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Wednesday, 30 September 2020

5 अण्डररेटेड किताबें

 

 5 अण्डररेटेड किताबें

फेसबुक पर एक प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा जिसमें  5 अण्डररेटेड किताबों के बारे में संक्षेप में बताना था






  तो इच्छा हुई कि उन किताबों के बारे में बताऊँ जो मेरी मतिअनुसार अच्छी हैं, विषय-वस्तु का पूर्ण निर्वाह करती हैं, भाषा-शैली और साहित्यिक  कसौटी पर खरी हैं – संक्षेप में,  पठनीय हैं किन्तु उनका उतना प्रचार-प्रसार न हुआ जितनी वे पात्रता रखती हैं. फेसबुक पर कई पेज और ग्रुप हैं जिन पर किताबों की बात होती है,  उनके अलावा सुधी पाठक  अपनी वाल पर भी किताबों के बारे में चर्चा करते रहते हैं किन्तु इनकी चर्चा नही होती देखी. ऐसी ही  5  किताबों पर बात कर रहा हूँ –

-          “क” – लेखकः राबर्तो कलासो – राजकमल प्रकाशन से,

-          “ मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ” – लेखिकाः महुआ माजी - राजकमल प्रकाशन से,

-          “कथासरित्सागर” – लेखक सोमदेव – नेशनल बुक ट्रस्ट से,

-          “ काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से” – लेखकः सुरेन्द्र वर्मा – भारतीय ज्ञानपीठ से, एवं

-          “ उपसंहार” – लेखकः काशीनाथ सिंह – राजकमल प्रकाशन से.

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“क” भारतीय मानस और देवताओं की कहानियां

जैसा उपशीर्षक से स्पष्ट है, इसमें पौराणिक चरित्रों की कहानियां हैं. पौराणिक चरित्र, जो हिन्दुओं के पूज्य और धार्मिक चरित्र हैं, कुछ तो अवतार हैं और त्रिदेवों की कथा भी है किन्तु पौराणिक आख्यान होते हुए भी यह धार्मिक ग्रन्थ नही और न ही उन पात्रों और घटनाओं की नये सम्दर्भों में या अपनी मान्यतानुसार व्याख्या करता है – यह उन घटनाओं और पात्रों को ग्रन्थों मे वर्णित आधार पर ही सरस और प्रवाही रूप में बताता है और कुछ प्रसङ्गों का गहन विवेचन भी है.  किताब में 15 अध्याय हैं. पहला आख्यान सृष्टि के प्रारम्भिक दौर का है जो गरुण, विनता और कद्रु की कथा है और गरुण द्वारा अमृत लाने का वर्णन है. उसी क्रम, में नाग, बालखिल्य ऋषिगण,  इन्द्र, प्रजापति और तैतीस कोटि ( करोड़ नही, प्रकार ) देवों की कथा है. आगे ब्रह्मा, शिब,  विष्णु,  राम, कृष्ण, अश्विनीकुमार, अश्वमेघ यज्ञ, सप्तऋषियों की वार्ता से बुद्ध तक का आख्यान और दर्शन है.

इन आख्यानों में न तो केवल सपाट लोकरञ्जक कथा है और न ही बोझिल दर्शन बघारा गया है बल्कि बहती हवा, जल, व्याप्त प्रकाश आदि की तरह पाठक सहज भाव से उन आख्यानों में प्रवेश करता और लिप्त होता है. अभी “बुक बाबू क्लब” पेज पर इस किताब की चर्चा देख कर सुखद अनुभूति हुई. किताब मूल रूप से इतालवी में है, अंग्रेजी में अनूदित हुई और हिन्दी में देवेन्द्र कुमार ने अनुवाद किया.

 

मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ

विकिरण, प्रदूषण और विस्थापन से जूझते आदिवासियों की गाथा है यह उपन्यास. यद्यपि लेखिका ने प्रथानुसार इस उपन्यास के पात्र, स्थान और घटनाओं के काल्पनिक होने का स्पष्टीकरण दिया है किन्तु सब जानते हैं कि यह सब काल्पनिक नहीं. जहाँ भी जंगल हैं, खनिज हैं या यूँ ही तमाम वनसम्पदा है, उन पर उद्योगपतियों की गृद्धदॄष्टि लगी होती है. वे विकास के नाम पर खनिज का दोहन करते हैं , जंगल काटते हैं और इस प्रक्रिया में कारखानों का साधारण से लेकर विकिरणयुक्त अपशिष्ट वहां के जल स्रोतों को, भूमि को व हवा को जीवन के लिए प्राणघातक स्तर तक प्रदूषित करता है जिसका खामियाजा भुगतते हैं उस जंगल में रहने वाले आदिवासी. वे भूमि, पर्यावरण, स्वास्थ्य और जान तक गंवाते हैं. सरकार भी उद्योगपतियों का ही हित साधती है. इस दुष्चक्र में होता है संघर्ष और आदिवासी हर तरह से मारे जाते हैं.

 

मरंगगॉड़ा एक आदिवासी गांव हैं जहां ज़मीन के नीचे है यूरेनियम. इसी यूरेनियम के दोहन के चक्कर में कैसे जीवनचक्र छिन्न-भिन्न होता है, जल स्त्रोत विकिरण से प्रदूषित हो जाते हैं, उन्हे प्राणघातक बीमारियां होती हैं, वे बीमारी से ग्रस्त होकर ज़ल्दी मरते रहते हैं और सरकार से लेकर आन्दोलन तक – सब उन्हे एक संसाधन मान कर दोहन करते हैं. अन्त न सुखद है, न दुखद – बस वही है जो आज हो रहा है. कहा काल्पनिक जा रहा है किन्तु सहज ही जाना जा सकता है कि यह छत्तीसगढ़ के यूरेनियम समृद्ध क्षेत्र की विनाशगाथा है. इस दारुणगाथा के साथ ही हैं आदिवासी जीवनशैली और जंगल के वे वर्णन जो पाठक को मानो उसी वन प्रांतर में ले जाते हैं. उपन्यास रोचक और प्रवाहमय शैली में है.

 

कथासरित्सागर

महाकवि सोमदेव द्वारा विरचित यह ग्रन्थ गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ का सरस रूपान्तरण है. इसमे उस काल, जब राजा-महाराजा होते थे, भगवान भी धरा पर आते थे और श्रेष्ठिजन सुदूर देशों में व्यापार हेतु जाया करते थे, की कथाएं हैं. जैसे बात में से बात निकलती आती है वैसे ही एक कथा से दूसरी कथा फिर उस कथा से कोई और कथा – इसी प्रकार अनेक सरस, गुदगुदाने वाली, नीति की शिक्षा देने वाली कथाएं निकलती आती हैं. इनका उद्देश्य कोई शिक्षा या उपदेश देना नही अपितु मनोरञ्जन है. इसमें तान्त्रिक अनुष्ठानों, प्राकेतर कथाओं, गन्धर्व, किन्नर, विद्याधर एवं अन्य दिव्यलोक के प्राणियों की कथाएं हैं जो विभिन्न कारणों से मनुष्यों के सम्पर्क में आते हैं और जन्म होता है एक विचित्र कथा का. अनेक पुरानी कथाओं, वैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, किस्सा तोता मैना आदि कई कथानकों की छवि इसमें है. मिथक, इतिहास, फैटेंसी, इन्द्रजाल आदि का अनूथा संगम है इन कथाओं में. हर वय वर्ग के पाठकों का मनोरञ्जन करने में सक्षम हैं ये कथाएं. संस्कृत से रूपांतर राधावल्लभ त्रिपाठी ने किया है.

