गाँव से लखनऊ भेजे गये थे पढ़ने के लिए. हम अमानीगंज चौराहा, अमीनाबाद में रहते थे और वे घर के पास, जूते वाली गली में कमरा लेकर रहते थे. तब एक दो किलोमीटर भी घर के पास ही होता था. उनका कमरा कॉर्नर का था, ऊपर का था, नीचे एक दुकान थी. जीना अलग, मकान मालिक रहता न था तो मण्डली जमाने के लिए आदर्श स्थान था. बड़े बातूनी, लफाड़िया और हद दर्ज़े के मुरहे. अमीनाबाद में रहने तक खूब दोस्ती रही, लगभग रोज ही मिलना-बैठना होता था, किताबें अदला-बदली होतीं और बैठकी होती. फिर हम अमीनाबाद से दूर अलीगंज में रहने लगे तो उधर के ही हो गये. आना-जाना तो रहा पर अड्डेबाज़ी का समय न रहा तो दोस्ती भी रोज की न रही.
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Tuesday, 29 July 2025
Saturday, 21 June 2025
अनुवाद किसका हो – किताब का या शीर्षक का भी !
अनुवाद किसका हो – सामग्री का या शीर्षक का भी !
मंगा लेने के कई दिन बाद आख़िरकार ’Heart Lamp’ पढ़ना शुरू किया और दो कहानियां पढ़ भी डालीं. मंगा लेने के कई दिन बाद इसे पढ़ना शुरू करने का एक कारण तो यह कि हाथ में जो किताबें थीं उनमें से एक के पूरा हो जाने के बाद ही नयी किताब शुरू करता हूँ, ( अगर वह नयी किताब पाठक जी की न हो ) दूसरा कारण यह कि किताब अंग्रेजी में है. साहित्यिक रुचि के लोग तो जानते ही हैं फिर भी बता दूँ कि मूल रूप से अंग्रेजी में भी नहीं, कन्नड़ में है और इसका कन्नड़ से अंग्रेजी अनुवाद किया गया है. यह बानू मुश्ताक़ का कहानी संग्रह है ’Heart Lamp’ इसे अनुवाद के लिए 2025 का अंर्तराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार दिया गया है. अनुवादित श्रेणी के लिए यह विश्व का प्रतिष्ठित पुरस्कार है जो लेखक व अनुवादक दोनों का साझा होता है, इसकी पुरस्कार राशि, 50,000.00 ब्रिटिश पाउण्ड, भी लेखक और अनुवादक में बराबर – बराबर बांटी जाती है. इसकी अनुवादक हैं दीपा भास्ती जो लेखक और अनुवादक हैं. क्षेत्रीय भाषाओं, उनमें कन्नड़, के लिए यह गौरव की बात है.
अंग्रेजी अमूमन मैं पढ़ता नहीं, अंग्रेजी बोलने में शर्म आने वाले बयान से पहले से नहीं ! अंग्रेजी में मेरा हाथ बचपन से ही तंग है. अंग्रेजी ( पढ़ना-लिखना-बोलना ) मेरे लिए सहज नहीं, साहित्य तो कतई नहीं. अंग्रेजी का कुछ पढ़ने में मुझे दोहरकम लगता है, एक साथ ही पढ़ो और उसका मन ही मन हिन्दी अनुवाद करते चलो. फिर भी भीष्म प्रतिज्ञा नहीं है. कुछ किताबें जिन्हें पढ़ने की उत्कट इच्छा होती है पर उनका हिन्दी अनुवाद नहीं हुआ होता/ उपलब्ध नहीं होता तो अंग्रेजी में ही पढ़ लेता हूँ. भोजन के मामले में जो ज़हरमार करना/ पेट को धोखा देना होता है, वैसा ही है अंग्रेजी में पढ़ना मेरे लिए !
तो इसे भी ऐसे ही पढ़ना शुरू किया. सरल अंग्रेजी है, जब मैं पढ़ ले रहा हूँ तो कोई भी पढ़ सकता है. इसके पढ़ने के पीछे भी वही कारण था – पुरस्कृत कृति के प्रति उत्सुकता और कुछ उसके बारे में पढ़ा होना. ‘रेत समाधि’ तो हिन्दी में भी उपलब्ध है किन्तु यह नहीं, बाद में शायद हो किन्तु’कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक’ सो अभी ले लिया और पढ़ा.
