पुस्तक चर्चाः साँपों की सभा-अनूप मणि त्रिपाठी
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Monday, 14 October 2024
पुस्तक चर्चाः साँपों की सभा-अनूप मणि त्रिपाठी
पुस्तक चर्चाः साँपों की सभा-अनूप मणि त्रिपाठी
Thursday, 19 September 2024
अथ श्री हयग्रीव अवतार कथा !
अथ श्री हयग्रीव अवतार कथा !
अभी कुछ ही दिन भये कि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा
अर्थात रक्षा बंधन के दिन हमने फेस बुक नाम्ना प्लेटफार्म पर विष्णु भगवान के
हयग्रीवावतार ( जिसमें धड़ मानव का और सर हय अर्थात अश्व अर्थात घोड़े का ) का चित्र देखा और अति संक्षिप्त परिचय के साथ
व्हाट्स ऐप नाम्ना एक अन्य प्लेटफार्म पर पोस्ट कर दिया. उस पोस्ट के साथ हम
जिज्ञासुजनों को आमन्त्रित भी किये कि जिस किसी जन को इस संदर्भ में कोई जिज्ञासा
हो, करे ! यथाजानकारी शमन का प्रयास किया जायेगा ! हे मित्रों ! घोर कलिकाल, कि इन
कथाओं के श्रवण व चर्चा में किसी जन ने किञ्चित रुचि न प्रकट करी सिवाय एक
जिज्ञासु, उत्तम भाई, के. वे जिज्ञासा के साथ अनुरोध करते भये कि स्यात कथा कलेवर
से कुछ पुष्ट होगी सो उचित प्रतीत होता है कि फेसबुक पर तो इसका परिचय व अंश पोस्ट
किया जाय औ ब्लॉग पर संपूर्ण रूप में कहा जाय सो उनके अनुरोध का मान रखते हुए हम कह रहे हैं.
कथा वाचन के समय हम स्वयं को व्यास गद्दी पर और सम्मुख जिज्ञासु उत्तम भाई को मुख्य यजमान के रूप में विराजमान तथा अन्य सुधीजन को नीचे दरी / कुर्सियों पर व कुछ इधर उधर के तांक झांक करते ( ऐसे जो फेसबुक / ब्लॉग पर आते तो हैं पर न कोई रिएक्शन देते, न कमेण्ट करते ) मन की आंखों से देख रहे हैं.
कथावाचन एवं श्रवण के पूर्व हम स्पष्ट कर देना उचित समझते हैं कि किसी प्रकार की दक्षिणा, सीधा, वस्त्र, पात्रादि एवं विधि विधान की हमारी ओर से कोई मांग नही है तथापि जो श्रद्धालुजन श्रद्धा स्वरूप यह सब अथवा पत्रं पुष्पं इत्यादि अर्पित करने की अभिलाषा करें तो हम उसमें बाधक न होंगे. साथ ही यह भी निवेदन है कि कथा को भक्ति भाव से अथवा कौतूहल से अथवा मिथक कथा अथवा गल्प – जो भी भाव हो, उससे ग्रहण करें. साथ ही व्यास पीठ पर होने के नाते यह हमारा अधिकार है कि कथा में हम अपनी छौंक लगाते चलें – कृपया इस इस अधिकार का हनन करने का प्रयास न करें, इसका मान रखें. यजमान गण की जो शंकायें होंगी, कृपया कथा के समापान तक धैर्य रखें. कथा के उपरांत टिप्पणी सत्र होगा, उसमें यथाशक्ति समाधान का प्रयास किया जायेगा. कथा के समापन पर कोई आरती, हवन, भोज अथवा प्रसाद वितरण न होगा तथा सारी ही कथा गद्य में है, नृत्य गानादि की कोई व्यवस्था न होगी. संकल्प श्रावण में किया था किंतु अब भादों चल रहा है और भादों में भागवत का विधान है अस्तु भागवत न होते हुए भी इसे भागवत ही मानें.
---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा प्रथमोध्याय
सम्पन्न ----
द्वितीय अध्याय –
यह कथा देवी भागवत में वर्णित है, जो जन अधिक
जिज्ञासु हों वे देवी भागवत पढ़ने को सलाहित हैं, कथावाचक को तंग न करें. तो एक बार
की बात है, भगवान विष्णु सदा की भांति क्षीरसागर में शेषशैय्या पर अधलेटी मुद्रा
में विश्राम कर रहे थे. कौमोदकी गदा दक्षिण जंघा के पार्श्व में रखी थी, सुदर्शन
चक्र वाम तर्जनी पर मंथर गति से घूम रहा था, एक कर में कमल और एक कर अभयमुद्रा में
शिथिल सा था, शीश पर मुकुट, गले में वनमाला, कौस्तुभ मणि और वक्ष पर भृगु के चरण
चिन्ह सुशोभित हो रहे थे और श्रीमुख पर मन्द मन्द मुस्कान थी जो कालांतर में
चित्रित की जाने वाली मोनालिसा की मुस्कान की अपेक्षा लक्षगुणित रहस्यमयी और मोहक
थी. श्रीचरणों के समीप लक्ष्मी जी चरण चापन कर रही थीं. श्रीहरि लक्ष्मी जी का
अलौकिक रूप निहार रहे थे. लक्ष्मी जी आज कुछ अधिक ही सुंदर और मोहक लग रही थीं और
प्रभु उस छवि पर मुग्ध हुए जा रहे थे, इस उपक्रम में उन्हे पता ही न चला कि उनकी
उनकी मन्द मुस्कान हास्य में बदलती जा रही है. वे आल्हाद के वशीभूत हँस रहे थे.
लक्ष्मी जी के हाथ तो उनके चरण पर थे किंतु दृष्टि उनके श्रीमुख पर थी. पहले उन्हे
ताकते और फिर हँसते देख कर लक्ष्मी जी ने समझा कि वे उन पर हँस रहे हैं, उनका
उपहास कर रहे हैं. हे मित्रों ! कोई भी स्त्री अपने रूप पर कोई विपरीत टीका-टिप्पणी
सहन नही करती फिर ये तो हँसी उड़ाना लगा और वह भी लक्ष्मी जी का. उन्होनें एक बार विचार किया होगा कि श्रंगारादि
में कोई कमी या असंगति तो नही हो गयी किंतु ऐसा कुछ उनके ध्यान में न आया तो उनका
क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उन्होने विष्णु जी को शाप दिया कि तुम्हारा सर
कट कर गिर जाये. रूप का तिरस्कार न करके कुछ और किया होता तो सम्भवतः ऐसा घोर शाप
न देतीं, पावं पकड़ कर, घुमा कर क्षीरसागर में ही फेंक देतीं तो हँसने का दण्ड मिल
जाता, अकस्मात सागर में गिरने से हँसी लुप्त हो जाती और वे तैर कर पुनः शेष पर आ
जाते किंतु रूप का अपमान ! दण्ड अपेक्षाकृत अधिक था किंतु अब मुख से शाप निकल गया
तो श्रीहरि ने कोई प्रतिकार न किया ( किस पति का साहस है प्रतिकार का ! ) हे
मित्रों ! यदि यह विचार आ रहा हो कि हास्य को उपहास समझना और वह भी लक्ष्मी जी
द्वारा और फिर मृत्युदण्ड – तो हे श्रोतागण, आप भ्रम में हैं. प्रभु के समस्त
कार्यों का कोई हेतु होता है – ऐसी व्यवस्था हमारे ग्रंथकार कर गये हैं. तो प्रभु
ने शाप अंगीकार किया. शाप में कोई ऐसा निर्देश न था कि यह तत्काल क्रियान्वित होगा
अथवा कुछ कालोपरांत और कहां होगा सो शाप ने भी कुछ ढील ले ली और उस समय
क्रियान्वित न होकर किसी उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करने लगा.