 

काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से

यह महाकवि कालिदास के जीवन पर आधारित उपन्यास है. उपन्यास इस अर्थ में विलक्षण है कि इसकी भाषा-शैली इतनी प्राञ्जल और प्रवाहमय है कि यह काव्य का सा आनन्द देता है. लेखक, सुरेन्द्र वर्मा, ने उपान्यास के शीर्षक के बाद लिखा भी है, “ कविसुरेन्द्रवर्माविरचित” ठीक भी है, कवि कालिदास का जीवनवृत्त तो काव्य होना ही था. इसमे कालिदास के बारे में प्रचलित किवदन्ती, कि वे वज्र मूर्ख थे, जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे और कुछ पण्डितों ने परम विदुषी विद्द्योत्तमा से बदला लेने के लिये षड्‍यन्त्रपूर्वक उसका शास्त्रार्थ और विवाह कालिदास से करा दिया और भेद खुलने पर उसने उन्हे भी अपमानित किया और देवी काली की उपासना करके वे कविकुलगुरु बने. इस  उपन्यास में कालिदास की कवि प्रवृत्ति और अध्ययन व कवि बनने के संघर्ष को दिखाया है. उन दिनों काव्य प्रतिभा व अन्यान्य कलाओं का केन्द्र उज्जयिनी था सो वे वहीं के लिये अपने छोटे से ग्राम से चल पड़े. उज्जयिनी कला व साहित्य का केन्द्र तो था किन्तु वहां भी विद्वानों की मठाधीशी थी, षड्‍यन्त्र थे और प्रतिष्ठा पाने को आये गुणवानों की भीड़ थी. कालिदास कैसे अपने ग्राम से निकल कर आते हैं, पुस्तकालय में उनके साथ क्या बीतती है, उज्जयिनी में उन्हे स्थान नही मिलता सो वे एक घर में किराये पर रहते और  किराये के साथ गृहस्वामिनी की बेटी को ट्यूशन पढ़ाते व उनकी बगिया की देखभाल करते हैं और ग्रन्थ प्रकाशित करवाने में कितनी दिक्कतें आती हैं और कैसे वे राजकुमारी की दृष्टि में चढ़ते हैं – इसकी रोचक गाथा है यह उपन्यास. इस क्रम में पर्याप्त चुटीले हास्य-व्यंग्य प्रसङ्ग हैं. उपन्यास  शुरू करते ही बांध लेता है. बार-बार पठनीय है यह कृति.

 

उपसंहार

काशीनाथ सिंह के इस उपन्यास में शीर्षक के साथ लिखा है, ‘उत्तर महाभारत की कृष्ण कथा’ और लिखा है ‘ चरम सफलता में निहित है एकाकीपन का अभिशाप’ इन उपशीर्षकों से स्पष्ट है कि यह महाभारत युद्ध के बाद की कथा है जब कृष्ण युद्ध में तटस्थ रहकर भी पाण्डवों को विजय दिलाने वाले नायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए और द्वारिका आये. कृष्ण तो वीतराग थे किन्तु उनके संगी-साथियों को विजय मद चढ़ गया था जिसकी परिणिति यदुकुल के विनाश में हुई. युद्ध के बाद उसके दौरान हुए विनाश, घात-प्रतिघात आदि का चिन्तन किया उन्होनें तो पाया इस युद्ध और विजय की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी – पराजितों और विजेताओं, दोनों पक्षों को. यह कृष्ण के आत्मचिन्तन का दौर था. द्वारिका में भी कहां सब ठीक था – हर ओर असन्तोष, विद्रोह और आक्षेप के स्वर थे. दाऊ भी उन्हें आरोपित कर रहे थे और उनका पुत्र प्रद्युम्न भी, साम्ब भी व्यथित और विद्रोही होकर लक्ष्मणा ( कृष्ण की पुत्रवधू, दुर्योधन की पुत्री ) के साथ महल छोड़ कर जा चुका था – लक्ष्मणा पिता दुर्योधन व अपने मायके के लोगों की हत्या के लिये कृष्ण को दोषी मान रही थी. फिर वो कथा जब दुर्वासा का कृष्ण मे महल में आगमन हुआ .

 

बहुत झञ्झोड़ता है यह उपन्यास. नाटकों की भांति लम्बे एकालाप भी हैं और लम्बी किन्तु सरलकविताएं, जो कृष्ण की मनोदशा को अभिव्यक्त करती हैं. पौराणिक पात्र होते हुए भी यह धार्मिक आख्यान नही है.

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इन सब किताबों के लेखक प्रख्यात हैं, विषय-वस्तु का निर्वाह हर तरह से बहुत अच्छी तरह हुआ है, काशीनाथ सिंह और सुरेन्द्र वर्मा की अन्य कृतियां ( सुरेन्द्र वर्मा की ‘मुझे चाँद चाहिए” और काशीनाथ सिंह की “काशी का अस्सी” व अन्य कई ) बहुचर्चित रही हैं, स्वयं लेखक भी अतिचर्चित / बहुपठित रहे किन्तु ये कृतियां उतनी नही पढ़ी गयीं जितनी कि उनकी अन्य कृतियां जबकि ये भी कम नही. इस पोस्ट में मेरा प्रयास उन कुछ कृतियों की ओर सुधी पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराना है.

( "उपसंहार" किताब का परिचय यहीं एक पृथक पोस्ट में भी दिया है, कृपया देखें )

 

Monday, 28 September 2020

लखनऊ की नई लाईब्रेरियां !

  


कुछ दिन पहले लखनऊ के पुस्तकालयों के बारे में बात की थी, मौक़ा लाईब्रेरी / लाईब्रेरियन दिवस का था. तब पहले के पुस्तकालयों से अब तक अस्तित्व बचाये हुए कुछ पुस्तकालयों की बात की किन्तु लखनऊ में इधर के कुछ सालों में ‘उगी’ लाईब्रेरियों की बात पोस्ट बड़ी होने के डर से न कर सका, अब करता हूँ.

नौकरी के सिलसिले में कई साल प्रदेश से बाहर तैनात रहा. जब आता था तो जगह-जगह चौबीसों घण्टे चलने वाली लाईब्रेरियों ( इन्हे पुस्तकालय कहने का जी नही चाह रहा – क्यों ! जिनका इनसे साबका पड़ा होगा वे जान ही रहे होंगे, बाक़ी अभी जान जाएंगे )  के बोर्ड देखे – 24 X 7, वाई-फाई सुविधा से युक्त, किन्ही में कैफे भी. मैं जानकीपुरम मे रहता हूँ और इन्जीनियरिंग कॉलेज से लेकर कपूरथला तक और उधर हनुमान मंदिर तक कुछ नही तो पचीसों तो हैं ही, पचास तक भी हो सकते हैं. कुछ बेसमेण्ट में तो कुछ ऊपरी मंज़िलों में. देख कर ख़ुशी और कौतूहल होता था कि इतनी लाईब्रेरियां और कौतूहल ये कि अचानक से ऐसा क्या हुआ जो लोग इतने पढ़ीस हो गये और इधर के ही. जब इधर इतने हैं तो शहर भर में तो सैकड़ों की तादाद में होंगी ही. अन्दर जाकर देखने का मौक़ा न  लगा सो कौतूहल बना रहा. जब लखनऊ वापसी हुई तो एक मे गया फिर कई एक मे गया कि सब ऐसी हैं या कोई पुस्तकालय जैसी भी है.