कहानियों पर अभी कुछ नहीं कह रहा हूँ, अनुवाद के बारे में कुछ विचार आये. नहीं, नहीं – अनुवाद की गुणवत्ता आदि के बारे में नहीं. उस पर तो तब कह सकता था जब मैंने मूल पढ़ा होता या फिर अनुवाद बेकार होता, ‘मक्षिकास्थाने मक्षिका’ जैसा, यान्त्रिक सा होता, कथा में रस न मिलता. अभी तो यह कि क्या अनुवाद में किताब के शीर्षक या कहानी संग्रह है तो हर कहानी के शीर्षक का भी अनुवाद किया जाना अनावश्यक नहीं ! लेखक ने जो शीर्षक दिया, उसे वैसा का वैसा न देने से क्या उसकी आत्मा खण्डित नहीं हो जाती ! मूल भाव तिरोहित सा नहीं हो जाता ! आख़िर अनुवादक नाम का अनुवाद तो करता नहीं, उसे वैसा का वैसा ही लिखता है. कोई लेखक चन्द्र प्रकाश हो तो अंग्रेजी अनुवाद करते समय उसे Moon Light तो नहीं लिखता ! उपन्यास या कहानी का शीर्षक भी तो नाम ही है, उसे क्यों नहीं वैसा का वैसा रहने देते. हाँ अंग्रेजीदां लोगों के लिए ब्रैकेट में मूल नाम का भावार्थ दे सकते हैं. शीर्षक में ही लेखक बहुत कुछ कह देता है, कभी – कभी तो शीर्षक ही विषय वस्तु का संकेत दे देता है तो उसे वैसा का वैसा ही रखना उचित है. Stone Slabs for Shaista Mahal या Fire Rain … सभी कहानियों का शीर्षक भी अंग्रेजी में अनूदित कर दिया गया है. बानू जी ने किताब का व कहानियों का यह शीर्षक तो न रखा होगा. मूल शीर्षक होता तो बात, कम से कम मेरे विचार से, और होती.
अन्य भाषा से अंग्रेजी अनुवाद करते समय यह अपेक्षित है. हिन्दी व अन्य भारतीय भाषा भाषियों के लिए यह उससे तादात्म्य स्थापित करेगा, बिना अधिक प्रयास के मालूम हो जाएगा कि हम कौन सी रचना पढ़ने वाले हैं. भारतीय साहित्य प्रेमी बहुधा अन्य भारतीय भाषओं के बहुतेरे शब्द आसानी से समझ लेते हैं तो मूल भी समझ लेंगे. ‘गीतांजलि’ का अंग्रेजी अनुवाद भी गीतांजलि नाम से ही है न कि शीर्षक का अंग्रेजी अनुवाद कर दिया गया/ इसका अर्थ यह हुआ कि पहले अनुवादकों के ध्यान में यह बिन्दु रहता था, उसे मानते थे. तब मानते थे तो अब भी मानें ना !
बहुत सी अंग्रेजी व अन्य भाषाओं की किताबों का अनुवाद हिन्दी में हुआ है. उसमें भी शीर्षकों तक को अनूदित कर दिया गया है. ‘आख़िरी शब के हमसफ़र’ को ‘निशान्त के सहयात्री’ कर दिया गया, अच्छा अनुवाद है किंतु शीर्षक अगर ‘आख़िरी शब के हमसफ़र’ ही रहता तो किताब उठाते ही पता चल जाता कि किस किताब का अनुवाद है. ऐसे ही ‘ए सुटेबल ब्वाय’ को ‘एक अच्छा सा लड़का’, ‘वार एण्ड पीस’ को ‘युद्ध और शान्ति’, ‘फेयरवेल टू आर्म्स’ को ‘शस्त्र विदाई’, … कर दिया गया. सुधी पाठक तो पहचान लेगा किंतु जो बिना जाने किताब उठा रहा है वह मूल नाम से अधिक तादात्म्य स्थापित करेगा.
आपका क्या विचार है !
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किताब - ’Heart Lamp’
लेखक – बानू मुश्ताक़, अनुवादक दीपा भास्ती
मूल भाषा - कन्नड़
विधा - कहानी
प्रकाशक – पेंगुइन बुक्स
पेपरबैक संस्करण, दाम 399/-, 12 कहानियां
Tuesday, 17 June 2025
हनुमान जी का विक्रम नाम !
हनुमान जी का विक्रम नाम !