----
अथ श्री हयग्रीवावतार कथा द्वितीयो ध्याय सम्पन्न
----********************************************
तृतीय अध्याय
तो मित्रों ! आप चिंता में पड़ गये होंगे कि आगे
क्या हुआ ? विष्णु भगवान का शीश कट कर गिरा या नही. उसके बाद वे जीवित रहे कि
वैकुण्ठवासी भये ! वैसे वो क्या वैकुण्ठवासी होंगे, वो तो वहीं रहते ही हैं, वो तो हम मृत्युलोक, उसमें भी भारतवर्ष के और
उसमें हिंदू, प्राणियों के मरने पर कहा जाता है. बाक़ी धर्मावलंबी और अन्य देशों के
लोगों का क्या होता है, हमें नही मालूम ! एक मुसलमान कवि ने कहा भी है, “ हिंदुन
के नाथ हो तो हमरा कछु निहोरा नही, जगत के नाथ हो तो हमरी भी सुधि लीजिये. “ ये तो
हट कर चर्चा हो गयी, इससे भी बड़ा प्रश्न यह सर उठा रहा है कि यदि शाप क्रियान्वित
हुआ और, जैसा कि सबको विदित है, वे मरे भी नही तो इसके बाद उनके और लक्ष्मी जी के
दाम्पत्य सम्बन्ध पूर्ववत मधुर रहे अथवा उनमें तिक्तता आ गयी ? क्या श्रीहरि ने
उसके अननंतर लक्ष्मी जी की ओर चितवते हुए हँसना तो दूर, मंद स्मित सहित देखना भी
बंद कर दिया – हे मित्रों, डर और उसमें भी पत्नी से डर आदित्य को भी ग्रस सकता है.
पूजा नाम्नी एक श्रोता ने तो इसके कपोल - कल्पित होने का प्रश्न भी किया – हे
यजमानगण ! यह सब अतिप्रश्न हैं, कथा श्रवण के समय इनके पूछने से श्रोता और वक्ता –
दोनों को दोष लगया है जिसका निवारण श्रोताओं द्वारा उपवास रख कर वक्ता को एक
सप्ताह तक दोनों पहर सुस्वादु भोजन कराने से होता है. सो अब चित्त लगा कर श्रवण
करो कथा, शंका समाधान टिप्पणी सत्र में किया जायेगा.
तो इसके कुछ कालोपरांत विष्णु भगवान एक युद्ध
के बाद क्लांत होकर यूं ही एक पेड़ से टिक कर विश्राम करने लगे और निद्रादेवी ने
उन्हे अपने अंक में ले लिया. उनका शार्ङ्ग नामक धनुष उस पेड़ के तने से टिका था और
उसकी प्रत्यञ्चा भी चढ़ी थी. उसी समय एक कीट ने धनुष की प्रत्यञ्चा को कुतरना शुरू
कर दिया और कुतरते – कुतरते वह डोरी कट गयी और विष्णु जी के गले से जा लगी और झटके
से उनका सर कट कर भूमि पर जा गिरा. यह देखते ही हाहाकार मच गया. सब देव देवियां
एकत्र हुए और देवी की सलाह से यह तय पाया गया कि घोड़े का सर काट कर विष्णु जी के
कबंध पर लगा दिया जाय और विश्वकर्मा जी ने ( उन्होनें क्यों ? वे तो शिल्पी थे.
वैद्य तो अश्विनीकुमार थे, उनसे यह कार्य क्यों नही कराया गया – इस बारे में देवी
भागवत कुछ नही कहता ) ऐसा ही किया गया. हे जिज्ञासु जन ! वह दिन श्रावण मास के
शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का था. उस पुरुष का कबंध तो विष्णु का था किंतु सर घोड़े का
अतः यह अवतार हयग्रीव अवतार कहा गया.
हे श्रोता गण ! अब यह अति प्रश्न न करने लगियेगा कि यदि घोड़े का सर लगाया जा सकता है तो क्यों नही विष्णु जी का ही सर लगा दिया गया और अश्व एवं मानव की संरचना, शिरायें, रक्तादि भिन्न गुण सूत्र के होते हैं, कैसे वे मैच किये. हम पहले ही सचेत कर चुके हैं कि ये अतिप्रश्न हैं कालांतर में बुद्ध ने इनका निषेध किया है. अगर आप प्रायश्चित करने को उतारू ही हैं तो हम क्या कर सकते हैं. पूर्व में भी मानव एवं पशु के सर धड़ की यह असंगत संगति हुई है. गणेश की कथा तो विदित ही होगी. इसके अतिरिक्त दक्ष प्रजापति का शीश शिव के गण वीरभद्र ने काट कर हवनकुण्ड में भस्म कर दिया था तो उनके धड़ पर अज अर्थात बकरे का सर लगाया गया था. नृसिंहावतार का भी स्मरण होगा, आधा नर आधा सिंह. कुछ काल के लिये श्रीहरि ने ही माया से नारद का मुख वानर का कर दिया था – तो ये नयी बात नही है. अब आप हयग्रीवावतार की कथा का श्रवण कर चुके हैं तो इसका हेतु जानने को भी व्याकुल हो रहे होंगे. चतुर्थ अध्याय में सुने हयग्रीवावतार का हेतु.
---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा तृतीयोध्याय
सम्पन्न ----
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चतुर्थ अध्याय
यदि आप धार्मिक कहें अथवा मिथक – इस कोटि के
ग्रंथों का पाठ करते हैं अथवा प्रवचन सत्संगादि में जाते हैं तो निश्चित ही ज्ञात
होगा कि देखने में भले ही विचित्र अथवा निरुद्देश्य लगे अथवा यह प्रश्न उठे कि
क्या भगवान भी सामान्य मनुष्यों का सा आचरण करते थे किंतु उनके प्रत्येक कार्य का
एक प्रयोजन होता है. उसे ही सिद्ध करने को यह अवतार अथवा अटपटी घटनायें होती हैं.
कर्तव्य, दया, ममत्व अथवा स्नेह के वशीभूत साथी देवगणों से कुछ ऐसे कार्य हो जाते
हैं जो तत्काल अथवा भविष्य में घोर संकट उत्पन्न करते हैं. उन्ही संकटों के निवारण
/ भूल सुधार के लिये यह नाना प्रकार के अवतार होते हैं सो इस अवतार का भी एक प्रयोजन
है.
इस अवतार का हेतु जानने के लिये हे श्रोतागण !
हमें फ्लेश बैक तकनीक का उपयोग करना होगा. हम लिये चलते हैं आपको बिना किसी उपकरण
के इस अवतार के भी पीछे के युग में जब सर्वत्र जल की अधिकता थी. शेषशायी विष्णु
सदा की भांति उस दिन भी शेष शय्या पर लेटे थे. आपको तो मालूम ही है कि उनकी नाभि
से कमल निकला हुआ है, सामान्य कमल की तरह इसकी नाल जल में नही है ( जाने कमल पोषण
कहां से ग्रहण करता होगा ) बल्कि विष्णु जी की नाभी से ऊपर वायुमण्डल में है. उस
विशाल कमल पर चतुरानन (तब उनका एक सर शिव जी काट चुके थे )
“ … तो उसे जोड़ा क्यों नही गया या उसकी जगह और
कोई सर नही लगाया गया और वे जीवित भी रहे – सर था कि केश … “ – बार बार कह रहा हूं
कि बातें बाद में करें, मुझे सब सुनाई दे रहा है, हां तो कमल पर ब्रह्मा जी बैठे थे. उनके हाथों में वेद
शोभायमान थे. विष्णु जी की दृष्टि कमल पर दो बिंदुओं पर केंद्रित हो गयी और उन दो
बिंदुओं से मधु और कैटभ नामक दो दैत्यों ने जन्म लिया ( ये कौन खुसुर-फुसुर कर रहा
है कि जन्म कहीं ऐसे होता है ? कहा ना, टिप्पणी सत्र में यह सब होगा ) दैत्य भी
ऐसे दुष्ट कि ब्रह्मा के हाथ से वेद छीन कर सागर में गोता लगा गये. अब वेदों पर
खतरा था तो विष्णु जी तुरंत सागर में कूदे और उनसे युद्ध करके उनका वध किया मगर
वेद फिर भी हत्थे न लगे. वे दैत्य कुछ अधिक ही दुष्ट थे ( कैसी संतानें थी विष्णु
जी की ! ) उन्होने वेद एक अन्य दैत्य, हयग्रीव, को सुपुर्द कर दिये थे. अब विष्णु
जी ने हयग्रीव को तलाशा और उसका वध करके वेद पुनः ब्रह्मा जी को सौंपे.
