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Thursday, 6 June 2024

गरमी में खांसी – जुकाम और एक (अ)पौराणिक कथा !

खांसी - जुकाम सामान्यतः जाड़े की चीज़ है या बरसात में भीग जाने की या बहुत हुआ तो बदलते मौसम की, मगर ऐसी भद्दर गरमी में जुकाम हो जाए, वह भी बहने वाला तो लगता है जैसे कोई गुनाह हो गया है और वह सबके सामने उजागर भी हो गया है ! कल से लज़्ज़त ए गुनाह उठा रहा हूँ.

 


भद्दर गरमी में जुकाम हो, भच्छ-भच्छ छींके आएं, बार-बार नाक पोछें तो आपके तीन-चार हफ्ता पुराने पाप याद दिलाए जाने लगते हैं, लानत-मलानत का दौर चल पड़ता है कि जब मालूम है कि इतने नाज़ुक हैं तो क्यों फ्रिज का पानी पीते हैं, बल्कि सामान्य पानी ही क्यों पीते हैं, हमेशा या कम से कम घर पर गुनगुना पानी क्यों नहीं पीते ? उस दिन आपने आईसक्रीम खा ली, फलां शादी में दो बार कोल्ड ड्रिंक लिया, दही बड़ा खाया, बाहर से आते ही AC के सामने बैठ गये/ नहा लिए ... वगैरह, वगैरह.

 

छींक आने का समय !

आपने चाय बनायी, कप में छानी और हाथ में लेकर किचन से कमरे की ओर बढ़े कि मेज पर रख कर आराम से पियेंगे मगर दो-तीन मीटर दूरी तय करने  में जब बीच राह में हों कि आआं ... छी, भच्छ ! चाय भी गिरी और हाथ भी जला.

 

और भी बहुत सी स्थितियां होंगी गरमी में खांसी – जुकाम की और आपको इतनी बातें सुनाई जाती होंगी कि वाकई लगने लगे कि आपसे कोई गुनाह हो गया है या यह जाने – अनजाने पापों का दण्ड है. अब खांसी – जुकाम का क्या ! यह तो किसी को और कभी भी हो सकता है. ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों को भी ! एक पुरानी कथा याद आ रही है जो आपसे अब तक छिपायी गयी. वामपंथी साहित्य/इतिहास/पुराण कारों ने सामने आने ही नहीं दिया. वो तो भला हो पुरातन पर गर्व करने और करवाने वालों का जो ऐसा छुपाया गया इतिहास खोज – खोज कर सामने लाते हैं, व्हाट्स ऐप के माध्यम से ग्रुपों में फारवर्ड करते रहते थें, फेसबुक और एक्स पर ठेलते रहते हैं. तो एक ऐसी ही कथा हाथ लगी जो आपने सुनी / पढ़ी न होगी – सुनते / पढ़ते भी कैसे – विधर्मियों ने सच्चा इतिहास सामने आने ही न दिया.

                                                      कथा से पहले ही ‘नाकोहस’ ( नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेन्टीमेन्ट्स – ‘आहत भावना आयोग’ )* वालों से क्षमा मांग लेता हूँ. क्षमायाचना के उपरान्त श्रवण करें यह (अ)पौराणिक कथा -  

 

“रावण बहुत विकट और क्रूरकर्मा शिवभक्त था. पुराणों में वर्णित है कि उसने यज्ञकुण्ड में अपने सर काट कर आहुति दी थी. ज्यों ही वह सर काटता, क्षणांश में ही नये सर उग आते. गरदन पर कटे का कोई निशान भी न रहता जैसे कुछ हुआ ही न हो. शुरू में तो उसने भक्ति मे वशीभूत होकर ऐसा किया फिर सर उगते पाकर उसे मज़ा आने लगा, फिर तो उसने इसे खेल बना लिया और एक नहीं, इक्कीस बार आहुति दी. तब सर उगाते-उगाते तंग आकर ब्रह्म देव ने प्रकट होकर रोका, 'बस कर भाई, मैं प्रसन्न हूँ.' तब उसने कोई अन्य वर न मांगा और यज्ञ का समापन किया.