पुस्तकालय में ढ़ेरों किताबें होती हैं जो बहुधा साहित्यिक और विविध विधाओं की होती हैं. कुछ ऐसे पुस्तकालय भी होते हैं जिनमें कोर्स ( बहुधा स्नातक एवं उच्च कक्षाओं की )  की किताबें भी बहुतायत से होती हैं या कोर्स की  किताबें ही होती हैं. कुछ में वाचनालय भी होता हैं जहाँ लोग बिना सदस्य बने या निर्गत कराए बैठ कर किताबें पढ़ सकते हैं, नोट्स बना सकते हैं, फोटो कॉपी ( सशुल्क ) करा सकते हैं. अधिकतर ऐसे पुस्तकालयों में तीन-चार किताबें साल भर या सत्र भर के लिये निर्गत की जाती हैं. इनमें सदस्य बनना होता है. इन पुस्तकालयों से उन छात्रों को बड़ी मदद हो जाती है जो किताबें खरीदने की स्थिति मे नही होते या खरीदना नही चाहते. लखनऊ विश्वविद्यालय में टैगोर लाईब्रेरी के साईड में ‘कोआपरेटिव लेण्डिंग लाईब्रेरी ( CLL के नाम से अधिक जानी जाती थी ) थी ( हो सकता है, अब भी हो ) किन्तु उसमें केवल विश्वविद्यालय के छात्रों को ही यह सुविधा थी. ऐसे अन्य पुस्तकालयों में आचार्य नरेन्द्रदेव पुस्तकालय और चन्द्रभानु गुप्त नव चेतना सदन ( अपट्रान बिल्डिंग, अशोक मार्ग ) में स्थित लाईब्रेरी में यह सुविधा थी.

जब इन नयी लाईब्रेरियों में गया तो पाया कि ये परम्परागत अर्थ में लाईब्रेरी हैं ही नही बल्कि ये स्व अध्ययन केन्द हैं जो केवल पढ़ने की जगह और शांत वातारण उपलब्ध कराते हैं. इनमें किताबें नही होती हैं ( अपवाद स्वरूप कुछ में एक-दो अख़बार, कुछ पत्रिकाएं और कुछ किताबें मिलीं ) जैसे साईबर कैफे में छोटे-छोटे केबिन बने होते हैं वैसे ही कतार में पचीसों केबिन होते हैं ,जिनमें छात्र बैठ कर पढ़ते और नोट्स बनाते हैं. किताबें वे अपनी लाते हैं और चूँकि ये चौबीसों घण्टे खुलने वाली लाईब्रेरियां हैं तो वे अपने चुने हुए तयशुदा वक़्त पर आते और उसी वक़्त के दायरे में पढ़ते हैं. अब लगातार पढ़ते / नोट्स बनाते रहते हैं तो कुछ में चाय वगैरह की व्यवस्था (सदस्यता शुल्क के अलावा, जितनी लें उतने के शुल्क पर ) भी रहती है. यह आवासीय भवनों में भी हैं और व्यवसायिक भवनों में भी. एक केयर टेकर भी होता है जो सदस्यों के आने और रुकने का समय नोट करता है ( ताकि कोई तयशुदा समय से पहले न आये और अपने टाईम स्लॉट से अधिक न बैठने पाये ) सामान्य देखभाल करता है, यह भी देखता है कि कोई अवाञ्छित गतिविधि न हो. वह कुछ सामान्य व्यवस्था ( जैसे बिजली, पानी, सफाई वगैरह ) भी करता है. चूँकि ये लाईब्रेरी हैं नही तो उस व्यक्ति को लाईब्रेरियन कतई नही कहा जा सकता, होता भी नही है,  वह केयर टेकर भर होता है. यह व्यवसाय है तो इसका मालिक या तो एक ऑफिसनुमा जगह में बैठता है या फिर तय समयावधि में आता है. सदस्यता आदि देने का काम वही करता है. सामान्यतः यह राशि 800/- से 1200/- तक होती है.

कई लाईब्रेरियां देखीं कि शायद कोई वास्तव में लाईब्रेरी जैसी हो जहाँ किताबें हों, किताबें निर्गत की जाती हों और वाचनालय हो किन्तु सब केवल पढ़ने की जगह उपलब्ध कराने वाले केन्द्र निकले. इनमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले ही होते हैं. अब सवाल ये कि इन्हे लाईब्रेरी क्यों नाम दिया गया. शायद लाईब्रेरी व्यावसायिक गतिविधि में न गिनी जाती हो और इस पर टैक्स और विभिन्न विभागों से अनुमति आदि की आवश्यकता न होती हो या उनमें कुछ छूट हो. कुछ ऐसे व्यावसायिक भवन हैं जिनमें शादी-व्याह और अन्य आयोजन होते हैं, वे बाज़ार दर पर किराये पर दिये जाते हैं किन्तु नाम “सत्संग भवन”  होता है. सत्संग आदि धार्मिक गतिविधियों में आते हैं, उनमें व्यावसायिक गतिविधियों, जैसे कर एवं अन्य प्रावधान नही होते सो वे सत्संग भवन के नाम से रजिस्टर्ड होते हैं. मेरी तरफ एक “ सत्संग भवन” है जिसमें सत्संग या कोई धार्मिक आयोजन आज तक नही हुआ, वह सत्संग की छूट लेकर व्यावसायिक गतिविधियां चला रहा है – ये “लाईब्रेरियां” भी इसीलिए लाईब्रेरी नाम से हैं. एक यह बात छोड़ दी जाय तो यह चलन स्वागतयोग्य ही है. वास्तविक पुस्तकालय निर्धारित समय पर ही खुलते-बन्द होते हैं जबकि ये चौबीसो घण्टे खुले रहते हैं जिनमें छात्र अपनी सुविधानुसार टाईम स्लॉट में अध्ययन करते हैं. चौबीसों घण्टे चलने के बावजूद कोई आपत्तिजनक गतिविधि या झगड़ा-झञ्झट  होते नही सुना.

अभी कुछ दिन पहले एक बोर्ड देखा, Books with Coffee (The hangout Library)  कुछ अलग सा नाम था, Books का भी उल्लेख था और नाम में इसे पहले रखा गया था सो पहले बहुत सी ऐसी लाईब्रेरियां देखे होने के बावजूद क्षीण सी सम्भावना लगी कि शायद यह वास्तविक लाईब्रेरी हो, नही तो Book Café  तो हो ही.  आशङ्कित होते हुए भी गया किन्तु यह भी वैसा ही ‘सेल्फ स्टडी सेन्टर’ निकला . कोरोना काल होने से रौनक थी ही नही, करीब पचास लोगों की जगह होते हुए भी बस एक युवक और एक युवती ही थे और वे भी स्टडी नही कर रहे थे. मालूमात हासिल करने की नियत से पूछा तो उन्होनें ऊपर इशारा कर दिया. ऊपर गया तो कुछ मिस्त्रीनुमा लोग काम कर रहे थे, पूछने पर बताया, “ भैया ( मालिक ) शाम को आते हैं “ स्टडी करने वाले जिस मुद्रा / भंगिमा में थे उससे इन लाईब्रेरियों के ‘मिलन केन्द्र’ के रूप में भी विकसित होने की सम्भावना लगी.