अब हयग्रीव की कथा सुनें. इस दैत्य ने भी अन्य
दैत्यों / दानवों / राक्षसों की भांति बड़ा कठोर तप किया था. तप पर जब देवी प्रकट
भयीं तो इसने भी अन्य दैत्यों / राक्षसों की भांति अमर होने का वर मांगा. अब अमर
होने का एकाधिकार तो देव प्रजाति को था तो और किसी को कैसे दिया जा सकता था, देवी
ने इसे और कोई वर मांगने को कहा तब इसने यह वर मांगा कि इसे केवल वही मार सके
जिसका सर घोड़े का और धड़ मानव का हो. बेचारा देवताओं के छल और जुगाड़ को कहां जानता
था ! देवी ने तुरंत एवमस्तु कहा और अंर्तध्यान भयीं. अब तो यह निर्द्वंद्व हो गया,
सबको सताता, राज्य पर कब्जा करता. युद्ध में यह अजेय था क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति
ही न था जो घोड़े के सर और मानव के धड़ वाला होता. जब इसके अत्याचार बहुत बढ़े तो
विष्णु और देवी ने मिल कर लक्ष्मी जी की मति फेर दी, उन्हे विष्णु जी को हँसता देख
कर अपने रूप के उपहास का भ्रम हुआ और उन्ही की प्रेरणा से ऐसा शाप दिलाया. उसी
योजना के आधीन विष्णु जी युद्ध में क्लांत होकर प्रत्यञ्चा चढ़ा हुआ धनुष छोड़ कर सो
गये, किसी देव ने कीट रूप में प्रत्यञ्चा काटी जिससे उनका सर कट कर गिर गया, वे
हयग्रीव भये और हयग्रीव नामक दैत्य का वध हुआ और वेद पुनः ब्रह्मा जी को सुपुर्द
किये गये.
---- अथ श्री हयग्रीवावतार कथा चतुर्थोध्याय
सम्पन्न ----
(
हे संतगण ! कहीं जाईयेगा नही, अभी पञ्चम अध्याय शेष है. यद्यपि वह मूल कथा में नही
है किंतु उसे हमने क्षेपक रूप में सम्मिलित किया है, यह आप सबको और उपयोगी लगेगा )
पञ्चम अध्याय
आपने श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा सुनी
होगी. उसमें पञ्चम अध्याय में कोई कथा नही है बल्कि यह बताया है कि कथा के चार
अध्यायों मे जो पात्र थे वे अगले जनम में क्या भये, जैसे जो विप्र सदानंद थे वो अगले
जनम में वे द्वापर में सुदामा भये ( ग़रीब शुरू में वो तब भी रहे ) जो राजा थे वे
मोरध्वज भये आदि, इत्यादि सो इस कथा का भी पञ्चम अध्याय यही होने वाला है.
ये जो अवतार हैं, सारे के सारे विष्णु के ही
भये और कोई भी अवतार यूँ ही, मन में मौज़ उठी औ प्रभु अवतार ले लिये, टाईप का नही
है, हर अवतार का हेतु बताते भये हैं नाना ग्रंथकारों द्वारा लिखित औ सम्पादित
ग्रंथकार! कुछ अवतार तो किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति हेतु लिये गये औ उद्देश्य
पूरा होने पर भूमि पर बहुत काल तक नही रहे, यूं कहे कि लुप्त हो गये. (जैसे यह
हयग्रीवावतार) बाद में किसी काल में कहीं भी न दिखे (मतलब ग्रंथों में) न किसी
अन्य अवतार के साथ उनका कोई संग साथ दिखाया गया ( जैसे राम के काल में परशुराम
अवतार का आमना सामना भया, अर्थात एक अवतार उद्देश्य पूर्ण होने के बाद भी रहा ) तो
कुछ अवतार इतने चर्चित भी न रहे. एक अवतार, कल्कि अवतार, अभी होना बताया जाता है.
जब अवतारों की बात रही, ( भावना को ठेस न लगे तो कह दूं कि कल्पना की गयी / मिथक
और गल्प में स्थान पाया ) तो देश काल के अनुसार ही उनकी वेषभूषा की कल्पना की गयी यथा
कल्कि अवतार की धारणा घोड़े पर बैठे हुए और तलवार लिये हुए की गयी है किन्तु यदि यह
अवतार हुआ तो क्या ऐसा ही होगा – इसी वाहन और इसी हथियार से दुष्ट दलन करेगा.
बुद्ध तो अवतारवाद, मूर्ति पूजा, आडंबर के विरुद्ध थे – इन्हे भी दशावतार में
शामिल कर लिया गया. यह सब घालमेल अवतार के कालनिर्धारण पर प्रश्नचिन्ह लगाता है.
सामान्यतः लोग विष्णु जी के दस अवतारों को ही जानते हैं, दस अवतार ये हैं – 1.मत्स्य, 2.कूर्म, 3.वाराह, 4.नृसिंह, 5.वामन, 6.श्रीराम, 7.श्रीकृष्ण, 8.परशुराम, 9.बुद्ध एवं 10.कल्कि. इनको शामिल करते हुए कुछ अन्य अवतारों का भी उल्लेख ग्रंथों (श्रीमद्भभागवत महापुराण, देवी भागवत, सुखसागर आदि) में मिलता है, उन्हे मिला कर चौबीस अवतार हो जाते हैं. ये चौबीस अवतार हैं – 1.श्री सनकादि (चार बालकों का समूह जो सदा बाल रूप में ही रहता है. धरती पर इनके आने की कोई लिखत ग्रंथों में नही मिलती. ये ऊर्ध्वलोकों में ही विचरण करते हैं.) 2.नारद ( ये तो ब्रह्मा के पुत्र हैं और इन्हे मोह भी हुआ था जिसका भञ्जन विष्णु जी ने ही इन्हे वानरमुख देकर किया था एवं इन्ही के शाप से उन्हे रामावतार लेना पड़ा था. ये तो अवतार – अवतार की टक्कर हो गयी, एक अवतार मोहग्रस्त और एक नें मोह निवारण किया और मोहग्रस्त ने शाप भी दिया – बड़ा घालमेल है ) 3.नर – नारायण ( दो अवतार जो साथ ही रहते हैं – इन्हे कृष्ण और अर्जुन भी कहा जाता है ) 4.मत्स्य, 5.कूर्म, 6.वाराह, 7.नृसिंह, 8.वामन, 9.गजेंद्रोधारावतार, 10.यज्ञ, 11.हयग्रीव, 12.कपिल, 13.दत्तात्रेय, 14.पृथु, 15.ऋषभदेव, 16.मोहिनी, 17.धन्वंतरि, 18.हंस, 19.वेदव्यास, 20.परशुराम, 21.राम, 22.कृष्ण, 23.बुद्ध और 24.कल्कि. इनमें राम और कृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं और बाक़ी अंशावतार.
कथा्वाचन हयग्रीवावतार का हो रहा है सो हे उत्सुकजन! अब इसी कथा को आगे बढ़ाता हूं. हयग्रीवावतार भया तो भारत भूमि में किंतु फैला जापान और तिब्बत में भी. फैला से यह मतलब न लगाया जाय कि वहां विष्णु के हयग्रीवावतार की पूजा होने लगी. हमारे यहां बुद्ध शांति, प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं. हर जगह मूर्तिकला या चित्रकला में उनके मुख पर अद्भुत शांति और अति मंद मुस्कान छायी रहती है. वे बहुधा पद्मासन में होते हैं और कानों तक फैले बड़े- बड़े नेत्र अर्धनीलिमित अर्थात अधखुले होते हैं . मुख पर शांति के अतिरिक्त करुणा भी विद्यमान रहती है. वे निर्वेद के मूर्तिमान स्वरूप हैं वहीं तिब्बत और जापान में बुद्ध भिन्न भिन्न मुद्राओं और अवतारों में हैं. वे हास्य मुद्रा में भी हैं, क्रोधावस्था में भी और रौद्र रूप में एक योद्धा के रूप में भी मठों की दीवारों पर चित्रित हैं. बुद्ध का यह अवतार ‘अवलोकितेश्वर’ कहा जाता है. कई हाथ, हाथों में भयंकर अस्त्र – शस्त्र लिये हुए और अद्भुत लययुक्त मुद्रा में अवलोकितेश्वर बुद्ध की प्रतिमायें मठ में दिखती हैं. रौद्र और नृत्य का अद्भुत संगम है इन चित्रों और मूर्तियों में. जापान में भी कुछ बौद्ध मठों में “हयग्रीव’ रूप में बुद्ध किंवा अवलोकितेश्वर विराजमान हैं. सिक्किम के संग्रहालय में विभिन्न मुद्राओं बुद्ध / अवलोकितेश्वर की मूर्तियां हैं. बुद्ध ही वहां कृष्ण हैं, शिव हैं और विष्णु हैं. लक्ष्मी व अन्य देवियों को भी वहां तिब्बती मुद्रा और श्रंगार में गढ़ा गया है. शिव की एक विलक्षण प्रतिमा सिक्किम संग्रहालय में है. अनेक भुजाओं वाले शिव रौद्र रूप में युद्धरत हैं और उनकी बाहों में पार्वती जी भी हैं. संग्रहालयों और मठों में फोटोग्राफी वर्जित होने से वे बस आंखों में ही बसे हैं.