सरों की आहुति उसने एक बार और दी और भक्ति नहीं, एक अन्य कारण से ऐसा किया. यह प्रसङ्ग पुराणों में नहीं है.
                     हुआ यह कि एक बार रावण को गले में इन्फेक्शन हुआ और खांसी आने लगी, भयङ्कर जुकाम हो गया, मार भच्छ- भच्छ छींके आयें, नाक, बल्कि नाकें – दस नाक थीं न उसके – पर हेड एक नाक ! बहे.  आधे दिन उसने दवा की ओर ध्यान न दिया, नमक और फिटकरी का गरारा वगैरह किया किन्तु खांसी में सुधार न हुआ. तब वह होम्योपैथिक डॉक्टर से दवा लाया, एक दिन तो खांसी रुक गयी मगर दूसरे दिन और तेज़ हो गयी. इस बीच हितचिन्तक उसे घरेलू इलाज बताने लगे, 'महराज ! दो-दो दाना काली मिर्च मुह में डाल कर कुचलते हुए रस लेते रहें.' 'प्राणनाथ ! अदरख भून देती हूँ, उसे गले में रख कर रस लें.' एक बार सुषेण जी अदरख, कालीमिर्च, अजवाईन, गुड़, काला नमक, हरी इलाईची को एक घण्टा पका कर उसका अवलेह दे गये थे, उसे भी लिया. खांसी तो ठीक न हुई, इतनी गर्म चीज़े एक साथ लेते रहने से लूज मोशन और शुरू हो गये. अब यह सब वह दसों सरों से ले रहा था तो और दुष्प्रभाव हुआ. अब उसने खांसी छोड़ कर लूस मोशन की दवा ली क्योंकि खांसी, छींक व शंख वादन आदि लूज मोशन को और उत्तेजित करता है. यूँ तो सहस्त्रों  परिचारक थे मगर सेवा-सुश्रुषा मेघनाद और मंदोदरी ही कर रहे थे. कुम्भकर्ण का निद्रा काल था और विभीषण वैसे भी किसी काम का न था. ऊपर से रावण शैव और वह वैष्णव. वह वैसे भी लंका के बाहरी हिस्से में कुटिया बना कर रहता था और भजन किया करता था. वह आ गया होता तो रावण उसी दिन पाद प्रहार करके भगा देता.
              अब उसने सुषेण को बुलाया और ऐलोपैथिक दवा देने को कहा. वह खांसी- जुकाम से तंग आ चुका था और दो दिन बाद एक सैन्य अभियान पर निकलना था. इस दशा में वह सैन्य अभियान पर जाता तो करता तो शत्रुओं में भगदड़ मचा देने वाली गर्जना, किन्तु निकलती खांसी और छींक और उसी के मिले – जुले प्रभाव से धोतिका भी गीली / पीली हो जाती.
(श्रोतागण यह न सोचें कि उस युग में कहाँ थी होम्योपैथी व ऐलोपैथी ? तो हे श्रोताओं ! वैकल्पिक चिकित्सा उस काल में भी थी, बस उसके नाम भिन्न थे. आख़िर ग्रन्थों में सब बातें थोड़े न वर्णित होती हैं. चौदह वर्ष के वनवास काल में राम-सीता-लक्ष्मण आदि अस्वस्थ भी हुए होंगे, उसका कहाँ वर्णन है.)
   दूसरे, कथा सुनते समय उस पर शंका नहीं करते. ऐसे श्रोता पाप के भागी होते हैं, उन्हें कथा श्रवण का फल भी नहीं मिलता और प्रसाद भी ! सो वर्णन पर शंका न करें.)
सुषेण आये और उन्होंने औषधि दी, सेवन विधान बताया. रावण ने दवा लेनी शुरू की मगर कोई विशेष लाभ न हुआ, दूसरे दिन सैन्य अभियान हेतु निकलना था.
              अकस्मात उसे एक उपाय कौंधा. उसने यज्ञवेदी तैयार करने का निर्देश दिया और सर काट कर आहुति दी. तुरन्त नये सर उग आये. यह सर नये थे तो इनमें थ्रोट और नोजल इन्फेक्शन न था. सब चकाचक, खांसी का नामोनिशान नहीं, नाक बहना और छींकें आना भी बन्द ! वैसे तो एक बार की आहुति में काम हो गया किन्तु ऐहतियातन ग्यारह बार आहुति दी. खांसी तो सही हो ही गयी, सैन्य अभियान भी सदा की भांति सफल रहा.
                                               **********
इन तीन दिनों में खांसी और उसके उपचार के यही सब चरण मेरे साथ भी हुए और सारे उपचार किये सिवाय लंकापति द्वारा किये अन्तिम उपाय के. तलवार तो कहीं से अरेंज हो भी जाती किन्तु मुझे अमरता का वरदान तो है नहीं. एक ही सर है और मुझे अच्छी तरह मालूम है कि वह उगेगा नहीं. घरवालों पर मुकदमा चलता और बाद में क्राईम पट्रोल में स्टोरी आती सो अलग. सो अभी दवा चल रही है, बहुत हद तक राहत है, कल नहीं तो परसों पूरा ठीक हो जाऊँगा. तब तक कोई और कथा सोच रखूँ.”

·       ‘नाकोहस’ – देखें पुरुषोत्तम अग्रवाल का उपन्यास ‘नाकोहस’.  

Sunday, 26 May 2024

पुस्तक चर्चाः नया राजा नये क़िस्से.

 

पुस्तक चर्चाः नया राजा नये क़िस्से.


राजा होते हैं तो उनके क़िस्से भी होते हैं, उन पर बनते हैं या यूँ कहें कि तमाम राजा उन किस्सों से ही बने होते हैं. जैसे किस्से अवाम में फैले / राजा ने फैलवाए, वैसी ही उसकी छवि बनी और युग्-युगान्तर तक बनी रही. अब यह किताब ‘नया राजा नये क़िस्से’ है तो ज़ाहिर है कि इसमें आज के राजा के किस्से हैं. राजा का कहीं नाम नहीं लिया गया है और न ही यह कि वह किस देश का राजा है मगर हर किस्सा बता देता है कि किस राजा की बात हो रही है. वर्तमान परिवेश ऐसा है कि किताब का शीर्षक देख कर ही 99.99% सुधी जन समझ जायेंगे कि किसके क़िस्से होंगे और उनका अनुमान 100% सही होगा. वैसे उस राजा को इन क़िस्सों की एक बात से मैच नहीं कर सकते, वह यह कि कई क़िस्सों में राजा की रानी का भी उल्लेख है. केवल उल्लेख ही नहीं, राजा के महल में रानी रहती भी है, राजा उससे बातचीत भी करता है. इस एक बात से यह कह सकते हैं कि इस किताब का राजा काल्पनिक है, वास्तव में किसी से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है, यदि कहीं ऐसा पाया जाता है तो यह संयोग मात्र है. क़िस्सों में रानी को डाल कर लेखक ने अपना बचाव किया है अन्यथा उसे सजा भी हो सकती थी. नहीं हुई तो एक कारण तो यही है. राजा व उसके दरबारी कह सकते हैं कि महराज, यह आपके किस्से नहीं. आप कहाँ रानी – वानी के लफड़े में पड़े हैं, कहाँ उनसे बातचीत करते हैं, आपने तो राजधर्म के लिए पहले ही उन्हें छोड़ रखा है. एक यह बात और दूसरी यह कि नया राजा कहाँ पढ़ता ही है, साहित्य – वाहित्य तो कतई नहीं. वैसे ही उसके दरबारी ! उन्हें भी पढ़ने से क्या वास्ता. तो इन्हीं दो कारणों से लेखक बचा हुआ है ( इस तथ्य से भी अनुमान लग गया होगा कि किसके क़िस्से हैं ) लेखक, और उनमें भी व्यंग्यकार, बहुत चकड़ होते हैं. लेखक, अनूप मणि त्रिपाठी व्यंग्यकार के इस गुण से युक्त हैं. यह राजनीतिक परिदृश्य पर व्यंग्यलेख (क़िस्से ) हैं. किसी न किसी घटना या राजा की चिंता को लेकर छोटे-छोटे क़िस्से और हर क़िस्सा ऐसा ही बरबस ही मुह से निकले कि वाकई, राजा ऐसा ही है. इस किताब में राजा के 43 किस्से हैं. इस किताब के समर्पण में “लोकतंत्र में आस्था रखने वालों को समर्पित” कहा गया है, इससे भी किताब पढ़ने के पूर्व ही यह संकेत मिल जाता है कि किसके क़िस्से हैं.

