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Friday, 8 April 2022

रामचरित मानस व अन्य किताबों में शगुन - अशगुन संकेत

 

शगुन – अशगुन विचार




रामचरित मानस व अन्य किताबों  में शगुन - अशगुन संकेत

पिछली पोस्ट में ‘श्रीरामशलाका प्रश्नावली’ के माध्यम से भविष्य का संकेत पाने के लिए प्रश्न विचार पर चर्चा की गयी. प्रश्न विचार के अलावा स्वप्न फल और विभिन्न पशु –पक्षियों व व्यक्तियों के दर्शन व अन्य संकेतों से शगुन अशुगुन विचार की परिपाटी रही है और आज तक चली आ रही है. कार्य कारण का कोई स्पष्ट व तार्किक सम्बन्ध न होने पर भी पढ़े –लिखे व प्रगतिशील विचारों तक के बहुतेरे लोग भी इन पर विश्वास करते हैं और पालन करते हैं. विश्वास न करें / ऐसा कहें तो भी एक बार मन में शङ्का तो उत्पन्न हो ही जाती है. कहीं जाते समय किसी के छींक देने पर, बिल्ली के रास्ता काट जाने पर, काने व्यक्ति के दर्शन होने पर एक बार तो ठिठक ही जाते हैं व पानी पीकर या कुछ देर ठहर कर या रास्ता बदल कर अशगुन का निवारण करते हैं तो जल भरे पात्र के दिखने पर, दही – मछली के उच्चारण या दर्शन पर कार्य सिद्ध होने का भाव उत्पन्न होता है. शगुन – अशगुन की कोई तार्किकता नहीं, ये मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं जिससे आचरण प्रभावित होता है और तद्नुरूप कार्य.

                                                     यहाँ इनकी तार्किकता पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ अपितु श्रीरामचरित मानस व अन्य किताबों में जो शगुन – अशगुन वर्णित किये हैं, उन्हें दिखा रहा हूँ.

 

रामजी ने धनुष भङ्ग किया तो स्वतः ही सीता जीसे उनका विवाह हो गया किंतु वे साधारण लोग तो थे नहीं. एक तो दोनों पक्ष राजा, दूजे राम, लक्ष्मण, सीता अवतारी सो लौकिक विधि से भी तो उछाह के साथ भव्य विवाह होना था –

                  कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना॥

                  टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग विदित सब काहू॥

                                            तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।

                                            बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥

सो जनक ने दशरथ के पास दूत पठाए, बारात का निमंत्रण दिया और अयोध्या से बारात चली. अब यह अति शुभ कार्य था तो बारात प्रस्थान के समय शुभ शगुन होने ही थे. देखिए, तुलसीदास जी ने बारात प्रस्थान के समय कौन –कौन  शुभ शगुन गिनाये हैं –

 

बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥

चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥

सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी॥

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥

मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥

छेमकरी कह छेम विसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥

सनमुख आययु दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥

              मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।

              जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥

-         बालकाण्ड ३०२ / १ से ४

बारात ऐसी सजी है कि वर्णन करते नहीं बनता. ऐसे अवसर पर सब सुंदर शुभदायक शगुन होने लगे. चलते समय नीलकण्ठ पक्षी बायीं ओर चारा चुगते दिखा मानों संपूर्ण मङ्गल की सुचना दे रहा हो. दाहिनी ओर सुंदर खेत में कौआ शोभा पा रहा है तो सबको नेवले का दर्शन भी हुआ. त्रिविध ( शीतल, मन्द और सुगन्धित ) हवा अनुकूल दिशा में बह रही है तो सुहागिन स्त्रियां भी भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिए आ रही हैं. लोमड़ी बार – बार दिख रही है तो गाय भी सामने खड़ी बछड़े को दूध पिलाती दिखी. हिरनों की टोली दाहिनी ओर से निकल कर गयी, मानो सभी मङ्गलों का समूह दिखायी दिया. क्षेमकरी (सफेद सर वाली चील)  बोल रही है मानों विशेष रूप से क्षेम ( कुशल ) कह रही हो. श्यामा चिड़िया बायीं ओर सुंदर पेड़ पर दिखायी पड़ी दही – मछली और दो विद्वान ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिए सामने से निकले. सभी मङ्गलमय कल्याणकारी फल देने वाले शगुन मानों सच्चे होने के लिए ही प्रकट हुए.

                                                                 प्रकारांतर से तुलसीदास जी ने बताया कि कहीं जाते समय  ये सब दिखना शुभ सङ्केत है, कार्य सिद्ध होगा.

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इसी प्रकार स्वप्न विचार द्वारा भी भावी का सङ्केत सुंदरकाण्ड में सीता – त्रिजटा संवाद में है. सीता को सांत्वना देते हुए त्रिजटा कहती है कि मैनें सपना देखा एक वानर ने लङ्का जला दी और राक्षसों की सारी सेना को मार डाला. रावण नग्न अवस्था में गधे पर बैठा दक्षिण दिशा (यम की दिशा में, मृत्यु की ओर ) जा रहा है. उसके सर मुंडे हुए हैं और बीसों भुजाएं कटी हुई हैं. इस विकराल व दयनीय्त अवस्था में वह दक्षिण दिशा में जा रहा है और विभीषण को लङ्का का राज्य मिल गया है.

                                              ऐसा स्वप्न रावण व उसके कुल के लिए अनिष्ट व सीता के लिए सौभाग्य का सूचक है.

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥

सपने बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥

खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥

-         सुन्दरकाण्ड / १०/ १ से ३

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ऐसे ही जब रावण युद्ध करने चला तो अनेक अशगुन होने लगे किंतु उन्हें जान कर भी रावण अभिमानवश उन्हें किसी गिनती में नहीं ले रहा. आयुध अपने आप ही हाथ से गिर जा रहे हैं. रथ से योद्धा गिर जा रहे हैं और घोड़े – हाथी चिक्कारते हुए साथ छुड़ा कर भाग रहे हैं. सियार, गीध, कौए और गधे विकराल स्वर कर रहे हैं और कालदूत के समान उल्लू भयङ्कर शब्द कर रहे हैं.

                                                                    अर्थात युद्ध या किसी विजय यात्रा पर जाते समय हथियार हाथ से गिरे या स्वयं वाहन से गिर पड़े या वाहन खराब हो जाए ( साथ छोड़ दे ) अशगुनिए पशु – पक्षी बोलने लगें तो यह अनिष्ट का सूचक है.

 

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला॥

               अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते।

               भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥

               गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।

               जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥

-         लङ्काकाण्ड ७७/५

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राम जी जब रावण का वध करने को उद्वत होते हैं, 31 बाणों का सन्धान करते हैं तो रावण के लिए अनेक अशगुन होने लगे मानों रावण को चेतावनी दे रहे हों. गधे , सियार और कुत्ते रोने लगे ( यह तो आज भी अशगुन माना जाता है ) नाना प्रकार के पक्षी एकत्र होकर आर्त शब्द करने लगे और दिन में ही तारे और धूमकेतु दिखने लगे. दसों दिशाओं में आग लगी दिखने लगी और पत्थर की प्रतिमाएं भी आंसू बहाने लगीं. धरती हिलने सी लगी और आकाश से रक्त – मांस गिरने लगा.