हयग्रीवावतार की मूर्तियां जापान और तिब्बत में
होने के बारे में नेट से पता चला, बाक़ी जो कथा कही – वह स्मृति में बसी है, वहीं
से ली. इन ग्रंथों का अध्ययन बाल्यकाल से करता रहा हूं सो सब लगभग मालूम ही है, जो
छूट जाता है वह फिर से ताज़ा कर लेता हूं, जैसे दशावतार पूरे मालूम थे, चौबीस
अवतारों में कुछ देखने पड़े.
थोड़ा विषयांतर – तिब्बत की मठ कला में रौद्र और भयंकर रस का प्राचुर्य है. शांत रस और सौंदर्य भी वहां किञ्चित उसी रंग में है और मांगलिक चिन्ह भी भयंकर ही हैं. मैं जब सिक्किम गया तो कुछ मुखौटे और हैण्डिल लाया भी जो मेरी कुटिया के द्वार पर लगे हैं. तिब्बत और जापान के हयग्रीव विग्रह के साथ अपनी कुटिया के द्वार पर लगे मुखौटे और हैण्डिल का चित्र और. ड्रेगन के चित्र वाली चीन की केतली का चित्र फिर कभी प्रसंग उपस्थित होने पर अन्यथा अधिक जिज्ञासा हो रही हो तो कुटिया पर पधारें.
हयवदन नाम से एक नाटक भी है जो गिरीश कार्नाड
ने लिखा है.नाटक मूलतः कन्नड़ में है जिसका हिन्दी अनुवाद भी हुआ और मञ्चित भी खूब
हुआ. नाटक हयग्रीवावतार के बारे में नहीं, एक लोक कथा पर आधारित है जिसमें दो अभिन्न
मित्र हैं, एक कोमल प्रकृति का, संगीतप्रेमी और दूसरा एक पहलवान. पहलवान मित्र एक
सुन्दरी पर रीझ जाता है तो गायक मित्र यत्नपूर्वक उसका विवाह उस कन्या से करा देता
है. कालांतर में एक यात्रा पर जाते समय देवी को दिए पुराने वचन के अनुपालन में एक
मित्र देवी को शीश अर्पित करता है तो मित्र शोक में दूसरा भी अपना सर काट देता है.
पत्नी वहाँ से कुछ दूर थी, आने पर वह यह दृश्य देखती है तो देवी से अनुनय-विनय
करती है तो देवी बताती है कि इनके सर धड़ पर लगा दो तो ये जीवित हो उठेंगे. पत्नी
ऐसा ही करती है किंतु हड़बड़ी में पति का सर मित्र के धड़ पर व मित्र का सर पति के धड़
पर लगा देती है. अब दोनों जीवित हो उठते हैं तो बड़ा धर्मसंकट उत्पन्न होत है कि
किसे अपना पति माने ? देह प्रमुख कि मस्तिष्क ? अब क्या होता है और परिणिति क्या
होती है ? इसके लिए नाटक देखें अथवा पढ़ें. देवी का चरित्र चित्रण भी बड़ा मज़ेदार व
हास्ययुक्त किया है.
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अथ श्री हयग्रीवावतार कथा पञ्चमोध्याय ( क्षेपक ) संपन्न ---
Friday, 26 July 2024
रसगुल्ला !
आते हैं रसगुल्ला खाने पर, मतलब खाने के तरीके पर.
“तो रसगुल्ला कैसे खाते हैं आप ?”
“कैसे क्या ! अरे भाई, मुहँ से खाते हैं ! और कैसे ?“अरे वह मतलब नहीं है. मुहँ से तो खाएंगे ही, मुहँ के अलावा भी और कहीं से खाते हैं क्या ?”
यह सवाल इसलिए पूछा कि बहुत पहले, अब से करीब चौथाई सदी पहले एक को रसगुल्ला ऐसे खाते देखा कि सदमा लगा, धिक्कारयुक्त आश्चर्य से आँखे फैल गयीं. कुछ ने तुरन्त टोका और चर्चा तो बाद तक होती रही. खाया ही उसने ऐसे वीभत्स से ढंग से था ! रसगुल्ले व रसगुल्ला प्रेमियों के लिए मानसिक प्रताड़ना थी ! हम एक ट्रेनिंग में औरंगाबाद में थे. लंच में खाने के साथ रसगुल्ला भी था. एक ने बाउल से रसगुल्ला उठाया, उसे बाउल में ही ऐसा निचोड़ा कि सारा रस निकल गया, सिर्फ गुल्ला बचा. वो गुल्ला उसने एक बार में ही मुहँ में रखा और खाया. सबको अजीब लगा, वीभत्स भी क्योंकि किसी को ऐसे रसगुल्ला खाते देखा न था. उस समय लोग इतना डायबिटीज कांसस न थे कि रसगुल्ला खायें किन्तु रस से परहेज करें. सब युवा भी थे और तब युवाओं में आज की जीवनशैली की बीमारियां – शुगर, ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारियां आदि कॉमन न थीं बल्कि युवाओं को होती ही न थीं. कुछ ने टोका भी कि ये कैसे खाया ? प्रश्न नहीं, धिक्कार कि इस ढंग से खाया, ऐसे भी कोई खाता है ! आपस में कहा भी कि बड़ा गंदा तरीका है. उसने बताया कि रस बहुत मीठा होता है, नुकसान कर सकता है.
भला रस निचोड़ कर जो गुल्ला खाया, उसमें कैसा स्वाद ! वो तो फीका सा, केवल छेना हुआ. सादा छेना तो ऐसा होता नहीं कि मिठाई के तौर पर खाया जाए, भले ही कुछ देर पहले वह रस में डूबा रहा हो.