ऊपर Book Café  का ज़िक्र किया. लखनऊ में यह भी हैं और बहुत ही अच्छी, स्तरीय, बेहतरीन साज-सज्जा, साहित्यिक किताबों  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र और  परिवेश तथा बेहतरीन कैफे के साथ हैं. पोस्ट भी बड़ी हो रही है तो यदि आप इच्छुक होंगे तो अगली पोस्ट में उनकी चर्चा करूँगा. तब तक न हो तो एक चक्कर इन ‘लाईब्रेरियों’ का लगा आईये.  

 

Saturday, 12 September 2020

लोक के कबीर

 

लोक के कबीर

  गुरु ने बतायो, बेधन भेद बतायो ॥

पहली भिक्षा अन्न की लाना, गाँव नगरिया पास न जाना।

हिन्दू तुर्की छोड़ के लाना, लाना झोली भर के ॥

दूजी भिक्षा मांस की लाना, जीव जन्तु के पास न जाना ।

जिन्दा मुर्दा छोड़ के लाना, लाना खप्पर भर के ॥

तीजी भिक्षा जल की लाना, कुआँ-बावड़ी पास न जाना ।

ताल-तलैया छोड़ के लाना, लना तूँबी भर के ॥

चौथी भिक्षा लकड़ी लाना, रूख वृक्ष के पास न जाना ।

गीली-सूखी छोड़ के लाना, लाना गठ्ठर भर के ॥

कहत कबीर सुनो भई साधो, ये पद तो निरवाना ।

इस पद का जो अर्थ करेगा, वो है चतुर सुजाना ॥

 

अभी दो-तीन दिन पहले यह पद मेरी नज़र से गुज़रा, इसमें कहत कबीर सुनो भई साधो था, इससे लगता था कि यह पद कबीर का है किन्तु यह कबीर का है नही ! पञ्चों की सम्मति के आशय से इसे आपके समक्ष रखा और लगभग सभी ने सम्मति दी कि ये पद कबीर का नही है. अब मुझे क्यों लगा कि ये पद कबीर का नही है और कैसे ऐसे बहुत से पद कबीर के नाम से लोक में चल रहे हैं – इस पर कुछ कहने से पहले इस पद का शब्दार्थ ( जो कि स्पष्ट ही है ) और गूढ़ार्थ बता कर ‘चतुर सुजाना’ बन लूँ. वैसे तो इस पोस्ट पर आने वालो में अधिकांश को पता ही होगा किन्तु एक-आध मित्र हो सकते हैं जिन्हे गूढ़ार्थ न मालूम हो – अर्थ बताने को मेरी प्रगल्भता न मानें, उन्ही एक-आध मित्रों के लिए अर्थ प्रस्तुत है.

एक जोगी अपने शिष्य को भिक्षा लेने के लिए भेज रहा है और शिष्य के गूढ़ार्थ बोध की परीक्षा लेने के आशय से सीधे-सीधे यह नही बता कि भिक्षा में क्या लाना है  बल्कि कहता है, भिक्षा में अन्न लाना कि


न्तु हिन्दू-मुसलमान ( मतलब किसी भी व्यक्ति ) से न लाना और किसी गाँव-नगर में भी न जाना और झोली भर के लाना. दूसरी विशेषता बताते हैं कि मांस लाना किन्तु जीव-जन्तु या ज़िन्दा-मुर्दा का मांस न हो और खप्पर भर के लाना. तीसरी बात जल लाना किन्तु कुआँ-बावड़ी, ताल-तलैया से मत लाना और तूंबी भर के लाना. चौथी बात कि लकड़ी लाना किन्तु किसी वृक्ष से न लाना, गीली-सूखी न हो और गठ्ठर भर हो. गुरूजी (इस पद में कबीर) ने कहा यह निर्वाण का पद है और जो इसका अर्थ बतावे वो चतुर सुजान है.

                                                                                                                              अब चेला भी ऐसे गुरूओं की संगत में बहुत रहा होगा, ऐसी अटपटी / गूढ़ संकेतों वाली बातें खूब सुनी-गुनी होंगी सो वह भिक्षा में एक ऐसी वस्तु लेकर आया जिसमें चारों शर्तें पूरी हो गयीं – वह भिक्षा थी नारियल.

                                                                                               नारियल की गिरी / गरी को अन्न भी कहा गया है, भूख मिटाता है और यह किसी की रसोई में नही बनता सो पहली शर्त पूरी हो गयी. फलों के गूदे को मांस भी कहा जाता है. वाल्मीकि रामायण सहित कई जगह मांस का उल्लेख है, वनवास मे राम लक्ष्मण से मांस लाने को कहते हैं और वे गूदेदार फल लाते हैं. मांस को लोक भाषा में गूदा भी कहते हैं ( पहले तो सूखे हाड़ थे, अब कुछ गूदा चढ़ा है हड्डियों पर. मांसल शरीर को गुदाज भी कहते हैं सो गूदा और मांस पर्यायवची के रूप में लोक में प्रचलित और स्वीकार्य रहे हैं ) तो नारियल में गूदा है और यह किसी जीव-जन्तु का नही. नारियल में पानी होता है सो जल भी हो गया और कुआँ-बावड़ी आदि किसी स्रोत का नही. नारियल का खोपरा लकड़ी ही है. खप्पर भी है और जलावन भी. गुरुजी एक शर्त जोड़ना भूल गये – बाल / जटा लाने की अन्यथा नारियल के रेशे बाल / जटा भी कहे जाते हैं. इस तरह “चतुर सुजान” चेले ने एक फल लाकर गुरु जी की सारी शर्तें पूरी कर दीं.

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अब आते हैं इस पर कि क्यों मुझे लगा कि यह पद कबीर का नही हो सकता. कबीर ने उलटबांसी खूब कही हैं किन्तु उनके हर पद में भक्ति, अध्यात्म या पाखण्डों का विरोध है या दैनिक जीवन में काम आने वली नीतियां, सद्वचन हैं – पहेलियाँ नहीं. यह पद  तो  केवल पहेली  है और पहेली भी गाँव-जवार में खूब बूझी जाने वाली. न इसमें ( पूछने और बूझने )  धर्म है, न अध्यात्म, न कोई दर्शन , न लोकहित की कोई बात और न ही कुरीतियों / पाखण्ड पर प्रहार. यह उन पहेलियों से तनिक भी अलग नही ( ‘कोई लावे ऐसा नर, पीर बावर्ची भिश्ती खर’ टाइप की ) जो बड़े-बूढ़े बच्चों से बुझाया करते थे. ये विशुद्ध मनोरंजन के लिए है.

 