                                                    यह सब तो भीषण युद्ध और जनहानि के लक्षण हैं ही.  

सुनत विभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥

असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥

बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥

दस दिसि दाह होन अति भारी। प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी॥

                           प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।

                           बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥

                           उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए।

                           सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥

-         लङ्काकाण्ड / १०१/ ३ से ५

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ये तो मानस में शगुन -अशगुन और अमङ्गल के सङ्केत हैं, कई उपन्यासों में भी ऐसे सङ्केत और शगुन विचार मिलता है. अब होते हैं या नहीं किंतु यह लोकव्याप्ति है. भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ में एक पात्र चीलें मंडराती देख कर अनिष्ट की आशङ्का से ग्रस्त होता है जो सही भी सिद्ध होती है.

 

अशगुन / अमङ्गल सङ्केतों की चर्चा बहुत हो ली, यह शुभ नहीं. तो अब चर्चा करें शगुन विचारने की एक प्रणाली की जिसका वर्णन शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी के वृहद उपन्यास, “ कई चांद थे सरे – आसमां” के एक प्रसङ्ग में है . कुछ नाम या इस आशय की पवित्र किताब को औचक खोल कर पन्ने पर लिखे के अनुसार भविष्य / प्रश्न के संकेत ग्रहण किया जाता है. इसे ‘रमल’ भी कहते थे, ‘फाल’ निकालना भी.

 

उपन्यास में एक प्रमुख पात्र है, वज़ीर. जीवनयापन, केवल जीवनयापन भर नहीं बल्कि विलासिता पूर्ण जीवनशैली, के लिए वह वेश्यावृत्ति अपनाती है किन्तु साधारण वेश्याओं की तरह जिस-तिस के लिए नहीं बल्कि शासक ( नवाब ) की रखैल बनने का. इसके लिए वह उच्च वर्ग की महफ़िलों में पैठ बनाती है और नवाब से शारीरिक संपर्क कर लेती है किन्तु उसे संशय रहता है कि यह एक् दो बार / कभी-कभी का सिलसिला होगा या नवाब साहब उसे ‘रख लेंगे’. ऊहापोह में वह ‘फाल निकलवाने’ का आसरा लेती है और इसके निष्णात हैं पण्डित नन्द किशोर.

 

पण्डित जी आते हैं. आव भगत आदि के बाद पण्डित जी कहते हैं –

“ अच्छा, किसी फूल का नाम लो.” उन्होंने कहा.

“जूही,” उसके मुंह से बेइख़ित्यार निकला.

पण्डित नंद किशोर ने आंखें बंद कर लीं. तस्बीह के कुछ दाने फिराए, फिर एक पल बाद बोले, “ देहली के उत्तर-पश्चिम में , यहां से बहुत दूर भी नहीं, नवाबी रियासत है, रियासत के मालिक का नाम, … “उन्होंने कुछ पल ख़ामोशी रखी, “ … शम्सुद्दीन अहमद ख़ां है.”

वज़ीर का चेहरा शर्म से गुलाबी हो गया. वो सिर झुकाए – झुकाए बोली, “ सरकार के लिए ज़ाहिर का बयान क्या, लेकिन मेरा जी बहुत डरता है कि … “

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“ … कि इस वक़्त क्या किया जाए ? क्यों, ऐसा ही है न ? नवाब की तरफ से सिलसिला शुरू होने का इंतज़ार कर रही हो ?”

“ जी, वो तो हो चुका. लेकिन इसके बाद अब मैं क्या करूं ? और इंतज़ार करूं या उनके क़दम पर क़दम बढ़ाऊं, मेरी तो अक़्ल काम नहीं कर रही. “ यह कहते हुए वज़ीर की आंखों में आंसू छलक आए.

“ तो इसमें घबराने की क्या बात है ? बीबी, बात तो सामने की है लेकिन चलो, तुम्हारे इत्मीनान के लिए ख़्वाजा साहब से पूछ लेते हैं.”

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इसके बाद ख़्वाजा साहब  से पूछने का उपक्रम हुआ जो ‘श्रीरामशलाका प्रश्नावली’ जैसा ही है. ‘दीवाने – हाफ़िज’ को मंगवाया गया. मगर ठहरें, मंगवाने से पहले माहौल बनाया गया – कमरा फिर से ख़ुशबू, इतर, लोबान वगैरह से पाक किया गया,  ‘पाक – साफ़ हाथों’ से पाक काग़ज का एक ताव, पाक रोशनाई की दवात, नए नरकुल का एक टुकड़ा मंगाया गया. ‘दीवाने – हाफ़िज’ की एक प्रति को अख़रोट की लकड़ी के नक़्क़ाशीदार रिहल पर रख कर लाया गया, दरवाज़े सब बंद कराए गए और लिसानुल – ग़ैब ( ग़ैबी आवाज़, ख़्वाजा हाफ़िज – जिनका इंतक़ाल सदियों पहले हो चुका था – का ध्यान करने को कहा गया. फाल निकालने के ग्रह – नक्षत्रों की दिशा- दशा विचारी गयी, जब दूसरा पहर लग गया तो पण्डित जी ने ख़्वाजा साहब के सामने सवाल मन में  रख कर दीवान का पन्ना ( कोई भी ) खोला और एक हर्फ़ पर उंगली रखी. यह हर्फ़ था ‘दाल’ ( उर्दू में ‘द’ )  बीबी से काग़ज पर दाल लिखने को कहा. फिर कुछ गिनतियां कीं और कहा, अब लिखो ‘रे’, फिर गणना के बाद आया’अलिफ़’ , फिर ‘छोटी हे’ … वज़ीर  निर्देशानुसार लिखती गयी तो दीवान में मजूद ग़ज़ल का मतला बना –

                                    ऐ पै के – रास्तां ख़बरे – सर्वे – मा बिगो

                                    अहवाले – गुल ब – बुलबुले – दस्तां सरा बिगो.

( ग़ज़ल फारसी में है, इस मतला का अर्थ हुआ, ‘ ऐ सच्ची ख़बरें देने वाले, हमारे सरों की ख़बर कह, गुलाब के फूल का हाल चहचाती हुई बुलबुल से कह )

इसका संकेत पण्डित जी ने ऐसे बताया –

उन्होंने मज़े की हालत में ज़ानूं पर हाथ मारा औरर फ़रमाया, “ख़्वाजा – ए- शीराज़ ने तुम्हें बादशाह और उन्हें भिखारी ठहराया है. सिर्फ़ यही नहीं कि तुम उनसे बातचीत करो, बल्कि यूं बातचीत करो जिस तरह दुनिया के बादशाह अपनी चौखट पर आए भिखारियों से बात करते हैं. तुम चाहने वाली नहीं, चाही जाने वाली हो. अल्लाह मुबारक करे.

 

 इस भविष्यफल के बाद वज़ीर का मनोबल खूब बढ़ा, उसने वो मुकाम हासिल किया जो वह चाहती थी.