रसगुल्ला तो तभी रसगुल्ला होता है जब वह रस में डूबा हो और रस सहित ही खाया जाए. बिना रस के वह रसगुल्ला थोड़े न रह जाता है. रसगुल्ला चीज़ ही ऐसी है कि सोच या देख कर ही मिठुआ लोगों के मुहँ मे स्वाद घुलने लगे. रसगुल्ला ! आहा !! रसोगुल्ला ! नाम लेते ही जैसे मुहँ में रस भर आता है – हाँ, मधुमेहियों के मुहँ में भी ! रसगुल्ला तो जानते हैं न आप, पहचान तो गये ना ! नहीं, नहीं ! यह नहीं कह रहा कि आप रसगुल्ला को नहीं जानते ! वो क्या है ना कि कुछ लोग रसगुल्ला और गुलाबजामुन को अलग़-अलग़ न पहचान कर दोनों को रसगुल्ला ही जानते / कहते हैं – रसगुल्ला को सफेद वाला या छेने का रसगुल्ला और गुलाबजामुन को काला वाला रसगुल्ला ! ऐसे बंधु – बांधवियों के लिए स्पष्ट किया जाता है कि रसगुल्ला तो सफेद या छेने वाला ही होता है, वो खोया वाला, काला–भूरा-सुनहरा सा, गुलाबजामुन होता है. काला वाला काला-जाम होता है पर रसगुल्ला नहीं होता, भले ही वह भी गुल्ला होता है और रस में डूबा होता है. छेना का ही और उसी आकृति का. जो वह बड़ा सा, पीले रंग का जो होता है, वह ‘राजभोग’ कहाता है, रसगुल्ला नहीं. राजभोग हो या जनभोग – वह इतना बड़ा होता है कि कुछ ही लोग उसे समूचा मुहँ में रख कर, बिना गले में फंसे, चुभला कर खा सकते हैं, अन्यथा तो चम्मच से काट कर ( चम्मच से काटने के बाद भी काटना दांत से ही होता है ) खाना उचित और सुविधाजनक होता है. जो समूचा मुहँ में रख कर आसानी से खा लेते हैं, वे सम्भवतः बताशे ( गोलगप्पे या कुछ लोग पानीपूरी तो अब कहने लगे हैं, हम तो पुराने समय से बताशा कहते हैं ) खाने के अभ्यस्त होते हैं, उसमें भी कहते हैं, ‘भईया, ये क्या छोटे-छोटे, पिचके – पिचके दे रहे हो ! फूले – फूले और बड़े – बड़े खिलाओ !’ ऐसे लोग राजभोग भी आसानी से एक बार में समूचा खा लेते हैं. रसगुल्ला तो वही है, मध्यम आकार का, एक बार में, समूचा मुहँ में रखने वाला. वैसे छोटे – छोटे से रसगुल्ले भी आते हैं जो उनके लिए हैं जिनका मुहँ नहीं खुलता. रसगुल्ला खाने वाले उन्हें पसंद नहीं करते क्योंकि वे गुल्ला तो होते हैं पर उनमें उतना रस नहीं होता जितना मानक रसगुल्लों में, फिर भी वे उन्हें खाते हैं. सोफिकेस्टेड / टेबल मैनर्स का पालन करने वाले तो नफासत से, चम्मच में एक लेकर, खाते हैं और एक ही खाते हैं पर कुछ लोग एक बार में तीन – चार भी खा लेते हैं. छोटे / मिनी रसगुल्ले रसगुल्ला के नाम पर धोखा हैं, इनमें वो बात नहीं होती जो रसगुल्ला में. रसगुल्ला के नाम पर कलंक हैं मिनी रसगुल्ले – मरघिल्ले, सूखे-सूखे !
अब सब चीज़ों की तरह इसमें भी प्रयोग होते हैं, फ्यूजन के चक्कर में दो चीज़ों का मज़ा बेमज़ा कर देते हैं. न इसका स्वाद मिलता है, न उसका. गुड़ के रसगुल्ले (गुलाबजामुन) बनते हैं तो छेना के बजाय चावल के रसगुल्ले भी और ब्रेड के भी. ब्रेड का पकौड़ा तो ठीक है, पर रसगुल्ला ! वैसे बनाने वाले तो ब्रेड का दही बड़ा भी बनाते हैं और्फ शाही टुकड़ा भी. मुझे तो इसके नाम पर ऐतराज है, एक तरफ शाही दूसरी तरफ टुकड़ा. शाही लोग क्या टुकड़खोर हो गए !
खैर, रसगुल्ले पर ही रहता हूँ और एक वाकया बयान करके ‘अपनी वाणी को विराम’ और आपकी वाणी को आमन्त्रण देता हूँ. रसगुल्ला को ठण्डा खाने का आनन्द है जबकि गुलाबजामुन को गरमागरम. वैसे बनने के तुरन्त बाद और काफी देर बाद तक दोनों गरम रहते हैं मगर हलवाई दोनों का समुचित उपचार करता है. रसगुल्ले की कढ़ाही या परात को धीमी आँच पर रखता है तो रसगुल्लों के बड़े बाउल को ‘ठण्डे वाले काउण्टर’ ( उसका कोई तकनीकी नाम होता है जो मुझे नहीं मालूम) में और ग्राहक को केवड़ा या और कोई ख़ुश्बू-वुश्बू छिड़क कर देता है. विडम्बना कि एक दिन मुझे गरम रसगुल्ले खाने पड़े और कुछ देर के अन्तराल से फिर से ! हुआ यह कि मुझे एक जगह जाना हुआ. अब कुछ लोग ऐसे हैं जिनके यहाँ खाली हाथ नहीं जाते, कुछ मीठा ले जाते हैं. हमारी तरफ ( जानकीपुरम में ) ‘देहाती रसगुल्ले’ नाम से एक दुकान है जो बड़े – बड़े रसगुल्ले बनाता है. वहाँ से दस पैक कराए और दो वहीं खाने के लिए लिए. अब वो बिल्कुल ताज़ा थे, कड़ाही में ही पड़े थे सो गरम थे. अब रसगुल्ला के खवैया समझ सकते हैं कि मैंने कैसे खाये होंगे, खाये क्या, ज़हरमार किया, ज़ुबान को धोखा दिया, बहलाया ! फिर उनके घर गया. सलीका है कि बैठने पर चाय वगैरह से पहले पानी पेश किया जाय और सूखा नहीं, कुछ मीठे के साथ. उस दिन उनके घर में मीठा न रहा होगा सो मेरे लाये हुए में से दो पीस पेश किए. ऐसे ढ़ीठ रसगुल्ले कि अब भी गरम थे. मैंने बहाना किया कि अब मीठा नहीं खाता, इसे हटा लीजिए. उन्होंने इसरार कि या कि अरे लीजिए ! इतने से कुछ नहीं होता. फिर से मना करने पर उन्होंने एक निकाल लिया कि अच्छा एक तो लीजिए ही. अब क्या करता ! फिर से गरम रसगुल्ला खाना पड़ा. उसके कुछ दिन बाद तक रसगुल्लों से जी हटा रहा.
अब मेरी वाणी को विराम और आपकी को शुरू ! बताएं अपने अनुभव, न हों तो प्रतिक्रिया ( इमोज़ी के साथ टिप्पणी भी) तो दीजिए ही दीजिए.
( 'मीठी-मीठी बातें' मेरे इसी ब्लॉग ' पर हैं. 27 फरवरी, 2023 की पोस्ट 'मीठी-मीठी बातें' भी देख लें.
)
Thursday, 11 July 2024
चचा चटपटे !
शाम का चाय – नाश्ता करके लैपटॉप पर कुछ करने बैठा था (बात न पकड़िएगा, लैपटॉप पर नहीं बैठा था. बैठा तो हस्बेमामूल और आम लोगों की तरह कुर्सी पर था, लैपटॉप मेज पर था और जैसे सब की बोर्ड और माउस से कुछ लिखते/चैटियाते/रीलियाते/फेसबुकियाते हैं … वैसे ही) कि ज़ोर की हांक सी सुनाई पड़ी,
“घर में हो भई कि कहीं गये हो?”
“घर में ही हूँ चचा, आ जाईए !” प्रत्युत्तर
में वैसा ही हांकनुमा आमन्त्रण दिया.
चचा के गेट खोलने और सीढ़ियां चढ़ने
की आवाज़ सुनाई दी. चचा को तो जानते ही होंगे आप लोग, कई बार मिल चुके हैं. चचा जगतचचा
हैं, मतलब मेरे पिताजी की वय के लोग भी इन्हें चचा कहते हैं, मेरी वय के भी और मेरी
बेटी की वय के भी और स्कूल जाने वाले बच्चे भी. और तो और, चची भी इन्हें चचा ही कहती
हैं, चचा की अम्मी भी और सास भी. जगतचचा हैं तो चचा की लोकप्रियता का अनुमान लगा सकते
हैं. चचा की तीन श्रेणियों में मेरे लिए हैं तो चचा बुजुर्गवार की श्रेणी के, किन्तु
हमसे नाता चचा यार श्रेणी का रखते हैं. चचा वो हैं जो आ जायें तो कोई वो काम नहीं कर
सकता जो कर रहा होता है. चचा कॉल बेल वगैरह के चक्कर में नहीं पड़ते, आवाज़ देते हैं
और मोबाईल रखते तो हैं पर कॉल करके कभी नहीं आते, काहे से कि, ‘शहर में कोई एक तुम्ही
थोड़े न हो, हर घर में दो – तीन भतीजे तो होंगे ही, ये न मिले तो उससे मिल लेंगे मगर
जिसके यहाँ पहले गये हैं वो मिल जाय तो बेहतर.’
चचा कमरे में आये. तशरीफ रखी तो सौ बार
पूछा सवाल पूछा जिसका हर बार एक ही जवाब मिला. कहा,
“चचा, घण्टी बजा लिया कीजिए ! काहे गले
को इतनी तकलीफ देते हैं. आपके बैठने से पहले वह बैठ गया या पड़ गया तो आगे क्या करेंगे
?”