कुछ बानगी देखें –

राजा बहुत परेशान था. लोग महँगाई, बेरोज़गारी आदि का सवाल उठा रहे थे. मंत्रियों से विमर्श किया. राजा ने कहा कि कोई हौआ खड़ा कर दो पर मंत्री को यह न कारगर न लगा. तब राजा ने कहा, ‘जो सवाल खड़ा करे, उसका चरित्र हनन करा दो. जो समझाने से भी न समझे उसे संदिग्ध घोषित कर दो. ‘

मंत्री चुपचाप सुनता रहा.

राजा ने आगे कहा, ‘ राष्ट्र के समक्ष कोई नया संकट खड़ा कर दो, नहीं तो उनके समक्ष कोई संदेह ! नहीं तो प्रजा को गर्व का कोई नया विषय दे दो.! नहीं तो किसी जाति, बिरादरी, वर्ग, समूह के विषय में कोई नई अफ़वाह उड़ा दो.

मंत्री कुछ न बोला. वह चुपचाप सुनता रहा.

मंत्री की भाव भंगिमा देख कर राजा थोड़ा उत्तेजित हो कर बोला, ‘देखो, अगर कोई तुमसे कहे कि फलां चीज़ के दाम बहुत बढ़ गए हैं तो तुम सीधे उससे उसका पंथ पूछ लो ! बोलो, ओहो फलाना पंथी हो ! तभी ! कोई कहे कि बेरोज़गारी बढ़ गई है तो कहो बेरोज़गारी नही बढ़ी है, जनसंख्या अधिक हो गई है. समझ रहे हो न ! राजा थोड़ा अधीर हुआ.

अब मंत्री राजा से कैसे कहे कि यह सारे हथकंडे वह तब से इस्तेमाल कर रहा है, जब से उसकी नियुक्ति हुई है.

                          मंत्री को कोई तरीका न रुचा. उसने कुछ तूफानी करने का सोचा और राज्य से विलुप्त हो चुके शेरों को विदेश से मंगवाने के इवेंट की राय दी. विस्तृत चर्चा और निर्देशादि के बाद यही तय पाया गया.

घोर वाद – विवाद के बाद वह दिन भी आया जब विदेशी शेरों का राज्य की पावन धरती पर विशेष रथों द्वारा ऐतिहासिक आगमन हुआ. दिन भर राजा और शेरों की गौरवशाली बातें हुई. अति विस्तृत राज्य का राजा इस कार्य हेतु पूरे दिन अति व्यस्त रहा और प्रजा भी. शेरों को शिकार करते हुए टी.वी. पर प्रजा को सजीव दिखाया गया. रात को राज्य के सूचनातंत्र द्वारा राजा का मंगलगान हुआ. जिसे ज्ञानियों ने बहस कहा.

उस रात के बाद राजा ने काफ़ी दिनों तक चैन की बंसी बजायी.

कथा सुनाने के बाद बेताल ने विक्रम से पूछा, ‘यों तो कई प्रश्न हैं, परंतु तू बस एक प्रश्न का जवाब दे तो तुझे जानूं ! तो बता विक्रम शेर ने क्या खाया था ??’

विक्रम ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, ‘मुद्दा.’

यह सुनते ही बेताल उड़ गया.

                   ( क़िस्सा ‘राजा और शेर’ से.)

                        **************

राजा ने अचानक विद्वानों की आपात मीटिंग आहूत की. अफरातफरी में सभी भागे – भागे, आशंकित होते आए. कुछ समय बाद राजा ने मीटिंग का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा, ‘जैसा कि विदित है मुझे आखेट बहुत पसंद है परंतु अब मैं चाहता हूँ कि आप सब आखेट की जगह कोई नया शब्द खोजें या बनाएं ! मुझे यह शब्द भाता नहीं ! नकारात्मकता झलकती है … प्रजा मुझे क्रूर समझती है.

  फिर आगे बोला, ‘यह शब्द मुझे पुरातन, घिसा-पिटा लगता हैँ मुझे कोई आधुनिक, नया शब्द दें. और हाँ, जब तक मेरी समस्या का समाधान नहीं हो जाता, तब तक आप में से कोई भी राजधानी से जाएगा नहीं !

           तमाम चिन्तन – मन्थन हुआ, अन्ततः नया शब्द खोज ही लिया गया.

विद्वानों की टोली ख़ुशी – ख़ुशी वह शब्द लेकर राजा के सामने उपस्थित हुई.

‘तो आपने क्या नया शब्द खोजा !’ राजा ने पूछा.

‘चुनाव महराज ! चुनाव !’ विद्वानों की टोली ने समवेत स्वर में कहा.

यह शब्द सुनते ही राजा ख़ुशी से उछल पड़ा. वह उत्साहित होकर बोला, ‘वाह ! हमें भाया यह शब्द ! खूब भाया ! तो तय रहा आज से हम आखेट पर नहीं चुनाव पर जाया करेंगे !

                     ( क़िस्सा ‘ राजा और आधुनिकता’ से )

                     *************

तो ऐसे कई क़िस्से हैं इस किताब में. आज के हालात और राजा की सच्ची तस्वीर, व्यंग्य की चासनी में लिपटी हुई, देखने के लिए किताब पढ़ें.

किताब – ‘नया राजा नये क़िस्से’

विधा – व्यंग्य

लेखक – अनूप मणि त्रिपाठी

प्रकाशक – वाम ( बुक स्टोर्स पर उपलब्ध )

पेपरबैक, 147 पृष्ठ, दाम 225/-

                   

 

Monday, 20 May 2024

धिक्कार है !