हनुमान जी के अनेक नाम हैं. महावीर,
पवनसुत/पवनपुत्र/मारुतनन्दन, बजरंग बली, मारुति, अञ्जनिसुत/ अञ्जनिपुत्र/आञ्जनेय/अञ्जनिनन्दन
आदि सर्वाधिक प्रचलित नाम हैं. महावीर जी कोई कहे तो भी जैन धर्म के महावीर स्वामी नहीं, हनुमान जी ही ध्यान
में आते हैं. अन्य कई देवी-देवताओं की तरह ‘हनुमत सहस्त्र नाम’ भी है जाप के लिए जिसमें
हनुमान जी के एक हज़ार नाम हैं. कल ‘रामायण यक क़ाफ़िया’ पढ़ रहा था तो उसमें अशोक वटिका
प्रसङ्ग में हनुमान जी का विक्रम नाम पढ़ा. इस रामायण में कई जगह हनुमान जी का उल्लेख
विक्रम नाम से है.
हनुमान जी
का विक्रम नाम मैंने नहीं सुना था ( बाद में याद आया कि सुना है ), यह प्रचलित भी नहीं.
कोई उन्हें विक्रम नाम से स्मरण नहीं करता. जानकारी के लिए कुछ और ग्रंथ देखे, ‘हनुमत
सहस्त्र नाम’ भी देखा, उसमें भी विक्रम नाम नहीं मिला. नहीं मिला तो न सही, इसी बहाने
‘हनुमत सहस्त्र नाम’ का जप हो गया.
विक्रम नाम के मिस ‘रामायण
यक क़ाफ़िया’ का अशोक वाटिका प्रसङ्ग देखें जिसमें हनुमान जी का विक्रम नाम
है –
“ … इतने में विक्रम
ने फेंकी राम की अंगुश्तरी ।
जानकी जी की जुदाई का किया क़िस्सा बयां ॥
जानकी हैरां हुई
अंगुश्तरी को देख कर
।
दिल को अन्देशा हुआ, पैदा हुए वहमो गुमां
॥
ध्यान था अंगुश्तरी ए राम लाया कौन शख़्स ।
किस में ऐसा ज़ोर है, है कौन ऐसा पहलवां ॥
विक्रम आये सामने सीता को पाया फ़िक्रमन्द
।
की बयां सहरानवर्दाने
अलम
की दास्तां
॥ … “
वाटिका उजाड़ने की ख़बर पाकर रावण ने
अक्षय कुमार को भेजा और पकड़ कर लाने की ताकीद की. हनुमान जी का विक्रम नाम ही बताया
–
“… था अछै, रावन का फ़रज़न्द अहले ताकत
अहले ज़ोर ।
उस से रावन ने
कहा
जा तू मियाने बोस्तां
॥
हिकमतो तदबीर से विक्रम
बली को कैद कर ।
चश्मे गुलशन को
दिखा आइनये अम्नो अमां ॥ …”
अशोक वाटिका उजाड़ी, अक्षय कुमार को
मार गिराया. तब रावण ने मेघनाद को भेजा –
“ … कोह की सूरत पवनसुत ने उखाड़ा
एक दरख़्त ।
फ़ौज को मारा, कुचल डाली अछै की अस्तुख़्वां
॥
वह राजा ब्रह्मा की शक्ति था बराये
अहले ज़ोर ।
था परसधर का फरसा,
राम का तीरे
रवां ॥
शंभु का त्रिशूल था, वज्र इन्द्र का, अर्जुन
का बान ।
विष्णु जी का चक्र, काली जी की तेग़े
ख़ूंफ़िशां ॥
था श्री नरसिंह का नाखुन, श्री विक्रम का
गुर्ज़ ।
आतिशे सोज़ां, बलाये आस्मां, बर्क़े तपां ॥
यंशे अक़्रब या दमे अज़दर था या दन्दाने मार
।
ग़ैरते
ख़र्तूमे फ़ीलो, पंजए शेरे ज़ियां ॥
मेघनाथ अपने पिशर को फिर दिया रावन ने हुक्म
।
जा
के विक्रम
को
करे पाबन्द ज़ंजीरे गिरां
॥ … “
ऐसे ही कई जगह हनुमान जी के अन्य
नामों के साथ विक्रम भी कहा गया है. विक्रम नाम स्मरण करते हुए याद आया कि तुलसीदास
जी ने भी हनुमान जी को विक्रम कहा है –
“ महावीर विक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥
तो हनुमान जी का एक नाम विक्रम भी था.
*************
कुछ ‘रामायण
यक क़ाफ़िया’ मन्ज़ूमए ‘उफ़ुक़’ के बारे में !