“
ये घण्टी-घण्टा के चक्कर में हम नहीं पड़ते. कौन सा तुम बादशाह जहांगीर हो जो घण्टा लटकाए हो और हम कौन सा फरियादी हैं जो घण्टा बजाएं.”
“फिर भी ! ऐसी हांक लगाने से इर्द
गिर्द के दस घरों तक आवाज़ जाती है, सब जान जाते हैं कि किसके यहाँ कौन आया है.”
“तो ! जान जायं ! कोई चोरी है क्या
? वो तो हम एक और वजह से बजाय घण्टी बजा कर आने के इस तरह मुनादी सी करके आते हैं.
बहू-बेटियों वाला घर है. जाने कैसे लेटी-बैठी हों, क्या पहने हों, क्या कर रही हों.
ऐसे आने से पता चल जाता है, जिसको पर्दा-उर्दा करना हो कर सकती हैं, कपड़े बदलने हो
तो बदल सकती हैं, ठीक से बैठ सकती हैं या अन्दर जा सकती हैं. चचा हैं हम ! बहू-बेटियों
कि बेहुरमती न हो, ये ख़्याल तो हमें ही रखना होगा ना !”
“हाँ, यह तो है. कायल हो गया आपके
तरीके का.”
“वो तो होओगे ही. हम न ग़लत कहते हैं,
न करते हैं.”
“ग़लत तो करते हैं चचा ! अभी पिछली
बार आप बाथरूम में वाश बेसिन पर पैर रख कर धो रहे थे. एक पैर उस पर था, दूसरा ज़मीन
पर. पता नहीं किस धुन में थे कि बिना वह पैर उतारे दूसरा उठा दिया और धड़ाम हो गये.
वो तो फ्रैक्चर नहीं हुआ. और वो जो चाकू से आम खा रहे थे और होंठ कट गया. इस बार भी
ज़रूर कुछ अज़ूबा करके आए होंगे”
“अरे वो तो हो गया ! हमारे अलावा ऐसा
कोई और कर सकता है भला ? सब करने लगें तो आम लोगों और चचा में क्या फर्क रह जाए !”
“छोड़िए ये सब, आपसे बातों और हरकतों
में कौन जीत सकता है भला ! ये बताईए कि चाय-कॉफी लेंगे या शरबत. पहले ये मीठा खाकर
पानी पीजिए, उसके बाद जो कहें, पेश हो.”
“चाय-कॉफी या शरबत या मीठा कुछ नहीं.
आज तो कुछ खूब चटपटा, तीखा, खट्टा खिलाओ. न हो कुछ ऐसा तो ये करो कि मुट्ठी भर हरे
मिर्चे कटवा कर, खूब खटाई, नमक, अचारी मसाला डाल कर छौंकवा दो, तब साथ में चाय चल जायगी.”
गजब ! ऐसा क्या चचा ! आप तो बड़े मिठुआ
हैं पर मीठे को मना कर रहे हैं और मिर्चे चबाने को कह रहे हैं!”
“ तो मीठे के बंधुआ थोड़े न हैं. आज
सुबह से ही चटपटा खाने का मन कर रहा था, खूब चटपटा, तीखा, खट्टा ! मन को मारा नहीं,
खाया भी. बाहर नहीं घर पर ही और ख़ुद बना कर ! मेरा मन भी ऐसा है कि कभी खूब मीठा खाने
को करता है, कभी, खट्टा और कभी तीखा. फीका खाने का उतनी शिद्दत से मन नहीं करता, वो
तो वैसे ही खाता हूँ. लौकी, तुरई, बीन्स आदि बिना तेल मसाले की ही बनती है और हम दोनों
ही चाव से खाते हैं, गरमी में तो लगभग रोज ही. तो आज खूब चटपटा, तीखा, खट्टा की खवास
लगी. नाश्ते तक सबर किया, चाय ( ग्रीन टी ) के साथ नमक – रोटी खाई, रोटी में घी भी
था. नाश्ते में नमक रोटी हम अक्सर खाते हैं, बासी ( रात की रखी ) हो तो ठीक, नहीं तो
तुरंत की बनी भी खा लेते हैं. नमक कभी लहसुन मिर्चा का होता है, मिर्चा कभी हरा तो
कभी लाल, तो कभी खटाई मिला, कभी तेल या घी मिला. कभी कई मसाले मिला कर बनाया हुआ.
आज खूब चटपटा, तीखा, खट्टा खाने मे
नाश्ता के बाद शुरुआत पानी में नींबू और नमक से की, खट्टे की वजह से कुछ सन्तोष मिला.
फिर खाने के साथ लच्छेदार कटा महीन प्याज सिरका के साथ मिला कर खाया. नारी का खट्टा
साग और घुंईया के कोमल पत्तों के साथ बनी चने की दाल तो थी ही. थोड़ी देर बाद फिर तलब
लगी तो सिरके में बना सहजन – हरे मिर्च का अचार खाया, रूखा ही, बिना दाल – चावल –रोटी
के. मज़ा आ गया तो कई बार खाया. बेटी के बनाए हुए ‘मिर्चौने आलू’ और ‘मिर्चौने चावल’
की याद आयी, वह कभी-कभी बनाती थी, अब तो शादी हो गयी, ससुराल में है नहीं तो बना देती.
नवाबगंजी आलू अब देखने को नहीं मिलता नहीं तो उबले हुए और हरी धनिया के साथ मिर्चौने
आलू बनते. घण्टा-खांड़ ठीक रहा फिर खूब चटपटे पापड़ ओवन में भून कर खाये…
“हे भगवान चचा ! आप भी क्या हैं !
इतना तीखा, इतना चटपटा, इतना खट्टा ! कुछ उम्र का तो लिहाज करते !”
उनका ऐसा खाना और यह वय देखते हुए दहशत
और उनके बीमार होने आशङ्का से मैंने बीच में टोका.
“उमर का लिहाज ! क्या हुआ हमारी उमर
को! माना के अब बाली उमरिया नहीं है और न ही गदह पचीसी मगर अभी अस्सी के भी तो नहीं
हुए. बीच में टोक देते हो. बड़ी खराब आदत है, बेसब्रापन है. अब आगे का सुनो हवाल.” और
चचा आगे बढ़े.
… शाम को नाश्ते में भुने चने में
प्याज छोटा-छोटा कतर कर डाला, एक नींबू निचोड़ा, थोड़ा सिरका, थोड़ा सरसों का तेल, सादा
नमक ( साधारण नमक, नमक भी कहीं सादा होता है), थोड़ा मसालेदार नमक डाला. काला नमक डॉक्टर
ने मना किया है नहीं तो वह भी डालता. हाथ से अच्छी तरह मिलाया और खाया. चम्मच से मिलाने
में वो बात नहीं आती. तुम्हारी चची ऐसा ज़हर
खा न पायीं मगर मुझे मज़ा आ गया. यहाँ आने से पहले फरेंदा को लोटे में डाल कर ऊपर से
नमक बुर्राया और अच्छी तरह हिला-हिला कर खूब घुलाया, घुल भी गये और उनमें नमक भी पैबस्त
हो गया. इस समय वही खाकर आ रहा हूँ, रात की रात को देखी जाएगी. चचा ही यह सब कर सकते
है, नौकरीशुदा या बिजी पेशेवर या व्यापारी या बड़े लोगों के नसीब में कहाँ यह मज़ा !”
“आप ही लें यह मज़ा. हम साधारण आदमी
ही भले. अरे माना उम्र कोई बहुत नहीं हुई, अभी अस्सी के नहीं हुए पर यह सब खाने से
भयङ्कर एसिडिटी, सीने में जलन होगी. पेट भी खराब होगा, सुबह–शाम जब भी जाएंगे बहुत
कष्ट होगा, आगे बवासीर भी हो सकती है. आपको तो यह सब ख़्याल रखना चाहिए. सादा और कम
खायें.”