घर पर जो बड़ा आपसे मात्र दस मिनट पहले भी बिस्तर छोड़ कर चैतन्य हो जाता है, वह आपको देर तक पड़े रहने के लिए धिक्कारने लगता है. कतई ज़रूरी नहीं कि यह काम आपसे बड़ा ही करे, विवाहित होने की दशा में यह काम पत्नी ( केवल पत्नी ही, पति की कहाँ ऐसी मजाल ! ) करती है, बाक़ी में पापा या मम्मी. भले ही बेटा/बेटी सात- साढ़े सात बजे उठ कर नित्यकर्म और नाश्ता आदि कर के, करीने से तैयार होकर समय से दस मिनट पहले ही ऑफिस/ कोचिंग/ कॉलेज … में हाज़िर हो जाए किंतु उसके इन सब पर वो पापा/ मम्मी का दस मिनट पहले उठ जाना भारी पड़ता है. बड़ा भाई या बहन या चाचा आदि यह नहीं करता, पापा की परी की लताड़ना बहुधा मम्मी करती है और मम्मी के मगरमच्छ की पापा ! उस पर कहीं ये लताड़क उठ कर टहलने जाते हों या योग आदि करते हों और नहा धो कर पूजा वगैरह करते हों तो करेला, उसपे नीम चढ़ा हो जाता है. ऐसों को तो बाक़ी सबका जीवन निःसार लगता है. भले उनके उठने के दस से आधा घण्टा बाद ही उठें, उन्हें लगता है, ‘तूने दिवस गंवाया सोय के … ‘ उन्हें ब्राह्ममूहूर्त या पाँच बजे का समय ऐसा अनमोल लगता है कि क्या कहें. अलबत्ता ये उन्हें भी वर्षों बाद तक पता नहीं चलता कि ऐसी परसन्तापी दिनचर्या और उसके दंभ से उन्होंने पाया क्या ! बीमार वे भी रहते हैं, उठ कर वे कोई ऐसा काम भी नहीं कर डालते जो गृह प्रबन्धन में सार्थक योगदान करता हो. बस अपनी संतुष्टि के लिए करते हैं और चाहते हैं कि सब ऐसा ही करने लगें. ऐसे लोग बातों के तीर छोड़ने के अलावा सुबह, माने अपने समय / लक्षित पात्र के उठने से दस से लेकर आधा घण्टा पहले , उठाने के लिए पंखा/AC बंद कर देते हैं, लाईट जला देते हैं, जाड़ा हुआ तो रजाई खींच देंगे, घोषणा करेंगे, ‘सात बज गये ( भले ही तब 6:40 हुआ हो ) अभी तक पड़े सो रहे हो, कितना सोते हो ! ऐसे में कोई सो सकता है भला, पड़ा भी नहीं रह सकता.

                        ऐसा नहीं है कि खाली घरवाले ही ऐसा करते हों, उनकी कोटि का अड़ोसी – पड़ोसी, परिचित भी ऐसा कर सक़ता है. एक बार सुबह सात बजे ( गरमी ही थी ) एक परिचित आये. तब हम लोग चाय पी रहे थे. आकर बैठते ही उन्होंने कहा ( वस्तुतः धिक्कारा ), हम तो सुबह साढ़े चार बजे उठ जाते हैं. नित्यकर्म ( कहा तो उन्होंने कुछ और था ) करके, एक कप चाय पीकर, टहलने जाते हैं. लौट रहे थे तो सोचा आप लोगों से मिलते चलें.’ भाव वही बोध था कि हम साढ़े चार बजे उठ जाते हैं ( बड़ा तीर मार लेते हैं. अरे, उठते हैं तो क्या हमारे लिए ? अपनी ही लिए तो ! ) सलोन में तैनाती के दिनों में हम और कैश ऑफिसर एक ही कमरे में रहते थे. वे सुबह पाँच बजे उठ कर टहलने जाते, हम पड़े रहते. कुछ दिन हम गये किन्तु बाद में छोड़ दिया. उनका आलम यह था कि छह बजे तक लौट आते, नहाते धोते और फिर सो जाते. नौ सवा नौ तक उठते और नाश्ता वगैरह करके हम दोनों बैंक चल देते. कमरे से बैंक पाँच मिनट की दूरी पर था. लौट कर सुबह जब वे सोते रहते, मैं किताब पढ़ता. किताब वगैरह का कुटेव उनमें न था.  ऐसे ही जो नियमित रूप से मंदिर आदि जाता है वह भी ताना देता है, ‘क्या घर में बैठे रहते हैं, मंदिर चला कीजिए. हम तो रोज जाते हैं, आरती वगैरह के बाद ही लौटते हैं. समय अच्छा कट जाता है. किताब वगैरह पढ़ने को ऐसे लोग समय की बरबादी मानते हैं. ‘भई,  हमसे तो नहीं होता ये सब ! पता नहीं आप कैसे इतनी मोटी मोटी किताबें पढ़ लेते हैं, हमसे तो मैगजीन भी नहीं पढ़ी जाती ! अख़बार में भी बस हेडिंग देखते हैं. क्या मिलता है यह सब पढ़ के ! जितना पढ़ना था, कॉलेज तक में पढ़ लिया, अब क्या करना पढ़ के.’ यह बात और है कि वे किताब नहीं पढ़ते किंतु आज के व्हाट्स ऐप युग में फारवर्डेड मैसेज खूब पढ़ते और फारवर्ड करते हैं. उनकी पढ़ाई अब इतने भर की है.

                                 सारे ही ज़ल्दी उठ कर टहलने जाने वाले, योग करने वाले, सुबह-शाम या केवल शाम को मंदिर जाने वाले ऐसा नहीं करते, जो शुरू से ही यह सब कर रहे हैं वे इन सबको किसी अलौकिक बात की तरह नहीं लेते. यह उनकी सामान्य दिनचर्या होती है और वे किसी को बदलने के लिए उद्धत नहीं हो जाते. यह तो नव सनातनियों की तरह रिटायरमेण्ट के बाद या किसी के असर में आकर शुरू करने वालों की प्रवृत्ति होती है. अचानक उन्हें यह इलहाम होता है कि वे सामान्य लोगों से अलग कोई दिव्य काम कर रहे हैं और बाक़ी सबको भी इस ओर लगाना उनका पुनीत कर्तव्य है. ऐसे नये-नये बने लोग ही उधिया जाते हैं.