( उपन्यास का यह प्रसङ्ग भी कई पेजों में फैला है. शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी की शैली किस्सागोई / दास्तानगोई की है जिसमें सब कुछ इतने विस्तार से बयान किया जाता है कि तस्वीर सी खिंच जाती है. विस्तार भय से मैंने किताब में लिखा हू ब हू बहुत ही कम बयान किया है, छोड़ – छोड़ कर और अपने शब्दों में, संक्षेप में बताया है )

 

 

 

 

Saturday, 2 April 2022

श्रीरामशलाका प्रश्नावली

 

श्रीरामशलाका प्रश्नावली

भविष्य या कर्मफल के प्रति शङ्का और जिज्ञासा अधिकांश लोगों में होती है, यह न भी हो तो भी एक बार तो मन में यह विचार आता ही है कि सम्पादित किया जा रहा कार्य सफल होगा कि नहीं. कभी – कभी कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही अगर – मगर या ऐसे ही प्रश्न उपस्थित हो जाते हैं कि ये कार्य करना उचित है या नहीं, फलदायी होगा या नहीं और यदि कार्य प्रारंभ कर दिया गया तो उसमें विघ्न – बाधा तो न आयेगी, यदि आयेगी तो उनका शमन हो सकेगा अथवा नही या उसे छोड़ देना ही ठीक होगा.

                               






                            कार्य के अलावा भी कुछ अप्रत्याशित घटनाएं हो जाती हैं जिनमें हानि/ अमङ्गल  की आशङ्का या अनिश्चितता होती है, उनके बारे में चित्त विकल रहता है और कुछ जानने की उत्कट इच्छा होती है. इन सबके समाधान के लिए व्यक्ति शगुनिया / सगुनिया के पास जाता है या ज्योतिषियों के पास जाता है या करने – धरने वालों के पास जाता है. इनसे लाभ होना या उमड़ रहे प्रश्नों का उत्तर पूरी तरह विश्वास का मामला है.

इन्ही सबको ध्यान में रख कर तुलसीदास जी ने ‘श्रीरामशलाका प्रश्नावली’ की रचना की. यह जो चित्र में आप यंत्र ( यंत्र रूढ़ अर्थ में केवल कोई मशीन / उपकरण नहीं होता अपितु कागज पर गणना के आधार पर अथवा ईष्ट देव की स्तुति, स्वस्ति आदि के कुछ अक्षर / शब्द / वाक्य अथवा अङ्क लिखे होते हैं, उन्हें भी यंत्र कहते हैं. तंत्र शास्त्र में विविध प्रकार के यंत्रों का बहुत महत्व है )  / वर्ग पहेली जैसा देख रहे हैं, वह गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामशलाका प्रश्नावली है जिसकी सहायता से उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर मिलता है जो ऊपर वर्णित हैं. यह पूरी तरह विश्वास/ श्रद्धा पर फलदायी होते हैं. श्रीरामशलाका प्रश्नावली’ श्रीरामचरित मानस में दी होती है.

इससे प्रश्न का समाधान पाने का तरीका बहुत सरल है, बस मन में श्रद्धा और इस पर विश्वास हो. सबसे पहले मन में श्रीराम जी का ध्यान करें, फिर मन में प्रश्न का विचार करें, फिर एक शलाका ( सींक या शलाख ) लेकर उसे किसी भी खाने में रख दें. ( शलाका के प्रयोग के कारण इसमे शलाका जुड़ा है. उंगली भी रखी जा सकती है किन्तु उंगली खानों से बड़ी होगी और दो या अधिक वर्ग ढक जाएंगे अतः शलाका का प्रयोग उपयुक्त होगा ) अब जिस अक्षर पर शलाका रखी है उसे कागज पर लिख लें. फिर उससे नवें वर्ग में जो अक्षर पड़े, उसे लिख लें. इसी प्रकार नवें वर्ग का अक्षर तब तक लिखें जब तक कि पूरी प्रश्नावली का चक्कर न लगा लें. उंगली प्रश्नावली के बीच में पड़े ( जैसा कि उदाहरण में बताया है ) तो अंत पर पहुँच कर वहाँ से तब तक गिनें जब तक कि उस अक्षर पर न पहुँच जायें जिस पर सबसे पहले उंगली रखी थी. जैसे प्रश्नावली की अंतिम पंक्ति में पहूँचे और नवें अक्षर के बाद तीन वर्ग बचे हैं और पूरी प्रश्नावली का चक्कर नही लगा तो वे तीन वर्ग और ऊपर से छठा वर्ग … इस प्रकार चक्कर पूरा करें.

चक्कर पूरा होने पर देखेंगे कि लिखे हुए अक्षरों से एक चौपाई बन गयी है जो मानस में है. मानस की अनेक चौपाईयां सूत्र रूप में भी हैं अर्थात वे कथा प्रसङ्ग को तो आगे बढ़ाती ही हैं, स्वतंत्र रूप में नीति की कोई बात कहती हैं. उस चौपाई का गोस्वामी जी ने संदर्भ बताया है और उससे आधार पर फलाफल की घोषणा की है.

इसमें जो उदाहरण दिया है उसमें प्रश्नावली के जिस वर्ग पर शलाका पड़ी उसमें ‘म’ अक्षर अङ्कित है ( इसे * से चिन्हित किया गया है ) अब इसे कागज पर लिखा और फिर नवां अक्षर लिखा तो यह रचना मिली –

म र चि रा खा को क रि त र्क ब ढ़ा वै सा खा हो इ हि सो इ जो रा

अब मानस का पारायण करने वाले जान ही लेंगे कि इन अक्षरों से यह चौपाई बनती है –

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

यह चौपाई बालकाण्ड में शिव पार्वती संवाद के अंर्तगत है. आशय यह निकालना चाहिये कि कार्य पूर्ण होने में संदेह है अतः उसे या तो न करे या फल की चिंता किये बिना भगवान पर छोड़ दे. जो होगा,  देखा जायेगा.

नवें अक्षर को गणना में  लिया गया है अतः कुल नौ चौपाईयां बनती हैं जिनका अलग – अलग फल है. शलाका श्रीरामचरित मानस में ही मिलेगी, अलग से नहीं.

इस पोस्ट का आशय ज्योतिष अथवा किसी अन्य प्रकार से फलादेश की गणना या शगुन विचारना या इस व इस जैसी पद्धति का महिमामण्डन या प्रचार – प्रसार नहीं, यह श्रद्धा व विश्वास का मामला है और मेरा आशय जानकारी देना / साहित्यिक है.

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यह बनाना निश्चित ही बहुत कौशल का कार्य और श्रमसाध्य रहा होगा. ऐसे ही नहीं 15X15 के खाने बना कर उनमें कोई भी अक्षर / संयुक्ताक्षर रख दिये गये बल्कि यह सुनिश्चित किया कि कहीं पर भी शलाका रखी जाए, उसे और नवें अक्षर को गिनने पर आये अक्षरों से चौपाई बने और उन्हीं चौपाईयों में से बने जो फलादेश हेतु सोच रखी हैं. इस आशय से किन्ही खानों में संयुक्ताक्षर और किन्हीं में दो अक्षर और किसी में केवल मात्रा (T) लिखी गयी. यह तुलसीदास जी एवं तत्कालीन कवियों की बहुमुखी प्रतिभा को बताता है. तुलसीदास जी केवल भक्त और कवि ही नही थे अपितु ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान भी थे.