“तुम तो ऐसा खाका खींच रहे हो जैसे
हम रोज और आठों याम ऐसा ही खाते हैं. अरे आज खवास लगी तो खा लिया, कल भी लगेगी तो कल
भी खा लेंगे मगर रोज ऐसी लगी या आदत बना ली तो खुदै छोड़ देंगे. हम तो सादा जीवन, उच्च
विचार के कायल हैं. और फिर एसिडिटी –वेसिडिटी के डर से क्या ज़बान का चटखारा छोड़ दें,
मन को मार लें, सधुआ जाएं. ख़ुदा दुश्मन कोप भी ये दिन न दिखाए कि कुछ खाने का मन हो
और तकलीफ होगी या आगे चलकर ये हो जाएगा, वो हो जाएगा के डर से खा न सके. कल को मरना
ही है तो क्या अभी मर जाएं ! अरे तकलीफ होगी तो डॉक्टर, वैद्य, हकीम काहे के लिए हैं.
उनके भी धंधे की फिकर है हमें. दवा ले आएंगे, ठीक हो जाएंगे. फिर सौ बात की एक बात
– रोज और आठों याम ऐसा ही नहीं खाते हैं, मन चला तो खा लिया. बात का बतंगड़ बनाते हो.
जहाँ फांस न जाय वहाँ बल्ली घुसेड़ने पर लगे हो.
वो मिर्चे छौंके बहू ने कि हम घर जायं या कोई
और घर देखें या अपने घर जाकर खायें ?”
चचा की बात खतम होते न होते बेटी एक
ट्रे में चचा की रेसिपी वाले छौंके मिर्चे, भुजिया, पकौड़ियां, चाय और टोकरी भर नसीहतें
देकर अन्दर चली गयी.
“सलाम चचा ! नाराज़ न होईए. पापा को
तो आपको छेड़ने में मज़ा आता है. वैसे कह तो सही रहे हैं, आपको यह सब इतना और लगातार
नहीं खाना चाहिए. मन किया था तो ज़रा सा, मुहँ का जायका बदलने भर को खा लेते. चची नहीं
टोकतीं आपको !”
“येSSSए ल्लो ! काजी घर के चूहे सयाने.
बाप सेर तो बेटी सवा सेर ! अब ये भी नसीहत करने लगी. मगर भई, इसकी नसीहत बुरी न लगी,
बड़ी प्यारी और जहीन बच्ची है, अल्ला सलामत रखे, खूब पढ़े.” कहते हुए चचा ने मिर्चों
की कटोरी उठाई और सी-सी करते हुए खाने लगे. जो खाकर आए थे, वो हल्का रहा होगा, ये निखालिस
हरे मिर्चे थे.
खाकर, चाय पी. ज़माने के हालात पर तब्सिरा
किया और चलने के इरादे को व्यक्त करते हुए बोले,
“मज़ा आ गया ! चोला मगन हुआ, आत्मा
तृप्त हो गयी. अब व्रत पूरा हुआ, जाते में निराला नगर पर बताशे खाता जाऊँ तो उद्यापन
हो, पूर्णाहुति हो. चलते हो खाने ?”
“आप ही को मुबारक ! मुझे यह शौक़ नहीं.
और चचा, बताशों के पानी में स्वाद जानते हैं काहे से आता है ! वह जो कोहनी तक हाथ घड़े
में डाल कर बताशा डुबोता है, उसका स्वाद है. पता नहीं हाथ ठीक से धोता है, नाखून काटता
है या नहीं, शर्ट धुली होती है या बताशे के पानी से ही धुल जाती है !”
हमने चचा को चिढ़ाया. हम
जानते हैं कि वह बताशे वाला साफ-सुथरा रहता है, ठेला तीन तरफ से पन्नी से ढका रहता
है, पानी के ड्रम ढक कर रखता है और पानी निकालने वाले से पानी निकालता है, कोहनी तक
हाथ डुबो कर नहीं.
“फिर छेड़ा हमें ! जलते हो हमारे खाने
–पीने से. जाओ हम नहीं आएंगे अब !” कहते हुए चचा जीने से उतर गए. उनका जाना ऐसे ही
होता है, किसी न किसी बात पर तुनक कर जाते है मगर इस बार का तुनकना झूठा था. शब्द कुछ
थे, आंखें और मुस्कान कुछ और बयां कर रही थी. देखें अब चचा कब आते हैं और क्या नयी
बात बताते हैं.
Wednesday, 10 July 2024
पुस्तक परिचयः ‘जो हिन्दुस्तान हम बना रहे हैं’ और ‘भारत की घड़ी’
पुस्तक परिचयः ‘जो हिन्दुस्तान हम बना रहे हैं’ और ‘भारत की घड़ी’
आज प्रियदर्शन लिखित दो पुस्तकें, ‘जो हिन्दुस्तान हम बना रहे हैं’
और ‘भारत की घड़ी’ मिलीं. दोनों कथेतर हैं और समय – समय पर लिखे लेखों का संकलन
हैं.
पहली किताब, ‘जो हिन्दुस्तान हम बना रहे हैं’ के लेख गत
कुछ वर्षों में भारत में हुए बदलाव पर गहन और विवेचनात्मक नज़र और चिंता को व्यक्त करते
हैं. इसका उपशीर्षक ‘परम्परा के आईने में भारत
की पहचान’ है. शीर्षक, उपशीर्षक और प्रियदर्शन को देखते हुए यह लेख निश्चित ही
गत कुछ वर्षों में भारत में हुए आर्थिक बदलाव / ‘विकास’ या राजनीतिक सम्बन्धों पर नहीं
हैं बल्कि इस राजनीतिक परिदृश्य में जो सामाजिक, सांस्कृतिक बदलाव, बल्कि विचलन, हुए
हैं, संस्कृति और राष्ट्रवाद के आवरण में जो सामाजिक विघटन आदि हुआ है, राष्ट्रवाद
की एक नयी और एकांगी अवधारणा विकसित की गयी है – उसका लेखा जोखा है. इस किताब में 46
लेख हैं.
दूसरी किताब, ‘भारत की घड़ी’, भी गत वर्षों में हुए उसी
विचलन पर विवेचनात्मक दृष्टि डालती है. इसमें हाल की ही घटनाओं के निहितार्थ ही नहीं
बल्कि कुछ पुरानी घटनाएं भी ली गयी हैं, दलित और स्त्री प्रश्नों को भी उठाया गया है.
इस किताब का उपशीर्षक ‘बदलते भारत का लेखा
जोखा’ है. पहली किताब की तरह इसमें भी आर्थिक प्रश्न / ‘विकास’ नहीं है. लेख भी उपशीर्षकों में बांटे गये हैं – ‘दलित
होने का मतलब’, इसमें 6 लेख हैं, ‘विचार और विचारहीनता के संकट’ में 8 लेख हैं, ‘स्त्री
होने का मतलब’ में 10 लेख हैं और शुरू में 18 लेख हैं जिन्हें किसी उपशीर्षक में नहीं
रखा गया है. इस किताब में कुल 32 लेख हैं.
मेरी समझ में ऐसी किताब उपन्यास
या कहानी या नाटक की तरह एक बार में / अविकल पढ़े जाने के लिए नहीं होती, अन्य कथेतर
की तरह भी एक साथ पढ़ना उचित न होगा. ऐसा करना अरुचि उत्पन्न कर सकता है, अपच या बोरियत
जैसा, आप ऊब कर किताब छोड़ भी सकते हैं या सबका प्रभाव गड्डमड्ड होकर मिट सकता है.
आलेख वाली किताब
के आलेख रोज या एक दिन छोड़ कर एक या दो पढ़ने चाहिएं, बल्कि एक-दो आलेख के बाद एक दिन
का अन्तराल देकर दूसर्री किताब पढ़ना उचित होगा. मेरा तो यह विचार है, अन्य सुधी/ गम्भीर
पाठकों का कोई दूसरा भी हो सकता है – आपका क्या है ? किताब उनके लिए आवश्यक सी
है जो इस तरह की किताबें पसन्द करते हैं.
दोनों किताबें सम्भावना प्रकाशन
से हैं, पेपरबैक हैं. पहली किताब का दाम 300/- और दूसरी का 350/- है, 650/- की दोनों
किताबें प्रकाशक से ( अभिषेक अग्रवाल, फोन नम्बर 7017437410 ) से मंगाने पर 400/-
(शिपिंग फ्री) में मिलीं.
***********************
लेखों की चर्चा
अश्लीलता की बात पर कुछ !