                                  ऐसे धिक्कारने (उनके हिसाब से प्रेरित करने, दिनचर्या सुधारने ) का असर बहुधा कुछ नहीं होता. दस मिनट देर तक सोने वाला अपने हिसाब से ही उठता है, कुछ दिन बाद प्रेरक लोग कहना छोड़ देते हैं. पत्नी के केस में कुछ पति सुबह उठने,  टहलने जाने व योग आदि करने लगते हैं. कुछ दिन खलता है, बाद में आदत पड़ जाती है. जो शुरू से ऐसा ( आदर्श दिनचर्या वाला ) होता है, वह धिक्कारने जैसा या दूसरों को बदलने के असफल प्रयास जैसा काम नहीं करता. यह सब जो रिटायरमेण्ट के बाद नये – नये टहलू, योगी, मंदिर जाने वाले होते हैं, वे ही ऐसा करते हैं. बेटे / बेटी को धिक्कारने वाला काम पहले की वय में ही होता है क्योंकि रिटायरमेण्ट की अवस्था तक लक्ष्य सन्तान शादी या नौकरी के हिल्ले लग चुकी होती है, तब बेटे की पत्नी अपने पति और बेटी दामाद के साथ ये करती है. वे अपना पिछला बदला ले रहे होते हैं, ‘धोबी से जीत न पाये तो गदहे के कान उमेठते हैं’.

                          अब एक नया वर्ग और धिक्कारने वाला पैदा हो गया है, वह है शाकाहारी/ शुद्ध शाकाहारी / वीगन वर्ग. यह भी नया-नया उदित हुआ वर्ग है या फिर वह जिसे प्रचारादि से अकस्मात यह बोध, उच्चता बोध, होता है कि वह कितना महान आचरण कर रहा है, जीव दया और प्रकृति के लिए कितना समर्पित है. उसमे यह बोध दो तरह से काम करवाता है – एक, वह इस गर्व, बल्कि दम्भ से भर उठता है कि वह कितना मानवीय है. वह मौक़े – बेमौक़े अपनी शाकाहारिता /वीगनता का उल्लेख करता है. वह कोई मौक़ा नहीं चूकता जब वह लोगों को अपने इस आचरण/ संकल्प और उस पर दृढ़ रहने के बारे में न बताए. तब शाकाहारिता /वीगनता उसकी जीवनशैली न होकर एक ढोल हो जाती है जो वह अनजाने ही अपने गले में डाले रहता है, बजाता रहता है, बिना इसे सोचे कि भई, कर रहे हो तो अपने लिए, हमें क्यों हर समय सुनाते रहते हो. दूसरी तरह वह यह करता है कि अपने से भिन्न आहारियों को, विशेषतः मांसाहारियों को, धिक्कारने लगता है. न केवल धिक्कारता बल्कि उन्हें राक्षस, नरपिशाच, उनकी थाली में लाश होने, पेट को कब्रिस्तान बताने, उसकी थाली खून से सनी होने जैसे वीभत्स और जुगुप्सात्मक बातें कहता है. जीव दया से ओतप्रोत यह वर्ग अन्य अपनी प्रजाति के अन्य जीवों के प्रति घोर शाब्दिक हिंसा और घृणा से भरा होता है. वह बड़ी विचित्र, अमानवीय और अव्यावहारिक कल्पनाएं करता है – वह शब्दों और कार्टून आदि के जरिये सोचता है कि कोई अन्य आहारियों की पत्नी को कैद करके रखे है, उससे अनवरत बलात्कार कर रहा है और उससे उत्पन्न संतति को पैदा होते ही कटने / भोजन बनने को भेज रहा है. वह यह भी कल्पना करने लगता है कि अन्य आहारियों के बच्चों को काट कर भोजन के लिए बेचा जा रहा है. वह कार्टून/ लेख के जरिए यह सब दिखाता भी है कि पशु – पक्षी ( पक्षियों में मुर्गा ) उसे काट कर बेच रहे हैं या अपनी प्लेट में रख कर खाने जा रहे हैं. सोशल मीडिया के आने से और इधर कुछ सालों में ऐसी उग्रता बहुत बढ़ी है. वह समझ ही नहीं पाता कि सात्विकता के दम्भ में कब वह उन्हीं जैसा क्रूर और अमानुषिक हो गया जिनकी निन्दा वह करता है, जिनसे घृणा करता है.

     यह कोई मनगढंत बात नहीं, मैंने ऐसे बहुत से लेख पढ़े हैं, बहुत से कार्टून / मीम देखे हैं. विडम्बना यह भी कि सात्विक जीवन का दावा करने वाले इन कुकृत्यों पर कोई विरोध प्रकट नहीं करते. अपनी जीवन शैली/आहार को श्रेष्ठ मानें, उसका खूब प्रचार करें पर अन्य आहार व शैली बालों को ऐसे धिक्कारने और उनके व उनके परिवार के प्रति ऐसी कल्पना तो न करें. वो तो कहो कि उनके वश में नहीं अन्यथा ऐसे उग्र सात्विक लोग अन्य लोगों के साथ वास्तव में ऐसा व्यवहार करने लगें, मन में तो उनके यह सब और ऐसा करना भरा ही होता है जो ऐसे लेख / मीम के माध्यम से निकलता है.

              शाकाहार या वीगन शैली अपनाना अच्छा, अधिक मानवीय और जीव दया से पूर्ण है, स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है किंतु यह एक आहार  / जीवन शैली है, उसी तरह जैसे कि अन्य लोगों की और अन्य भूभागों में रहने वालों की. इस अलग जीवन शैली अपनाने के कारण हमें अपने से भिन्न जीवन शैली के लोगों को धिक्कारने, उन्हें अमानुष मानने और नीचा दिखाने का अधिकार नहीं मिल जाता.

यहाँ, इस ( शाकाहारिता / वीगनता वाले ), अंश के लिए मैं पुनः निवेदन कर रहा हूँ कि यह किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं है. अपवाद हर जगह हैं. कोई इसे अपने पर कटाक्ष / आक्षेप न मानें, यह प्रवृत्ति पर आपत्ति है, कटाक्ष है. ऐसा भी अतिवादी लोग करते हैं और कर रहे हैं, यह उन सहित सबने देखा होगा. यही बात सुबह धिक्कारने/ मन्दिर आदि जाने वालों के लिए है. बहुत से सुबह उठ कर या शाम को बिना दूसरों को डिस्टर्ब किए, बिना उन्हें धिक्कारे, शांतिपूर्वक अपनी जीवनशैली वर्षों से या अभी ज़ल्दी शुरू किया है तो अभी से, निभा रहे हैं. वे अपने को श्रेष्ठ व अन्य को हीन नहीं मानते. यह भी उन लोगों पर नहीं बल्कि प्रवृत्ति पर आक्षेप है, व्यक्तिगत रूप से किसी ऐसे पर नहीं.