मैंने मानस के अलावा और कहीं तुलसीदास जी की जीवनी नहीं पढ़ी अतः उनके भक्त कवि होने के अलावा अन्य आयामों के बारे में नही पढ़ा किंतु अमृतलाल नागर जी ने “मानस का हंस” में उनके जीवन के विविध आयाम उजागर किये हैं. इस उपन्यास को नितांत काल्पनिक नहीं कह सकते क्योंकि उन्होंने विभिन्न राजाओं और संस्थाओं के अभिलेखागार में रखी अनेक जीवनियों के आधार पर उपन्यास लिखा. इस उपन्यास में तुलसीदास के ज्योतिष और शगुन विचार में प्रवीण होने का उल्लेख और कई प्रसङ्ग हैं. रत्नावली के मायके में तो यह आजीविका का साधन ही था. तुलसीदास जी के ससुर और साला इस कार्य को करते रहे, रत्नावली भी इसमें प्रवीण थीं और स्वयं तुलसीदास जी ने भी शौक़िया इसे किया ( इसमें धन लाभ भी हुआ जो उन्होंने दान कर दिया)

मानस का हंस में ‘श्रीरामशलाका प्रश्नावली’ बनाने का प्रसङ्ग है. तब तुलसी का विवाह हो चुका था. तुलसीदास जी काशी में निवास कर रहे अपने मित्र, गङ्गाराम से भेंट करने गये. वे भी ज्योतिषी थे. काशी नरेश के पुत्र कहीं चले गये थे और उनका कोई पता नहीं चल रहा था. राजा चिंतित थे और उन्होंने युवराज का पता बताने वाले को एक लाख रुपये देने की घोषणा की. पण्डित लोग विचारने में लगे किन्तु कोई ठीक न बता पाया. गङ्गाराम भी आधा – अधूरा ही विचार पाये. मित्र की सहायता और मान रक्षा के लिए तुलसीदास जी ने रात भर में यह शलाका बनायी और युवराज के सवा पहर दिन चढ़ने तक सकुशल लौट आने की घोषणा की, साथ ही इस बारे में अपना नाम न आने का वचन लिया. गङ्गाराम जी राजा के पास गये, भविष्यकथन बताया और युवराज के लौट आने पर लाख के बजाय सवा लाख रुपयों से पुरस्कृत होकर लौटे. बहुत मनुहार के बाद तुलसीदास जी ने घोषित पुरस्कार से ऊपर का पच्चीस हज़ार ही लेना स्वीकार किया और उसमें से भी तीन चौथाई दान कर दिया. यह ‘श्रीरामशलाका प्रश्नावली’ वही है जो तुलसीदास जी ने रात भर में तैयार की.

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इस प्रकार की प्रश्नावली और भी होंगी, एक तो मुझे स्मरण है. बहुत पहले, किशोरावस्था में,  कृष्णलीला पर एक काव्य पढ़ा था “कृष्णायन” उसमें भी ऐसी प्रश्नावली थी. उसमें हर बारहवें अक्षर को जोड़ कर चौपाई ( कृष्णायन की ) बनती थी. उसमें बारह चौपाईयां बनती थीं और इसी प्रकार उनके फलादेश थे.

वह ग्रंथ अब मेरे पास नहीं है, किसी मित्र के पास हो तो कृपया देखें और उसकी प्रश्नावली के बारे में लिखें. इतना मालूम है कि यह द्वारिका प्रसाद मिश्र की रचना है जो उन्होंने 1942 में जेल में रहते लिखी थी, वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे. अन्य ग्रंथों में भी ऐसी प्रश्नावली होगी. सुधी साथी कृपया उन्हें साझा करें.

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तुलसी ने श्रीरामचरित मानस में राम विवाह और राम – रावण युद्ध के प्रसङ्ग में कुछ शगुन – अपशुगनों की चर्चा की है.  अन्य अनेक प्रकार से ( सुगंध के आधार पर, फूल, फल, सब्जी आदि का नाम पूछ कर, प्रश्न विचार से पूर्व आहार, स्वप्न आदि के आधार पर भी शगुन / भविष्यफल विचारा जाता है. शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी के वृहद उपन्यास, ‘कई चांद थे सरे –आसमां’ में भी प्रश्न विचार का प्रसङ्ग है.   

पोस्ट लंबी हो रही है अन्यथा उनको भी देता. आपकी रुचि हो तो उनकी पृथक पोस्ट में चर्चा करूँ.

Thursday, 3 March 2022

पेन, स्कूल और हम !

 


पेन
, स्कूल और हम !

विगत दिनों एक पोस्ट में बीड़ी की बात के साथ  स्कूल गाथा कही और एक पोस्ट में प्रभु से उन लोगों भी को माफ करने की अरदास की जो जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं किंतु मानते नहीं. आज की दो यादों में स्कूल है, पेन और हम तो दोनों में ही हैं.

फाउण्टेन पेन का शौक़ तो हमें विद्यार्थी जीवन से ही था. अमीनाबाद में रहते थे और विद्यांत कॉलेज में पढ़ते थे ( इण्टर तक वहीं पढ़े ). अमीनाबाद में पेन की दो मशहूर दुकानें थी एक कौशला एण्ड कंपनीऔर दूसरी अनुपम भारतीयये दोनों पेन निर्माता भी थे, पेन की मरम्मत / सर्विसिंग आदि भी करते  थे और पेन के पार्ट्स ( निब, जीभी, हड्डी आदि ) भी मिल जाते थे. इनके पेन में गुणवत्ता तो थी ही, बजट के अनुरूप भी होते थे तभी तो मेरे जैसे लोग भी खरीदते थे. 

विद्यांत में वाणिज्य के एक अध्यापक थे, मैं उनका मुहलगा शिष्य था सो वे अपने कुछ निजी कार्य भी मुझसे करवाते थे. ये वही गुरू जी थे जिन्होंने मुझसे बीड़ी मंगवाई थी और ब्राण्ड न बताने के कारण अपनी समझ से मैं गणेश बीड़ी ले गया था जो मँहगी भी होती थी और तंबाकू अच्छी किंतु हल्की. इस बार उन्होंने मुझे बुलाकर एक फाउण्टेन पेन दिया और कहा कौशला कंपनीचले जाओ. वहाँ फलाने ( मालिक का बेटा, ओ. पी. कौशला जी वृद्ध हो चुके थे, अधिकतर काम बेटा देखता था ) को मेरा नाम बताना और कहना कि ये पेन ठीक कर दे. मुझे तो अधिकारिक रूप से निडर होकर मटरगश्ती करने को मिला और एक कुटिल भाव भी जगा. मेरे पेन की निब भी खरखराती थी, बदलने वाली हो  गयी थी सो गेंहू के साथ खर पतवार भी पानी पा गया. मैंने दोनों पेन दिया और गुरु जी की बात दुहरा दी. तब लोगों में गुरु जी के  प्रति आदर  था, उनका कोई काम करना अहोभाग्य मानते थे ( एक मैं ही गुरुघाती निकला जिसका मुझे आज तक पछतावा है ) उन्होंने दोनों पेन लिये, निब बदली और अच्छी वाली लगायी, पेन की सफाई की और इंक भर कर दी और कहा, ‘गुरु जी को प्रणाम कहना.गुरु जी के पेन के साथ मेरा पेन भी फ्री में दुरुस्त हो गया, हाथी के पांव में सबका पांव. उस समय तो अपनी चतुराई पर अपनी पीठ ठोंक रहा था किंतु अब इस धूर्तता पर शर्म आती है. किसी को यह पता न चला. मैंने किसी को बताया नहीं ( पाप कौन उजागर करता है भला ! ) और वो तो उनसे बताते न कि गुरु जी आपके दोनों पेन ठीक कर दिये.