अब ये पहेली है तो इसे ऐसा क्यों बनाया गया कि कबीर की लगे. गुरु-चेला, भिक्षा आदि जोड़ा और तब भी कमी लगी तो कहत कबीर सुनो भई साधो  भी लगा दिया . कबीर लोक चेतना के कवि हैं, उनकी सधुक्कड़ी भाषा, खरी बात और साधो या संतों को सम्बोधित करके बात करना लोक को बहुत रुचा. इनके पदों में भक्ति का वो स्वरूप न था जिसे लोक अन्य भक्त कवियों की रचना में पाता था. भक्त कवि या अन्य कवि जन की बात नही कहते थे, वे राम या कृष्ण आदि का लीला गान करते या महिमा का. अन्य कवि श्रंगारी थे या विरदावलियां गाते थे. जन की समस्या या साधारण जन की बात, उससे उसी की भाषा मे बात न थी. समाज में अनेक भेद, छुआछूत और पाखण्ड व्याप्त थे. कबीर ने अपनी कविता में इन सब पर बात की, पण्डित-मुल्ला दोनों को खरी-खरी सुनाई और पाखण्डों पर तार्किक चोट की तो कबीर जन - जन में गाये-सराहे जाने लगे. हर वो साधु, जोगी या फकीर जो उनकी तरह बात करता था – कबीर जैसा स्वीकार्य हो गया. कबीर एक व्यक्ति न रह कर एक शैली हो गये. जो कबीरी बात करे सो कबीर. कबीर को लोक ने अपनाया तो अनेक लोक के कबीर हो गये और उनकी रचनाएं कबीर का नाम धारें कही-सुनी जाने लगीं और कबीर के नाम से प्रचलित होती रहीं. बात कबीर जैसी थी तो पद भी कबीर का हो गया. उसमें कबीर का नाम, कहत कबीर या कबिरा लगा दिया गया गया कबीर जैसा होने के कारण. लोक को इस मीमांसा से मतलब न रहा कि यह कबीर की है या नही – वो तो इसी में मगन कि कबीर जैसी बात है तो कबीर की है. यह अन्य काव्य में क्षेपक य प्रक्षिप्त जैसा न था, इसका उद्देश्य कबीर के काव्य को दूषित करना न था, अन्य कोई निहितार्थ भी समझ नही आते. यह सब साधु / जोगी / फकीर – जो कबीर जैसा गाते और पदों में कबीर का नाम लगाते -  लोक के कबीर थे.

ऐसे ही लोक के कबीर का एक पद देखें. कबीर का नही है, मालूम नही किसका है पर कबीर के नाम से प्रचलित है –

 

आज बसैं सबरी घर रामा ।

सबरी राम का आवत जानैं, चन्दन से लिपवावावैं धामा ।

गंगा ते सबरी जल भरि लावैं, तखत बैठि परभू करैं असनाना ।

बैरी-मकोइया परभू भोग लगावैं, अवर नहीं सबरी घर सामा ।

कुस कै गुदरी सबरी बिछावैं, लोटि-लोटि परभू करै विसरामा ।

कहत कबीर सुनौ भई साधो, सुफल भयो यहि सबरी के जामा ।

 

(अवधी के अध्येता, अमरेन्द्र अवधिया, ने ‘नवभारत टाइम्स” में “गलचउरा” कॉलम में ‘सबरी के राम’ शीर्षक से आलेख दिया है, उसी में यह पद है)

 

लोक में कबीर के अलावा भी भिन्न पद

 

कबीर लोक में गये तो अनेक पद कबीर के नाम से प्रचलित हो गये किन्तु बहुतेरे पद ऐसे हैं जो कबीर के विभिन्न संकलनों में अलग-अलग रूप में हैं और रूपक भी अलग बांधा गया है. अब कबीर ने तो कोई संकलन किया नही. पद गाते रहे और शिष्य उन्हे संकलित करते रहे. पहले श्रुति और स्मरण से कि जो सुना वह याद रह गया और सुनाते रहे . औरों ने भी सुना और सुनाते रहे. इस तरह चार से चालीस लोगों के बीच तैरते पदों में से किसी ने कितना पकड़ा, कितना छोद़ा और कितना अपने पास से मिलाया – कहना मुश्किल है. बहरहाल वो सारे पद कुछ या बहुत कुछ अन्तर के साथ भी कबीर के ही माने जायेंगे.

 

कबीर के कोई सौ साल बाद जब कबीरपंथ की स्थापना हुई तो एक विशिष्ट पोथी की ज़रूरत महसूस हुई. भक्ति के लोकवृत्त में प्रचलित कबीर रचनाओं मे से चयन करके पोथी तैयार हुई. दादूपंथी और निरंजनपंथियों ने बहुत सी कबीर रचनाओं को छोड़ दिया जिनमें कोई दोष जज़र आया ( जैसे ‘मुगल’ शब्द का प्रयोग – यह कालक्रम दोष माना गया ) बीजक के संकलनकर्ताओं ने बहुत से ऐसे पद छोड़ दिये जो उनके पंथ द्वारा विकसित समझ के विपरीत थे. सम्भवतः यही कारण है कि 1570 से 1681 के बीच कबीर के माने जा चुके 593 पदों में से 32 ही बीजक में मिलते हैं.

कबीरर्पंथियों ने अपनी ज़रूरत के मुताबिक कबीर-वाणी का पाठ अपने लिए तय कर लिया. दादूपंथी पाठ पंथ के लिए उलझन पैदा करता था सो उन्होने बीजक को अपने व्यवहार के लिए माना और इसे रेखांकित करने के लिए कहा, “संतो, बीजक मत परमाना” बीजक कबीर की सभी रचनाओं का संकलन नही बल्कि चुनी हुई रचनाओं का संकलन है – ‘कलेक्टेड वर्क’ नही ‘सिलेक्टेड वर्क’ यही कारण है कि बीजक, ग्रन्थावली और अन्यत्र बिखरे पदों में बहुत अन्तर पाया जाता है.

बात बहुत लम्बी हो रही है, जिस विवेचना को विद्वानों ने किताबों मे समेटा उसे एक फेसबुक पोस्ट मे कैसे समेटा जा सकता है इसलिये एक पद प्रस्तुत कर रहा हूँ जो बीजक ( शुकदेव द्वारा सम्पादित संस्करण )  में अलग है और ग्रन्थावली ( माताप्रसाद गुप्त द्वारा सम्पादित ग्रन्थावली ) में अलग, यहां तक कि रूपक भी बदल दिया गया है. 

कबीर ग्रन्थावली में पद इस रूप में है –

 

हरि मेरा पीव भाई, हरि मेरा पीव,

हरि बिन रहि न सकै मेरा जीव ।

हरि मेरा पीव, मै हरि की बहुरिया । राम बड़े मैं छटुक लहुरिया ।।

किया स्यंगार मिलन के ताई । काहे न मिलो राजा राम गुसांई ॥

अब की बेर मिलन जो पाऊँ । कहै कबीर भौ जल नहि आऊँ ॥

                                                                  ग्रन्थावली में इस पद मे दाम्पत्य-प्रेम का रूपक है तो ‘बीजक’ में ‘कातने’ का रूपक कर दिया गया है –

 

हरि मोरा पीव मैं राम की बहुरिया, राम मोर बड़ो मैं तन की लहुरिया ।

हरि मोर रहटा मैं रतन पिउरिया, हरि को नाम लै मैं कतती बहुरिया ।

मास तागा बरस दिन कुकरी, लोग कहैं भल कातन बपुरी ।

कहै कबीर सूत भल काता, चरखा न होय मुक्ति कर दाता ।

 

( बीजक और ग्रन्थावली में पदों के भेद की सामग्री पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब “अकथ कहानी प्रेम की” से ली गयी है. किताब राजकमल प्रकाशन से है और इसे पहला राजकमल प्रकाशन कृति सम्मान, ‘ कबीर हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार 2009’ से पुरस्कृत किया गया है.

                                                                  इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों में, “हरि मोर पिव मैं हरि की बहुरिया” या “ राम मोर पिव मैं राम की बहुरिया” के रूप में मिलता है. गुरु ग्रन्थ साहब में कबीर के पद भी हैं, हो सकता है उसमें किसी भिन्न रूप मे हों. तो मित्रों, कबीर के भिन्न-भिन्न पाठ हैं विभिन्न कारणों से जिनमें भिन्नता मिलती है, इसके अलावा लोक के कबीर तो हैं ही.

Friday, 21 August 2020

पथरा चौथ !

 

पथरा चौथ !