अपनी बताई विधि से प्रियदर्शन
की किताब, ‘जो हिन्दुस्तान हम बना रहे हैं’
को पढ़ना शुरू किया. इस क्रम में लेख, ‘यह अश्लीलता
क्या होती है ? इससे कौन डरता है ?’ को पढ़ा. इसमें अश्लीलता को सतही/रूढ़ अर्थों
में ही न लेते हुए उसके विभिन्न आयामों पर चिन्तन है कि अंगप्रदर्शन/ नग्नता के अलावा
भी क्या-क्या अश्लील हो सकता है या क्या अधिक अश्लील है – अंगप्रदर्शन/ शारीरिक नंगई
या अन्य तरह की नंगई !
लेख पुराने हैं
तो उनमें तत्कालीन घटनाओं को लिया गया है इसलिए अश्लीलता के प्रश्न पर रणवीर सिंह के
लगभग नग्न / अश्लील फोटोशूट की/ के बहाने चर्चा है. इस फोटो शूट की चर्चा के साथ कुछ
अन्य अश्लीलता विमर्श भी हैं. अगर विस्तार में जाते और लेख पुराना न होता तो समाज में
पैसे का अथाह और निर्लज्ज प्रदर्शन, अरबों रुपयों की शादियां और उनका मीडिया द्वारा
महिमामण्डन जैसा, चारणगान जैसा बखान, राजनीति में रिसॉर्ट अपसंस्कृति में अकूत धन का
खुला खेल, जाति – धर्म का आक्रामक उभार … तमाम चीज़ें अश्लीलता / विद्रूप की श्रेणी
में ही आती हैं – इन पर भी बात होती. जब देश की बड़ी आबादी अभाव की सीमा पर जीवन – यापन
कर रही हो, चिकित्सा, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय आदि की धरातल वाली स्थिति बदहाल हो,
तब तो यह सब और अश्लील लगता है. लेख पुराना है अन्यथा रणवीर सिंह की नंगई के साथ इस
समय की, देश की अति चर्चित, बल्कि विदेश में भी चर्चित, शादी में करोड़ों की फीस पर
आईटम गर्ल का नाच – गाना, एक सेलिब्रिटी का ड्रेस सेन्स, शादी का कॉर्ड व धन का निर्लज्ज
प्रदर्शन की भी चर्चा होती. जो होता, सो होता, अभी लेख के कुछ अंश देखें –
… अभिनेता रणवीर सिंह के बेलिबास फोटो शूट पर शुरू हुआ हंगामा थाने-कचहरी
तक पहुँच चुका है. निश्चय ही जिस सांस्कृतिक-सामाजिक माहौल में हम पले-बढ़े हैं, उसमें
ऐसी बेलिहाज़-बेलिबास तस्वीरें कुछ खटकती हैं. वे सुरुचिपूर्ण नहीं लगतीं. लेकिन किसी
दृश्य का खटकना या उसका सुरुचिपूर्ण न लगना और उसको अश्लील मान लेना दो अलग – अलग बातें
हैं. रुचि या सुरुचि काफी कुछ सामाजिक संस्कारों द्वारा निर्मित चीज़ होती है, जिसमें
समय के साथ बदलाव भी आते हैं. यही बात अश्लीलता की अवधारणा के बारे में कही जा सकती
है. जो चीज़ें कल तक अश्लील लगती थीं आज वे सुरुचिपूर्ण मालूम होती हैं. पचास और साठ
के दशकों की जिन फ़िल्मों को तब के बूढ़े-बुजुर्ग नौजवानों को बिगाड़ने वाली बताया करते
थे, वे अब क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं. बहुत सारा ऐसा साहित्य जो बीते दिनों अश्लीलता
के आरोप में जला दिया गया, अब महान मान लिया गया है.
रणवीर सिंह की
तस्वीरों पर कई ऐतराज हैं. यह कहा गया कि वे तस्वीरें अश्लील हैं. यह भी कहा गया कि
उनसे महिलाओं की भावनाओं को ठेस पहुँचती है. वे कला का नमूना नहीं हैं. उनसे पैसे कमाने
की मंशा है. जहाँ तक अंतिम दो ऐतराजों की बात है, उनका कोई ज़्यादा मतलब नहीं है. जो
चीज़ कला का नमूना न हो या पैसे कमाने के लिए की जा रही हो, यह ज़रूरी नहीं कि वह ओछी
भी हो और उस पर पाबंदी लगाई जाए…
*************
… अश्लीलता के सवाल पर आते हैं. अश्लीलता के बारे में कई बातें कही
जाती हैं. … कई बार कुछ लोगों की हँसी भी अश्लील हो सकती है और कुछ लोगों की चुप्पी
भी. जब लोकसभा में रेणुका चौधरी पर ताना कसते हुए इस देश के प्रधानमंत्री ने शूर्पनखा
की हँसी को याद किया था और उनके साथ पूरा सदन ठठा कर हँस पड़ा था तो वह एक अश्लील दृश्य
था. जब हस्तिनापुर के दरबार में द्रोपदी का वस्त्रहरण हो रहा था तब सारे महारथियों
की चुप्पी अश्लील थी. नकली विरोध भी अश्लील हो सकता है और अंध श्रद्धा भी. कभी देश
के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने बनारस में 500 ब्राह्मणों के पांव धोए थे. डॉ.
राममनोहर लोहिया ने इसे अश्लीलता की संज्ञा दी थी. उन्होंने कहा था कि जो समाज जाति
के नाम पर किसी के पांव धोता हो, वह उदासी में डूबा समाज ही हो सकता है…
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… रणवीर सिंह के फोटो शूट पर लौटें. अगर कुछ लोगों को यह मर्यादा
विरुद्ध लग रहा है तो वे इसे न देखने को स्वतन्त्र हैं. संकट यह है कि मर्यादा का अपना
भाष्य वे बाक़ी समाज पर भी थोपना चाहते हैं. और फिर इस तथाकथित मर्यादा की चपेट में
सबसे पहले और सबसे ज़्यादा स्त्रियां आती हैं. लगभग हर समाज उनका ‘ड्रेस कोड’ तय करने
को तैयार रहता है. हर देश में एक ‘डिज़ाइनर अच्छी लड़की’ बनाने की कोशिश होती है. यह
कोशिश इस कदर खतरनाक होती है कि वह लड़कियों के हर कदम को नियन्त्रित करने में लग जाती
है.लड़कियों का प्रेम करना तो पाप होता है, बाहर घूमना, किसी से खुल कर बात कर लेना,
खिलखिला कर हँस देना या किसी की बात मानने से इन्कार कर देना भी ऐसा अपराध हो सकता
है जिसके लिए उन्हें पीटा जाए, जलाया जाए और उनके साथ बलात्कार भी किया जाए.
लेकिन
अगर मर्यादा की परम्परा स्त्री के साथ इस कदर अन्यायी है तो ख़ुद को आधुनिकता की तरह
पेश करने वाली खुलेपन की परम्परा उनके साथ दूसरे छल करती है. दरअसल परम्परा लड़की का
घर में गला घोंटती है तो आधुनिकता बाज़ार में उसको बेलिबास कर मारती है. अश्लीलता की
किसी भी बहस का फायदा उठाने में बाज़ार सबसे आगे होता है. कभी वह परम्परा के साथ खड़ा
होता है और कभी आधुनिकता के साथ. उसे न तो परम्परा से लगाव है और न आधुनिकता से. उसे
बस अपने मुनाफे से लगाव है, जो बेशक, खुलेपन से कुछ ज़्यादा सधता है. लेकिन यह सच है
कि खुलेपन के नाम पर बाज़ार कई बार अपनी छुपी हुई अश्लीलता पर समाज की मुहर लगाने की
कोशिश में लगा रहता है…
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लेखक की रणवीर सिंह के फोटो शूट विषयक मान्यता से लगता है कि वह इसके पक्ष में है, शायद इसे लेखक ने महसूस भी किया और बिना सशक्त पक्ष रखे इसे लपेटने के प्रयास में अंत में कहा, ‘… रणवीर सिंह का फोटो शूट कहीं से भी कलात्मक नहीं है – न वे इसका दावा कर रहे हैं, उनके लिए वह उनकी कारोबारी प्राथमिकताओं का मामला है …