 

प्रसङ्गवश बता दूँ कि कौशला कंपनी अब भी है किंतु अब वे पेन नहीं बनाते. पेन भी अब उनके यहाँ कम वैराईटी के हैं, फाउण्टेन पेन तो नहीं के बराबर और मरम्मत भी नहीं होती. अब स्टेशनरी की दुकान हो गयी है.

अनुपम भारतीयने भी पेन बनाना बंद कर दिया था. उसके मालिक के निधन के बाद उनके पुत्र ने दुकान संभाली और दुकान का नाम अनुपम पेन स्टोरहो गया. पेन उनके यहाँ बहुत वैराईटी के और फाउण्टेन पेन भी ब्राण्डेड से लेकर साधारण तक मिलते रहे. मरम्मत / सर्विसिंग भी तसल्लीबख़्श होती रही. मैंने कई ब्राण्डेड पेन और साधारण पेन उनके यहाँ से लिये. पुराने स्टॉक में कुछ उनके प्रतिष्ठान से निर्मित पेन ( अनुपम भारतीय नाम से ) भी थे उसमें से भी एक लिया. कोरोना की दूसरी लहर में उनका निधन हो गया. मुझे मालूम न हुआ. दो बार अमीनाबाद गया तो आदतन उनकी दुकान गया किंतु बंद मिली. तब उन्हें फोन किया तो उनके पुत्र ने उठाया और यह सूचना दी. दुकान के संदर्भ में उसने बताया कि उसका कोई इरादा दुकान चलाने का नहीं है. उसे फाउण्टेन पेन वगैरह में न रुचि है, न जानकारी. ये सब पापा ही देखते थे. अब यह बिजनेस बंद ही होगा. उससे कहा भी कि स्टॉक निकाल रहा हो तो कुछ मैं  खरीद लूँ किन्तु न मेरा जांना उधर हुआ और न ही फोनालाप. इनकी जानकारी और नाम ऐसा था कि अहमदाबाद में एक फाउण्टेन पेन प्रदर्शनी लगी थी. मशहूर निर्माताओं के स्टाल व मशहूर ब्राण्ड भी थे उसमें. मैंने औकातानुसार एक पेन खरीदा किंतु जायजा सबका लिया, बात भी कईयों से की तो वहाँ भी  कुछ पेन निर्माता उनके नाम और दुकान से परिचित थे. मेरा लखनऊ के होने के ज़िक्र में उनका भी ज़िक्र हुआ. लखनऊ में मेरी जानकारी में फाउण्टेन पेन के बारे में सही राय के साथ खरीदने का एक ही ठीहा था, वो भी बंद हो गया. किसी पेन प्रेमी को लखनऊ में ऐसी दुकान और जानकार दुकानदार की जानकारी हो तो बतायें.

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पेन, स्कूल और फाउण्टेन पेन से जुड़ी एक और याद !

मेरे एक चचेरे बड़े भाई थे. सत्य नारायण नाम था उनका किंतु वे सत्तू नाम से मशहूर थे, मशहूर वे अपने हमपेशा लोगों में थे. अमीनाबाद की शुक्ला बुक डिपोमें काम करते थे और बहुत अच्छे सेल्समैन थे. उनके सौजन्य से कई साहित्यिक किताबें पढ़ीं. वैसे तो वहाँ प्रमुखतः पाठ्य पुस्तकें बिकती थीं किंतु कुछ साहित्यिक किताबें भी रखते थे. गुरुदत्त की ज़माना बदल गयाके नौ भाग व अन्य किताबें, देवकीनन्दन खत्री का साहित्य, कृश्न चंदर की किताबें, ‘वीर दुर्गादासऔर अमरसिंह राठौरनाटक की तो याद है. वे किताबें लाते थे, बहुत करीने से कि गंदी न होने पाएं, कवर चढ़ा कर और बिना पन्ना मोड़े वे पढ़ते थे, मेरे पिता जी और मैं. इसके बाद किताब वापस की जाती थी.  हम उन्हें सत्तू दद्दा कहते थे. वे शौक़ीन व्यक्ति थे. बांसुरी बहुत अच्छी बजाते थे और अन्य कई वाद्य भी. कपड़े, जूते वगैरह उम्दा किस्म के पहनते थे. जाड़ों में सूट- टाई पहनते थे. शादी की नहीं सो सारा वेतन खुद पर ही खर्च करते थे.

उन्हें पेन का भी शौक़ था. एक पेन उनके पास था जो आकार में बेंत के बराबर था, जैसा टहलते समय हाथ में रखा जाता है. उसमें सिरों पर दो फाउण्टेन पेन थे. बीच की जगह उनके ढक्कन का काम करती थी. फिनिशिंग बहुत अच्छी थी, लकड़ी जैसी फिनिश और जोड़ मालूम न देते थे तो वह बेंत ही लगता था. मैंने उनसे कुछ दिन के लिए वह पेन मांगा, लिखने के लिए नहीं, सहपाठियों को दिखाने / रोब झाड़ने के लिए -  लिखने में तो वह सामान्य से लंबा और मोटा पेन था सो असुविधाजनक था उससे लिखना.  उन्होंने दे दिया. अब उतना बड़ा पेन या तो बस्ते में रखा जा सकता था या हाथ में लिए रहना पड़ता. जाड़ों के दिन थे, कोट पहने था, कोट की बायीं तरफ अंदर की जेब में रखा जो नीचे लगी होती है, पेन तब भी सीने तक आया. उन्हीं दिनों चारबाग रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन में  सैन्य प्रदर्शनी लगी थी. ट्रेन एक प्लेटफार्म पर खड़ी रहती थी. वह प्रदर्शनी शहर शहर जाती थी. मैं भी स्कूल से ही कुछ मित्रों  के साथ प्रदर्शनी देखने गया. पटरी पार करके प्लेटफार्म पर चढ़ने के उपक्रम में पेट के बल चढ़ा. पेन का ध्यान नहीं दिया. पेन पर प्लेटफार्म की कांक्रीट की सतह का दबाव पड़ा और पेन चट की आवाज़ के साथ टूट गया. अब मेरे होश फाख़्ता !अफसोस भी बहुत हुआ और डर भी लगा कि सत्तू दद्दा बहुत गुस्साएंगे और पिता जी तो पिटाई ही कर देंगे. पसली चटख जाती तो शायद इतना दुख न होता. बुझे मन से प्रदर्शनी देखी और लौटा. शाम को जब सत्तू दद्दा दुकान से आये तो उन्हें बताया. वो स्तब्ध रह गये, मुखमुद्रा से लग रहा था कि उन्हें भी बहुत दुख हुआ है किंतु आशङ्का के विपरीत गुस्सा न हुए और न ही पिता जी से शिकायत की. मैंने भी किसी और को नहीं बताया. मुझे आज तक उस पेन के टूटने का अफसोस है.