                          यह बहुत हो गया, कुछ कटु बातें हो गयीं जो चुभ सकती हैं, उनकी भावना आहत हो सकती है तो अब दूसरे तरह के धिक्कार, ताने, उलाहने की बात करता हूँ जो कटु नहीं, मीठी हैं. चुभती नहीं बल्कि सुखद और पुलकित करने वाली गुदगुदी करती हैं. देखने में निन्दा हैं किंतु व्याज स्तुति की तरह व्याज निंदा, बल्कि स्तुति ही हैं. यह धिक्कार, उलाहना, ताना, खिल्ली … है बलमा, सजना, पति आदि की,  और ऐसा करने वाली होती हैं उनकी सजनी, प्रेयसी और पत्नी. बहुतेरे फ़िल्मी गाने या लोक गीत देख लें, उनमें बालमा बेदर्दी होता है, गँवार होता है, निपट अनाड़ी होता है, कुछ जानता ही नहीं. मोरा नादान बालमा न जाने जी की बात, बालमा तू बड़ा वो है, बालमा बेदर्दी भी है और उसी को नायिका का मन याद भी करता है. वह बेईमान, निपट अनाड़ी, बेदर्दी, जलैया … होता है. कौन सा अवगुण है जो उसमें नहीं होता और वे सब नाच – गा गाकर सबको सुनाए जाते हैं.  

                                 तो यह हुई धिक्कारने वालों की बात. आप चाहें तो इस चिंतन के लिए मुझे भूरि–भूरि धिक्कारें, यह आपका अधिकार है.  

      


Saturday, 20 April 2024

शहतूत

हमारी तरफ




 डिवाईडर पर कई पेड़ हैं शहतूत के. ऐसे तो शहतूत के पेड़ नहीं पहचानता मगर डिवाईडर पर बहुत से शहतूत गिरे होते हैं. शहतूत को पहचानता हूँ तो यह पक्का है कि पेड़ शहतूत का ही है. शहतूत गिरे हुए देखने पर अब यह भी पता है कि फला-फलां पेड़ शहतूत का है. डिवाईडर पर और उसके एक तरफ सब्जी बिकती है. कोई ध्यान ही नहीं देता, कोई बटोरता नहीं. गिर कर जो डिवाईडर पर गिरे वे बुहार कर फेंक दिए गये और जो सड़क पर गिरे वे पिच्चा हो गये. गिर कर सूख जाना और बुहार कर फेंक दिये जाना या सड़क पर गिर कर पिच्चा हो जाना, लाल फिर काले धब्बे छोड़ जाना ही इन बेचारों की नियति है. शहतूत को इस तरह पिच्चा होते देख बरबस ही शबीर हका की कविता याद आती है, पढ़ी होगी आपने भी –

 

क्या आपने कभी शहतूत देखा है, 
जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर 
उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है. 
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं. 
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है 
इमारतों से गिरते हुए, 
गिरकर शहतूत बन जाते हुए

 

ऐसे गिर कर पड़े रहते हैं कि गिरे-पड़े वाला मुहावरा लागू होता है इन पर. जाने क्यों कोई इन्हें बटोरता नहीं, न सही बेचने के लिए तो खाने के लिए ही बटोर ले. मेरा मन होता है कि डिवाईडर वाले बटोर लूँ मगर 'सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग' हावी हो जाता है. देखता हूँ और मन मसोस कर रह जाता हूँ. वो स्वाद याद आता है मीठे शहतूत का. इतने मीठे कि उंगलियां और होंठ चिपचिपाने लगें. शहतूत में औषधीय गुण भी होंगे, आजकल तो हर वनस्पति के औषधीय गुण रेखांकित करने का चलन है किंतु मुझे तो मिठास के कारण ही भाता है.

 

मन मसोस कर इसलिए रह जाता हूँ कि अब शहतूत बिकने आता नहीं. पहले तो खूब आता था, पुरानो मोहल्लों में शायद अब भी आता हो पर कॉलोनियों में तो आता नहीं. सजी-धजी, अभिजात्य दुकानों में भी शहतूत नहीं दिखता. यह बारहमासी फल तो है नहीं, मौसमी और अब की मानसिकता में गँवई फल है. सेव, अनार, संतरा, आम, किवी, केला ड्रैगन फ्रूट (इसे कमलम भी नाम दिया गया पर प्रचलित न हो सका )आदि की तरह इसे फल का दर्ज़ा प्राप्त नहीं हो सका. शहतूत ही क्यों, इसी तरह सिंगड़ी ( जंगल जलेबी ), खिन्नी, फालसा, और बहुत कुछ कैथा और कमरख भी इसी तरह के फल हैं जो ‘मान्य फलों’ की श्रेणी से बाहर हो जाने के कारण नहीं दिखते. कैथा-कमरख तो स्कूलों के बाहर या चूरन वालों के पास मिल भी जाते हैं पर शहतूत नहीं दिखता.  

 

पहले जब आता था तो ठेलों पर या झौवों में बिकने आता था. फेरीवाले इसे आवाज़ लगा कर बेचते थे. हरे शहतूत के अलावा काला शहतूत भी आता था. काला शहतूत हरे की अपेक्षा छोटा और खूब गठा हुआ, स्वाद में कुछ खट्टा सा होता है. तब दोने में मिलता था, फिर कागज पर रख कर दिया जाने लगा. मेरे एक मित्र के घर के बाहर भी शहतूत का पेड़ है, उसमें भी खूब शहतूत आते हैं और गिर कर पिच्चा होने की गति को प्राप्त होते हैं. उनके घर में ही ATM भी है तो जब कभीं शहतूत के सीजन में जाना होता है तो देखता हूँ. वे भी शायद शहतूत तोड़ते न होंगे. आपने कब से नहीं खाये शहतूत !