‘रामायण यक क़ाफ़िया’ मन्ज़ूमए
‘उफ़ुक़’ के रचनाकार मलिकुश्शुअरा द्वारका प्रसाद ‘उफ़ुक़’ लखनवी हैं और मूल
रूप से यह रचना उर्दू में है. यह वाल्मीकि रामायण व रामचरित मानस पर आधारित है पर अनुवाद
न होकर स्वतन्त्र रचना है. यह पहली बार 1885 में प्रकाशित हुई और बाद मे प्रतिष्ठित
मुंशी नवल किशोर प्रेस , लखनऊ से 1914 में पुनः प्रकशित
हुई. रचनाकार का जन्म लखनऊ के नौबस्ता में 13 जुलाई, 1864 को एक साहित्य सेवी परिवार
में हुआ. इनके परदादा, दादा, पिता एवं माता उर्दू के शायर, गद्यकार एवं सम्पादक थे.
इन्होंने 1888 से 1894 तक उर्दू पद्य में 12 पृष्ठों का पाक्षिक ‘ नज़्म अख़बार’ प्रकाशित
किया व 30 से अधिक पुस्तकों की रचना की. 1913 में आपका निधन हुआ.
मुंशी नवल किशोर प्रेस , लखनऊ से
प्रकाशन के बाद अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश ने इसके प्रकाशन
का बीड़ा उठाया और यह 2021 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई. यह द्विभाषी है, एक ओर
उर्दू में तथा एक ओर हिन्दी में दिया हुआ है. अन्त में कुछ पेण्टिंग्स भी हैं. हर पृष्ठ
पर कठिन शब्दों के अर्थ व अंत में रामायण व रामकथा के पात्र व प्रसङ्गों के बारे में
परिशिष्ट भी है.
Saturday, 14 June 2025
टेलर का लेबल और धोबी का मार्का
पुलिस को सड़क किनारे झाड़ियों में एक लाश की सूचना मिली. एक आदमी बाईक से कहीं जा रहा था, उसे हल्के होने की ज़रूरत महसूस हुई. बाईक रोकी, सड़क से उतर कर झाड़ियों तक गया. निवृत होकर चेन बन्द कर रहा था कि एक पैर दिखा, झाड़ी के अन्दर तक घुसने पर पूरी लाश दिखी. ज़िम्मेदार नागरिक था सो पुलिस को फोन किया और पुलिस आने तक वहीं रुका भी रहा. लाश करीब चालीस साल के आदमी की थी. हत्या किसी धारदार चीज़ से गला रेत कर की गयी थी. हत्या कहीं और की गयी, लाश वहाँ लाकर फेंकी गयी क्योंकि न खून बिखरा था, न संघर्ष के कोई चिन्ह थे और न मर्डर वेपन बरामद हुआ. पहचान के लिए मोबाईल, पर्स या कोई कार्ड, कोई कागज, बिल, रसीद, कोई टैटू/गोदना, कोई बर्थ मार्क, घड़ी आदि कुछ न था. चप्पल, कपड़े साधारण थे, जेब में रुमाल, कुछ नोट और सिक्के मिले - उनसे पहचान में कोई मदद होनी न थी. लाश की फोटो, चेहरे का क्लोज अप लिया गया, लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवायी गयी और क्लोज अप के पोस्टर जगह जगह चस्पा कर दिए गए. फोटो दिखा कर आस पास पूछताछ की गयी पर पहचान न हुई और न ही किसी ने पोस्टर देख कर सम्पर्क किया. आस पास के थानों में भी किसी चालीस साल के आस पास के आदमी की गुमशुदगी की रिपोर्ट हुई थी, न इस थाने में.