बाद में, जब स्नातक में आ गया, वैसा पेन बहुत तलाश किया किंतु न मिला. कौशला कंपनी में वैसे पेन थे किंतु मुझे उसके आगे तनिक न रुचे बॉडी प्लास्टिक की और कलर व फिनिशिंग भी बहुत बेकार सी. अहमदाबाद की फाउण्टेन पेन एक्सपोमें रङ्गा पेनके स्टाल पर उसी तरह का पेन देखा, देखने में गांठदार बांस का टुकड़ा जैसे.  वे हैण्डमेड पेन बनाते हैं जो अच्छी फिनिशिंग वाले होते हैं. उन पेनों की क्वालिटी से तो सन्तुष्ट हुआ किंतु दाम बहुत थे. इतने कि तब तक मैं ब्राण्डेड / मंहगे पेन खरीदने लगा था फिर भी उसे खरीदने की नियत न हुई. है कोई दाता धर्मी जो यह इच्छा पूरी कर दे.

पेन और स्कूल के किस्से और भी हैं, समय समय पर सुनाता रहूँगा.

Tuesday, 1 March 2022

शिवरात्रि पर शिव परिवार के तीन चित्र

 


शिव जी विवाह किये और गौरा को लेकर घर आये. अब घर क्या, कैलाश पर बसेरा.  महल भी रहा होगा. कुमार संभव में कालिदास ने जो लीला बखानी है, वह खुले में थोड़े न संपन्न हुई होगी और बालक का शिरोच्छेद महल के बाहर ही किया होगा जब वह पहरे पर तैनात था. महल होगा किंतु शिव जी का दरबार खुले में ही लगता था. अब उनके परिवार में आज की तरह जितने लोग, उतने वाहन, किंतु सब अलग – अलग प्रवृत्ति के. शिव जी का वाहन बैल और वो बार – बार ऊँचे स्वर में डकारे तो पार्वती का वाहन सिंह उस पर दांत धरे गुर्राये. भूतगण अलग शोर करें तो इस कोलाहल में कोतवाल भैरव का वाहन कुत्ता अलग भौंके. गणेश के वाहन, मूषक, को देख कर उसे आहार बनाने को शिव जी के कण्ठ में लिपटा सांप फुंकारे तो उसे खाने को कार्तिकेय का वाहन मयूर झपटे. अब विवाह करने पर परिवार बढ़ेगा तो ये झमेले भी होंगे. जहाँ चार बरतन होते हैं, खड़कते ही हैं. शिव जी के पार्षद गण आपस में कहते हैं कि ये घर है कि तबेला, बड़ी रार मची है शिव जी के तबेले में.

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यही रार एक अन्य कवित्त में भी बखानी है. कवि देवीदास शिव जी की सबको साध कर रखने की क्षमता को सराहते हैं कि कैसी तो शिव जी राजनीति है कि एक सेर पर कोई न कोई सवा सेर बैठा रखा है. मूषक है तो वह उत्पात न करे इसलिए सांप रखे हुए हैं और  सांप को काबू में रखने के लिए कार्तिकेय का वाहन मोर है. पूतनी के लिए भूत हैं तो भूतों को भभूत लगा कर साधे हुए हैं, षटमुख के ऊपर गजमुख हैं ( कार्तिकेय जी की शरारतों को गणेश जी संभाले हुए हैं) काम पर विजय प्राप्त की किंन्तु वामा साथ में हैं, कण्ठ में विष है तो उसके शमन के लिए मस्तक पर चंद्रमा है जिसमें अमृत का वास है. तीसरे नेत्र में अग्नि है तो उसे शांत रखने को जटाओं में गङ्गा जी की धारा है. देवीदास कहते हैं कि देखिए ज्ञानी शङ्कर जी की सावधानी, सबको साध रखने की राजनीति ब अरते हुए हैं.

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अब ऐसा अलग – अलग प्रवृत्ति का परिवार और भूत – पिशाच गण के रूप में किंतु सदा ही रार नहीं रहती. कहीं आते – जाते भी होंगे. गौरा जी के साथ भ्रमण पर निकलने और उनके आग्रह पर दीन -  दुखियों, भाग्यहीनों के लिए व्यवस्था करने की कितनी ही लोककथाए हैं. अब इसी चित्र में देखिए – शिव जी सपरिवार कहीं गये हैं. सब साथ में हैं और टपरे की छत पर शिवजी कैसे मगन हैं.

                     भक्त सखाभाव से भी भक्ति करता है, इस भाव में वह भगवान को अपना सखा, अपने जैसा ही मानता और वैसा ही चित्रण करता है. ऊपर के कवित्त और यह चित्र ऐसे ही भाव से चित्रित हैं.

 

बार बार बैल कौ निपट ऊँचो नाद सुनि,

हुंकरत बाघ बिरुझानो रसरेला में |

भूधर भनत ताकी बास पाय शोर करि,

कुत्ता कोतवाल को बगानो बगमेला में |

फुंकरत मूषक को दूषक भुजंग तासों,

जंग करिबेको झुक्यो मोर हधेला में |

आपस में पारषद कहत पुकारी कछु

रारि सी मची है त्रिपुरारि के तबेला में ||

 

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मूसे पर सांप राखै, सांप पर मोर राखै, बैल पर सिंह राखै, वाकै कहा भीती है |

पूतनिकों भूत राखै, भूत कों बिभूति राखै, छमुख कों गजमुख यहै बड़ी नीति है |

कामपर बाम राखै, बिषकों पीयूष राखै, आग पर पानी राखै सोई जग जीती है |

'देविदास' देखौ ज्ञानी संकर की साबधानी, सब बिधि लायक पै राखै राजनीति है |

 

Thursday, 17 February 2022

अथ श्री रिसेप्शन कथा !

अथ श्री रिसेप्शन प्रसंग !

कल एक शादी के रिसेप्शन में गया. अब इसे यही कहने का रिवाज़ है, पहले इसे प्रीतिभोज, उससे पहले बहूभोज और उससे भी पहले 'एट होम' कहा जाता था - होता भले ही यह 'एट रोड' या 'एट पार्क' या किसी धर्मशाला आदि में था. अब तो यह ही नहीं, सारे वैवाहिक कार्यक्रम किसी गेस्ट हाउस या होटल में सम्पन्न होते हैं, कुछ दम्पति विवाह उपरान्त सम्पन्न किया जाने वाला संस्कार भी होटल में ही सम्पन्न करते हैं. कुछ पैसे की बलिहारी और कुछ देखा-देखी कि अब माङ्गलिक कार्यों हेतु भी घर में जगह नहीं - चाहे एक-दो कमरों का घर हो या दसियों कमरों वाला.

ये कल वाला 'एट होम' घर के सामने स्थित पार्क में था. एक हिस्से में वर-वधु के लिए स्टेज और डी.जे. व एक बड़े हिस्से में भोजन व्यवस्था. यह डी.जे. भी अब ऐसे समारोहों का अनिवार्य अङ्ग है और लगता वर-वधु के बगल में ही है, मेहमानों का सर भन्नाने लगता है तो वे बेचारे तो इसे लगातार खोपड़ी पर झेलते हैं. तो डी.जे. बज रहा था और मस्तों की टोली नाच रही थी. अब नाच के लिए डी.जे. बजे और उसमें भोजपुरी/हरयाणवीं/पंजाबी गाने न बजें, यह कैसे हो सकता है. गाना बज रहा था, "मइके से जब तू ससुरे गइलू, भतार के संगे का-का कहिलू ... ! गीत प्रश्नोत्तर शैली में था, इस जिज्ञासा के शमन में नायिका ने जो-जो बताया, वो यहाँ लिखनीय नहीं है. लोग इस पर डांस कर रहे थे. वैसे डांस में बहुत कुछ उत्प्रेरक इन गीतों के अलावा कुछ एम.एल. तरल विशेष भी होता है.