 

शहतूत पर एक किस्सा सुना लूँ तो चलूँ. एक बार एक बादशाह, मान लीजिए कि अकबर, का सैर करते या शिकार के दौरान एक गाँव से गुज़रना हुआ. थके थे सो एक पेड़ के नीचे बैठे, वह पेड़ शहतूत का था. वह गाँव  बुद्धिमानों / हाज़िरजवाब लोगों के गाँव के नाम से बजता था. कुछ बच्चों ने शहतूत खाने का न्योता दिया, कुबूल करने पर पूछा, “ठण्डे खायेंगे कि गरम ?” अब वे चक्कर में पड़े कि शहतूत ठण्डे और गरम कैसे ! पूछने पर लड़कों ने कहा, “खाकर देखिये” पेड़ के नीचे एक चादर बिछा दी और ऊपर चढ़ कर शहतूत तोड़ कर गिराने लगे, बादशाह उठा कर खाने लगे. थोड़ी देर बाद बच्चों ने कहा कि यह थे ठण्डे शहतूत, अब गरम खाईये. उन्होंने चादर हटा दी तो शहतूत ज़मीन पर गिरने लगे. अब बादशाह का जी न भरा था, उन्हें और खाना था मगर ज़मीन पर गिरने से उनमें मिट्टी लग गयी थी सो हाथ से झाड़ कर, फूंक-फूंक कर खाने लगे. शहतूत वैसे ही थे जैसे ‘ठण्डे’ वाले खाये थे. पूछा कि यह तो वैसे ही हैं, तुम तो कह रहे थे कि गरम हैं ? बच्चों ने कहा कि गरम हैं तभी तो आप फूंक – फूंक कर, ठण्डे कर के खा रहे हैं. बच्चों की हाज़िरजवाबी पर बादशाह दंग रह गये, ख़ुश भी हुए और जी भर ठण्डे शहतूत खाये.

                            

                       वे तब के राजा थे, प्रजा से घुलने – मिलने में यकीन रखने वाले. आज के राजा होते तो ऐसे सहज भाव से, पेड़ के नीचे बैठ कर व अपने आप ज़मीन या चादर से उठा कर खाते, बच्चे भी उनके पास न फटक पाते ऐसी चुहुल की बात तो दूर. हाँ चुनाव के दिन चल रहे होते तो बादशाह सलामत ऐसे शहतूत खाते और फोटो / वीडियो भी शूट कराते, तमाम चैनल वाले होते जो राजा की सरलता का अगले स्टण्ट तक खूब प्रसारण करते. खैर, छोड़िए तब और अब के राजाओं को, मिल जाएँ तो शहतूत खाईये.  

 

Wednesday, 10 April 2024

पुस्तक चर्चाः गूँगी रुलाई का कोरस


पुस्तक चर्चाः गूँगी रुलाई का कोरस


किताब के बारे में कुछ बताऊँ इससे बेहतर किताब के एक अध्याय को संक्षेप में प्रस्तुत कर देता हूँ , यह अंश किताब की विषय-वस्तु को बेहतर ढंग से बताएगा.
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हुदूदे-जात से बाहर निकल के देख ज़रा,
न कोई  ग़ैर, न  कोई  रक़ीब लगता है॥
- सौदा


ड्राईंग रूम में कमोल और कालिन्दी बहुत देर से अकेले बैठे थे कि सामने के दरवाज़े से गुप्ता साहब और अन्दर की ओर से अब्बू एक साथ तशरीफ़ लाये. न जाने अब्बू को कैसे इल्म हुआ कि कमोल और कालिन्दी वहाँ बहुत देर से अकेले हैं और यह तनहाई गुप्ता को खटक सकती है.

अध्याय पोस्ट के हिसाब से लम्बा है सो संक्षेप करने की नियत से बता दूँ कि कमोल बाउल परम्परा का निष्णात गायक है और अब्बू  जोगी परम्परा के विख्यात गायक, उस्ताद ख़ुर्शीद शाह जोगी, हैं. कमोल उनका जामाता है और पूरा घराना ही विख्यात संगीतज्ञों का है. कमोल के पिता, मदन बाउल, भी बाउल परम्परा के गायक हैं. अब्बू के घर का नाम ‘मौसिक़ी-मंज़िल’, जो अब ‘उस्ताद महताबुद्दीन ख़ान संगीत आश्रम’ है जहाँ तमाम यतीम बच्चों को आश्रम परम्परा के अनुसार संगीत शिक्षा और कम्प्यूटर सहित अकादमिक शिक्षा भी दी जाती है. कमोल और कालिन्दी में प्रेम और विवाह होते-होते रह गया जिसकी कसक कालिन्दी में है. कालिन्दी का विवाह गुप्ता जी से हुआ जो एक घाघ व्यापारी हैं, ‘सुआर्यन कम्प्यूटर ट्रेनिंग अकादमी’ के मालिक हैं जिसकी शाखाएं देश भर में हैं. गुप्ता जी ‘राष्ट्रवादी’ धर्म और हिन्दुत्व के रक्षक भी हैं. वे अन्य दूरगामी व्यावसायिक उद्देश्यों से पधारे, पूर्वपीठिका के रूप में आश्रम के बच्चों में से कुछ को अपनी अकादमी में फ्री ट्रेनिंग का प्रस्ताव लेकर पधारे.

“ … बात कालिन्दी नें आगे बढ़ाई कि बिजनेस अपनी जगह ठीक ही है, किन्तु हम भी आप लोगों की तरह कुछ पुण्य कमाना चाहते हैं. आश्रम के इन यतीम बच्चों में से सीनियर्स को फ्री कम्प्यूटर ट्रेनिंग देना चाहते हैं ताकि कल इन्हें अपने पैरों पर खड़े होने में थोड़ी मदद मिल सके … लेकिन …।


कालिन्दी का यह ‘लेकिन’ थोड़ा ज़्यादा ही लम्बा खिंच गया तो गुप्ता नें बात की डोर थाम ली, कि एक ट्रस्ट जो हमारी एकेडमी को संचालित करता है वह थोड़ा धार्मिक किसम का है. क्षमा चाहूँगा कि हम आप लोगों की तरह विशाल ह्रदय-उदार लोग नहीं हैं. हमारे ट्रस्ट के नियम-कायदे थोड़े बँधे-बँधे से हैं. अब कैसे कहूँ … हमारी शर्त आप लोगों को थोड़ी छोटी-हल्की लग सकती है … लेकिन हम अपने ही धर्म के बच्चों को एडमिशन देते हैं और फ्री ट्रेनिंग भी उन्हें ही देनें की शर्त से हम बँधे हैं.