ऐसे में लाश की पहचान नहीं हो पा रही थी तब पुलिस को उसके कपड़ों का ख़याल आया. शर्ट पर दर्ज़ी का लेबल लगा था जिस पर टेलर का नाम (दुकान का नहीं ) और इलाके व शहर का नाम लिखा था. इतने सुराग के सहारे पुलिस उसकी शिनाख़्त के लिए निकली. लेबल पर दर्ज़ शहर का वह इलाका तो जैसे दर्ज़ीबाड़ा था, लाईन से टेलर ही टेलर थे (है ना आश्चर्यजनक इलाका ) कुछ दुकानों पर पूछताछ के बाद पुलिस को अहसास हुआ कि यह तो बड़ा टाईमखाऊ और ऊबाऊ तरीका है. तब उन्होंने इलाके बड़े और अच्छे टेलर, मंझोले टेलर, छोटे टेलर और घफ से काम करने वाले टेलर के अनुसार बांटा (एक और संयोग, पुलिस की सुविधा के लिए उस इलाके में टेलर इसी तरह बसे थे, एक उप इलाके में एक स्तर के टेलर ) यह तरीका कारगर रहा और एक छोटे टेलर की दुकान से पता चला कि मोहन टेलर (लेबल पर यही नाम था ) घर से काम करता है. पुलिस वहाँ पहुँची तो मोहन ने शर्ट अपने यहाँ से सिली होने को स्वीकारा और लेबल पर लिखे नम्बर से रसीद बुक देख कर बताया कि यह कोई रेगुलर ग्राहक नहीं. पहली बार आया, इसका नाम-पता, फोन नम्बर भी रसीद पर नहीं लिखा. टेलर तक पहुँचने के बाद भी कोई सूत्र न मिलने पर नाम-पता न लिखने की लापरवाही के लिए समुचित फटकार लगायी. वे जाने को ही थे कि एक पुलिसिए की नज़र लेबल पर लगे काले निशान पर पड़ी. मोहन से पूछने पर उसने कहा कि वह ऐसा कोई निशान नहीं लगाता, ऐसे निशान धोबी लगाते हैं तो यह किसी धोबी का निशान हो सकता है. इस बार टेलर जैसी कवायद की ज़रूरत न थी क्योंकि जब शर्ट घर से काम करने वाले टेलर से सिलवायी तो धुलवायी भी किसी ऐसे ही धोबी से होगी, किसी लाण्ड्री से नहीं. थोड़ी ही पूछताछ के बाद घर से काम करने वाली धोबन का पता चला जिसने अपना निशान पहचाना. यह तो रसीद या रजिस्टर वगैरह भी न रखती थी पर पुलिस की सुविधा के लिए इस ग्राहक का नाम और घर मालूम था. फोटो देख कर भी उसने पहचाना कि इसी आदमी ने यह शर्ट धोने को दी थी. अब पुलिस के पास उसकी पुख़्ता पहचान थी, बस कत़्ल का उद्देश्य, कात़िल और कत़्ल कहाँ और कैसे हुआ, अकेले किया या और लोग भी शामिल थे ... जैसे काम थे.
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रेडीमेड का वर्चस्व बढ़ने पर भी लोग सूट, कोट, सदरी, शेरवानी आदि टेलर से सिलवायी हुई ही पहनते थे. शादी में सूट तो ज़रूर ही 'अपने' टेलर से सिलवाते थे, दो बार तो ट्रायल होता था, तीसरी बार में फाईनल होकर मिलता था तो सीधे शादी या रिसेप्शन पर पहना जाता था. रेडीमेड के दौर में भी जेन्ट्स टेलर की वकत थी. वे लेबल तो लगाते थे मगर सीरियलों में लाश की शिनाख़्त के सिलसिले में इन पर टेलर के लेबल का कोई स्कोप नहीं है, काहे से कि सूट, शेरवानी आदि में मर्डर होते ही नहीं. वैसे तो मर्डर के लिए कोई ड्रेस कोड नहीं होता मगर सीरियलों में मर्डर साधारण कपड़ों में ही होता है. क्यों महँगे सूट, शेरवानी को खून और चाकू/गोली वगैरह के निशान से खराब किया जाय, कास्ट्यूम किराए पर आते हैं, वापस भी न होंगे. वैसे अब सूट, सदरी, शेरवानी भी शादी तक में लोग रेडीमेड पहनने लगे हैं.
तो आज के कालखण्ड वाला सीरियल हो तो लाश की शिनाख़्त के लिए टेलर का लेबल आप्रसङ्गिक है, होगा ही नहीं कपड़ों पर. रेडीमेड पर जो लेबल होता है उससे बस ब्राण्ड, कपड़े की किस्म, मिश्रण अनुपात और धुलाई निर्देश आदि पता चलते हैं, कील ठोक कर दुकान का नाम नहीं.
अब आते हैं धोबी के मार्का पर. टेलर के लेबल की तरह आज के दौर में यह भी आप्रसङ्गिक है. हतप्राण ग़रीब हुआ तो हाथ से बालटी/टब में कपड़े धोता होगा. मध्यवर्गीय गृहस्थ हुआ तो घर पर वॉशिंग मशीन होगी. लाण्ड्री से धुलाता होगा तो अब लाण्ड्री वाले मार्का लगाते ही नहीं. नम्बर वगैरह कपड़े पर नहीं लिखते बल्कि पतले बकरम के टुकड़े पर लिख कर कपड़े के साथ कच्चे धागे से नत्थी कर देते हैं जिसे कपड़ा देते समय खोल कर फेंक देते हैं. घर से काम करने वाले धोबी भी अब नहीं लगाते, वैसे भी अब धुलाई का काम एक चौथाई ही रह गया है, प्रेस करने का काम होता है और प्रेस के लिए आये कपड़े पर भी कोई मार्का नहीं लगाते. तो शिनाख़्त का और कोई ज़रिया न होने पर धोबी का मार्का वाला सूत्र भी गया.