एक और गीत बजा जिसमें सेज-वेज के ज़िक्र के साथ नायिका ने सूचना दी, 'सैंया दिल मांगे अंगौछा बिछाय के ...' नायिका ने शालीनतावश ही दिल मांगने की सूचना दी अन्यथा अबके कुछ भोजपुरी गीत व्यवहार और वर्णन में खुलेपन के कायल हैं. 'लगावे लू लिपिस्टिक', रिमोट से लंहगा उठाने के गीत भी बजे. कुछ भी कहें, शालीनता-वालीनता को ताक पर रख दें तो मज़ा अबके भोजपुरी गीतों में भरपूरआता है, बोटी-बोटी फड़कने लगती है. नेहा सिंह राठौर जाने क्यों बाराती नचनियों से ये उद्दीपक गीत छीनने पर लगी हैं. वैसे तो अवधी, बुन्देलखण्डी गीत भी इनसे ज़बर हैं मगर उनपे ऐसा बदनतोड़ डांस नहीं हो पाता. पुराने दौर की बारातों में शहर तक में 'लौण्डा पटवारी का बड़ा नमकीन', 'लौण्डा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिए', 'करेजहू, करेजहू ! एक चुम्मा देहिले जावा हो करेजहू ' टाईप गाने बजते सुने हैं. अब तो मारे शुचिता के 'वो शब ओ रोज़ ओ माह ओ साल कहाँ ...'

फ़िल्मी गाने तो बज ही रहे थे, एक गाने ने ध्यान खींचा, “… छत पे सोया था बहनोई मैं घड़ी समझ के सो गयी. मुझको राणा जी माफ करना ! ग़लती म्हारे से हो गयी … “ फ़िल्म में दो आईटम गर्ल्स नाच रही थीं, यहाँ तो कई लोग थे. जिस बात ने ध्यान खींचा वो थी गाने में किया जा रहा गुदगुदाने वाला मज़ाक ! संबंधियों मॅ शादी-ब्याह, नाच-गाना में मज़ाक खूब  चलते हैं. जेवनार के समय गारी गायी जाती है किंतु ऐसे मज़ाक महिलाएं ननदोई को  लेकर करती हैं, बहनोई को इंगित करते हुए नहीं. बहनोई से भी ऐसे परिहास का रिश्ता होता है किंतु बड़ी बहन के पति से, छोटी के से नहीं. बड़ी बहन का पति  ‘जीजा’/ ‘जीजू’ कहलाता है, छोटी का बहनोई. ऐसा हास परिहास ननदोई के साथ होता है या ननद के साथ. ननदोई से ही ऐसी छेड़ छाड़ होती है. लोकगीत भी है, “ … सरौता कहाँ भूल आये प्यारे ननदोईया …” इस लोकगीत में सरौता भूलने से अधिक ज़ोर ‘कहाँ’ पर है, इसकी चर्चा होती है कि कहाँ गये थे.    फ़िल्मी गीतकार इस परम्परा से परिचित न रहा होगा.

बारातों के किस्से बहुत हैं, एक ही कार्य व्यापार सम्पन्न होने पर/तक एक पक्ष मुदित होता है तो दूसरा कुढ़ता है, एक तीसरा पक्ष भी होता है जो न वर पक्ष होता है न वधु पक्ष - वह भी कुढ़ता, अड़ंगे लगाता और मुदित होता है. बेगानी शादी में बहुतेरे अब्दुल्ले दीवाने होते हैं, आस-पास की मधुशालाओं, देशी-विदेशी की और चिखना की बिक्री पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, राजस्व, अर्थव्यवस्था आदि  सहालग में उछाल भरने लगती है.

एक व्यक्तिगत प्रसङ्ग भी है. घर के सामने ही आयोजन था सो सोचा क्या रिसेप्शनोचित ढंग से तैयार होऊँ, सामने ही तो जाना है. जो पहन कर बाज़ार गया था वो भी ठीक थे, उन्हें ही पहन लेता हूँ कि प्रतिवाद किया गया और कपड़े और ठीक-ठाक/औपचारिक पहने. अब हिजाब-विजाब क्या, असहिष्णुता इतनी हो गयी है कि कोई अपनी मर्ज़ी का पहन-ओढ़ भी नहीं सकता.


नोटः फोटो वर्णित रिसेप्शन की नहीं हैनेट से टीपी है. अब इस तरह दावत लुप्तप्राय है.



Thursday, 9 December 2021

पुस्तक चर्चा – एक तयशुदा मौत

 

पुस्तक चर्चा – एक तयशुदा मौत


“… जैसे ही आप दूसरों की सहायता से संगठन खड़ा करने की बात करते हैं – उनकी सहायता से जो समाज के प्रतिष्ठित तबके के लोग हैं – देशी-विदेशी सहानुभूति लेना चाहते हैं, उसी समय आपके साथ राजनीतिक बहस समाप्त हो जाती है. क्योंकि आप एक फासिल हैं, क्योंकि आधारहीन उदार मानवता की ही एक परिणिति है मृत्यु. हत्यारों को बचाने का अर्थ ही मृत्यु है. आप मृत्यु की उपत्यका में खड़े हैं … “

गैर सरकारी संगठन अर्थात NGO की कार्यप्रणाली की पड़ताल है यह उपन्यास. इस अंश में संगठन में राजनीतिक और भद्रलोक के हस्तक्षेप से मृत्यु की बात, मृत्यु की उपत्यका में खड़े होने की बात कही है – NGO का कोई कार्यकर्ता अगर उसकी ‘सुरक्षित लाईन’ से अलग जाकर उसमें राजनीति व समाज के लिए काम करने के और तरीकों का घालमेल करता है तो संगठन (NGO) उससे किनारा कर लेता है, उसे निकाल देता है या उसका इस्तीफा ले लेता है या उसे बिल्कुल अलग–थलग करके किसी संकट में उसकी कोई मदद नहीं करता – संगठन में उसकी मौत हो जाती है – यह मौत सांकेतिक से लेकर वास्तविक भी हो सकती है – स्वाभाविक मृत्यु नहीं, हत्या ! इस उपन्यास में ऐसे ही कार्यकर्ता, दीपांकर उर्फ दीपू की हत्या की पड़ताल है जिसकी एक जुलूस में हत्या कर दी गयी और उसके साथ एक अन्य सहयोगी, रामू, गायब हो जाता है. गाँव में भी उसका कोई पता नहीं चलता या तो उसकी भी हत्या कर दी गयी या वह हत्या की आशङ्का से भूमिगत हो गया – वह उस NGO में भी नहीं था किन्तु दीपू के कामों में उसका  साथी था. हत्या की पड़ताल के बहाने यह उपन्यास NGO की कार्य संस्कृति और बस एक लीक की पड़ताल करता है जिससे अलग जाने पर तयशुदा है मौत.