ड्राइंग रूम में एकदम सन्नाटा छा गया … अब्बू की तो जैसे साँसें रुक गई हों. कितना बेशर्म था यह शख़्स … इसके चेहरे पर तो पश्चाताप का कोई निशान भी नहीं था …
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“ … मैनें तो कालिन्दी को पहले ही कहा था कि ट्रस्ट की शर्तें आप लोगों को पसन्द नहीं आएंगी लेकिन इसे ही पुण्य कमाने की बड़ी हड़बड़ी थी. क्षमा कीजिएगा ! हमारा उद्देश्य आप लोगों के ह्रदय को पीड़ा पहुँचाने का कदापि नहीं था. उस बात को भूल जाइए … कुछ दूसरी बात करते हैं … ख़ुर्शीद साहब … आप मुसलमान होकर गेरुआ वस्त्र क्यों पहनते हैं ?


… ख़ुर्शीद साहब … ? कमोल क्या … लगा पूरा आश्रम ही चौंक पड़ा हो. अब्बू को आज तक किसी ने इस तरह नाम से पुकारा हो, कमोल को याद नही आ रहा था. मौसीक़ी की दुनिया में वे उस्ताद जोगी साहब के नाम से जाने जाते थे…


लेकिन गुप्ता का सवाल दरअसल बदले हुए माहौल का सवाल था जो हज़ार हज़ार बार अलग-अलग जगह जोगियों को घेरकर पूछा जा रहा था. अब्बू को सब ख़बर थी फिर भी वैसे ही मुस्कुराते हुए मुख़ातिब हुए, “ लगता है, अपने मुल्क और पाक कल्चर की रवायतों से आप पूरी तरफ वाक़िफ़ नहीं हैं बरख़ुरदार. हम जोगी हैंऔर बेटा कमोल, बाउल. जोगी और बाउल न हिन्दू होते हैं न मुसलमाँ. वे बस जोगी और बाउल ही होते हैं. हम जोगियों के गुरु गोरखनाथ और दादा मछ्न्दरनाथ नें न पूजा करने से मना किया और न नमाज पढ़ने से. वही सीख बाउलों को लालन शाह फ़क़ीर ने दी…

… अब आप ही तय कर दिजिए कि हम अपने गुरु गोरखनाथ की रवायत का गेरुआ बाना पहनें कि नहीं … अपना इकतारा बजाते भरथरी के गीत के साथ सुरसती-शिव-विष्णु के भजन गायें कि नहीं ? … सुरों पर सवारी कर मौला को पुकारें कि नहीं… “


और बातें भी कहीं मगर उनका असर न गुप्ता (व इस मानसिकता के लोगों) पर हुआ, न अब्बू, कमोल और इन जैसों पर. इस अध्याय का अंत यही हुआ कि गुप्ता एकेडमी के उद्घाटन का कार्ड थमा कर आने की औपचारिक प्रार्थना करके चल दिए.
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यह एक अध्याय है जिससे किताब की विषय-वस्तु स्पष्ट हो जाती है. संगीत को समर्पित एक घराने की कथा है जो धर्म- समुदाय आदि से परे बस इन्सानियत और संगीत में लीन है तो दूसरी तरफ सभी जगह माहौल बदल रहा है. लोग उनमें कलाकार नहीं हिन्दू-मुसलमान देख रहे हैं. आग दुहू घर लागी है. कुछ हिन्दू और कट्टर हिन्दू हो रहे तो मुसलमान भी और कट्टर होते जा रहे. उन्हे पसन्द नहीं कि मुसलमान हमारे राम –कृष्ण के गीत गाये, हमारी राग-रागिनियाँ गाये तो मुसलमानों को भी यह नहीं पसन्द, बल्कि कट्टर को तो मुसलमान का गाना-बजाना-नाचना भी गवारा नहीं. यह कट्टरता जान लेकर भी खतम नही होती. घराने के अधिकांश लोग मॉब लिंचिंग में मारे जाते हैं. अब जो हमसे सहमत नहीं या जिसे हम नहीं चाहते – उसे जीवित रहने का अधिकार नहीं, हम विचार की नहीं उसकी हत्या कर देंगे. कुछ की हत्या होगी ति बाक़ी ऐसे ही सहम कर पाँव खींच लेंगे.

जो स्थिति अब हो रही है, उसका चित्रण इस घराने के माध्यम से किया है.कथा इतिहास और कल्पना का मिश्रण है. भाषा-शैली प्रवाही और प्रभावी है और इससे भी बढ़कर है कि संगीत घराने की दारुण कथा कहने में संगीत परिवेश को अच्छी तरह उभारा है. लगता है हम संगीत गाथा ही पढ़ रहे हैं. राग-रागिनियों, रियाज़, परम्परा, संगीत सम्मेलन … सब ऐसा कि मानों संगीत सभा में हों या उस घराने में रह कर सब देख-सुन रहे हों. हर अध्याय के पूर्व किसी शायर, कवि या चिन्तक की पंक्तियां जो अध्याय का सार बताती हैं. संगीत तो है किन्तु मुख्य स्वर बदलता परिवेश, फिज़ा में घुलता ज़हर और असहमति के स्वर के साथ उस स्वर को उठाने वाले को ही खत्म कर देने की प्रवृत्ति … बहुत हद इस प्रवृत्ति को बहुसंख्यक, शासन, सत्ता और व्यवस्था का कहीं खुला तो कहीं मौन समर्थन. संवेदनशील विषय को उठाती प्रभावी किताब है.

किताब शोधपरक है, इतिहासाधारित है किन्तु बोझिल नहीं. झकझोरने वाली किताब है.
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किताबः गूँगी रुलाई का कोरस
लेखकः रणेन्द्र
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
प्रकाशन वर्षः  2021, पहला संस्करण