पथरा चौथ !
ऊँ गं गणपतये नमः
सभी लोगों को नमस्कार. बातचीत की शुरुआत गणपति को नमस्कार करके की, काहे से कि आज गणेश चतुर्थी है अर्थात गणेश जी का प्राकट्य दिवस. आज ही के दिन गणेश जी का अवतरण हुआ था. आज ही का दिन अर्थात कौन सा दिन, कौन सी तिथि ! तो मित्रों ! भाद्रपद, जिसे बोलचाल की भाषा में भादों भी कहते हैं, उसी भादों के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का अवतरण हुआ था. अवतरण या प्राकट्य इसलिये कि गणेश जी का जन्म सामान्य रूप से नही हुआ अपितु माता पार्वती ने पुतला बना कर उनमें प्राण प्रतिष्ठा की . तब वे गणेश थे, गजानन व अन्य नाम बाद में पड़े.
अब जैसे केला के पात में से पात निकलते हैं और बात में से बात निकलती है वैसे ही पौराणिक कथाओं में से अनेक उप कथाएं निकलती हैं. किसी अवतार के अनेक हेतु होते हैं और उनसे अनेक कथाएं जुड़ जाती हैं. कुछ तो पुराणों में होती हैं तो कुछ लोक मानस में प्रचलित हो जाती हैं और लोक मन इस कदर उनसे जुड़ जाता है कि कथाओं के साथ व्रत, पर्व, मनाने की विधि चल पड़ती है. अब पुराण की ही लें तो शिव पुराण में रुद्रसंहिता के चतुर्थ खण्ड, कुमार खण्ड, के अनुसार गणेश जी की उत्पत्ति भादों के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को हुई थी तो गणेश पुराण के अनुसार भादों के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को.
जो भी हो, जिस तिथि को भी गणेश जी का प्राकट्य हुआ हो – गणेश जी विनायक हैं, विघ्न बाधाओं को दूर करते हैं और अवतरण के दिन पृथ्वी पर आते और भक्तों के घर विराजमान होते हैं. नौ दिन तक रुकते हैं, दसवें दिन, अनन्त चतुर्दशी के दिन अपने लोक को प्रस्थान करते हैं. इसी भाव से चतुर्थी को घरों और सार्वजनिक पण्डालों में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं और उनकी विदाई के दिन अर्थात अनन्त चतुर्दशी को विसर्जन करते हैं.
गणेश जी के प्राकट्योत्सव के साथ एक मान्यता यह भी है कि इस तिथि को चाँद देखने से कलङ्क लगता है अतः इस दिन चाँद न देखें. हम बात कर रहे थे गणेश चतुर्थी की. कहां गणेश जी के प्राकट्य का दिन और कहां इस दिन चाँद देखने से कलङ्क लगने की कथा. गणपति के दर्शन से तो विघ्न दूर होते हैं किन्तु उन्ही के जन्मदिन पर चन्द्र दर्शन से कलङ्क ( कोई झूठा आरोप ) लगना – विरोधाभासी सा लगता है ना, किन्तु लोक मे इस दिन को “पथरा चौथ” के रूप में भी मान्यता है. इस दिन, अर्थात भादों की चतुर्थी को चाँद देखने से कोई न कोई कलङ्क लगता है. अब जो अनिष्ट है, उसके निवारण की भी व्यवस्था होती है और लोक मान्यताओं में इतनी सरल व्यवस्था होती है कि हर कोई कर ले. यह पर्व छत्तीसगढ़, उसमें भी विलासपुर में विशेष प्रचलित है, हिमाचल में भी है और उत्तर भारत के ग्रामीण अञ्चलों में भी. ग्रामीण तो छोड़ दें, लखनऊ के शहरी क्षेत्रों में भी यह प्रचलित रहा, अब इसका प्रभाव कम हो गया है, अब नही सुनने में आता. गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी मानस के एक प्रसङ्ग में प्रकारान्तर से चौथ के चाँद को न देखने की सलाह दी है. सुन्दरकाण्ड में विभीषण रावण को समझाते हुए कहते हैं कि जैसे लोग चौथ का चाँद नही देखते वैसे ही तुम परनारी का मुख न देखो –
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजौ चउथि के चंद कि नाई॥
भादों के शुक्ल पक्ष की चौथ का चाँद कृष्ण जी ने देख लिया था, फलस्वरूप उन स्यमन्तक मणि की चोरी का आरोप लगा. अब इस कथा को सुनने से पहले वह कथा सुनें जिसमें चौथ का चाँद देखने से अनिष्ट होने की बात है ( देखें, निकली ना कथा में कथा ) -
तो कथा यह है कि एक बार गणेश जी अपने वाहन मूषक पर सवार होकर तेज़ी से कहीं जा रहे थे कि चन्द्रदेव की नज़र उन पर पड़ी. एक तो गणेश जी का महाकाय शरीर, दूसरे वाहन चूहा और तीसरे तेज़ी से जाना – कुछ ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ कि चन्द्रदेव को हँसी आ गयी. हँसी ही नही, उन्होने उनका मज़ाक भी उड़ाया. चन्द्रदेव को अपनी सुन्दरता का अभिमान भी था. गणेश जी को क्रोध आया और उन्होने शाप दिया कि अब से जो भी तुम्हे देखेगा, उसे कलङ्क लगेगा. अब बताईये भला, ग़लती चन्द्रदेव की, उपहास का अपराध उन्होने किया और शाप फलित होगा उन निरपराध लोगों पर जो चाँद देखेंगे – क्रोध में ऐसा भी होता है. अब तो चन्द्रदेव डरे कि इतने सुन्दर और शीतल होते हुए भी लोग उन्हे नही देखेंगे. सुन्दर व्यक्ति के लिये यह दण्ड ही है कि कोई उसे न देखे. क्या लाभ सुन्दरता का कि लोग देख कर सराहें नही. चन्द्रदेव ने बहुत अनुनय-विनय की तो गणेश जी पिघले और दण्ड को बहुत कम करके केवल उस तिथि तक सीमित कर दिया. वह तिथि भादों के शुक्ल पक्ष की चौथ थी. तभी से इस तिथि को चाँद देखने पर कलङ्क लगने की मान्यता है अतः लोग इस तिथि को चाँद देखने से बचते हैं.

दोष निवारण का उपाय - पथरा चौथ पर छत पर पत्थर फेंकना
अब लाख बराव करने पर भी कोई चाँद देख ही ले तो क्या हो ? कलङ्क लगने की आशङ्का तो है ही. आपने अनुभव किया होगा कि जिसका निषेध हो, अदबदा कर वह होता है. चोट छूने / खुजाने, इस कोरोना काल में नाक-आँख – चेहरा छूना मना है तो अदबदा कर उंगली वहीं जाती है, इसी तरह यदि सोच लिया कि आज चाँद नही देखना है तो घर में कमरे के अन्दर बैठे रहें तो भले बचाव हो जाय अन्यथा बाहर निकलने पर निगाह ऊपर उठ जाती है और चाँद दिख जाता है. लो अब आ गयी मन में शङ्का ! अब दोष है तो दोष निवारण का उपाय भी है और उपाय भी बहुत सरल है. जिस घर की छत टीन की हो उस पर पत्थर फेंके. टीन पर पत्थर पड़ने से ज़ोर की आवाज़ होती है तो घर से कोई न कोई निकलेगा ही देखने कि किसने पत्थर फेंका. अब कोई दिखेगा नहीं काहे से पत्थर फेंकने वाला खड़ा तो रहेगा नही बताने को कि मैने पत्थर फेंका. देखने को निकला व्यक्ति, बहुधा गृहस्वामिनी, जब तक देखे कि किसने पत्थर फेंका और कोई नुकसान तो नही हुआ कि एक और पत्थर जाने किसने फेंका और टन्न की आवाज़ हुई. अब वो शुरू गालियां देने का दौर ! यह भी टोटका है इसका कि पत्थर फेंकने पर गृहस्वामिनी गालियां दे तो चन्द्र दर्शन का दोष मिट जाता है, कलङ्क नही लगता. गृहस्वामिनी भी यह जानती है कि आज पत्थर क्यों फेंके जा रहे हैं तो वह गालियां देती है कि लोगों का कलङ्क मिट जाय.
अमीनाबाद में जब रहते थे तो ऑफिस से लौटते में या घर पर रहें तो खिड़की से चाँद दिख जाता था. एक घर था मोहल्ले में जिसके आँगन में टीन छायी थी, वो गालियां देने में पटु भी थीं सो खूब पत्थर पड़ते थे टीन पर. अब टीन वाले घर भी न रहे और यह प्रथा भी लुप्त हो गयी. अब शायद लोग चन्द्र दर्शन से कलङ्क मानते भी नही. वैज्ञानिक आधार न होने पर भी ये भोले विश्वास बड़े मज़े के थे. एक चकल्लस हो जाती थी.