मौत की पड़ताल होते हुए भी यह उपन्यास कोई जासूसी उपन्यास नहीं जिसमें हत्या होती है, कोई उसकी जाँच करता है, रोचक और रोमांचक घटनाक्रम से होते हुए हत्यारे का पता चलता है और उसे सज़ा मिलती है, मृतक को न्याय मिलता है. इसमें हत्या ऐसे है कि लगता है दीपू की नियति ही थी उसकी हत्या. दीपू की हत्या क्यों हुई, NGO संस्कृति कैसी है, कौन लोग मन बहलाव और समाज सेवा के दिखावे के साथ इनमें जुड़ते हैं – यह उपन्यास बखूबी बताता हैं –

                                                                          “ … राजनीतिक कार्यकर्ता होलटाइमर के रूप में उन्हीं लड़के-लड़कियों को देखते थे जो अपने कैरियर, अपनी ख्याति, धनलिप्सा, परिवार सब छोड़कर मनुष्य के लिए काम करने निकल पड़ते थे. और आज के स्वैच्छिक संगठनों के कार्यकर्ता, ग्रासरूट एक्टिविस्ट, वे अच्छा वेतन  पाते हैं. संगठन चलाते हैं. धनी घरों के लड़के और लड़कियाँ जिन्हें पैसों की उतनी ज़रूरत नहीं होती – और वेतन के लिए इस ग़रीब देश के लड़के-लड़कियों को जुटाया जा सकता है. थोड़ा – बहुत आदर्श की बात करते हुए. ये नये संगठन संचालक, सजे-सँवरे लड़के और लड़कियाँ, आदर्श, ख्यति, विदेशी सेमिनार, पत्रिकाओं में इण्टरव्यू और आजकल कुछ वामपन्थी ग्रुपों की भी पीछे से सहायता … यह सब मिलकर ज़ाहिरा तौर पर एक सफल जीवन तो है ही. पुलिस की लाठी-गोली नहीं है, राजनीतिक टण्टा नहीं है, बीच-बीच में स्थानीय तौर पर झमेला होने पर भी उसे ऊपर के लोगों की सहायता से सुलझा लिया जा सकता है … “

दीपांकर उर्फ दीपू दिल्ली के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय ( नाम नहीं लिखा किन्तु समझा जा सकता है कि JNU की बात हो रही है ) में समाजशास्त्र का शोध छात्र है. वहीं वह ‘कॉमरेड्स’ यूनियन, NGO आदि के सम्पर्क में आता है और शोध में व्यवहारिक कार्य  के सिलसिले में खदान के असंगठित मजदूरों के बीच आता है. यहाँ वह एक NGO – SEED (Society for education and Development) के कार्यकर्ता के रूप में आया है. ‘सीड’ इन मज़दूरों के लिए स्कूल चलाती है. यह गूजरों का इलाका है जो यहाँ के मुल निवासी हैं. स्कूल गूजरों की बस्ती में है और गूजर नहीं चाहते कि इन मजदूरों के बच्चे उस स्कूल में आयें. खदान है तो असंगठित मज़दूर हैं, ठेकेदार हैं,  स्थानीय सम्पन्न लोग हैं, ठेकेदार, स्थानीय  लोग, पुलिस, सहकारी केन्द्र, नेता – सबका गठजोड़ है जिन सबका शिकार खदान मजदूर है. दीपू देखता है कि यहाँ स्कूल से अधिक ज़रूरत समय पर उचित मजदूरी की है, स्वास्थ्य और सुरक्षा की है और स्कूल तथा शिशु केन्द्र की है जो गूजरों की बस्ती में नहीं बल्कि इन्हीं के बीच हो. वह मज़दूरों को संगठित करने, उचित मज़दूरी दिलाने और उनके बीच स्कूल खोलने के प्रयास में लग जाता है, ‘खदान मज़दूर संघ’ का गठन होता है. यह ‘सीड’ समेत किसी को नहीं पचता. परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि सीड से असहमति के बाद वह इस्तीफा देकर श्रमिक संघ और स्कूल के काम में लग जाता है. एस. डी.एम. को ज्ञापन देनें के क्रम में जुलुस निकलता है और उसी में ठेकेदारों के गुण्डे जुलूस पर आक्रमण कर देते हैं और उसकी हत्या हो जाती है.

हत्या की ख़बर पाकर दीपू का एक साथी घटना कि तह में जाने के इरादे से वहाँ पहुँचता है और पड़ताल में NGO संस्कृति और तमाम गठजोड़ की परतें खुलती हैं जिनकी कुछ झलक उपन्यास के अंशों से मिली होगी.    

उपन्यास रोचक और स्तब्धकारी है किन्तु सजग पाठक स्तब्ध नहीं होता क्योंकि वह इन सब प्रवृत्तियों को जानता ही है, बावजूद जानकारी के उपन्यास बांध लेने में समर्थ है. पतला उपन्यास है. यह उपन्यास जनचेतना, निरालानगर, लखनऊ में उपलब्ध है और डाक से भी मंगाया जा सकता है. इस प्रकार का साहित्य जनचेतना में बहुलता से उपलब्ध है.

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पुस्तकः एक तयशुदा मौत

विधाः उपन्यास

लेखकः मोहित राय

अनुवादकः रामकृष्ण पाण्डेय ( मूल बंगला से हिन्दी में अनूदित )

प्रकाशकः परिकल्पना प्रकाशन ( राहुल फाउण्डेशन का इम्प्रिण्ट)

मूल्यः ₹70.00, पृष्ठ 94

जनचेतना का सम्पर्क सूत्रः 0522-4108495, janchetna.books@gmail.com, वेबसाइट janchetnabooks.org

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“ … बुर्जुआ वर्ग का एक हिस्सा इसलिए सामाजिक व्यथाओं को दूर करना चाहता है ताकि बुर्जुआ समाज को बरकरार रखा जा सके. अर्थशास्त्री, परोपकारी, मानवतावादी, श्रमजीवी वर्ग की हालत सुधारने के आकांक्षी, दीन सहायता संगठन, पशु निर्दयता निवारण समितियों के सदस्य, नशाबन्दी के लिए उतावले लोग, हर कल्पनीय प्रकार के अनजान सुधारक इसी श्रेणी में आते हैं. इसके अलावा, इस तरह के समाजवाद का पूरी की पूरी पद्वतियों के रूप में विशदीकरण कर दिया गया है … इस समाजवाद का एक दूसरा, अधिक व्यवहारिक, परन्तु कम व्यवस्थित रूप प्रत्येक क्रान्तिकारी आन्दोलन को मज़दूर वर्ग की दृष्टि में यह दिखाकर गिराना चाहता है कि उसे मात्र राजनीतिक सुधारों से नहीं, बल्कि जीवन की भौतिक अवस्थाओं, आर्थिक सम्बन्धों में परिवर्तन से ही कोई लाभ हो सकता है. लेकिन जीवन की भौतिक अवस्थाओं में परिवर्तन समाजवाद के इस रूप का मतलब बुर्जुआ उत्पादन सम्बन्धों के उन्मूलन से कदापि नहीं है … बल्कि इन्हीं सम्बन्धों पर आधारित प्रशासकीय सुधारों से है, अर्थात ऐसे सुधारों से जो किसी हालत में पूँजी और श्रम में परिवर्तन नहीं लाते … “

-         कार्ल मार्क्स-फ़्रेडरिक एंगेल्स, कम्युनिस्ट घोषनापत्र से (यह इसी उपन्यास के अन्त में निचोड़ के रूप में दिया है.)