अब सीरियल में पुलिस की सुविधा के लिए अदबदा कर कोई शर्ट टेलर से सिलवाए, मार्का लगाने वाले धोबी से धुलाए तो बात और है.
अब उन्हें लाश के पास से मोबाईल, पर्स या कोई कार्ड, कोई कागज, बिल, रसीद, कोई टैटू/गोदना, कोई बर्थ मार्क, घड़ी आदि बरामद न हो तो कोई और तरीका दिखायें, ये टेलर का लेबल और धोबी का मार्का अब हजम न होगा.
बात हो ही रही है तो इस पर भी हो जाय कि टेलर लेबल और धोबी मार्का क्यों लगाते होंगे. इसलिए तो नही ही लगाते होंगे कि किसी का खून हो, शिनाख़्त का कोई और पुख़्ता ज़रिया न हो तो इन्ही से शिनाख़्त हो जाय. टेलर तो अपनी दुकान की पहचान, विज्ञापन व इसलिए लगाते होंगे कि ग्राहक के कपड़े देख कर कोई पूछे, 'बड़ी बढ़िया फिटिंग है, कहाँ से सिलवाई ?' तो ग्राहक नाम-पता बता सके. मगर इन सबमें लेबल का तो कोई रोल है ही नहीं. ग्राहक बिना लेबल देखे ही बतायेगा कि शर्ट उतार कर लेबल देख कर/कॉलर पलट कर लेबल दिखाएगा ? लेबल बहुधा ऐसी जगह होता है जो सामने न दिखे, शर्ट में कॉलर के नीचे और पैण्ट में जिप के पास. तो विज्ञापन वाला उद्देश्य भी नहीं, फिर क्यों ? एक उपयोगिता समझ में आती है. बड़े और मंझोले टेलर सारा काम ख़ुद या दुकान के कारीगरों से नहीं सिलवाते. वे नाप लेकर, कपड़ा कटिंग करके घर से काम करने वाले दर्ज़ियों को देते हैं, वह सिल कर देता है. अब उसके पास कई टेलरों का काम आता है तो पहचान के लिए /कपड़े आपस में गबड़ न जाएं, हर टेलर अपना लेबल भी देता है जिसे वह दर्ज़ी उसके कपड़ों पर लगाता है - दोनों को सुविधा. और कोई कारण तो समझ आता नहीं लेबल लगाने का. पुलिस/प्रशासन ने भी अनिवार्य नहीं किया है लेबल लगाना.
ऐसे ही धोबी के मार्का का है. वह तो निश्चित ही ग्राहक की पहचान के लिए, कि किसका कपड़ा धुलने को आया है, मार्का लगाता है. चूंकि बहुत से ग्राहक नियमित रूप से धोबी से ही कपड़े धुलाते हैं. अब हर दूसरे दिन या हफ्ते कपड़ा आये तो हर बार नया तो होगा नहीं. ऐसे हर बार मार्का लगाते रहे तो कुछ ही माह में कपड़े की उस जगह, जहाँ मार्का लगाते हों, जगह ही न बचती होगी तो उन्होंने अलग चिट पर लिख कर नत्थी करना या कोई वैकल्पिक तरीका शुरू किया.
अब आप बताएं - क्या आप टेलर से सिलवा कर पहनते हैं या रेडीमेड और क्यों ? शिफ्ट हुए तो क्यों, नहीं हुए तो क्यों ? कपड़े धोबी से/लाण्ड्री से धुलवाते हैं ? यह मार्का लगाने वाली प्रथा कबसे शुरू हुई होगी ? क्या त्रेता में वह धोबी, जिसने सीता जी के बारे में वह बात कही, कपड़ों पर मार्का लगाता होगा ?
प्रश्न और भी होंगे - करिए और जवाब दीजिए ! वैसे भी यह पोस्ट 'निठल्ला चिंतन' है, खलिहर हों तो, खलिहर नहीं पर खुरपेंची हों तो समय निकाल कर कुछ कहें.