दोष निवारण का दूसरा उपाय – स्यमंतक मणि वाली कथा सुनना/ सुनाना
कृष्ण जी को भी चन्द्र दर्शन से कलङ्क लगा, स्यमंतक मणि की चोरी का ! हुआ ये कि भादों, शुक्ल पक्ष की चौथ को, दूध दुहते समय उन्होनें चाँद देख लिया. जहाँ दुह रहे थे वहीं गोमूत्र इकठ्ठा हो गया था, उसी में चाँद का प्रतिबिम्ब दिख गया. उसके बाद उन पर मणि की चोरी का आरोप लगा. कैसे यह आरोप लगा और कैसे वे इससे मुक्त हुए – ये कथा कहने / सुनने से भी दोष निवारण होता है. आप भी सुनें वह कथा –

मथुरा में एक धनी व्यक्ति थे सत्राजित. उनके पास स्यमन्तक नाम की एक मणि थी जो उन्होने सूर्यदेव की उपासना करके प्राप्त की थी. वह मणि सूर्य के समान प्रकाशमान थी कि उस पर दृष्टि नही ठहरती थी. उसमें यह भी विशेषता थी कि प्रतिदिन उपासना के बाद वह मणि स्वर्ण देती थी. इस प्रकार नित्य स्वर्ण प्राप्त करते हुए सत्राजित बहुत धनी हो गये थे और उनका प्रभाव और तेज बहुत बढ़ गया था. एक दिन वे मणि धारण करके कृष्ण की सभा में आये तो मणि के तेज के कारण लोगों ने समझा कि सूर्यदेव उनसे मिलने आये हैं. कृष्ण जी ने उनका सत्कार करके मणि मथुरा के राजकोष में देने का निवेदन किया जिसे उन्होनें नही माना और वाद-विवाद के पश्चात सभा से रुष्ट होकर चले गये. दोनों में मनोमालिन्य हो गया.
कुछ दिन बाद सत्राजित का छोटा भाई, प्रसेनजित, वह मणि धारण करके वन को गया जहाँ एक सिंह ने उस पर आक्रमण करके उसको मार डाला और मणि ले गया. सिंह आगे गया तो उसके पास मणि को देख कर एक बलवान रीछ ने उस पर आक्रमण किया और मणि छीन ली व ले जाकर गुफा में अपनी पुत्री को दे दी.
अब प्रसेनजित के न लौटने पर लोग उसे ढूंढने गये तो जंगल में उसका रक्तरञ्जित शव मिला. अन्य आभूषण तो उसके शरीर पर थे किन्तु मणि न थी. यह देख कर सत्राजित व उनके पक्ष के लोगों ने कृष्ण पर आरोप लगाया कि उन्होने उसकी हत्या करके मणि ले ली है. कुछ दिन पहले ही कृष्ण ने मणि मांगी थी और वाद-विवाद भी हुआ था सो सहज ही यह मान लिया गया कि कृष्ण ने ही हत्या और मणि की चोरी की है. इस कलङ्क के निवारण के लिए कृष्ण गहन वन में गये और अपने पक्ष के लोगों से एक पखवारे प्रतीक्षा करने के बाद उन्हे मृत मान कर लौट जाने का निर्देश दिया. वन में उन्हे आगे सिंह मृत मिला और पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए वे रीछ की गुफा में गये जहाँ एक कन्या मणि से खेल रही थी. वे रीछ जामवन्त ( वही त्रेता में राम की सेना के ऋक्षराज योद्धा ) थे और कन्या उनकी पुत्री जामवन्ती. मणि छीनने में कृष्ण और जामवन्त का भयङ्कर युद्ध हुआ जो सत्ताईस दिन तक चला. परास्त होने पर जामवन्त नें कृष्ण जी को विष्णु के अवतार रूप में पहचाना और क्षमा मांगते हुए मणि और अपनी कन्या, जामवन्ती, उन्हे सौंप दी. कृष्ण ने उससे विवाह किया और मथुरा आकर मणि सत्राजित को सौंप दी व सारा वृत्तान्त सुनाया. वे बड़े लज्जित हुए और मणि के प्रति उनका लोभ जाता रहा. उन्होनें वह मणि भी कृष्ण को सौंप दी और अपनी पुत्री, सत्यभामा, का विवाह भी कृष्ण जी से कर दिया. कृष्ण जी ने सबको इस कलङ्क का कारण बताया और यह भी बताया कि यदि कोई भादों, शुक्ल पक्ष की चौथ का चाँद देख ले तो इस प्रसङ्ग का श्रवण करे तो उसका दोष निवारण हो जायेगा.
तो हे मित्रों ! हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता ! शास्त्र तो हैं ही, शास्त्र से बढ़कर और प्रचलित लोक है. लोक में अभिजात्यता का बन्धन नही, सहज उछाह है और प्रकृति का समावेश. भादों, शुक्ल पक्ष की चौथ का चाँद देखने से होने वाले दोष निवारण हेतु पथरा चौथ है और निवारण का उपाय अति सरल और विनोदपूर्ण. आप चन्द्र दर्शन से होने वाले दोष को न मानें तो कोई बात नही, मानने का आग्रह भी नही है, बस कथा का आनन्द लें – एक लोकसम्मत कथा है तो एक पुराणसम्मत ! गणपति का प्राकट्योत्सव है सो उसका उत्सव मनायें, उन्हे मोदक अर्पित करें, खायें और खिलायें. कथा में यदि कुछ प्रश्न उपस्थित हुए हों उनका स्वागत है, कुछ त्रुटि हुई हो तो बतायें और सुधार करें.

 

 

 

Thursday, 20 August 2020

रतना- रतनावलि


 

रतना- रतनावलि - विश्वनाथ सिंह ‘विकल गोंडवी’ “आधुनिक अवधी कविता” प्रतिनिधि चयनः 1850 से अब तक ( सम्पादकः अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी) में संकलित

रामकथा के नारी पात्रों पर पर कम लिखा गया है जबकि रामकथा में नारी पात्र कम नही हैं. मैथिली शरण गुप्त जी ने यह उपेक्षा अनुभव करके “साकेत” लिखा जो ‘उर्मिला’ पर है, उसमें वनवास के बाद उर्मिला के उद्गार व्यक्त किये गये हैं. मैथिली शरण गुप्त जी ने ‘यशोधरा’ काव्य भी लिखा. महानायकों के लीला गान में उनकी नायिकाएं उपेक्षित सी रहीं सो उन्होनें इन नायिकाओं की उदात्तता का गान किया चाहे वो ‘साकेत’ में लक्ष्मण की उर्मिला हों या ‘यशोधरा’ में बुद्ध की यशोधरा. पण्डित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘ हरिऔध’ ने “प्रियप्रवास” में वर्णन तो कृष्ण की मथुरा यात्रा का किया है किन्तु इसमें राधा को उनकी प्रेयसी और वियोगिनी नायिका से अलग ही रूप मे प्रस्तुत किया. लिखते समय इस काव्य का नाम उन्होने ‘ब्रजांगना-विलाप’ रखा था किन्तु विलाप के स्वर के स्थान पर लीला वर्णन होने से इसे “प्रियप्रवास” कर दिया.

बात रामकथा के नारी पात्रों की हो रही थी किन्तु महाआख्यानो के नारी पात्रों की बात चल निकली, पुनः वहीं लौट चलते हैं. रामकथा के नारी पात्रों पर ही जब काव्य में बहुत नही लिखा गया तो उस नारी पर क्या लिखा जाता जिसके उलाहने बल्कि तिरस्कार से तुलसीदास रामकथा के अप्रतिम गायक बने, रामचरित मानस जैसा ग्रंथ लिखा. तुलसी ने रत्नावली के तिरस्कार को प्रेरणा और ईश्वरीय आदेश के रूप मे ग्रहण किया,

“आधुनिक अवधी कविता” प्रतिनिधि चयनः 1850 से अब तक ( सम्पादकः अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स ) पढ़ते हुए विश्वनाथ सिंह ‘विकल गोंडवी’ के रत्नावली से सम्बन्धित कुछ पदों को पढ़ा. तुलसी और रत्नावली प्रसङ्ग पर इनका मन खूब रमा है और “रतना-तुलसी” शीर्षक अवधी काव्य प्रकाशित हुआ है. इस संकलन में “रतना-रतनावलि” शीर्षक से उनके कुछ पद हैं. तुलसी अवध के थे, रामचरित मानस अवधी में है और यह पद भी अवधी में हैं जो मातृभाषा और लोकभाषा होने से और भी मीठी लगती है. आनन्द लें रतना-रतनावलि के कुछ छन्दों का –

सगरो घर हेरि के हारि गये, रतना न मिली तौ उदास भये ।

अति आकुल, व्याकुल, हाल, बेहालह्वै, जाचक ह्वै पिय पास गये।

रतना हठ ठानिनि, एक न मानिनि, रूठि गई तौ निरास भये।

जेतनै रतनावलि दूर भई वतनै तुलसी प्रभु पास भये ॥

 

तुलसी ने सारे घर में रतना को ढूँढा किन्तु वह न मिली तो उदास हो गये. उदास होकर रतना से मिलने को बहुत अकुलाये,  व्याकुलता में हाल-बेहाल हो गया और याचक की तरह प्रिया के पास गये किन्तु रतना ने उनकी यह व्याकुलता देख कर धिक्कारा, हठ ठान लिया, उन्होने बहुत मनौना किया किन्तु उसने उनकी एक न सुनी. तुलसी निराश हो गये कि अब तो रतना दूर हो गयी किन्तु रतना की दूरी ने उन्हे राम के पास कर दिया. जितना रतना उनसे दूर हुई, उतना ही तुलसी प्रभु के पास हो गये. रतना दूर न होती तो तुलसी भोग-विलास, घर-गृहस्थी, मोह-माया में पड़े रहते और कभी इस कोटि के भक्त और कवि न हुए होते.

 

काटि-कूटि फँसरी सकल मोह ममता कै

तुलसी कै गटई छोड़ाय गई रतना ।

बिसय औ बासना कै बिस मन से निकारि

भगति कै भावना जगाय गई रतना।

जगत असार बीच एक राम नाम सार

गुप-चुप सब समझाय गई रतना ।

तुलसी कै जिनगी सँवारै खरतीं विकल

सब कुछ दाँव पर लगाय गई रतना ॥

 

रतना सम्भवतः तुलसी की भक्ति और काव्य क्षमता को जानती थी और यह भी अनुभव करती थी कि मेरे मोह में पड़ कर ये बस ऐसे ही रह जायेंगे सो उसने लोक हित में और उन्हे भक्ति की ओर उन्मुख करने के लिये जान-बूझ कर कटु वचन कहे और धिक्कारा.

                           तुलसी रतना के मोह में गले-गले तक डूबे हुए थे, उबरने में रतना जैसे गले का फंदा बन गयी थी सो सारी मोह माया की फाँसी अपने कटु वचनों से काट कर तुलसी का गला छुड़ा गयी. अपनी धिक्कार से विषय-वासना का विष उनके मन से निकाल कर भक्ति की भावना जगा दी. जो काम तमाम संतों का संग न कर सका वह रतना की बातों ने कर दिया, उन्हे परोक्ष रूप से, गुप-चुप ढंग से समझा समझा दिया कि संसार में कोई सार नही, राम में ही सार है. तुलसी की ज़िन्दगी सँवारने के लिये रतना ने अपनी ज़िन्दगी दाँव पर लगा दी. वह अलग होकर तुलसी को राम के साथ कर गयी.

 

रत राखतीं जौ निज मा रतना, सिरी राम मा होते कभौ रत ना।

पकरावतीं जौ रतना पथ ना, तुलसी कबहूँ पउते पथ ना।

कुछ होते न संत सिरोमनि होते, न होते महान कबी यतना।

मन चूर न होत, न मानस कै, तुलसी कबहूँ करते रचना॥

 

रतना ने तुलसी को राम की ओर मोड़ने के लिये अपनी रति का त्याग किया. जो वह अपने ही में रत रखती तो तुलसी काभी भी श्रीराम में रत न हो पाते. रतना जो उन्हे राम से प्रीति का पथ न दिखाती तो तुलसी कभी भी यह भक्ति पथ न पा सकते थे. वह इस तरह उलाहना न देती तो तुलसी कुछ न बन पाते,  न तो संत शिरोमणि हो पाते और न ही इतने महान कवि. उनका मानस ऐसे चूर न होता तो तुलसी कभी भी मानस की रचना न कर पाते.

 

रतनावलि से दुइ आखर मा तुलसी गुरुमंतर पाय गये।

घरनी घर बार सबै तजि कै, सिरी राम के द्वार पै धाय गये।

मथि कै मन मानस माखन दै, सबके हिय बीच समाय गये।

अपुना तरिगे सबके खरतीं सरगे तक सीढ़ी लगाय गये॥

 

पत्नी परम गुरू होती है, रतना भी तुलसी की परम गुरू साबित हुई. बहुत भक्ति करते रहे, बहुत सत्संग किया किन्तु तमाम प्रवचनों से उन्हे मंत्र न मिला, रतना के दो कड़वे बोलों ने ही उनको गुरूमंत्र दे दिया. तुलसी ने उस बात को ऐसा जी से लगाया कि घर बार सब छोड़ कर श्रीराम के द्वार पर दौड़ पड़े. तुलसी के मानस को उसने ऐसा मथा कि उससे रामचरित मानस रूपी माखन निकला और वो एक रतना के ह्र्दय से निकल करे सबके ह्र्दय में समा गये. स्वयं तो तरे ही, सबके लिये स्वर्ग की सीढ़ी लगा गये.